गीत और ग़ज़लः गोपाल दास ‘ नीरज’ अगस्त-सितंबर 2015

 

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दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था|

तुम्हारे घर का सफ़र इस क़दर सख्त न था।

 

इतने मसरूफ़ थे हम जाने के तैयारी में,

खड़े थे तुम और तुम्हें देखने का वक्त न था।

मैं जिस की खोज में ख़ुद खो गया था मेले में,

कहीं वो मेरा ही एहसास तो कमबख्त न था।

 

जो ज़ुल्म सह के भी चुप रह गया न ख़ौल उठा,

वो और कुछ हो मगर आदमी का रक्त न था।

 

उन्हीं फ़क़ीरों ने इतिहास बनाया है यहाँ,

जिन पे इतिहास को लिखने के लिए वक्त न था।

 

शराब कर के पिया उस ने ज़हर जीवन भर,

हमारे शहर में ‘नीरज’ सा कोई मस्त न था।

 

 

 

 

 

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तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा।

सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा ।

वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में,

हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा ।

 

तू ढूँढ़ता था जिसे जा के बृज के गोकुल में,

वो श्याम तो किसी मीरा की चश्मे-तर में रहा ।

 

वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की,

मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा ।

 

हज़ारों रत्न थे उस जौहरी की झोली में,

उसे कुछ भी न मिला जो अगर-मगर में रहा ।

-गोपालदास नीरज

 

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