कहानी समकालीनः घर का ठूँठः शैल अग्रवाल

चलो न दादी माँ, आप भी हमारे साथ चलो वहाँ। अमेरिका बहुत अच्छा मुल्क है। और वहाँ के बाजार तो इतने बड़े-बड़े हैं। ”
दोनों हाथ पूरे के पूरे फैलाते हुए नन्ही किरन ने कहा, ”  आपका इंगलैंड तो बिल्कुल हिन्दुस्तान के गाँव जैसा लगता है। ”
किरन और शैरन दोनों चन्नी के गले में हाथ डालकर उसकी पीठपर झूलते हुये जिद किए जा रही थीं। ” अच्छा बाबा ” मुस्कराती चन्नी ने अपनी उन दोनों आँख की पुतलियों को पीठ पर से उतारा और कमरे में लटके भारी, कीमती परदे खोल दिये। सामने हरा-भरा लॉन रँग-बिरँगे फूलों से सजा-सँवरा लहरा रहा था पर चन्नी की उदास आँखें उन सबसे फिसलकर, आदतन मजबूर, आज फिर उसी कोने वाले ठूँठ पर जा अटकी थीं। चन्नी की तरह यह भी बरसों से यूँ ही खड़ा है। हवा-पानी, ऑधी, बहार, पतझण किसी मौसम का इसपर भी कोई असर नहीं होता। कोई महकते हरे-भरे पत्ते इसमें नहीं आते। न ही किसी फल-फूल से इसकी भी गोद कभी भरती है। हॉ इक्की-दुक्की चिड़िया जरूर अक्सर सूखी टहनियों पर फुदकती रहतीं हैं। इधर से उधर, उधर से इधर बिल्कुल ही बेमतलब, बेकार ही,  घड़ी की सूँई की तरह। या फिर कभी-कभी इसकी बूढ़ी बीमार फुनगियों पर उलटी-सीधी लटक कर तरह-तरह के करतब दिखाती रहती हैं, बिल्कुल शीरी और किरी की तरह।
चन्नी के चेहरे पर बच्चियों के नाम से ही चमक आ गई पर उसे मालुम था कल सुबह ये भी उससे दूर बहुत दूर चली जायेंगी, वैसे ही जैसे बरसों -सालों पहले वह अपने पीछे सबकुछ छोड़कर यहाँ चली आई थी। नहीं, फ़र्क था इनके और उसके जाने में। चन्नी का छोटा सा परिवार, सैकड़ों अन्य परिवारों की तरह, लुटा-छिना, अनजान वतन में, जड़ से उखड़कर जा रहा था। इस कहर के मौसम में, कितने पनप पायेंगे, न चन्नी जानती थी न वे सब ही। सबकी आँखों पर डरका एक कोहरा-सा पड़ा हुआ था। सबकी आँखें नम और ऊदी-ऊदी-सी थीं पर दीप के साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं है।
चौधरी एन्टरप्राइजेज आज एक जाना-माना नाम है और नवदीप सिंह उसका इकलौता वारिस। लक्ष्मी की बेहिसाब कृपा है उसके परिवार पर। उसका दीप चाहे तो इँगलैंड और अमेरिका को जोड़ता हुआ पुल बना दे। फिर वहाँ जाने की, काम बढाने की, क्या ज़रूरत है –चन्नी की समझ में कुछ नहीं आरहा था? चन्नी तो बस यह जानती थी कि वह हर सुबह, हर रात इन्तजार करेगी, कभी इनके ख़त का, तो  कभी फ़ोन का।
पर सन अड़तालीस में चन्नी का इन्तजार करने वाला दूर-दूरतक कोई नहीं बचा था। गाँव का वह पुराना बरगद का पेड़ तक, जिसके नीचे गुट्टे खेलती, छलाँगे मारती चन्नी बड़ी हुयी थी, पाकिस्तान की सीमा में चला गया था। क्या पता उसे काटकर सड़क बना दी हो या कॉटे वाले तारों की सरहद। चन्नी की आँखें भर आईं। उसका हरा-भरा गाँव एक कुनबे जैसा था। हर घर काका-काकी और फुफ्फी या मामे का था। हर जवाँ मर्द भैया या चाचा था और हर औरत भाभी या बहना। सबकी समस्याओं की बिखरी पगड़ी चौपालों पर मिलकर बँधती थी और हर दर्द की फटी कुरती दालानों में बैठी भाभी घरके कामों के सँग बातों-बातों में सिल दिया करती थीं। उसके तो गाँव के कुँए का पानी तक बिल्कुल मीठा था, शायद उसके नीचे भी प्यार के सोते बहते थे। कितनी अजीब सी बात है, कि कुदरत के बनाए ये सोते जो कभी नही सूखते, आदमी उन्हे नफरत की मिट्टी से ढँक देता है या फिर उनकी कदर किए बगैर आगे बढ़ जाता है; कभी अनजाने में तो कभी मजबूरी में। चन्नी भी तो ऐसे ही मजबूर होकर ही बढ़ी थी।
जैसे इस ठूँठ ने अपने तनों में हज़ारों बातें घूँट रखी हैं, चन्नी ने भी अपने दिल की टूटती-बिखरती दराज़ों में यादों के कई कीमती ज़ेवर समेट रखे हैं। लियालपुर के छोटे से गाँव में जन्मी चरनजीत कौर, सरदार कुलविन्दर सिंह की इकलौती बेटी थी। वह सिर्फ नाम की ही कौर नहीं, राजकुमारियों की तरह पली और बड़ी भी हुई थी। माँ के प्यार में गुँथी रोटी और बापू की समझ की पिलाई छाछ, उसे आज भी हर तपन और शीत से बचाने की सामर्थ रखती है। सामर्थ क्या, बचा ही रही है। आंगन में चिड़िया सी फुदकती नन्ही चन्नी पूरे घर की जान थी।
छरहरे कद की शान्त समझदार चन्नी, कब जवान हुयी, उसे याद नही, बस इतना जरूर याद है कि मलकीता सिंह ने जब कुड़माई के बाद पहली बार चरनजीत को देखा था तो उसने काही रँग का पीले बूटों वाला सूट पहन रखा था। पहली नजर पड़ते ही वह बोल पड़ा था, “तू तो महकती धरती सी सरसों के बूटों में फूट पड़ी है। लगता है खेत-खलिहानों की तरह तेरी भी रखवाली करनी पड़ेगी।” उसकी आंखों की चमक और होठों की मुस्कान देखकर चन्नी को लगा था, इस पल को, इस सामने खड़े मलकीता सिंह को, हमेशा के लिए ही अपने पल्लू में गाँठ बाँधकर रख ले। समय की घड़ी की सूई तोड़ दे या उसकी बैटरी निकाल कर परले पोखरे में फेंक आये।
शादी के तुरन्त बाद ही एक बात तो चन्नी को खूब अच्छी तरह से समझ में आ गई थी कि उसके मलकीते का पहला प्यार उसकी धरती है, उसके खेत-खलिहान हैं पर चन्नी भी तो किसानों के ही घर जन्मी थी और धरती का मोल-मरम उसे भी तो खूब अच्छी तरह से मालुम था। उसने अपने मलकीते की हर चीज को अपना लिया। मलकीते की मा तो रब से भी ज्यादा बहू के गुण गाने लगी। रब के यहाँ देर हो सकती थी पर उसकी चन्नी तो कहे बग़ैर सबकी बात समझ लेती थी। ऐसी समझदार लक्ष्मी, सरस्वती सी बहू, बड़े पुण्य-प्रताप से ही मिलती है। पर क्या दे पाई थी बन्तो उसे ? पहले बरस में ही उसके घर की छत उड़ गई। दँगे वालों ने घर का चूल्हा तक तोड़ डाला। आब की चूनर टुकड़े-टुकड़े बाँट दी गयी। उसकी बहना, उसकी सौतन, धरती का वह टुकड़ा, जाने कहाँ नफ़रत और राजनीति की आँधियों में उड़कर उसकी पहुँच से दूर-बहुत-दूर जा गिरा।
दिल्ली की धरती पर खड़ी चन्नी के लिए सबकुछ अजनबी था। सब नया था। शरणार्थियों के बीच खड़ा उसका कुनबा उसे जीते जी दफ़न होता-सा दिख रहा था। चौधरियों की बेटी, चौधरियों के घर ब्याही, रोटी खिलाने के बजाय आज खुद रोटियों के लिए हाथ फैला रही थी। डूब मरने जैसी बात थी। बात-बेबात चन्नी की आँखें भर आतीं और हाथ दुआ के लिए उठ जाते, ” वाहे गुरू की कब किरपा होगी।”
मलकीता सिंह अपनी नवेली को यूँ उदास देखकर खून के आँसू पीकर रह जाता। बूढ़ी बन्तो, जिसने कभी ज़मीन पर पैर नही रखा था; आज सब कुछ सह रही थी। बेटे-बहू का दर्द भी। झुकी आँखों के सँग भी तो वह कुछ नहीं छिपा पा रहे थे। आख़िर बन्तो ने बेटे को नौ महीने कोख में रखा था पर बन्तो की बुढ़ापे की सोच, जोश की नहीं, होश की थी। कुछ करना होगा। बेटे-बहू को यूँ तिल-तिल मरते नहीं देख सकती वह। सुना है राज वाले विलायत जाने का परमिट दे रहे हैं। वहाँ उन्हे कहीं कपङों की मिलों और मशीनों की मिलों में काम करने वालों की ज़रूरत है। कम से कम दो बख़त की रोटी तो इज़्ज़त से कमाकर लायेगा उसका मलकीता। कबतक झुलसेंगे वह नफ़रत और ज़िल्लत की आग में? पर कैसे कहे वह यह सब सरदार हुकुम सिंह के बेटे से? हुकुमसिंह जो अपने इलाके में शेर-सा घूमता था, शेर-सा दहाड़ता था, और लड़ाई के मैदान में भी शेर-सा ही जूझा था। आज भी गाँव-गाँव के खलिहानों और चौपालों में उसकी बहादुरी के रसिए और चौपाई गाने वाले मिल जाएँगे। कहने वाले तो यही कहेंगे न कि चौधरी के कुनबे ने दुश्मनों से साँठ-गाँठ करली। मुल्क छोड़कर भाग गये। किन लोगों के बारे में सोच रही है वह? ये सँग खड़े बुझी आँखोंवाले लोग? यह सब तो उसीकी तरह खुद भी अपने पैरों के नीचे ज़मीन ढूँढते फिर रहे हैं। सर छुपाने को, अपना कहने को, एक टुकङा आसमान ढूँढ रहे हैं या फिर वह लोग, जो उनकी तकलीफों से बेखबर आराम से सो रहे हैं।
” मलकीते—”
” आया माँ। ”
मा की पुकार सुनते ही, तीन घंटे की लाइन में खड़ा मलकीता अपनी जगह छोड़, मा की तरफ दौड़ा।
” पुतर, चल हम बिलायत चलते हैं। ” शब्द बिजली-से उसपर गिरे और छ: फुट का जीता-जागता मलकीता पत्थर का बुत बन गया। सामने बैठी माँ, अपने पहले रूप की परझार्इं मात्र रह गई थी। उसकी आँख की शोक और सोच की गहरी दलदल में डूबते मलकीता सिंह का दम घुटने लगा। भगवान राम भी तो मा बाप के कहने पर बनवास गए थे। मानो तो सब अपने ही हैं। क्या फ़रक पड़ता है ? सारे धरती आसमान सब उसी परमेश्वर के बनाए हुये हैं। और मलकीते ने अपने आदर्शों को, अपने को, मा के आदेश पर कुर्वान कर दिया। मा का बोल मलकीते के लिए ग्रन्थसाहब की बानी थे। और सर झुकाये पीछे चलती चन्नी मैनचेस्टर के उस बदरँग, काली-सी ईटों वाले, दो कमरों के बंद सीलन भरे मकान में आ बसी।
चन्नी आज भी नहीं भूल पाई है कि कैसे पाँच साल के इन्दर और पचास साल की बन्तो दोनों ने ही सीलन फेफड़ों में समेट ली थी। चन्नी और मलकीता खुदको भूलकर हर परेशानी से लड़ रहे थे, बिल्कुल वैसे ही जैसे उसका बाप जँग में लड़ा था। खाकी पीला सूट अब भी था चन्नी के पास, पर अब उसमें से, इतनी ठँड के बाद भी, लड़ाई में लड़ रहे जवानों के पसीने जैसी महक आती थी। ” मेरी मा के कलेजे को हरा रखना,” मलकीता ने कभी बातों-बातों में कहा था। और सीधी-साधी चन्नी ने उसी दिन अपने मन के मन्दिर में भगवान की जगह सास को बिठा लिया था। सास और देवर के सँग रहती चन्नी मा-बाप का लाड़-दुलार, सहेलियों की मीठी बातें, गाँव की महकती अमराई, ऐश, आराम सब पीछे छोड़ आई थी। मलकीता सिंह रोज शाम को इन्दर को घुमाने सामने वाले पार्क में ले जाता था। कभी-कभी चन्नी और मा भी चली जाती थीं।
दूर से झुके हुए कन्धों वाली चन्नी भी बन्तो सी ही लगती थी। ” कुड़िए तन कर चलाकर। अभी तो पहाड़ सी जिन्दगी पड़ी है। यह इन्दर मेरा नही तेरा ही बेटा है। ” और बन्तो इन्दर को चन्नी की गोद में बिठा देती। नन्हा इन्दर भी भाभी की गोद में जाकर ऐसे चैन से सो जाता जैसे चन्नी ही उसकी माँ हो। थी ही चन्नी उसकी माँ। नहलाती चन्नी, खिलाती चन्नी और अगर रात में रोता तो दौड़कर गले से लगाती चन्नी।
बन्तो तो बहू के हाथ घर द्वार सौंपकर, ग्रन्थसाहब की सेवा में लग गयी थी। आखिर परलोक भी तो सुधारना था। चन्नी को लोक-परलोक का कोई होश नहीं था। उसका तो जीवन ही एक तीर्थजात्रा बन चुका था, जिसकी लगन में न कभी उसके हाथ-पैर दुखते थे, न शीत-ताप का कोई असर होता था। मलकीते की एक तृप्त मुस्कान चन्नी के हर दु:ख की मरहम थी और उस पर तो चन्नी अपने सौ जन्म तक कुर्बान कर सकती थी। चन्नी की उलझनों और परेशानियों को पढ़ता तो सिर्फ़ इन्दर बड़ा हो रहा था। बेबे जब मैं बड़ा होउँगा न तो आपके लिए चार कामवाली लगाउँगा, और चन्नी उसे गोद में उठाकर माथा चूम लेती। वारी जाउँ मेरे लाल। कङुए नीम से भी बड़ा हो जा। फिर खुद ही अपनी उँगली काट लेती। सच यहाँ तो नीम का दरख़्त ही नहीं दिखता। चल दूध पी ले, वह सामने की चिमनी देख रहा है न, जल्दी ही उससे भी बड़ा हो जाएगा। रो़ज़ चन्नी कपड़े की मिल की उँची चिमनी की तरफ़ इशारा करके इन्दर को दिखाती और रोज़ इन्दर एक ही घूँट में सारा दूध पीकर दरवाजे के सहारे एड़ियाँ उचकाकर खड़ा हो जाता। “देख बेबे, आज तो थोड़ा सा जरूर बढ़ा होउँगा। आज तो मैने एक भी बूँद दूध गिलास में नहीं छोड़ा है।” आती उबकाई को किसी तरह मुँह में रोककर इन्दर कहता। चन्नी जानती थी छोटे से इन्दर को बड़े होने की कितनी जल्दी थी।
मा, भाभी किसी का भी दु:ख तो वह बर्दाश्त नही कर पा रहा था। भैया अकेले-अकेले बहुत जल्दी बूढ़ा होता जा रहा था। सरदार हुकुमसिंह के बेटे में शेरों जैसी कोई बात न थी। गम्भीर सँभल-सँभलकर कदम रखने वाला मलकीता जिम्मेदार और ज़मीन से जुड़ा हुआ था। उसके अकेले कन्धों पर चार जनों के परिवार का बोझ था। और उसके मन पर बोझ था, पीछे छूटी, टूटी बिखरी, आधी-अधूरी पुरखों की ज़मीन का, जिसकी धूल में खेलकर उसके कुनबे की सात पुश्तें बड़ी हुयी थीं। आज उसी धरती मा को वह अब कभी देखतक नही सकता।
सबकुछ उसकी पहुँच से कितनी दूर था। चलो जी क्या हुआ ? अपनी-अपनी किस्मत है। उसके दरबार में कोई बेइन्साफी नही होती। सीधा-सीधा, अगले-पिछले जनम का हिसाब है। और मलकीते को खूब अच्छी तरह से पता था कि अगले जनम में वह अपनी उसी धरती की गोद में मस्त होकर फिरसे खेलेगा, बिल्कुल पीले, महकते, सरसों के बूटे की तरह। चन्नी जानती थी उसके मलकीते के इसी शान्त और धैर्य वाले स्वभाव की वजह से ही, इस बेगाने मुल्क में भी उसका पूरा परिवार अपनी सारी परेशानियाँ उसे सौंपकर चैन की नींद सो जाता था।
” दादी माँ ठूँठ क्या होता है ? ” दोनों लड़कियों ने एकसाथ सिर खुजाते हुए पूछा। चन्नी के मुँह से बार-बार सुनकर उनके लिए भी यह शब्द रहस्यमय बनता जा रहा था।
” ठूँठ,” हँसकर चरणजीत कौर बोली, ” उस मरते हुए बूढ़े पेड़ को कहते हैं जिसपर कभी कुछ नही उगता। बिल्कुल बेकार। अब गिरा, तब गिरा, पर गिरता ही नहीं। ”
” कैसी बातें करती हैं बेबे, आपभी? ” सामने खड़ा इन्दर जब और बर्दाश्त न कर सका तो भरे गले से बोला, ” रब आपको सौ सालकी उमर दे। न तो आप बुढ्ढी हैं, ना ही बिल्कुल बेकार। मैं इन बच्चों को सैटल कराके दो हफ़्ते में ही उलटे पाँव लौट आऊँगा। ” चन्नी उसका दर्द समझती थी पर वह यह भी खूब अच्छी तरह से जानती थी कि वक्त की नदी सिर्फ आगे बहना जानती है। उसके इस बहाव मे कितने रिश्ते बहेंगे, बिछड़ेंगे, डूबेंगे, यह तो नदी के हाथ में भी नहीं होता। ऐसा ही कुछ तो उसके साथ भी हुआ था, बरसों पहले; जब सत्रह-अठारह साल की चन्नी इँग्लैंड आई थी, सबकुछ पीछे छोड़कर। कितना छोटा और असमर्थ महसूस किया था उसने भी। वह तो किसी से कुछ कह भी नहीं पाई थी। कितनी बार लौटना चाहा था उसने भी, पर परछाइयों को भला कौन पकड़ पाया है? सबकुछ तो जलकर भस्म हो गया था, ऩफ़ऱत और धरम की आग में। वह तो अमृतसर के गुरुद्वारे भी गई थी। दारजी कहते थे, जब अपनी चन्नी की शादी होगी तो चूनर चढ़ाने जाएँगे। चन्नी की शादी भी हुई, चूनर भी चढ़ी, पर आज इस मौके पर दारजी या बीबीजी कोई भी नही थे। और चन्नी दुहरी होकर, फफक-फफककर, वहीं सीढियों पर रो पड़ी थी। अब तो पता नहीं, कौन उस घर में रहता होगा ? पता नहीं घर होगा भी या नहीं।
” उठो बेटी, सम्भालो अपने आपको। साहब के दरबार में हर दुआ पूरी होती है। ”
फकीर ने बड़ी हमदर्दी से उसकी पीठपर हाथ रखते हुए कहा था। चन्नी तुरन्त चुनरी के छोर से आँसू पोंछती हुई उठ खड़ी हुई थी। उसका बाँका सरदार, उसका शीश-सुहाग उसके सामने जो खड़ा था। उसे अब और क्या चाहिए था ? चलो जी, अभी तो चारो धाम की जात्रा करनी है और वैष्णव देवी भी जाना है। लगता था उनके जो भी सगे-सँबन्धी, रिश्तेदार छूटे थे, इन्ही मूर्तियों में समा गए थे और चन्नी व मलकीता हर शहर, हर मन्दिर, हर गुरद्वारे में जाकर उनसे मिल रहे थे।
उन पुरखों का ही तो असीस था कि आज यहाँ इँगलैंड में उनके पास अपना कहने को घऱ था। इज़्ज़त थी। उसका अपना लियालपुर का सरदार, मिल का मजदूर सरदार, सर मलकीत सिंह कहलाता था। दुनिया भर का वैभव और उपाधियाँ उसके आस-पास गेहूँ के बालों सी लहलहा रही थीं। पर आज भी उसके लिए हिन्दुस्तान ही सिर्फ़ घर था और उसका पुश्तैनी घर तोड़ दिया गया था। मलकीत सिंह अपनी यादों में हमेशा सन् सैंतालीस से पहले के हिन्दुस्तान में ही रहा। वही उसका वतन था और गाँव का घर ही उसका अपना घर। अपने से दिखने वाले सब उसके अपने ही तो थे। लियालपुर के, पँजाब के, कई लोग उसे मिलने लगे और मलकीता सबको अपने घर लाने लगा। भूल गया कौन हिन्दू है, कौन मुसलमान। पीछे वतन में क्या हुआ था। नाइन्साफी तो दोनों के ही साथ हुयी थी और दोनों ने ही की भी थी।
यही उसका नया कुनबा था। भूले-भटके लोगों का कुनबा। एक मिट्टी से निकले दो बूटों की तरह उनमें से एक ही धरती की खुशबू आती थी। किन भाइयों में कभी मनमुटाव नही होता। यह उसकी जिम्मेदारी है कि अपने घरको, अपने देशको, बिखरने से बचाये। बन्तो, चन्नी, इन्दर और खान भाई सब उसका दर्द समझते थे। एक गाड़ी में लगे चार पहियों की तरह सब चल पड़े थे; उसी दिशा में जहाँ वह जाना चाहता था। आज बसन्ती बयार सी मलकीते के यश की महक उसके नेक कामों की तरह इंग्लैंड, हिन्दुस्तान, पाकिस्तान सब जगह फैल गई थी।
चन्नी को कल सा याद है वह दिन जब खान भाई उसके घर आए थे। मलकीते ने दरवाजे से ही आवाज़ दी थी, ” देख चन्नी, खानभाई आए हैं। तू रोती थी न कि गाँव का कोई नही दिखता। किस को रखड़ी बाँधू ? ले आ राखी , ख़ान भाई अपने लियालपुर के ही हैं। ” उस दिन से चन्नी के हाथ पैरों में पँख निकल आए थे। चन्नी दौड़कर अन्दर गई थी और बरसों बाद उसने सेवयीं वाली खीर , हलवा पूरी और रसे के आलू, सब बनाए थे, बिल्कुल वैसे ही जैसे मा सलूने के दिन बनाती थी। राखी बाँधने के बाद जी भरकर वीरा की आरती भी उतारी थी। और खानभाई के दिए हुए उस एक शिलिंग के सिक्के को हथेली पर रखे वह यूँ ही घँटों घूरती रही थी मानो बादशाह सलामत का ख़ज़ाना मिल गया हो। खानभाई ने भी बहना को प्यार देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। दोनों परिवारों की सूखी जड़ों को फिर से प्यार की नम धरती मिल गई थी। और उख़ड़े पौधों ने जमीन पकड़ना शुरू कर दिया।
यही नहीं, आकाश में बैठे मुकद्दर के बादशाह ने भी उनके लिये बड़े-बड़े मनसूबे बाँध रखे थे। कपड़े की एक पुरानी, बरसों से बन्द पड़ी मिल बिकाऊ थी और मलकीत व ख़ान दोनों ने ही थोड़े-थोड़े पैसे बचाये हुए थे। उनका खर्च ही कितना था ? दोनों को ही कोई बुरी आदत नहीं थी, और दोनों के ही घर अन्नपूर्णा का वास था। घरमें किसी चीज़ की कमी कभी नही होती थी। अगर होती भी हो तो न कभी मलकीतसिंह को महसूस हुआ न रियाज खान को। थोड़ा सा सरकार से कर्ज लेकर दिनरात एककर दोनों ने, बरसों की जँग लगी मशीन को चन्द महीनों में ही इस लायक कर दिया कि कपड़े के थान पर थान उगलने लगी। वैभव के ढेर लग गए और सरदार मलकीत सिंह और रियाज़ ख़ान देखते देखते शहर की जानी-मानी हस्तियों में गिने जाने लगे। पर मलकीत सिंह की बेचैन रुह उजड़े-भटके परिवारों में ही रहती। पर पार्टीशन के समंदर से निकले सारे जहर को खुद पीने की इच्छा वाला मलकीता गुमनामी के अँधेरे में ज्यादा दिन छुप न सका। लोगों ने उसे देवता बना दिया। उसके नाम के मन्दिर बना दिए गए। पर मलकीता आज भी उस पीछे छूटी दुनिया में ही भटकता रहा। अभी भी उसे चारो तरफ हज़ारों भूखे और असहाय इन्सान ही दिखाई दे रहे थे। अस्पताल पर अस्पताल और धर्मशालायें बनती चली गयीं। किसी ने उसका हाथ नही रोका, हिसाब नहीं पूछा, न खान ने ,न छोटे भाई इन्दर ने; जो अब उसका दाँया हाथ था। और न ही किस्मत के मुनाफे ने। सब कुछ था उसके पास, सिवाय लियालपुर के। सर मलकीत सिंह का मन चौधरियों की पगड़ी पहन कर अपने गाँव की चौपाल पर बैठने को मरते दमतक तरसता रहा पर यादों के ठूँठ पर कब पत्ते आते हैं।
चन्नी को याद नहीं कब उसने अपनी जिन्दगी को सामने खड़े ठूँठ जैसा पाया था। शायद तब, बरसों पहले जब पाँच हफ़्ते के कुलविन्दर को धरती की गोद में सुलाने के कई बरस बाद भी उसकी गोद दुबारा नही भरी थी और गुरुद्वारे में किसी औरत ने बातोंबातों में कहा था, “ऐसी ठूँठ सी जिन्दगी कैसे काटेगी बेटी। देवर आखिर देवर ही होता है। भगवान ने बिचारी को इतनी धन माया सब कुछ दी पर एक बेटा ही नही दिया।” चन्नी अँगारे सी जल पड़ी थी, नन्हे इन्दर को गोदी में उठाए, वहीं जमी-जमी। इन्दर उसका बेटा था। मरती सास ने देवर नही बेटा कहकर सौंपा था उसे। वैसे भी शादी के पहले दिन से ही उसीके पास तो रहा है उसका इन्दर। इन्दर के हर छोटे बड़े दर्द को उसने मा की तरह ही सहा और महसूस किया है और इन्दर भी उसके माथे की हर शिकन और होठों की हर मुस्कान को पढ़ता हुआ ही बड़ा हुआ है। बिल्कुल वैसे ही जैसे वह अपने दारजी और बीजी के मन की हर बात बिना बताए ही समझ जाती थी।
रिश्ते कोई एक जनम में तो नहीं बनते, यह तो कई जन्मों की बात है। इन औरतों के कहने से क्या होता है, चन्नी खूब अच्छी तरह से जानती थी इन्दर उसी का बेटा है। इसके पहले कोई उसके इन्दर को उससे छीने, वह दौड़ती हाँफती अपने घर लौट आई थी और घऱ में आते ही, सबसे पहले उसने अपने कान और घर के दरवाजे दोनों ही बाहर की दुनिया के लिए बन्द कर लिए थे। छोटे से इन्दर से मलकीता जब भी लाड़ में आकर पूछता भैया किसका बेटा है तो चन्दा सा मुस्कराता इन्दर “बेबे का” कहकर चन्नी के आँचल में छुप जाता और तब मलकीते की आँख बचाकर चन्नी उसकी नज़र उतारती। उसकी लम्बी उमर की दुआ करती। हर मा की तरह उसने भी अपने इन्दर के लिए कई सपने देख रखे थे। उसका बेटा इन्दर आज खुद बाप क्या दादा तक बन चुका था।
सामने वाले ठूँठ पर रँग-बरँगी चिङिया बैठी हुई थीं। चन्नी ने भी ठूँठ की लम्बी शाखों की तरह अपनी बाँहें फैला दीं। किरी और शैरेन दौड़कर उसकी पीठपर लद गईं। “यस दादी मा, पिगी राइड प्लीज़।” “दादी मा को सोने दो,” हेलेन ने आवाज़ लगायी। लड़कियाँ चुपचाप सहमकर उतर गईं और सोने के लिए चली गईं। पर चन्नी की आंखों में आज नींद नहीं थी। बच्चों को अब न जाने कब, ठीक से नाश्ता मिले। चन्नी उठी और नीचे चौके में जाकर भीगे चने छौंक दिये। भटूरे सुबह गरम-गरम उतार देगी। भल्ले तो दुपहर में ही उसने बना लिए थे।

धुली दूध सी चान्दनी में गहरे भूरे, काही रँग का ठूँठ बड़ा ही प्रभावशाली और रहस्यमय लग रहा था। तने पर आड़ी-तिरछी लकीरों के साथ, बीचोबीच दो बड़े गहरे भँवर, मानो सब देखती-समझती आँखें। मुस्कराते होंठ। चन्नी जानती थी, यह घर का ठूँठ खड़ा-खड़ा सब देखता-समझता रहा है। अपने कई परेशान क्षणों में चन्नी ने भी उससे बातें की हैं। उसे सुना और समझा है।
इन्दर के कमरे से गीता की आवाज आ रही थीं। जब भी वह परेशान होता है यही सब गाता-सुनता है। बरसों का यही सिलसिला है। ‘सुख दु:खे समे कृत्वा लाभ-लाभौ जयोजया:’ सुख दुख में, हार जीत में जो एक सा रहे — चन्नी नहीं जानती, भगवान श्रीकृष्ण गीता में किसके गुणों का बखान कर रहे थे; किसी सन्त महात्मा के या उसके अपने सामने खड़े ठूँठ के। ठूँठ की पतली सूखी टहनियाँ घुँघराले बालों सी उलझी-उलझी खड़ी थीं और फैली लम्बी शाखायें बड़े आश्वासन के साथ सब कुछ समेटे और सम्भाले हुए। चन्नी को आज सबकुछ समझ में आ गया। जबतक काम खत्म हुआ, रात के दो बज चुके थे। सारी कि सारी चिड़ियायें ठूँठ पर से उड़कऱ जाने कहाँ चली गइं थीं।
“सुबह फिर खुद ही आ जायेंगी” चन्नी बुदबुदायी और परदा खींच दिया। ठूँठ का तो पता नहीं पर बरसों की थकी हारी चन्नी बिस्तर पर सर रखते ही आँखें मूँदकर सो गई।—

 

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