कविता धरोहरः अज्ञेय/ लेखनी-सितंबर-अक्तूबर 16

नदी के द्वीप

Brindawan1
हम नदी के द्वीप हैं।
हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकतकूल-
सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं।
माँ है वह, इसी से हम बने हैं।
किंतु हम हैं द्वीप।
हम धारा नहीं हैं।
स्थिर समर्पण है हमारा। हम सदा से द्वीप हैं स्रोतस्विनी के
किंतु हम बहते नहीं हैं। क्योंकि बहना रेत होना है।
हम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं।
पैर उखड़ेंगे। प्लवन होगा। ढहेंगे। सहेंगे। बह जाएँगे।
और फिर हम चूर्ण होकर भी कभी क्या धार बन सकते?
रेत बनकर हम सलिल को तनिक गँदला ही करेंगे।
अनुपयोगी ही बनाएँगे।
द्वीप हैं हम।
यह नहीं है शाप। यह अपनी नियति है।
हम नदी के पुत्र हैं। बैठे नदी के क्रोड़ में।
वह बृहत् भूखंड से हमको मिलाती है।
और यह भूखंड अपना पितर है।
नदी, तुम बहती चलो।
भूखंड से जो दाय हमको मिला है। मिलता रहा है,
माँजती, संस्कार देती चलो :
यदि ऐसा कभी हो
तुम्हारे आह्लाद से या दूसरों के किसी स्वैराचार से अतिचार-
तुम बढ़ो, प्लावन तुम्हारा घरघराता उठे
यह स्रोतस्विनी ही कर्मनाशा, कीर्तिनाशा, घोर कालप्रवाहिनी बन जाए
तो हमें स्वीकार है वह भी। उसी में रेत होकर
फिर छनेंगे हम। जमेंगे हम। कहीं फिर पैर टेकेंगे।
कहीं फिर भी खड़ा होगा नए व्यक्तित्व का आकार।
मात: उसे फिर संस्कार तुम देना।
 

 

 

 

काँगड़े की छोरिया

Brindawan1

काँगड़े की छोरियाँ कुछ भोरियाँ सब गोरियाँ
लालाजी, जेवर बनवा दो खाली करो तिजोरियाँ
काँगड़े की छोरियाँ।
ज्वार-मका की क्यारियाँ हरियाँ-भरियाँ-प्यारियाँ
धान खेतों में लहरें हवा की सुना रही हैं लोरियाँ
काँगड़े की छोरियाँ।
पुतलियाँ चंचल कलियाँ कानों झुमके बालियाँ
हम चौड़े में खड़े लुट गए बनी न हमसे चोरियाँ-
काँगड़े की छोरियाँ
काँगड़े की छोरियाँ, कुछ भोरियाँ, सब गोरियाँ।

 

 

 

 

नंदा देवी
Brindawan1

यह भी तो एक सुख है
(अपने ढंग का क्रियाशील)
कि चुप निहारा करूँ
तुम्हें धीरे-धीरे खुलते!
तुम्हारी भुजा को बादलों के उबटन से
तुम्हारे बदन को हिम-नवनीत से
तुम्हारे विशद वक्ष को
धूप की धाराओं से धुलते!

यह भी तो एक योग है
कि मैं चुपचाप
सब कुछ भोगता हूँ
पाता हूँ
सुखों को,
निसर्ग के अगोचर प्रसादों को,
गहरे आनंदों को
अपनाता हूँ
पर सब कुछ को बाँहों में
समेटने के प्रयास से
स्वयं दे दिया जाता हूँ