कहानी समकालीनः आधे-अधूरे-शैल अग्रवाल/ लेखनी- सितंबर-अक्तूबर 16

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आधी-अधूरी जिन्दगी…यह ख्वाइशों की अनसुनी और अनकही कहानी ना कभी पूरी हुई है और ना ही हो पाएगी। इच्छाओं के महल खड़े होते हैं और हवा के थपेड़ों से तुरंत ही बिखर भी जाते हैं पर हम जीते हैं चुपचाप, सिर झुकाए। यही जीवन है, जटिल और अबूझ।। जैसे तेज चलती कार के चारो पहिए अचानक ही पंक्चर हो जाएँ, हमारी जिन्दगी पूरी तरह से स्टैंड स्टिल पर थी। बस इन्तजार ही इन्तजार था इसमें, वह भी एक ऐसे पल का जो सारी खुशियाँ छीन ले जाएगा हमसे।

अभी कुछ दिन पहले ही की बात है जब मैं ने छवि से कहा था कि अब यहीं रहना है उसे और मैं जा रहा हूँ, तो बच्ची सी लिपट गई थी। पूछने लगी थी- ‘ ऐसे क्यों ? तुम क्यों नहीं आओगे यहाँ मेरे साथ रहने?’
हर बात का जबाव देना आसान नहीं । सारे शब्द गले में आंसू से ही तो रुँध गए थे ।
‘ तुम्हारी तबियत खराब है न और तुम्हें इलाज की जरूरत है और मैं ख्याल ठीक से रख नहीं पा रहा हूँ, इसलिए।
जिम्मेदारी से नहीं भाग रहा पर यही सच है अब तो।‘
जैसे-तैसे खुद को संयत करके प्यार से समझाना चाहा था तब मैंने उसे।
जबाव सुनकर सहमी–सहमी सी चुपचाप खिड़की के पास जा बैठी थी वह। आगे कुछ नहीं पूछा था उसने, मानो कितना भी विभ्रम हो पर इतनी समझ बाकी थी अभी उसमें।
जिन्दगी क्यों इतनी निर्मम है-मन किया कि सामने की खिड़की से छवि को गोदी में लेकर कूद जाऊँ, छुप जाऊँ कहीं इसके साथ… बचा लूँ अपनी छवि को कैसे भी इसे इस निर्दय और निर्मम बीमारी से।
छवि भी जानती है बहुत प्यार करता हूँ मैं उससे , पर कल जो हुआ, वह नहीं होना चाहिए था। हम बड़ों की दुनिया के…जिन्दगी के नियम हैं कुछ जिनके अनुसार चलना ही पड़ता है। पर वह भी करे तो क्या करे ? होश में ही कहाँ रहती है अक्सर। याद ही नहीं रह पाता कुछ भी…
कितना तो करता हूँ मैं- खिलाना-पिलाना, नहलाना, तैयार करना सबकुछ, फिर भी कुछ न कुछ छूट ही जाता है। जाने कैसे कल सुबह सुबह खुद तक को साफ करना भूल गई थी और यूँ ही गन्दी ही सोफे पर आ बैठी थी। तब बच्चों सा ही तो साफ किया था मैंने उसे और इस सोफे को भी। आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे-‘ यह क्या हो गया है, किसकी नजर लग गई हमारी हंसती-खेलती गृहस्थी को ! छोटी-बड़ी सब बात भूल जाती है तो यह बात क्यों नहीं भूल पा रही छवि कि वह घर में नहीं, यहाँ केयर होम में ही रहेगी अपने रोहन से अलग और दूर! सिर दर्द से फटने लगा। जब और बर्दाश्त नहीं कर पाया तो माथा हथेलियों से दबाता चुपचाप सामने बिस्तर पर ही बैठ गया मैं।
सिर दुख रहा है क्या –लाओ दबा दूं , कहकर छवि सिर गोदी में लेकर धीरे धीरे दबाने लगी और हम दोनों ही भूल गए कि बीमार मैं नहीं, वह है।
उसके चेहरे पर आते-जाते एकएक भाव को पढ़ रहा था । जब और नहीं देखा गया तो पास जाकर समझाया, ‘ ना-ना, ऐसे नहीं सोचते। आऊँगा क्यों नहीं, रोज आऊंगा। बस चौबीसों घंटे तुम्हारे साथ नहीं रह पाऊंगा। फिर जाने से पहले स्पंज से मुंह पोंछकर बाल काढ़े थे छवि के और रात के कपड़े बदलकर बिस्तर में भी खुद ही लिटाया था मैंने उसे । सामने खड़ी नर्स की आंखें भी भर आई थीं-बहुत प्यार करते हो ना पत्नी से।
‘ रिश्ता ही ऐसा है यह- कितना भी भागना चाहूँ, जाऊंगा कहाँ! ‘
जैसे तैसे आंसुओं को रोकते हुए होठों ही होठों में खुदसे बातें करता चुपचाप बाहर निकल आया था उसदिन, मानो बहुत शर्मिंदा हूँ खुद पर। उसकी आँखों की नमी भी तो रास्तेभर सवाल पर सवाल पूछती रही थी ।
पल-पल चेहरे के हाव-भाव से ही मन की बात जानने वाला मैं अब यह तक नहीं जानता कि छवि मेरी बात ठीक-ठीक सुन या समझ भी रही है या नहीं, कि अब उसकी वाकई में किस वक्त जरूरत क्या है ? पर अब इससे ज्यादा फर्क भी तो नहीं पड़ता। निर्णय हो चुका था और डॉक्टर, सोशल वर्कर, यहाँ तक कि बच्चों की भी यही राय थी कि यही बेहतर होगा कि छवि अब यहाँ, केयर होम में ही रहे। देखभाल कहीं बेहतर हो पाएगी और मैं भी तो जवान नहीं रहा। बड़ा ही हूँ उससे।
अक्सर ही एक तेज और स्पष्ट ‘ बाय‘ कहकर मुंह फेर लेता और बाहर निकल आता, ताकि अब बहे तब बहे आंसू कमजोर न कर दें हमें।
आसान नहीं था यह हृदयहीन अति व्यवहारिक फैसला…चालीस वर्ष से छाया की तरह जिसने साथ निभाया हो, उसे यूँ ही पल भर में तज देना, वह भी तब जब शरीर से ठीक नहीं और मानसिक रूप से भी अस्वस्थ है वह। पर करूँ भी तो क्या करूँ, मेरे शरीर में भी तो सामर्थ नहीं बची। कपड़े बदलते , नहलाते, उठाते-बिठाते खुद भी तो गिरते गिरते बचा हूँ कईबार। गनीमत है हड्डी पसली नहीं टूटी, नहीं तो मैं भी बिस्तर में पड़ जाता। फिर कौन किसकी देखभाल कर पाएगा? बुढ़ापा है, अकेले नहीं संभाल पा रहा पलपल की जरूरतों को, तो यहाँ छोड़ने में बुराई भी नहीं। बस रात में सोने की ही तो बात है, सुबह उठते ही तो आ ही जाता हूँ । बच्चों-सी चौबीसों घंटे की देखभाल चाहिए …फिर भी… मन के एक चोर कोने ने आवाज उठाई और अचानक ही मेरे तेज चलते कदम लड़खड़ाने लगै। वहीं रेलिंग पकड़ कर ठहर गया मैं।
बहुत कमजोर और असमर्थ महसूस कर रहा हूँ। जाने कितने वर्ष की यह यातना और लम्बी जिन्दगी है हमारे आगे !
जाने कबसे यह सिलसिला चल रहा था पर मुझे तो तीन साल पहले ही पता चला था कि छवि के साथ कुछ गलत भी है। याददाश्त जा रही है। भूलने की बीमारी हो गई है…एक ऐसी बीमारी जिसमें धीरे-धीरे पूरा शरीर घुल जाता है। मस्तिष्क और शरीर एक दूसरे का साथ छोड़ देते हैं। सामंजस्य नहीं बिठा पाते जिन्दगी से।
कल सी ही तो याद है जब कभी कुछ न भूलने वाली छवि घर की चाभी रखकर भूल गई थी और घर का कोना-कोना उलट-पलट दिया था, पर चाभी नहीं मिली थी। रुँआसी-सी तब आई थी मेरे पास और बेहद शर्मिंदगी के साथ छुके सिर से पूछा था, ‘ रोहन, तुमने तो कहीं नहीं देखा मेरा चाभी का गुच्छा ? ‘
उस वक्त अस्त-व्यस्त बाल और मलिन चेहरे के साथ बेहद दयनीय और अस्वस्थ लगी थी सदा हंसती मुस्कुराती छवि ।
‘कहीं रखकर भूल गई होओगी, सो जाओ अब। देखना, सुबह खुद ही मिल जाएगा।‘ मैंने भी लापरवाही से ही जवाब दे दिया। परन्तु और आश्चर्य तब हुआ था जब ‘सच।‘ कहकर बच्चों के से उत्साह के साथ पल भर में ही बिस्तर में घुसते ही मिनटों में सो भी गई थी छवि।
घंटों लगे थे उस रात सोने में मुझे और सुबह देरतक सोने वाले इस रोहन की आँख भी जल्दी ही खुल गई थी। जाने कौनसे अनिष्ट की भावना थी जो हृदय पर शिला-सी आ धरी थी और दम घोट रही थी मेरा।

कूड़ा भरा कागज का थैला, जिसे शायद रात में ही बाहर फेंकने जा रही थी छवि, अभी भी टेबल के पास ही किचन में ज्यों-का त्यों पड़ा हुआ था। भूल गई होगी…पर यह तो मेरी छवि नहीं। ऐसे तो नहीं भूलती वह कुछ भी। ऐसी भूल या कोताही पिछले चालीस वर्षों में तो एकबार भी नहीं हुई उससे। भगवान मेरी छवि पर अपनी दया दृष्टि बनाए रखना। बूढ़ा तो सबको ही होना है एक दिन, पर हाथ पैर और दिमाग के चलते ही उठाना हमें। खुदपर और दूसरों पर बोझ मत बनने देना- कहते, प्रार्थना करते हुए उठा और कूड़ा लेकर बाहर रखने चल दिया। फिर चाभी के गुच्छे की याद आते ही सरसरी नजर थैले के अंदर भी डाल दी – शायद इसमें ही गिर गया हो छवि का चाभी का गुच्छा। हलका सा झिंझोड़ा, तो कुछ खनकने की आवाज भी आई । फिर तो तुरंत ही पूरा उलट दिया , पर चाभी का गुच्छा वहाँ नहीं था। फिर से कूड़ा समेटकर जैसे ही बाहर आया और डस्टबिन का ढक्कन खोला तो घर की चाभी सबसे ऊपर ही पड़ी थी। तब बिल्कुल गोद में छोरा और शहर में ढिंढोरा वाले अंदाज से एक विजयी मुस्कुराहट होठों पर फैल गई। तो, यहाँ भूल गई थीं हमारी छवि रानी इसे…. अच्छा हुआ जो रात में किसी उठाईगीरे की नजर नहीं पड़ी, वरना अनर्थ हो जाता । पर यह कैसे संभव है.. शायद गिर गया हो और उसे पता ही न चला हो। पर आज मंगल वार भी तो है। कूड़े वाली ट्रक भी तो आती है आज ही सुबह-सुबह, वह भी तड़के ही भोर में। अच्छा हुआ मिल गया, वरना बेवजह ही परेशानी उठाती पड़ती, हो सकता है घर का एक-एक ताला तक बदलवाना पड़ता।
एक विजयी परन्तु हताश मुस्कुराहट पुनः चेहरे पर आई-पर ऐसा हुआ कैसे…कहीं बीमार तो नहीं छवि? कितना लापरवाह रहने लगा हूँ अपनी घर गृहस्थी से…यूँ फालतू की बातें सोचने से फायदा ही क्या अब, कुछ नहीं हुआ छवि को। कभी-कभी आराम की जरूरत सभी को पड़ती है!
छवि को आवाज नहीं दी थी बस चाभी का गुच्छा वापस सहेज कर सही जगह पर टांग दिया ।
ऊपर बेडरूम में छवि बच्चों की तरह पैर सिकोड़े, बेफिक्र सो रही थी। चादर ठीक से उढ़ाकर मैने भी वापस सोने की कोशिश की, पर अब एक बेबजह का भय मन के अंदर सांप की तरह फन उठा चुका था और चैन नहीं लेने दे रहा था… छवि समझदार भी है और चतुर भी, आखिर ऐसा हुआ तो हुआ कैसे…कहीं भूलने की बीमारी तो नहीं लग गई इसे। फोन नंम्बर और परिचितों के नाम भूलने की शिकायत तो जाने कबसे कर रही है। यह तो कोई इतनी बड़ी बात नहीं सभी परिचितों के फोन नंबर वगैरह तो मैं भी याद नहीं रख पाता। क्यों बेकार में इतना सोच रहा हूँ मैं!
पर भय सही ही सिद्ध हुआ। भूलने का सिलसिला जो शुरु हुआ तो कोई अंत ही नहीं दिखा कहीं। उस दिन बाजार गई तो सामान खरीदा, पैसे दिए और सामान का थैला वहीं भूलकर घर वापस आ गई। जब चाय मांगी तो कैटल औन करके चुपचाप सामने आ बैठी, कहने लगी दूध नहीं है घर में। शौपिंग करने क्यों नहीं गया मैं? उसे कतई याद नहीं रहा था कि सौपिंग करने वह खुद गई थी और सारा सामान खरीदा भी था उसने। बस घर लाना भूल गई है वह ।
मैं व्यर्थ में ही याद दिलाने की कोशिश करता रहा मैंने उसकी पर्स की पौकेट में रसीद देख ली थी और सेन्सबरी को फोन भी कर दिया था कि अभी घंटे भर में सामान लेने आऊंगा। पर वह मानने को तैयार नहीं थी। इसी तरह से धीरे-धीरे वह हर बात और हर चीज भूलने लगी । अब उसके लिए अकेले बाहर जाना तक सुरक्षित नहीं रह गया था। अपना घर समझकर सामने वाले घर का दरवाजा खटखटाने लग जाती, कभी अपने ही घर में एक कमरे से दूसरे कमरे तक का रास्ता भूल जाती। घर-परिवार तो अब दूर की बात थे, अपना भी ख्याल नहीं रख पा रही थी छवि। बच्चों की तरह छोटे बड़े उसके हर काम मैं ही करता । खाना खिलाने से लेकर पौटी साफ करने तक के सभी। कहीं इधर-उधर भटक न जाए, चोट आदि न लगा ले, चौबीसों घंटे की निगरानी रखनी पड़ती थी। प्यार में कोई कमी नहीं थी परन्तु अक्सर ही बेहद थकने लगा था मैं, शरीर से भी और मन से भी। यहाँ तक कि मन में पापी ख्याल आने लग जाते और कभी कभी तो यह तक सोचने लग जाता कि या तो इसे ही कुछ हो जाए या फिर भगवान मुझे ही उठा ले अब !
अगले पल ही, खुद को अपनी इस पलायनवादी और गलत व निराश सोच के लिए धिक्कारता भी। यह तो अच्छा ही था कि दो साल पहले ही रिटायर हो चुका था , वरना कैसे मैनेज करता। आदतन् विषम से विषम परिस्थिति में भी रौशनी की लकीर ढूँढ लेता। याद करता, कैसे जिस दिन से शादी हुई थी, हर बात की जिम्मेदारी ओढ़े बड़ी कुशलता से घर गृहस्थी चलाई थी छवि ने…बिना किसी शिकवे-शिकायत के और एक मैं हूं कि पहली ही चोट पर तिलमिला उठा। दाम्पत्य जीवन की हजार मीठी यादें थीं मेरे पास। तन से ही नहीं मन से भी सुंदर है मेरी छवि। मुझे तो कोई फिकर ही नहीं करने दी कभी। आज जब उसे जरूरत है तो मैं भी पूरा साथ निभाउँगा। शादी की वेदी पर भी तो यही कसम खाई थी मैंने, आखिर।
तुरंत ही आंसू पोंछकर उठ खड़ा हुआ मैं ।
छवि की पसंद के कढ़ी चावल बनाए और साथ में जीरे के भुने आलू भी। खाना डब्बे में भरकर चल पड़ा छवि से मिलने । आज छवि को अपने हाथ से खिलाउंगा और तैयार भी खुद ही करूँगा। पिछले तीन दिन से नहीं जा पाया हूँ, रास्ते के हर मोड़ के साथ दिन के कई सुखद कार्यक्रम विर्धारित कर लिए थे मन-ही-मन। मुस्कुराता हुआ देखना चाहता हूँ खुद को भी और अपनी छवि को भी।

चहककर ही मिली थी छवि। घंटों बातें भी की थीं हमने। लगा ही नहीं कि यहाँ छोड़ने की भी जरूरत है। जब चलने की बात हुई तो कहने लगी, शाम को चले जाना और मान भी गया तुरंत ही मैं उसकी हर बात । वहीं टी.वी. औन करके घर की तरह ही पसर गया सोफे पर। मैच के साथ-साथ बीचबीच में छवि को भी देख लेता , बेहद संतुष्ट नजर आ रही थी आज मेरी छवि।
जानते हो रोहन, बगल के कमरे में जो शर्मा जी हैं न, वह अपनी पत्नी को भी नहीं पहचान पाते। कल जब उनकी पत्नी मिलने आई तो नर्स से पूछने लगे, यह औरत कौन है, कब जाएगी? इसे बाहर करो, तभी तो मैं कपड़े बदल पाऊंगा, खाना खा पाऊँगा। नर्स ने जब कहा कि यह आपकी पत्नी हैं और यही आपके लिए ये छोले-भटूरे बनाकर लाई है, जो आपको बेहद पसंद हैं, तो मेज पर हाथ पटक-पटककर चिल्लाने लगे, रोने लगे। बोले-ऐसा कैसे हो सकता है, मेरी पत्नी की तो मृत्यु हो चुकी है।
रोहन कहीं मैं भी तो इनकी तरह पागल नहीं हो जाऊंगी। सबकुछ भूल जाऊंगी। मेरी मदद करो रोहन। मैं तुम्हें नहीं भूलना चाहती , हमारा रिश्ता तो जन्म-जन्मांतर का है।
‘ हाँ छवि। ‘
हमारी आंखों की नदियाँ, गलबहियाँ डाले धारा बनी, चेहरे, गले कपड़े सब भिगोती, अपनी ही मनमानी किए जा रही थीं और मैं बेबस, हाथ पकड़े निष्पलक उसे देख रहा था ।
‘ हाँ छवि । ‘ कितनी आसानी से कह तो दिया था मैंने पर काश् ऐसा संभव होता! विज्ञान कितनी भी तरक्की कर ले, हम अभी भी तो उसकी मर्जी के ही गुलाम हैं। काश् यह फैसला मेरे हाथ में होता!
उसके हाथों को प्यार से चूमते हुए मन ही मन रोता रहा ..काश् . वक्त की इस आगे बढ़ती धारा को रोक या मनचाहा मोड़ दे पाता मैं।…
सामने टी.वी पर गाना चल रहा था-मैं तो इक माटी की गुड़िया , बीच आंगन धर दीन्ही…शब्द तीर की तरह मन बींध गए।
छवि गोदी में सिर छुपाए मन की जाने किन गहन कन्दराओं में जा छुपी थी। लगा सो गई थी पर बीच-बीच में दबी सुबकियाँ और हिलती पीठ के साथ आँसुओं की नमी साफ-साफ बता रही थी कि इस हालत में भी समझती थी वह इन्सानी मजबूरी और कमजोरियों को..बेबस हम इन्सानों की इस आधी-अधूरी जिन्दगी को।…
एक समंदर अब हमारी आंखों के अंदर था , जो वहीं थम सा गया था और फिलहाल बेहद शांत था।…