कहानी समकालीनः चरैवेतिः शैल अग्रवाल

एक आम-सा-ही दिन था वह …

खाने की टेबल पर खाना लग रहा था। बेटी बगल के कमरे में बैठी पढ़ कम, टेलीविजन ज्यादा देख रही थी और वह धुले कपड़ों को तह कर-करके अलमारी में रख रही थी कि अचानक ही माली दौड़ता आया और आने वाले प्रकृति के कोप से सचेत रहने की चेतावनी देने लगा। भय और बदहवासी में साफ-साफ कुछ बता भी तो नहीं पा रहा था वह, सिवाय उसी एक बेसुरी रट के, ‘ प्रलय होगा मेमसाब आज! ..प्रलय। चारो तरफ बस यही शोर है । पूरे पंजिम में यही शोर है। ‘

अल्वा की नजर  खुद-ब-खुद खिड़की के बाहर  चली गई। आकाश पर चील  मंडरा रही थीं और इक्के दुक्के कुत्तों के रोने की आवाज भी आ रही थी… वहीं पास से ही, कहीं।

’चुप कर। जाने क्या-क्या अनाप-शनाप बोलता रहता है।’ कहकर लौटा तो दिया, पर माली की आँखों में फैले भय ने बाध्य कर दिया था अल्वा को कि वह भी अब बचाव के लिए कुछ करे। अपशगुनों पर ध्यान दे। अब तो टेलिविजन पर भी खराब मौसम और तूफान की ही चेतावनी थी। जरूरत से ज्यादा ऊंची लहरों का अंदेशा … शायद सुनामी भी।

जैसे तैसे कुछ जरूरी चीजों को समेट, तुरंत ही छत पर जा पहुंची तब अल्वा।

…एक रात की ही तो बात थी। लहरें उछाल भले ही मार लें, समुद्र कभी मर्यादा नहीं तोड़ता, जानती थी अल्वा। पूर्वा के साथ एक आरामदेह बिस्तर लगा कर सोने की अच्छी तैयारी कर ली थी उसने। पसंदीदा संगीत, मैगजीन सबकुछ था उसके पास, फिर भी एक अनचीन्हा भय मन को कुतरे जा रहा था और आगत् विप्लव के पदचाप मानो रह-रहकर चौकस करने लगे थे उसे।

’जो होगा, देखा जाएगा। फिर ईशू तो है न सुरक्षा के लिए।’ बारबार यही कहकर मन-ही-मन समझा ले रही थी वह खुद को भी और भयभीत पूर्वा को भी।

खाने के बाद शांति से शाम की फिल्म देखना चाहती थी अल्वा, इसलिए जल्दी-जल्दी सब काम निपटा लिए थे, अच्छा ही हुआ जो रोटियां भी सेक ली थीं उसने, क्योंकि अब घर में चारोतरफ घुप्प अंधेरा था। बिजली जा चुकी थी और भयभीत आंखों से नींद कोसों दूर जा छिटकी थी । जैसे-जैसे भय को दूर धकेलती वह, वैसे-वैसे हाथ-पैर और-और शिथिल होते जाते।

क्रोधित लहरों की फुंकार जल्दी ही बहुत पास से सुनाई देने लगी और तब घबराहट में जाने कहां खो गई थी घर की हर चीज; जितना हो पाया, जो ले पाई, वही बहुत था अब तो परेशान और डरी अल्वा के लिए।

अभी, कुछ घंटे पहले ही तो दूरदर्शन पर संभावित तूफान की खबर आई थी …और इतनी जल्दी सबकुछ बदल भी गया! अल्वा तेजी से बदलते मौसम से जितना ही सुरक्षित होने की कोशिश करती, शंका के बादल उतने ही गहराते जाते।

अब बाहर की दुनिया से पूरी तरह से कट चुकी थीं, दोनों मां-बेटी। कोई इन्टरनेट या मोबाईल काम नहीं कर रहा था, जिसके सहारे वे वापस जुड़ सकतीं। …फोन, टेलीविजन, रेडिओ, मोबाइल कुछ नहीं थे अब उनके पास दुर्भाग्य की यह कहानी कहने या मदद मांगने को । न कोई खबर मिल सकती थी और ना ही वो ही कोई सूचना दे सकतीं थीं। अब ये आधुनिक तत्कालीन सुविधाएँ एक असाध्य सपना थीं उनके लिए। सहायता मांगना तो दूर जो उनके साथ घट रहा था, उसे एक-दूसरे के साथ तक तो बांट नहीं पा रही थीं वे ।

भय ने टेंटुए भींच दिए थे दोनों के। यूँ कहा जाए तो ज्यादा सही होगा कि सुरक्षा के चन्द आम जरूरी कवचों के नाम पर विध्वंस के उस क्रुद्ध पल में अब कोई सुरक्षा-कवच या सुरक्षित स्थान नहीं था उनके पास, न तो घर में ही और ना ही मन में..। लकवा मारी सी अपंग मूक दृष्टा थीं अल्वा और पूर्वा। थोड़ी राहत अल्वा को बस एक इसी बात की थी कि दिनभर की थकी पूर्वा को गोदी में सिर रखते ही, सान्त्वना और थपकी देते ही नींद आ गई थी ।

शाम से ही लगातार समुद्री चिड़ियों का हृदय विदारक चीत्कार और जानवरों का दारुण रुदन साफ-साफ दिखाई और सुनाई दे रहा था अल्वा को। न देखना चाहे तो भी, न सुनना चाहे तो भी। मानो मौत के इस काले साये को आदमियों से पहले ही पहचान लिया था इन्होंने।

अल्वा की पथराई आंखें अब प्रहरी-सी सचेत थीं। जब हाथ को हाथ तक न सूझे वह देख पा रही थी कि अंधेरे को चीरती लहरें घर में दरवाजा तोड़कर घुस आई थीं और क्रुद्ध फुंकार के साथ जल्दी-जल्दी सब कुछ समेट रहीं थीं। बर्तन-भांडे, कुर्सी, सोफा, सभी  कुछ तो समाता जा रहा था उनकी हाहाकारी झोली में। विनाश का ऐसा ताण्डव, वह भी घर के मजबूत आबनूसी दरवाजों को तोड़कर, 100 गज दूर बहते शान्त-गम्भीर समुद्र द्वारा, अल्वा वाकई में बहुत भयभीत थी अब।

देखते-देखते फटी आँखों के आगे ही, क्रोधित लहरों ने अब तो सीढ़ियाँ तक चढ़ना शुरू कर दिया था; मानो भयभीत अल्वा और पूर्वा को ढ़ूँढ़ कर ही दम लेंगी; अल्वा जानती थी कि अगर विप्लव का यही तांडव रहा तो कुछ ही घंटों में यह छत भी सुरक्षित स्थान नहीं उनके लिए। घर के आगे पीछे का रास्ता तो पहले ही डूब चुका था। पानी की गहराई कितनी है नहीं जानती थी अल्वा, पर यदि लहरों ने सीढ़ी चढ़ना शुरू कर दिया है तो कम-से-कम दस पंद्रह फीट तो अवश्य है ही। तैरना संभव है अगर हिम्मत और ताकत साथ दें तो। पूर्वा भी तैरना जानती है, पर कबतक और कितनी दूर तक, यह नहीं जानती थी अल्वा और क्या वह दोनों यूँ लगातार इस वेग के साथ या खिलाफ तैर भी पाएंगी ?

हर आपद कर्म के लिए शरीर और मन को तैयार कर रही थी अल्वा, एक दृढ़ और जुझारु संकल्प के साथ। चोर नजरों से अपनी और पूर्वा के हाथ पैरों की ताकत और मन की शक्ति को समझती और बारबार तौलती, प्रार्थना पर प्रार्थना किए जा रही थी भगवान से कि 14 वर्ष की उम्र तो बहुत ही कम होती है,…कम-से-कम पूर्वा को तो बख्श ही दें वह इन नागिन-सी फुंकारती लहरों से।

घर के बाहर मजबूती के साथ लाइन में खड़े ताड़ के पेड़, जमीन में गहरे धंसे बिजली के खंबे, सभी को तो ढूँढ-ढूँढकर उखाड़ रही थीं वे लहरें, बहाए ले जा रही थीं सब कुछ अपने साथ। फिर छत के एक कोने में धंस कर बैठी अल्वा और पूर्वा की क्या औकात थी। अगल-बगल कोई घर नहीं था सिवाय उस पुरानी पुर्तगाली रोमन कैथोलिक चर्च के। कितना गर्व था एकान्त प्रिय अल्वा को अपने घर की इस चित्र-सी मोहक प्राकृतिक संरचना पर। पर आज कितना पछता रही थी वह यूँ समुद्र के इतने पास घर चुनने के लिए।

शुरु से ही भला लगता था उसे शयनकक्ष की खिड़की से समुद्र की लहरों को अठखेलियां करते देखना, पर आज वही लहरें कितनी विद्रूप थीं, मानो मौत खुद लहरों का रूप लेकर दर-दर घूम रही थी, हर जीवित प्राणी को निगलने और मिटाने के लिए। सही कह रहा था माली, शायद यही प्रलय है। सृष्टि का अंत है। ढोर, जानवर, पक्षी सब इनकी चपेट में… अब नहीं बचेगा कोई। पूर्वा को लेकर सुरक्षित स्थान की तलाश में रात से ही छत पर  वह सिकुड़ी-सिमटी बैठी है, बेटी को कसकर सीने से लगाए और एक छोटी –सी गठरी में चन्द रोटियाँ और जितने आसानी से हाथ में आ सके…वे चन्द पैसे-सिक्के लेकर। अल्वा नहीं जानती कि सामने फुंकारती मौत अब इन्हें इस्तेमाल करने का मौका देगी भी या नहीं, पर इन्तजाम तो करने ही पड़ते है! उसका और बेटी का जीवन अब वाकई ईशू के ही हाथों में ही था। किससे सहारा ले…किस तक मदद की गुहार लगाए नहीं जानती थी वह। कोई सहारा नहीं था वहाँ पर, न घर का और ना ही गृह-स्वामी का। वह तो अच्छा ही था कि रौबर्ट रोहन को स्कूल छोड़ने मुंबई जा चुके थे और ईशू की दया से सुरक्षित थे बाप-बेटे, इस घर, इस शहर, इस समुद्र के किनारे से दूर। वरना दो और अपनों की सुरक्षा को लेकर असहाय और बेचैन अल्वा और क्या कुछ कर लेती, सिवाय बैठकर ऐसे ही डरने और घुटने के… मौत से जिन्दगी की भीख मांगने के। काश् पूर्वा की छुटटियाँ भी चार दिन पहले ही खतम हो गई होतीं, तो कम-से-कम आँखों के दोनों तारों में से एक के टूटने या डूबने का भय तो न सालता रहता उसे!

सुबह तक तो जरूर ही सब शान्त हो जाएगा यही सोचकर छत पर आई थी अल्वा बेटी को सीने से लगाए। वैसे भी घर ऊँचाई पर था और अंग्रेजों के जमाने की बनी एक मजबूत और सशक्त इमारत थी।..उसकी समझ में इस तरह के खतरों को सहने की ताकत थी इसमें। वह कब जानती थी कि घर जो आजतक उसका एक सुरक्षित किला था, अचानक ही, मौत की एक डरावनी सुरंग बन जाएगा और इसमें से केवल अब ये बेहद खौफनाक और असह्य लहरें ही अन्दर-बाहर आने-जाने का अधिकार रख पाएंगीं, या समर्थ थीं।

बर्तन भांडों के साथ मेज कुर्सी ही नहीं, खिड़की, दरवाजे सभी बहे चले जा रहे थे। भय-विस्मित, निष्पलक आँखों से अल्वा देख रही थीं कि कैसे उन चन्द लहरों ने पूरा-का-पूरा घर ही बहा-बहाकर ओझल कर देने की ठान ली थी।

“पूर्वा बेटा, इस खिड़की को कस कर पकड़े रहो, चाहे कुछ भी हो जाए, इसे छोड़ना नहीं ।“ डबडबाई आँखों से बेटी को निष्पलक देखती आधी-घबराई, आधी रोई-सी बोली थी तब, अल्वा।

छत तक पानी बढ़ता देखकर अर्धविक्षिप्त-सी अल्वा बेटी को संयत करने का जितना ही प्रयास करतीं, पूर्वा की आंखों में उतना ही भय गहराता जान पड़ता और नतीजा यह हुआ कि इस विषय पर एक गहरी चुप्पी साध ली माँ-बेटी ने। रात तो कैसे भी अनर्गल कहानी किस्से और चुटकुलों में और अंत में भजन व प्रार्थना में निकल गई, परन्तु सुबह बेटी से दूर जाने से चन्द पल पहले ही, बेहद थर्राती आवाज में यही आखिरी चेतावनी दे पाई थीं अल्वा पूर्वा को, “ याद रहे कुछ भी हो…(कुछ भी का मतलब, कुछ भी) ये खिड़की की सलाखें मत छोड़ना। मेरी बहादुर बेटी हो ना, तुम!”

बारबार आँसू भीगे बालों को चेहरे से पीछे हटाते हुए इतनी ही तो तसल्ली दे पाई थी मां उसे और आंसुओं से रुंधे गले से निकली वह फसफसी आवाज बहुत ही धीमी और कराहती-सी जान पडी थी तब पूर्वा को । शायद कभी भूल भी न पाए वह माँ की उस आखिरी उदास आवाज को।  खिड़की के बीचोबीच बिठाकर कंधे पर लिपटे शौल से बाँध दिया था फिर अल्वा ने उसेः अपनी समझ से एक अतिरिक्त सुरक्षा के लिए।  मानो वह चौदह की नहीं चार साल की बच्ची हो उनकी। पूर्वा ने भी यंत्रवत् ही सही, करने दिया था मां को सबकुछ  जो भी वह करना चाहती थीं। पूरा विश्वास जो था उसे अपनी मां पर । …माँ ने भी कब रोहन और उसकी सुरक्षा और सुविधा के अलावा कुछ और सोचा या चाहा था- भलीभांति जानती थी पूर्वा।

आंसू भीगे होठों से बेटी के पूरे चेहरे पर कई प्यार भरे चुम्बन देकर उसे कसकर अपनी बाजुओं में जकड़कर आगत् का इन्तजार करती फटी आंखों से अपने भयावह भविष्य को टोह रही थी अब अल्वा।

खिड़की तक पानी अभी पहुंच नहीं पाया था। पर अल्वा जानती थी कि अगले पल ही, कभी भी पानी खिड़की तक पहुंच सकता है। एकमात्र यह खिड़की ही तो सहारा रह गई थी मां-बेटी की…खिड़की जिसके बाहर से भी, राहत के नाम पर बस, दहाड़ मारते समुद्र का डरावना विस्तार ही दिखाई दे रहा था। तब खिड़की दोनों हाथों से कसकर उसे पकड़ाकर, वह खुद भी तो उसके पीछे खड़ी हो गई थीं, उसे कसकर पकड़े हुए..एक दुशाले-सी ही खुदको भी उसपर लिपटाती-लिभड़ाती-सी।

पूर्वा को पूरी तरह से अपने में समेटकर उसके चारो तरफ एक अतिरिक्त सुरक्षा-कवच बना लिया था अब अल्वा ने।

और तब तुरंत ही उनकी सहमी आंखों के आगे ही घर की छत का वह कोना, आधे वरांडे का छोटा सा उठा हुआ वह टुकड़ा भी अचानक चरमरा कर टूटा और अन्य चीजों की तरह ही पानी में बहने लगा। अंत इतना नजदीक है कब सोचा था अल्वा और पूर्वा ने।

शाम से ही आपद अनहोनी के आभास से अल्वा का मन बेचैन था। जानवरों की तरह जलजले को सूंघती, एक सुरक्षित कोने में पहुंचने को बेचैन थीं दोनों मां बेटी, पर वह प्रलयंकारी पल इतना निठुर था कि इसकी भी इजाजत नहीं दे रहा था उन्हें । एक और तेज लहर का झोंका आया और खिड़की के आगे वाले हिस्से के साथ-साथ ही मां को को भी पूर्वा की पकड़ से छीनकर बहा ले चला इस बार। शायद मां-बेटी दोनों को ही एक हलकी-सी झपकी आ गई थी विनाश के उस अनहोने पल में। फिर तो बस एक भयावह चीत्कार और उसके बाद सब शान्त था वहाँ।

फटी-फटी आंखों से पूर्वा देख रही थी एकाध बार मां का ऊपर उठता हाथ जरूर दिखा था उसे – फिर मां कहीं नहीं थीं।  बस जल ही जल का डरावना और अनन्त विस्तार था, आगे और पीछे… दोनों ओर क्या चारो तरफ । पूर्वा ने भी खिड़की सहित ही, कूदना चाहा था मां की सहायता के लिए…मां को ढूँढने के लिए, पर मां शायद जानती थीं कि यही होगा, तभी तो माँ की लगाई उस कसी गांठ ने खुद मां बनकर पूरी तरह से रोक लिया उसे। छटपटाती ही रह गई भयभीत पूर्वा।

देखते-देखते जल और घर की वह निर्णायक रेखा भी मिट गई और घर का दरवाजा तक पूरी की पूरी चौखट के साथ बह-बहकर जाने कहां-का-कहां जा पहुंचा ..अदृश्य .मां की तरह ही। किसी का कोई पता नहीं था। भय का दैत्य सब कुछ निगल चुका था।

अब पूर्वा की मां कहीं नहीं थीं और घर और समुद्र के बीच कहीं कोई सीमा रेखा नहीं बची थी। आंसू डूबी आँखों के आगे, कहां तक घर था और कहां से वह पानी का समुन्दर शुरु होता था, जानने या समझने का कोई ज़रिया नहीं था। मां-घर, अब सब उसी विशाल समन्दर के अदृश्य हिस्सा थे… …समन्दर भय का…समन्दर यादों का…समन्दर एक अनिश्चित और अकेले आनेवाले कल का।

भीगती कांपती पूर्वा मानो खुद भी तो उसी पानी में जा समाई थी। भय के मारे पूर्वा की सोचने और समझने की शक्ति तक क्षीण पड़ती जा रही थी। दम-घोटू भय ने टेंटुए दबोच रखे थे और गले से चीख क्या, एक छोटी-सी घिघ्घी तक नहीं निकल पा रही थी। अगले पल ही एक अनियंत्रित हिचकी के साथ बेचैनी और मितली सभी को अन्दर ही अन्दर पी गई पूर्वा।  पेट में उफनता कई गैलन पानी उसे परेशान कर रहा था या भय और सदमा नहीं जानती थी चौदह वर्षीय पूर्वा।

‘ जाने क्या-क्या और देखना बाकी है अभी तो। होने दो जो होना है।‘

इससे ज्यादा और क्या सोच भी सकती थी वह। पूर्वा पूरी तरह से डूब चुकी थी घटनाओं के अनियंत्रित इस भंवर में ।

‘क्या कर सकती है अब वह? अब तो मां भी नहीं हैं उसे बचाने के लिए, हौसला बढ़ाने के लिए! पर मां कहां और कैसी है? ’

डर ने उसके हाथ पैरों को मानो उसके शरीर से अलग कर दिया था, महसूस ही नहीं हो रहे थे वे उसे। पूरी-की-पूरी पूर्वा मानो भयभीत दो आँखों में बदल गई थी, जो चुपचाप सब देखने और समझने की कोशिश कर रही थीं। सुरक्षा का रास्ता ढूँढे जा रही थी। हालांकि जानती थी पूर्वा, उसके साथ भी, किसी भी पल वही होने वाला है, जो अभी-अभी मां के साथ हुआ था ।

’ ईश्वर, मेरी मां को सुरक्षित रखना। उनकी गलतियों को माफ करना । उन्हें अपनी दया का पात्र बनाए रखना। ’

धर्मभीरू पूर्वा ने मानो भय से आंखें बन्द कर ली थीं, परन्तु अंदर की आँखों से वह सब कुछ साफ-साफ देख पा रही थी…कि कैसे जीसस  की सक्षम बाहों ने उसकी मां को उठाकर किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया है। कैसे मां पापा और रोहन ने उसे वापस ढूँढ लिया है और हंसी-खुशी वे तीनों अपने एक नए, ज्यादा सुरक्षित घर में पुनः रहने जा रहे हैं।  सुन्न पड़ती, उसी टूटी खिड़की को कसकर पकड़े-पकड़े उसी पर औंधी लेटी-लेटी पूर्वा मुसीबत के इस  भयावह पल में भी अपने परिवार के लिए… विशेषकर अपनी माँ के लिए ही सोच पा रही थी। नोहा और उसकी सुरक्षा नाव की कहानी उसने भी पढ़ी थी। मां द्वारा सौंपी यह खिड़की ही उसकी नाव थी,..बस यही जानती थी अब तो, वह।

सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए मां ने फ्रॉक को भी तो घेरे से चीरकर गांठ बांध दी थी उसी खिड़की के सहारे…और ऊपर से अपना शौल भी लपेट कर बांध दिया था ठंड से बचाने के लिए, जो भीग-भीग कर भारी होने के बावजूद भी एक सुरक्षा-सी दे रहा था पूर्वा को, माँ की उपस्थिति और अहसास बना लगातार उसके साथ था।

कहां, और कैसे जाना है..उसकी समझ और बस में अब कुछ नहीं था। नियति जहाँ ले जाए, वही उसका मुकाम था अब, यदि कोई मुकाम हो भी तो ! कुछ पल पहले ही, मां को इसी पानी में अकेले बहते और विलुप्त होते देख चुकी थी वह और इस आपद कालीन स्थिति में कुछ भी हो सकता था, इतनी समझ थी उसमें भी। डूबकर ही नहीं, थकान और भय से भी मर सकती थी वह तो।

अब हिम्मत या समझ, कुछ भी नहीं बची थी कि बचने के उपाय तक सोच पाए, सोचना तो दूर…पिछले कई घंटों से चल रहे लहरों के इस ताणडव को और आगे देख या सह पाए-इतनी भी हिम्मत नहीं थी उसके पास। चाबुक सी प्रचंड लहरों और अंधेरे भय की ठंडी तलवारों के लगातार प्रहार से आहत, भूखी-प्यासी पूर्वा आखिर कब तक लड़ पाती।

एक विरोधाभास बन चुका था गोवा के सुरक्षाधिकारी रौबर्ट दिक्रूजा की बेटी पूर्वा का जीवन इस वक्त। पानी चारो तरफ था फिर भी बेहद प्यासी थी पूर्वा। पूरी गोवा की सुरक्षा का भार उसके पापा के कंधों पर था और अपने परिवार की परिस्थितियों से पूर्णतः शायद अनजान ही थे वह अभी भी। पता हो भी तो कोई सुरक्षा तो नहीं ही दे पा रहे थे वह उन्हें।

लहरों पर दूर बही जा रही थी पूर्वा। अपने घर से दूर, परिवार से दूर, जानी पहचानी हर चीज से दूर। कोई पेड़, कोई वनस्पति, कोई जमीन, कहीं कुछ नहीं दिख रहा था उसे। चारो तरफ बस असीम जल-ही-जल का विस्तार। हां, भयभीत पूर्वा के भय को दुगना करते हुए दो हरे रंग के लहराते सांप भी उसी तरफ बढ़ते आते जरूर दिखे उसी पल।

परन्तु अब हताश् उन आँखों में मूर्छित होने के पहले दुख नहीं था, अपितु थी वह छवियाँ, जो उन दिनों की थीं जो हाल ही में उसने अपने मम्मी पापा के साथ बिताए थे- पिछली छुट्टियाँ, जो तीन हफ्ते पहले ही यहीं पूरे परिवार के साथ इसी समन्दर के किनारे हंसते-खेलते बेहद उत्साह के साथ निकली थीं। रोहन भी था साथ में। छोटे भाई रोहन के साथ की गई छोटी-छोटी बातें और खिलखिलाती हँसी ही उसके सुन्न होते कान सुन पा रहे थे, और थी कभी प्यार से मुस्कुराती तो कभी बेहद उदास मां की छवि… बेटी के लिए कुछ न कर पाने की असमर्थता के दर्द से विकृत दूर जाती माँ का चेहरा और गोदी में छुपाने को फैली, डरी , बेचैन दूर जाती बाँहें । चलचित्र सा सबकुछ साफ साफ देख पा रही थीं पूर्वा की थकान और भय से मुंदती आँखें। तेज लहरों पर डूबती उबराती पूर्वा इन्ही के सहारे, इन्ही की आस में ही तो बहती चली जा रही थी अपनी उस अनंत यात्रा पर।

कुछ ही घंटों में सुन्न पड़ी और मूर्छित पूर्वा को कुछ पता नहीं था कि उसे कितनी खरोंचें, कितनी चोटें लग चुकी थीं…कितने नील पड़ चुके थे उसके सुकुमार शरीर पर और वे उद्दंड और उपद्रवी लहरें कहां से कहां बहाए ले जा रही थीं उसे उसी टूटे खिड़की के फ्रेम में ही लपेटे-समेटे..कि वह कभी वापस अपने घर परिवार के किसी सदस्य से मिल भी पाएगी या नहीं?

——

कितने घंटे, कितने दिन, कितने हफ्तों के बाद जगी वह, यह तो ठीक-ठीक नहीं मालूम उसे… हाँ, पर जगने पर पूर्वा ने खुद को किसी अस्पताल के बिस्तर पर पाया…मतलब लहरों के क्रोध से मां का आशीर्वाद ज्यादा सशक्त था-जान चुकी थी वह। पता नहीं, उसकी नींद कितनी लम्बी थी , कितने दिन , घंटे, पल बीच में गुजरे और माँ का क्या हुआ, क्या पापा को मिल पाईं वह , कुछ नहीं जानती थी पूर्वा। किस शहर में थी -यह तक नहीं जानती थी, वह तो।  गोवा में तो नहीं ही थी वह..क्योंकि आसपास बोली जानेवाली बातों को जब उसने सुनने-व समझने की कोशिश की, तो आधी ही बातें समझ में आ पाईं, जो कि बीचबीच में अंग्रेजी में हो रही थीं। एक बात साफ थी कि समुद्र किनारे एक पेड़ की शाख में अटकी, उसी लकड़ी के जंगले पर बंधी मिली थी वह उन्हें। यह भी ईशू का एक चमत्कार ही तो था कि बच गई वह- वे आपस में बातें कर रही थीं। बहुत कम ही उबर पाते हैं ऐसी आपदा से। उन्हें कैसे बताती पूर्वा कि वह खिड़की नहीं, मां ही थीं जिसने उसे बचाया है। मां का मन सब जानता है।

पूर्वा ने इधर-उधर सिर घुमाकर पहचानने , सुनने-समझने की कोशिश की, परन्तु हिन्दी और कोकणी का एक शब्द भी कोई नहीं बोल रहा था वहाँ पर । क्या पता कोई दूसरा ही देश हो यह? स्थानीय भाषा कौन-सी थी जिससे कि भौगोलिक स्थिति की जानकारी हो सके , चाहते हुए भी यह गुत्थी सुलझाने की सामर्थ नहीं थी पूर्वा के जर्जर शरीर और सुन्न पड़ते मस्तिष्क में।

प्रेस रिपोर्टरों ने चारो तरफ से घेर रखा था उसे। वे सब उसके होश में आने का बेसब्री से इन्तजार कर रहे थे और शब्दों के उस जंगल में फड़फड़ाते परिंदों की एक भी गुटरगूँ समझ में नहीं आ पा रही थी । अचानक सामने टी.वी. पर खबरें आने लगीं। गोवा के इक्के दुक्के वे गांव जो पूरी तरह से खतम हो चुके हैं  वहाँ से किसी के बचने की खबर नहीं है। समुद्र की हाहाकारी लहरें सब लील चुकी हैं।

पूर्वा का मन किया कि उठे और रिपोर्टर के हाथ से माइक ले ले , बताए कि आगत् को कोई नहीं जान पाया, वे भी नहीं। वह बची है उन्ही हाहाकारी लहरों से। और क्या वे उसे उसके बाप, भाई से मिलवा पाएँगे…उसकी माँ को ढूँढ पाएंगे…पर पूर्वा के गले से एक आवाज न निकली। उठना चाहा तो पैर बेहद हल्के और सुन्न महसूस हुए, मानो थे ही नहीं, हाथों को आपस में एक दूसरे से जोड़कर महसूस करना चाहा तो वह तक नहीं कर पाई पूर्वा। लगा, शरीर का हिस्सा-हिस्सा उससे बगावत कर चुका था , उसके नियंत्रण में नहीं था। बगल में खड़ी नर्स को जरूर वह अभी भी सुन पा रही थी, जो दूसरी को बता रही थी – ‘ लगता है फिर से कोमा में चली गई ! …कितनी सुन्दर है और कितनी छोटी, पर कितनी अभागी। इतनी छोटी-सी उम्र में ही क्या-क्या नहीं सहना पड़ रहा इसे। किस्मत में जाने क्या-क्या लिखा कर लाई है यह…पता नहीं इसका अता-पता- परिवार वाला कोई मिल भी पाएगा या नहीं ?’

पूर्वा ने कसकर आँखें वापस बन्द कर लीं। आगे कुछ सुनने की फिलहाल न तो हिम्मत ही बची थी और ना ही इच्छा!…बस स्कूल में सुना वह वेदगान ही मंत्र-सा कानों में गूंज रहा था …चरैवेति चरैवेति। चलना ही जीवन है। पीछे जो छूटा सो छूटा…बढ़े चलो, चलते चलो। यही जीवन है। चलते चलो, चलते चलो । सामने पहाड़ हो या दुख का पठार हो। बढ़े चलो, चलो चलो- पूर्वा ने इस शोर से बचने के लिए कान बन्द करने चाहे तो दर्द की चिलक पूरे बदन को आरी-सी काट गई। चलती ही तो रही है वह, बिना थके, बिना रुके पिछले पूरे हफ्ते…होश और बेहोशी दोनों ही हाल में।

बिस्तर से उठने की, हाथ पैर हिलाने की पुनः कोशिश की उसने पर कुछ न कर पाई पूर्वा।

‘ यह भी होगा। अवश्य होगा- तुम हिम्मत मत हारना।‘

मां की आवाज लगातार ढाढस दिए जा रही थी उसे। कोई और हो न हो, पूर्वा जानती थी माँ अभी भी उसके पास थीं और लगातार व भरसक उसकी सुरक्षा कर रही थीं। भावनाओं और घटनाओं से अभिभूत पूर्वा की बंद आँखों से दो ठंडी बूंदें ढुलकीं और अंतस् तक को भिगो गईं।

और तब अचानक सबकुछ पहली बार साफ साफ दिखाई दिया पूर्वा को। बिस्तर पर उसका ठंडा शरीर पड़ा हुआ था, और नर्सों और डॉक्टरों में भगदड़-सी मची हुई थी। सब बेहद घबराए हुए थे। पूर्वा ने देखा सामने रौशनी की एक लकीर के दूसरी तरफ माँ खड़ी थी । चेहरे पर वही प्यार भरी मुस्कुराहट लिए, वही आंचल के साथ-साथ कमर तक लहराते बाल, इसी एक पल को तो तरस रही थी वह। अब एक पल भी और नहीं बरबाद होने देगी, लपककर सुरंग को लांघती पूर्वा मां के गले जा लगी थी।

पल भर को तो मां ने ढेरों प्यार किया था उसे, पर अगले पल ही वापस, अपने से दूर धकेल दिया –

‘ नहीं तू अभी यहाँ नहीं आ सकती, वर्जित है अभी यह पथ तेरे लिए। वापस लौट जा पूर्वा, अभी बहुत से काम करने हैं तुझे। रोहन और पापा को इन्तजार है तेरा। वे लौटेंगे और तुझसे जरूर ही मिलेंगे। तू ही वापस ढूँढेगी उन्हें। ‘

अगले पल ही पूर्वा सुरंग के उस पार धम्म से बिस्तर पर वापस आ गिरी थी। पोर-पोर दुख रहा था उसका और हर चोट की पीड़ा बुरी तरह से परेशान कर रही थी।

अधखुली आँखों से ही पुनः पूर्वा ने देखना चाहा – नर्स और डाक्टर आपस में एक दूसरे को बधाई दे रहे थे। – र्मौत के मुँह से ही नहीं, कोमा से भी सुरक्षित बाहर जो थी उनकी मरीज।…

 

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