रंग तरंग / लेखनी संकलन

Holi in capetown
माय करी मन की पद्माकर,
फाग की मीर अमीरनि ज्यों, गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी, नाय अबीर की झोरी।
छीन पितंबर कम्मर ते, सुबिदा दई मीड कपोलन रोरी,
नैन नचाय मुस्काय कहें, लला फिर अइयो खेलन होरी।
-कवि पद्माकर

अम्बर ने खोली
मुठ्ठी जो एक रंगभरी
भीगी-भीगी-सी
धरती मुस्काई

कोयल सी कूके
हरित नवेली चूनर ओढ़े
फिर-फिर के
बूटे-बूटे
रंगों में  सज आई
पात-पात महके लहके
सकुचाई शरमाई
झूम रही है बौराई

फाग ठिठोली कर गया
अब अवगुंठित यह
सोच रही बहकी-बहकी
खुशियां किस झोली में
पर टिक पाई!

-शैल अग्रवाल

होली का त्यौहार आ गया

फागुनी बौछार लेकर
भौरों का अभिसार लेकर
मन में उल्लास जगा गया
रसभरा त्यौहार आ गया
केसर चन्दन टेसू  रंगों में  मुस्कराता
मधुमास छा गया
चंग और फाग-राग  गाता
होली का त्यौहार आ गया
केसरिया पिचकारी लेकर
कुमकुम गुलाल अबीर की
उल्लसित फुहार बरसा कर
मौसम पर पलाश छा गया
होली का त्यौहार आ गया
रसिया गाता  हवाओं संग
कलियों में तरुणाई जगा
जाफरानी अमराई महका
होली का त्यौहार आ गया !

होली आई- होली आई

दहके फूल पलाश के
महके रंग गुलाल के
सरसों ने ली अंगड़ाई
होली आई होली आई

फागुन का देख जोश
धरती डूबी मस्ती में
मौसम  में मादकता  छाई
होली आई होली आई

डाल डाल टेसू खिले
चैत की गुहार पर
चेहरों   पर उल्लास मिले
होली आई होली आई

हवा के पंख पर केसर उड़े
लेकर फगुआ का सन्देश
कूकी कोयलिया वन वन
होली आई होली आई

मुखरित हो अब  छेड़ो राग
ढाई आखर प्रेम के रहें
द्वेष बचे न शेष
होली का उल्लास गूंजे
भीगी  बौराई पुरवाई
होली आई होली आई l
आई…. . होली….. आई…..  .

हायकु

धूप पंखुरी
खिली फागुन बन
बजे मृदंग

मौसम टेसू
मन हुआ फागुन
होली के संग

महकी हवा
रसपगी होली सी
बिखरे रंग

होली के रंग
उमंग नवरंग
भंग के संग

-सरस्वती माथुर

रहे सदा ये
रंगभरी तरंग
अपनों संग-
शैल अग्रवाल

 

 

बसंती हवाओं में बिखरी सु्गंध है.

मौजों के ऊपर से चंदा भी झांक रहा,

छाया यह कैसा मदहोशी रंग है.

 

शमशेर अहमद खान

 

 

होली का मतलब मिलन, रंग-अर्थ है प्यार.

मिले सभी आ कर तभी, सतरंगी संसार.

फागुन में सब जल गया, जितना भी था रार,

निर्मल मन को कर गया, ये अद्भुत त्यौहार..

फाग लिए अनुराग की, पिचकारी के साथ,

कर देता है प्यार की, अंतस में बरसात.

-गिरीष पंकज

 

 

 

यह मिट्टी की चतुराई है,

रूप अलग औरंग अलग,

भाव, विचार, तरंग अलग हैं,

ढाल अलग है ढंग अलग,

आजादी है जिसको चाहो आज उसे वर लो।

होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो!

 

निकट हुए तो बनो निकटतर

और निकटतम भी जाओ,

रूढ़ि-रीति के और नीति के

शासन से मत घबराओ,

आज नहीं बरजेगा कोई, मनचाही कर लो।

होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो!

 

प्रेम चिरंतन मूल जगत का,

वैर-घृणा भूलें क्षण की,

भूल-चूक लेनी-देनी में

सदा सफलता जीवन की,

 

जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो।

होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!

 

होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो,

होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो,

भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को,

होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!

-हरिवंश राय बच्चन

 

 

 

 

तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

 

देखी मैंने बहुत दिनों तक दुनिया की रंगीनी,

किंतु रही कोरी की कोरी मेरी चादर झीनी,

तन के तार छूए बहुतों ने मन का तार न भीगा,

तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

 

अंबर ने ओढ़ी है तन पर चादर नीली-नीली,

हरित धरित्री के आँगन में सरसों पीली-पीली,

सिंदूरी मंजरियों से है अंबा शीश सजाए,

रोलीमय संध्या ऊषा की चोली है।

 

तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

हरिवंश राय बच्चन

 

फागुन के दिन चार रे
फागुन के दिन चार रे, होरी खेल मना रे। टेक।
बिनि करताल पखबाज बाजै अणहद की झणकार रे।
बिनि सुर राग छतीसों गावैं, रोम रोम रंग सार रे।
सील संतोष की केसर चोली, प्रेम प्रीत पिचकार रे।
उड़त गुलाल लाल भयौ अंबर, बरसत रंग अपार रे।
घट के पट सब खोल दिए हैं लोक लाज सब डार रे।
होली खेलि पीय घर आये, सोई प्यारी प्रिय प्यार रे।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर चरण कमल बलिहार रे।

-मीराबाई

होलीः कुछ कविताएँ

होली के रंग

रंग होली के कितने निराले,
आओ सबको अपना बना लें,
भर पिचकारी सब पर डालें,
पी को अपने गले लगा लें ।

रक्तिम कपोल आभा से दमकें,
कजरारे नैना शोखी से चमकें,
अधर गुलाबी कंपित दहकें,
पलकें गिर गिर उठ उठ चहकें ।

पीत अंगरिया भीगी झीनी,
सुध बुध गोरी ने खो दीनी,
धानी चुनर सांवरिया छीनी,
मादकता अंग अंग भर दीनी ।

हरे रंग से धरा है निखरी,
श्याम वर्ण ले छायी बदरी,
छन कर आती धूप सुनहरी,
रंग रंग की खुशियां बिखरीं ।

नीला नीला है आसमान,
खुशियों से बहक रहा जहान,
मस्ती से चहक रहा इंसान,
होली भर दे सबमें जान ।

कवि कुलवंत सिंह

फाग

फागुन का महीना है, मचा है फाग
होली छाक छाई है; सरस रँग-राग !

बालों में गुछे दाने, सुनहरे खेत
चारों ओर झर-झर झूमते समवेत !

पुरवा प्यार बरसा कर, रही है डोल
सरसों रूप सरसा कर, खड़ी मुख खोल !

रे, हर गाँव बजते डफ़ मँजीरे ढोल
देते साथ मादक नव सुरीले बोल !

चाँदी की पहन पायल सखी री नाच
आया मन पिया चंचंल सखी री नाच !

-महेन्द्र भटनागर

होली हाइकू

फागुन मन
इन्द्रधनुष तन
होली पे आज

उमड़ा फिर
रंगों का सागर
पलकों तले

मलते हम
प्यार का गुलाल
छूटे ना कभी।

-शैल अग्रवाल

राधा जब हो गई पराई
मिटे स्वप्न मिट गई आस सब राधा जब हो गई पराई
बोल साँवरे !  किसके ऊपर भर पिचकारी मारेगा तू ।

बहुत रोकता था मग उसका, पनघट-पनघट द्वारे-द्वारे
बहुत छेड़ता था ग्वालिन को बेमतलब बिन सोच विचारे।

यह पल भर का नेह हो गया
तेरे जीवन भर का परिचय।

गाँव विराने चली आज वह
फिर अब किसे निहारेगा तू।

बोल साँवरे ! किसके ऊपर भर पिचकारी मारेगा तू।

कान्हा ! तेरी वंशी सुन जब लहर-लहर बन गई दिवानी
अल्हड़ता बन गया बालपन, बूढ़ापन बन गई जवानी।

यदि अब तूने उस वंशी से
दर्द भरे कुछ गीत न गाये।
रीत प्रीत की मिट जायेगी
तब फिर किसे पुकारेगा तू।

बोल साँवरे ! किसके ऊपर भर पिचकारी मारेगा तू।

आनी जानी दुनिया है यह अपनी उमर विरानी समझो
मिली नजर अफसाने हैं यदि बिछुड़ी नजर कहानी समझो।

चल उठ बरसाने का हर मन
हर कण तेरा दर्द पियेगा।
दर्द दिया है जिसने उसको
कब तक डगर बुहारेगा तू।

बोल साँवरे!  किसके ऊपर भर पिचकारी मारेगा तू।

– जयन्ती अग्रवाल

होरी
रंग रंग
अंग अंग
गुलाल कियो रे

अनंत परंत
युगोपरंत
देखी तुम्हारी हंसी
मेरे तो तन मन
संवार गइयो रे ।

कैसी है, होत होरी कैसे होरी के रंग रे
मेरे तो तन मन रहे
भौंरे के भौंरे रे।

मीठी रतनार छवि
देखी न सुनहु कबहुं
आज तनह मनह
जादू डार गइयो रे।

एक ही तेरी
झलक…
मन में उमंग
तन में तरंग
के कैसे कैसे रूप
उतार गइयो रे।

यौवन के आस पास
उगा उल्लास हास
तन मन मेरा
हुलै हुलास गइयो रे।

मन में उठी तरंग
हृदय की भाखा संग
सारे गुलाल रंग
जन्मजात– पात पात
मेरे कपोल गात
रंगई रंग गइयो रे।

-सुदर्शन ‘प्रियदर्शिनी ‘ ‘

 

किससे खेलूं होली रे !
पी हैं बसे परदेश, मै किससे खेलूं होली रे !
रंग हैं चोखे पास
पास नही हमजोली रे !

पी हैं बसे परदेश,मै किससे खेलूं होली रे !
देवर ने लाया गुलाल                                                                                                                                                                                                                                  मै बन गई भोली रे !
पी हैं बसे परदेश,मै किससे खेलूं होली रे
ननद ने मारी पिचकारी,
भीगी मेरी चोली रे !

पी हैं बसे परदेश,  मै किससे खेलूं होली रे !

जेठानी ने पिलाई भांग,
कभी हंसी कभी रो दी रे !

पी हैं बसे परदेश,  मै किससे खेलूं होली रे !
सास नही थी कुछ कम,
की उसने खूब ठिठोली रे !

पी हैं बसे परदेश, मै किससे खेलूं होली रे !

देवरानी ने की जो चुहल
अंगिया मेरी खोली रे !

पी हैं बसे परदेश, मै किससे खेलूं होली रे !

बेसुध हो मै भंग में
नन्दोई को पी बोली रे !

पी हैं बसे परदेश, मै किससे खेलूं होली रे !
-कवि कुलवंत

अलसाए मन में यह कैसा उमंग है,
बसंती हवाओं में बिखरी सु्गंध है।
मौजों के ऊपर से चंदा भी झांक रहा,
छाया यह कैसा मदहोशी रंग है।
-शमशेर अहमद खान

प्रेम -सुखों की वर्षा बरसे
सबका जीवन हर पल हरसे ।
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

होली का मतलब मिलन, रंग-अर्थ है प्यार।
मिले सभी आ कर तभी, सतरंगी संसार।
फागुन में सब जल गया, जितना भी था रार,
निर्मल मन को कर गया, ये अद्भुत त्यौहार..
फाग लिए अनुराग की, पिचकारी के साथ,
कर देता है प्यार की, अंतस में बरसात।
-गिरीष पंकज

तन झूमें मन मस्त हो, पुलकित हो परिवार,

जीवन का हर पल रंगे, रंगों का त्योहार।

सपनों में पातल खिलें, सांसों में मकरंद,

होली के इस पर्व मे, मिले अमित आनंद।

पगलाए से दिन मिलें, मादक-मादक रात,

होली का त्योहार दे सपनों की सौगात।

जीवन की कड़वाहटें सारी जाएँ भूल,

मेरी ये शुभ कामनाएँ करें जनाब कबूल।।

नरेश व पुष्पा कात्यान

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