धारावाहिकः मिट्टीः (भाग 19 ) शैल अग्रवाल-लेखनी अगस्त-सितंबर 2015

 

मिट्टीः भाग 19

Mitti-19

‘ बनाने से बनते हैं रिश्ते दिशा। खून- पसीने से सींचना होता है इन्हें भी, तब जाकर लहलहा पाती है यह पौध। ’ मां ने कभी बचपन में कहा था, जब प्रिय सहेली कावेरी से लड़ाई हुई थी उसकी और अन्य सहेलियों की तरह कुट्टी करके कभी बात न करने की कसम खा बैठी थी वह । मां ने ही समझाया था तब और मां ने ही सुलह भी करवाई थी उनकी । वापस भेजा था सहेली के पास  यह कहकर – ‘ रिश्ते न तो पल भर में बनते हैं और ना ही टूटते हैं ,बेटू। जरूरी तो नहीं कि खून का रिश्ता ही सबसे नजदीकी रिश्ता हो। किसी भी स्नेह करने वाले को यूँ दुतकारते नहीं हम। धूमकेतु से जाने किस-किस जनम के बिछुड़े आ मिलते हैं नए-नए रूप में।’

और दिशा बेहद डरी हुई थी अब कि कहीं एक ऐसा ही करीबी रिश्ता मौत की बांहों में दम न तोड़ दे!

नीतू और मुफ्ती दोनों को ही गोली लगी थी और दोनों बुरी तरह से घायल थे। खून बहुत बह चुका है। बस यही खबर मिली थी उसे। वो ही नहीं, और भी कई अभागे आहत हुए हैं इस  आतंकी हादसे में जिनका कसूर बस इतना था कि गलत जगह पर गलत वक्त पर थे। मदद तो पूरी मिल रही थी पर डॉक्टरों ने साफ-साफ कह दिया था-  अपनी तरफ से भरसक कोशिश कर रहे हैं हम, परन्तु जीवन और मृत्यु तो अभी भी  ऊपर वाले के ही हाथ में है। …

अब खुद से ज्यादा उसे उन दोनों की ही फिक्र थी। बेहोशी की हालत में भी वे जरूर एक-दूसरे का ही नाम ले रहे होंगे और होश में आते ही, एक दूसरे के बारे में ही पूछ रहे होंगे- जानती थी यह भी दिशा। इनका साथ न तोड़ना भगवान- बारबार हाथ स्वतः ही प्रार्थना में उठ जा रहे थे उसके। जब कैसे भी मन संभाले न संभला तो,

‘अगर संभव हो तो आ ही जा, अक्षत। बीच पर हाल ही में हुए इस आतंकवादी हमले की खबर तो तूने भी सुन ही ली होगी। नीतू आंटी और मुफ्ती भी वहीं थे उसी बीच पर उस वक्त। ‘

सप्ताहंत के आते-आते उसने अपने डॉ. बेटे अक्षत को भी तुरंत ही लंदन बुलवा ही लिया।

 

आनन-फानन छुट्टी लेकर पहुंच भी गया अक्षत। यही नहीं, एक से दो भले की तर्ज पर ‘जाने कब क्या जरूरत पड़ जाए ’-कहकर रोजलिन भी साथ हो ली थी। अक्षत ने भी आपत्ति नहीं की थी। रोजलिन की समझ आपदकाल में अतुलनीय है, ड्यूटी के दौरान कई बार परख चुका था वह।

‘ शायद परिस्थितियों की जटिलता उनकी अपेक्षा और सामर्थ से अथिक रही हो और अकेले न संभाल पा रही हों मां।…पर, नीतू आंटी और मुफ्ती तो ठीक होंगे न रोजलिन ? ‘ रास्ते में कई बार कार चलाते-चलाते पूछा था अक्षत ने यह उससे।

‘ हाँ-हाँ, सब ठीक होगा। तुम्ही हिम्मत हार जाओगे, तो फिर उन्हें कौन संभालेगा । ‘

धीर-गंभीर साथिनी की तरह रास्ते भर समझाती-संभालती रोजलिन बीच-बीच में चोरी छुपे अपने बहते आंसू भी पोंछ ही लेती थी। कल क्या होगा-कौन जानता था। छोटा-सा ही तो परिवार है अक्षत का ! उसका हर दुख उसकी बर्दाश्त के बाहर है- यह भी भलीभांति जान चुकी थी अबतक तो वह । बस कहने भर को ही तो दो शरीर रह गए थे वे। फिर नीतू आंटी भी तो मां की सहेली नहीं बहन जैसी ही थीं, अजनबियों से भरे इस अनजाने देश में- हर सुख दुख की साक्षी।

अब उसका खुद का मन भी अशुभ की आशंका से भयभीत हो चला था।

….

दुविधा और दुश्चिन्ताओं के बावजूद, सुबह की पहली किरण के साथ व्यस्त और भागते-दौड़ते आम से ही एक दिन ने स्वागत किया उन दोनों का लंदन में। अस्पताल भी मोटरवे से ज्यादा दूर नहीं था। अभी वे पहुँचे ही थे कि एक एम्बुलेस चीत्कार करते शोर के साथ आई और उन्हें पूरी तरह से सचेत करती आपतकालीन विभाग के ठीक सामने आकर खड़ी हो गई। चारोतरफ पूरी तैयारी और भागदौड़ के बावजूद, मरघटे-सी शांति थी अब वहाँ, उपस्थित हर कर्मचारी के चेहरे पर।

अंदर मृतप्राय क्षत्-विक्षत ही थे जिन्हें उन्हें वार्ड तक पहुंचाना था या फिर मृत भी जिन्हें मुर्दाघर में.. कुछ नहीं जानते थे वे।  एम्बुलेंस के चारो तरफ कैनवस की स्क्रीन लगा दी गई थी । कुछ  देखना या जानना, वैसे भी असंभव हो चला था। अप्रिय अनुमान और बेसब्र इंतजार हरेक को और भी बेचैन कर रहा था। दो दिन हो चुके थे उसे भी आए, पर अभी तक नीतू या मुफ्ती से मिल तक नहीं पाई थी दिशा। बस इतना ही पता चल पाया था कि दोनों यहीं और इसी अस्पताल में हैं या लाए जाएँगे।

‘तो अभी भी यह सिलसिला रुका नहीं है। कितनों को भूना है निर्दइयों ने, अक्षत। ‘ कहते-कहते रो पड़ी थी दिशा।

अक्षत देख रहा था बात करते-करते मां की आँखें बन्द हो जा रही थीं-भय में या प्रार्थना में –शायद वे खुद भी नहीं जानती थीं। नहीं जानती थीं कि उनकी सहेली और उसका बेटा जिन्दा भी है या फिर …’

अनायास और अकाल ही कई जीवन छिन्न-भिन्न हो चुके थे पिछले इन चन्द दिनों में, जो छुट्टी पर गए थे उनके भी और जो रह गए थे, उनके भी।

रोजलिन ने ही आगे बढ़कर बिखरती दिशा को संभाला था।

‘ फिक्र ना करें, आंटी । आपकी सहेली और उसका बेटा निश्चय ही ठीक हो जाएंगे। भगवान इतना निर्दयी तो नहीं।‘

‘ क्या पता बेटी! ‘

अंदर से भय की एक तेज मितली-सी उठी और दिशा की आंखों के आगे पूर्णतः अंधेरा छा गया। जमीन पर जम चुके और निर्बल पड़ चुके पैरों के साथ खुद को संभालना अब मुश्किल ही था दिशा के लिए ।

‘ कैसी भावनाओं में बही जा रही है, वह। बड़ी वह है, ये बच्चे नहीं। संभालना ही होगा खुद को उसे।‘ परिस्थितियों की सारी गंभीरता के बावजूद, एक घूंट पानी के साथ जैसे-तैसे तुरंत ही तटस्थ कर लिया दिशा ने खुद को तब। और ‘ जिन्दगी चाहे कुछ भी फेंके सामना तो करना ही होगा हमें ’ – कहती, आंसू और भय से लबालब आंखें पोंछती, आगे बढ़कर उसे सहारा देती रोजलिन के कंधे थपथपा दिए थे हिम्मती दिशा ने तब।

और ‘ अब मैं ठीक हूँ’ –कहती चुपचाप आगे वार्ड की तरफ बढ़ गई ।

तुरंत ही तेज कदमों से कौरिडोर नापते, अनुसरण करते वे भी उसके पीछे-पीछे जा पहुंचे, जहाँ दुर्घटना से गुजरे घायलों को रखे जाने का अनुमान था।

अस्पताल का पूरा वह पिछला आहता आनन-फानन ही खाली करवाकर नया आपद्कालीन वार्ड में तब्दील कर दिया गया था ।

भय और भगदड़ न फैले, सुचारु व सुव्यवस्थित रहे सब, इसलिए ‘ आपको जरूरत पड़ने पर बुला लिया जाएगा।‘ कहकर अन्य रिश्तेदारों की तरह उन्हें भी बिठा दिया गया वहीं उसी प्रतीक्षाघर में जहाँ कई और जाने कबसे इंतजार कर रहे थे। ‘कुशल हाथों में हैं उनके प्रियजन ‘, यह सांत्वना भी कम नहीं थी, फिर भी दिशा ने देखा, कि सब सांस रोके फटी-फटी आँखों से बस इंतजार ही कर रहे थे। प्रार्थना कर रहे थे रिश्तेदारों के लिए और सभी की आंखें दरवाजे पर ही गड़ी हुई थीं , क्या पता कब कोई खबर या बुलावा आ ही जाए उनके लिए।…

शायद परिस्थिति की यह निराशाजनक संभावना और उमड़ता आक्रोश ही था जो भय और शंका बनकर पसर चुका था चारो तरफ। कोई कुछ नहीं कह रहा था फिर भी सब महसूस कर पा रहे थे इसे। सबके मन में आशा की क्षीण ही सही एक लौ भी थी ही। यंत्रवत् इंतजार करना ही नियति थी अब तो सभी की।…

जब और बर्दाश्त न कर पाया तो ‘ अब कहीं कोई सुरक्षित नहीं।‘ चिल्लाता बगल में बैठा बुजुर्ग अखबार पटककर उठ खड़ा हुआ। उसकी विचलित करने वाली चीख से दिशा का मन भी अन्दर तक चिलक गया। वह जानती थी कि जीवन-मृत्यु के बीच जूझता इसका अठ्ठारह साल का पोता भी है इन घायलों में, जिसकी सही खबर अभी इसे भी नहीं मिली है। बेटा-बहू ने कार दुर्घटना में जब दम तोड़ा था तो पिछले सोलह वर्ष से इसने ही तो पाला पोसा है उसे मां-बाप दोनों ही बनकर। रात ही तो बेहद रुंधे गले से बताया था उसने यह सब दिशा को । तभी दौड़ती-सी नर्स आई और ‘ काम डाउन सर’ कहती, कंधे से पकड़कर वापस बिठा गई उसे। कमरे के अंदर माहौल बेहद नाजुक था और एक का प्रलाप सबका धैर्य तोड़ सकता था। अब वह अखबार हाथ में पकडे बैठा, एकटक कभी कौरीडोर को घूर रहा था तो कभी सामने की सफेद दीवार को।

इतनी सूनी और भावहीन आँखें तो मुर्दों की भी नहीं होतीं, जब नहीं देखा गया तो दिशा ने नजरें दूसरी तरफ घुमा लीं।

वाकई में आजादी और वैयक्तिक स्वतंत्रता के मानो अर्थ ही बदल चुके थे। इन सफल और संपन्न पाश्चात्य देशवासियों के लिए भी अब तो। कहीं सुख चैन नहीं।–एक ठंडी आह होठों से फिसली और दिशा के चश्मे को पूरी तरह से धुंधला गई। विडंबना ही तो थी कि लड़ाई पर नहीं, घूमने और सैर तफरीह के लिए गए थे वे … एक आनन्ददायक और आरामदेह वक्त की तलाश में। पर अब खून सनी पट्टियों में या फिर यूँ ताबूतों में वापस लौट रहे थे।

डरावना वह अगला पल कौनसा सच उजागर करेगा , अबतो अक्षत तक सहमा-सहमा-सा दिखा दिशा को।

हमेशा की तरह गौरव ने बारबार समझाया है उसे। तटस्थ रहने को कहा है । भगवान की इच्छा के आगे समर्पण करने को कहा है , पर दिशा के लिए संभव ही नहीं यह सब…चुपचाप हार कैसे मान ले वह।

‘ क्या मां यह सब देख और बर्दाश्त कर पाएंगी? ‘ अक्षत के मन की बेचैनी भी इसी बात को लेकर अधिक थी। दूसरों के दुख और कष्ट से निपटना आसान है पर बात जब अपनों की हो तो डॉक्टर भी तो इंसान ही हैं आखिर…कैसे विचलित न हो वह ! बहुत फिक्र हो रही थी उसे मां की , नीतू आंटी की, मुफ्ती की।

….

पहली खबर मुफ्ती की ही आई। वह होश में आ चुका था और डॉक्टरों के हिसाब से अब पूरी तरह से खतरे के बाहर था। तीनों ही साथ-साथ दौड़े मिलने को, गले लगाने को। पहुंचे तो देखा, पुलिस बयान ले रही थी उसका।

वर्णन भी ऐसा था कि किसी को भी विचलित कर दे।

मुफ्ती की आंखें बन्द थीं और बहते आँसुओं की धार के साथ वह बयान कर रहा था गुजरे एक-एक पल का। मानो हर यातना से पुनः गुजर रहा हो , बारबार जी रहा हो उस भयावह हादसे को।

‘ सुबह के 11 बजे के करीब का वक्त था। हम सभी बीच पर ही थे, अपनी-अपनी तरह से मौसम का आनंद लेते। अचानक वे दोनों आए । साधारण से दिखते इन्सान…यूँ ही घूमते टहलते से। किसी का ध्यान भी नहीं गया था उनपर। तभी, अचानक एक ने रायफल निकाली और सन डेक पर लेटे लोगों को शूट करना शुरु कर दिया।‘

अचानक मुफ्ती का गला भर आया और आवाज रुँध गई। बगल में खड़ी नर्स ने इशारे से पुलिस को पीछे हटने को कहा और ग्लूकोज का पेय देकर मुफ्ती की पीठ सहलाने लगी। थोड़ी ही देर में उसने बातों का सिलसिला वहीं से उठा लिया , जहाँ पर छोड़ा था पर आंखें अभी भी बन्द ही थीं उसकी।

‘ मैं और नीतू आंटी आइस क्रीम पार्लर पर थे उस वक्त। गोलियों की आवाज के साथ ही लोगों में भगदड़ मच गई थी । शीघ्र ही दनदनाती गोलियों के साथ चारो तरफ से घायलों की चीखें सुनाई देने लगीं। मैं भयभीत, आंटी का हाथ पकड़कर होटल की तरफ दौड़ा। नवें फ्लोर पर स्थित हमारा कमरा ही सबसे सुरक्षित जगह थी उस वक्त हमारे लिए। पर पहुँच न सका। अचानक लिफ्ट के ठीक आगे, वह हमारे सामने खड़ा था खून के धब्बों में सना बन्दूक के साथ। जाने किसके द्वारा सिखाया और उकसाया हुआ। नफरत उसकी आँकों से टपक रही थी और अगले पल मौत मुझे सीधे मेरी आँखों में घूर रही थी। फिर उसका हाथ ट्रिगर पर गया और उसने बिना निशाना साधे चारो तरफ गोलियां बरसानी शुरु कर दीं। हम दोनों गोली लगने से पहले ही मृत बनकर गिर पड़े फिर भी एक गोली मां के कंधे को छीलती मेरे टखनों में जा ही धंसी। दर्द के मारे आंखों में अंधेरा छा गया था फिर भी मैं चुप रहा। जब हमें रौंदता वह आगे बढ़ गया तब कैसे भी आधी बेहोश और खून में लथपथ मां को साथ लेकर मैं वहीं सामने सीढ़ियों के बगल के बाथरूम में जा छुपा। खतरा अभी भी टला नहीं था। खून की धार से पूरा फर्श तरबतर हो चुका था और बगल के टॉयलेट से भी दबी दबी कराहने की आवाज सुनाई दे रही थी मुझे। कैसे भी नीचे की झिर्री से मैं ने हाथ बढ़ाकर उसे भी अपने साथ लिया। 25 साल की क्लारा को पीठ में गोली लगी थी। टिशू पेपर के रोल से जैसे-तैसे हम सभी बहते खून को रोकने की कोशिश करते रहे। प्रार्थना करते रहे कि यह बुरा वक्त हिम्मत से निकाल पाएँ हम , इतनी शक्ति और सद्बुद्धि दे वह हमें।

कब वहीं उसी हालत में मैं मूर्छित हो गया, आगे क्या हुआ , कैसे यहाँ पहुंचा –कुछ पता या याद नहीं मुझे। मुझे तो यह भी नहीं पता कि नीतू आंटी कैसी हैं , कहाँ हैं-क्या आप ले चलेंगे मुझे मेरी मां के पास, प्लीज। ‘

कहते-कहते मुफ्ती फूट-फूटकर रोने लगा। अब वह पूरी तरह से थक चुका था ।

‘ यू आर रीयली ए ब्रेव बौय।‘ कहती पुलिस ने अपनी फाइल बन्द कर दी और उसकी शिथिल बांह को प्यार से थपथपा कर चले गए वे दोनों कांस्टेबल।

वे तीनों भी मुफ्ती के पास ही कुर्सी खींचकर बैठ गए। अब पूछने-कहने को कुछ नहीं था किसी के पास। चुपचाप देखते रहे उसे और उसके उस पैर को, जहाँ पर गोली लगी थी। चुपचाप उसके माथे और बाल को बीच बीच में सहला लेते। जानते थे कि दो ही साल में दुबारा एक बड़े हादसे से गुजरा है मुफ्ती। शरीर ही नहीं आत्मा तक घायल हो चुकी है उसकी। कोई नहीं कह सकता था कि ठीक होने में कितना वक्त लगेगा, इसबार तो डॉक्टर भी नहीं बता पा रहे थे।

बारबार मुफ्ती की बेचैन आँखें नीतू आंटी को ही ढूंढे जा रही थीं परन्तु नीतू की कोई खबर उनके पास भी नहीं थी।

जब बेचैनी नहीं सही गई तो दिशा आगे बढ़ीं और अपने आंचल से माथा पोंछती बोलीं-फिकर मत कर तू। ठीक होगी तेरी नीतू आन्टी। जब यहाँ तक भगवान ने साथ दिया है तो देखना, आगे भी देगा।

सबने ही मुफ्ती का मन बहलाने की बहुत कोशिश की। परन्तु भय मानो किशोर की नस-नस में धंस चुका था। टी.वी पर चलती न्यूज चैनेल ने भी एक-एक करके सारे घाव वापस खोल दिए उसके। खबर जारी थी और बारबार आ रही थी- तीस के करीब वहीं मर चुके थे, उस गोली बारी में। सत्तर के करीब घायलों को एयर ऐम्बुलेंस से ब्रिटेन वापस ले आया गया है, जिसमें से कुछ और की भी मौत होने की संभावना है। कई काफी गंभीर और लाइलाज हैं। –

मुफ्ती की आखें लबालब थीं। गले में कहीं एक हदय विदारक चीख अटकी हुई थी, जिसे उसने मुंह में मुठ्ठी भरकर अंदर ही अंदर घोट लिया था। फालतू में रोने से भी क्या फायदा-शायद जानता था वह।

अगली रात उन सबके लिए एक बेहद कठिन रात थी। नीतू की अभी भी कोई खबर नहीं थी। सभीकी बीसों उंगलियाँ भय में क्रौस्ड थीं और सभी बेहद चिंतित तने बैठे रहे रातभर।…

सुबह-सुबह पौ फटते ही वह हृदयविदारक और अप्रिय खबर भी मिल ही गई, जिसे सुनने तक से वे डर रहे थे। अब वह मात्र आशंका नहीं, एक डरावनी सच्चाई थी। वेटिंग रूम के बिल बोर्ड पर हादसे में गुजरे मृतों की सूची टांग दी गई थी और नीतू का नाम भी था उसमें ..ऊपर से दूसरे नंबर पर ही। मुफ्ती को कैसे खबर दी जाए, क्या बर्दाश्त कर पाएगा वह अभी, खून तो उसका भी बहुत बह चुका है…दर्द के साथ-साथ एक बड़ी कशमकश ही थी अब उन तीनों की आँखों में।

फौर्म भरते ही नीतू के पास ले जाया गया उन्हें। ठंडे मुर्दाघर में, जहाँ नीतू का पार्थिव शरीर इंतजार कर रहा था उनका। जिस नीतू से मिलने के लिए पिछले तीन दिनों से वे बेचैन थे, अब आंसुओं में डूबे ठीक से देख तक नहीं पा रहे थे वे उसे। यूँ मिलना होगा- सच होकर भी कितना अविश्वसनीय था यह सब। हफ्ते भर पहले ही तो हंसती मुस्कुराती गई थी अपने लाडले बेटे के साथ। ‘ बोल दिशा क्या लाऊं तेरे लिए?’ -पूछा भी था उससे।

‘बस तू सही-सलामत लौट आना। ‘ यही तो कहा था तब दिशा ने ।

नीतू नहीं रही पर आंसू भीगी आँखों के आगे वह पल अभी भी ज्यों-का-त्यों जीवित था।

सारी सच्चाई जानने के बावजूद भी मन नहीं मान रहा था दिशा का कि उसकी सहेली नीतू है से थी भी हो सकती है, हो गई है।

 

-क्रमशः…

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