मंथन: हिन्दी ही क्यों-आदित्य मिश्रा/ लेखनी-अगस्त सितंबर 2015

 

’हिन्दी’ राष्ट्रीय सांस्कृतिक अस्मिता की वैभवशाली प्रतीक है।

0471-0610-1820-3558_TN
किसी भी सफल राष्ट्र की गगनचुंबी इमारत उस देश की संस्कृति और भाषा की मजबूत नींव पर टिकी होती है। फिर प्रश्न चाहे भाषा का हो या संस्कृति का किसी एक पक्ष का कमजोर होना पूरी इमारत की बुनियाद को हिलाकर रख देता है और यहाँ तक कि उसे धराशायी करने में तनिक भी देर नहीं लगाता। भारत एक विशाल और महान देश है। विश्व पटल पर हमारी संस्कृति और सभ्यता की अलग पहचान स्थापित है। लम्बे समय तक गुलामी की बेड़ियों में जकड़े रहने के पश्चात् अंततः 15 अगस्त 1947 को स्वाधीन भारत के निर्माण का वर्षों पुराना अधूरा स्वप्न पूर्ण हुआ। यह आजादी हमें बड़े व्यापक संघर्षों के उपरान्त प्राप्त हुई। उन्नीसवीं शताब्दी में स्वाधीनता आन्दोलन के समय जब सम्पूर्ण देश में परिवर्तन की लहर उठी तब हिन्दी भाषा ने ही समस्त राष्ट्र में जनजागरण का शंखनाद किया और स्वतंत्रता की आधारशिला रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
आज राष्ट्र स्वतंत्रता की 69 वीं वर्षगांठ के पायदान पर खड़ा है। विचित्र बात यह है कि इन छह दशकों से भी अधिक समय बीतने के बाद भी अभी तक हम मानसिक रूप से अपने को आजाद भारत का नागरिक स्वीकार नहीं कर सके हैं क्योंकि पाश्चात्य  संस्कृति और विदेशी भाषा का मोह इस लम्बे अंतराल के बाद भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा। स्वतंत्रता आन्दोलन के पुरोधा महात्मा गांधी से लेकर सुभाष चन्द्र बोस, बाल गंगाधर तिलक, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, राजेन्द्र प्रसाद सरीखे अनेको राष्ट्रभक्त नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों ने हिन्दी को राष्ट्रीयता का पर्याय माना और उसे भारत की राष्ट्रभाषा घोषित करने की पुरजोर वकालत की परन्तु आखिर क्यों हमारी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था की दूषित मनोवृत्ति उनके संघर्ष और बलिदान का मूल्य निर्धारित नहीं कर पायी। हिन्दी को आज भी राष्ट्रभाषा के पद का सम्मान और गौरव प्राप्त नहीं हो सका है।
दुनिया के तमाम विकसित देशों की प्रगति का सर्वप्रमुख माध्यम स्वयं उस देश की अपनी राष्ट्रभाषा या मातृभाषा ही रही है। चीन, जापान, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी आदि देशों ने अपना सम्पूर्ण विकास अपनी भाषा के आधार पर किया। भाषा को आगे रखकर ही ये सभी देश प्रगति के मार्ग पर अग्रसर हुए। हम भारतीयो को भी अपने राष्ट्र की व्यापक प्रगति को राष्ट्रभाषा की प्रगति के साथ ही जोड़कर देखना चाहिए क्योंकि राष्ट्रभाषा की प्रगति राष्ट्र निर्माण की प्रथम सीढ़ी है। यदि समय रहते ऐसा न किया गया तो हमारा देश फिर किसी बड़े षड्यंत्र का शिकार हो जाएगा। अंतर्राष्ट्रीय परिवेश में हमारी पहचान का संकट खड़ा हो जाएगा। हम पहले भी ऐसे षड्यंत्रों का शिकार होते रहे हैं। इसी षड्यंत्र के तहत लार्ड मैकाले ने हमारी संस्कृति, सभ्यता और भाषा को नष्ट करने का सुझाव दिया था। 2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश पार्लियामेन्ट में मैकाले ने कहा था ’’यदि भारत को अपने काबू में करना है तो उसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करना होगा एवं भारत की शिक्षा प्रणाली व उसकी संस्कृति को नष्ट करना होगा।’’ इस कथन का स्पष्ट संकेत भाषा को नष्ट करने की ओर है क्योंकि जब किसी देश की भाषा नष्ट हो जाती है तो वहाँ की संस्कृति और सभ्यता स्वतः नष्ट हो जाती है। भाषा से ही साहित्य निर्मित होता है। विकृत भाषा विकृत साहित्य को जन्म देती है और विकृत साहित्य सीधे तौर पर सम्पूर्ण समाज की मानसिकता को विकृत कर देता है ऐसे में देश की बागडोर गलत हाथों में चली जाती है और देश में विनाषकारी स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं। अतः स्पष्ट है कि अपनी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा हेतु अपनी भाषा की रक्षा करनी होगी।
आजादी के लगभग दो वर्ष बाद 14 सितम्बर 1949 को भारत की संविधान सभा द्वारा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के अंतर्गत हिन्दी को भारत देश की राजभाषा स्वीकर किया गया तभी से इस विषेष तिथि को प्रत्येक वर्ष हिन्दी दिवस के पावन अवसर के रूप में मनाया जाता है। बड़े-बड़े मंचो से बड़े-बड़े भाषण और वक्तव्य दिए जाते हैं। कतिपय विद्वान वक्तागण ऐसे अवसरों पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा कहकर संबोधित करते हैं पर क्या वास्तव में आधिकारिक रूप से हिन्दी को हम राष्ट्रभाषा का दर्जा दिला पाए हैं यह एक विचारणीय प्रश्न हम सबके समक्ष है। व्यवहारिकता की कसौटी पर आज भी हिन्दी राष्ट्रभाषा का स्थान नहीं पा सकी है। सत्य तो यह है कि स्वतंत्र राष्ट्र की परिकल्पना राष्ट्रीय साहित्य के द्वारा निर्मित होती है और राष्ट्रीय साहित्य राष्ट्रीय भाषा की मांग करता है। इस उद्देष्य की पुष्टि महात्मा गांधी के इस कथन से होती है ’’ यदि भारत को एक राष्ट्र बनाना है तो किसी न किसी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाना ही चाहिए तो वह भाषा केवल हिन्दी ही है और मैं हमेशा इस उद्देष्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहा हूँ।’’
वर्तमान समय में वैश्वीकरण, आधुनिकीकरण और भूमंडलीकरण के युग में अंग्रेजी भाषा का अपना अलग महत्व हो सकता है। वैश्विक परिदृष्य में अंग्रेजी सहायक भाषा और संपर्क भाषा की भूमिका निभा सकती है। अंग्रेजी से हमारा कोई विरोध या पारस्परिक भेदभाव भी नहीं है और होना भी नहीं चाहिए परन्तु फिर भी हमें यह स्मरण रखना होगा कि एक स्वतंत्र राष्ट्र का नागरिक होने के नाते प्रत्येक भारतवासी का यह नैतिक कर्तव्य बनता है कि अपने देश में और अपने देश के बाहर हम अपनी मातृभाषा के अस्तित्व की रक्षा स्वयं करें। विदेशों में हिन्दी का सम्मान लगातार बढ़ रहा है। विश्व के कई बड़े देशों में हिन्दी भाषा के पठन-पाठन के प्रति लोगों की रूचि बढ़ी है। यह देख सुनकर गर्व की प्रतीति होती है। वहीं दूसरी ओर हम भारतीय लोग पाश्चात्य सभ्यता और अंग्रेजियत का गुणगान करने में लगे हुए हैं। भौतिकवादी युग में हम अपनी आवश्यकताओं और महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने में इस कदर डूबे हैं कि अपनी वास्तविक स्थिति तक को भूलते जा रहे हैं। आज समय यह आ गया है कि अन्य देशों के लोग हमसे यह अपेक्षा करते हैं कि हम अपनी राष्ट्रभाषा की दुर्दशा पर अपना ध्यान केन्द्रित करें। एक विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर पधारे चीन के प्रसिद्ध हिन्दी विद्वान डॉ च्यांग चिंगखुए के शब्द सम्पूर्ण भारतीय जनमानस पर कुठाराघात करने में पूर्ण रूप से सक्षम हैं। उनका मानना है कि भारतीय नेताओं की चीन यात्रा के दौरान उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी मातृभाषा हिन्दी में अपना संबोधन देंगे, लेकिन फिर यह देखकर अत्यधिक दुःख होता है कि वे लोग स्वयं अंग्रेजी का पल्लू थामे रहते हैं, उन्होने यह भी माना कि अपनी भाषा के तिरस्कार से कोई भी देश प्रगति के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकता और साथ ही उन्होने यह की बताया कि किस प्रकार चीन ने अपना संपूर्ण विकास अपनी मातृभाषा के दम पर किया है। कुछ ऐसे ही विचार विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर जापान के एक प्रसिद्ध विद्वान ने भी व्यक्त किए थे।
आज स्वतंत्र देश में रहने के बावजूद हमारी कौन सी ऐसी मजबूरी है जो हम अंग्रेजो द्वारा उधार में ली हुई भाषा का धड़ल्ले से प्रयोग करते जा रहे हैं। यह उधार की भाषा हमें उनका कर्जदार बना रही है। पहले भी यह स्पष्ट किया जा चुका है कि अंग्रेजी से हमारा कोई विरोध नहीं किन्तु स्वतंत्र राष्ट्र का नागरिक होने के नाते अपने अस्तित्व और अस्मिता की रक्षा करना हमारा परम धर्म है। कितनी अपार विडंबना है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तो निरन्तर हिन्दी भाषा समृद्धशाली हो रही है। वहीं दूसरी ओर हम इसे संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं परन्तु अपने राष्ट्र में ही हम आज तक इसे राष्ट्रभाषा का स्थान नहीं दिला पाए हैं। हिन्दी संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा अवश्य बनेगी ऐसी हृदय से कामना है किन्तु इसके पहले हमें हिन्दी को भारत में राष्ट्रभाषा के पद पर सुशोभित कर इसके आत्मसम्मान की गरिमा लौटानी होगी।
कारपोरेट जगत के बढ़ते प्रभाव ने भारतीय शिक्षा प्रणाली को दूषित करने का कुचक्र रच रखा है। अंग्रेजी के ज्ञान को समाज में स्टेटस सिंबल का पर्याय माना जाने लगा है लेकिन शायद हम इस कटु सत्य को समझने में नाकाम रहे हैं कि ऐसे स्टेटस सिंबल के कारण ही हम भारतीय परंपराओं और सांस्कृतिक मान्यताओं से सीधा वास्ता रखने में असफल साबित हुए हैं। इसलिए आज देश और प्रदेश की सरकारों को अपने-अपने अधिकारों और शक्तियों का पालन करते हुए हिन्दी को भारतीय शिक्षा पद्धति में समुचित स्थान देते हुए इसे रोजगार से जोड़ना पड़ेगा तभी देश की राष्ट्रीय गरिमा और स्वाभिमान बच सकेगा। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था ’’ हिन्दी के विरोध का कोई भी आंदोलन राष्ट्र की प्रगति में बाधक है।’’ इस आधार पर सच्चे राष्ट्रवादियां को हिन्दी के समर्थन में बड़े आंदोलन हेतु तैयार हो जाना चाहिए।
एक और महत्वपूर्ण बात उल्लेखनीय है कि हिन्दी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जो राष्ट्र की एकता और अखंडता को स्थापित करने में सक्षम है। यही वह भाषा है जो देश में भावनात्मक जुड़ाव को जन्म देती है। हिन्दी के राष्ट्रभाषा बन जाने से प्रांतवाद, भाषावाद, अलगाववाद आदि तमाम झगड़ों एवं सामाजिक बुराइयों का समाधान मिल सकता है, हिन्दी तो प्रामाणिक रूप से राष्ट्रीय एकता की सेतु कहलाने योग्य है। यही वह भाषा है जो विभिन्न संस्कृतियां के इस देश को एकता के सूत्र में पिरोने की माला बन सकती है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा0 जाकिर हुसैन का यह कथन इस सत्य की सर्वमान्य पुष्टि करता है ’’ राष्ट्रीय एकता का सर्वश्रेष्ठ माध्यम हिन्दी है। हिन्दी वह धागा है जो विभिन्न मातृभाषाओं रूपी फूलों को पिरोकर भारत भाषा के एक सुंदर घर का सृजन करेगा।’’ इस कथन के अनुरूप भारत सरकार द्वारा हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित करने की ओर गम्भीरता से सोचना चाहिए तथा अपनी इस जिम्मेदारी का निर्वहन करना चाहिए अन्यथा अंग्रेजो द्वारा स्थापित फूट डालो और राज करो की नीति एक बार पुनः देश पर प्रभावी होगी और हम गुलामी की ओर अग्रसर होंगे। इस बार हमे गुलामी की ओर ले जाने का माध्यम भाषा बनेगी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अनुसार राष्ट्रभाषा के बिना देश गूंगा होता है। हम गूंगे देश के नागरिक न कहलाएं इस विचारधारा की नींव तभी मजबूत होगी जब भारतीय विद्वत समाज तथा देश का शिक्षित वर्ग यह प्रण ले कि हमें उन विदेशी शक्तियों से सावधान रहना है जो देश की एकता और अखण्डता को खण्डित करने में लगी हुयी हैं। वे धर्म, जाति और भाषा के नाम पर देश को टुकड़ों-टुकड़ों में विभक्त करने की योजना बना रही हैं। हिन्दी का किसी भाषा से कोई द्वन्द नही है शायद इसीलिए वह समस्त भाषाओं को अपने में आत्मसात कर लेती है। हिन्दी का संबंध भारतीय संस्कृति और सभ्यता से है, वह किसी से छोटी या बड़ी नहीं है। भारत को हिन्दी से ही नयी चेतना और ऊर्जा प्राप्त हो सकती है। अंत में मैथिलीषरण गुप्त की घोषणा को आत्मसात करना चाहिए-
है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी।
हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी।

(आदित्य मिश्रा)
28-बी न्यू सिन्धु नगर कृष्णा नगर, लखनऊ 226023
फोन नं0-9839273819

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*