कहानी समकालीनः बसेराः शैल अग्रवाल

 

सोचा भी नहीं था कि यूं मिलेगा… अचानक ही साथ हो लिया था वह, आंचल से लिभड़ा-लिभड़ा ! पलटकर हाथ में लेकर, खुशी से बल्लियों उझलते मन के साथ रिधू देखे जा रही थी। विश्वास ही नहीं हो पा रहा था …कैसे आया, कहां से आया यह?

फिर तो  ढूंढती आंखें बयार की बेचैनी से चारो तरफ घूम गईं और तुरंत ही ठीक आँख के सामने, वहीं दरवाजे के पास मिल भी गया उसे वह …वही सुनहरा चमकता रंग, मानो आकाश का सारा सोना उन नाजुक पंखड़ियों मे सिमट आया हो…रंग-रूप, आकार, सब कुछ तो वही था। झुककर नाम पढ़े, इसके पहले ही सेल्स काउन्टर पर खड़ी लड़की समझाने आ पहुंची थी।

“ कितना सुन्दर है…है ना…जब पूरी रवानी में खिलेगा तो और भी सुन्दर लगेगा ! लबर्नम की एक नई किस्म है, पहली बार यहां इंगलैंड में । हमारे नारंगी फूल जो आग की लपटों से चमकते हैं, उनसे थोड़ी फरक। इन्डियन लबर्नम…यह भी परीनियल ही है। हर साल इन्ही दिनों खूबसूरत समा बांध दिया करेगा।

“ क्या तुम भारत से हो ?” , अचानक ही वृद्ध से दिखते व्यक्ति ने काउन्टर के पीछे से ही पूछा ।

“ हां।“

रिधू ने घूमकर देखा।

कमीज उतारे पंखे के सामने बैठा और आइसक्रीम खाता वह आदमी अचानक ही आई इस गर्मी की लहर के सारे मजे ले रहा था। रिधू का तो जैसे मन ही पढ़ लिया था उसने। “ अच्छा है ना मौसम यह, गुलाबी-गुलाबी गरमियों का, बिल्कुल तुम्हारी गुलाबी-गुलाबी सरदियों की  ही तरह …क्यों भारत की याद आ रही है ना ?”

इसके पहले कि रिधू कुछ भी पूछ पाए कि ‘ इतनी अच्छी हिन्दी कहां से सीखी ,’ या कुछ भी और, खुद ही बोल पड़ा था वह,

” पांच साल रहा हूं भारत में। सन बयालिस से सैंतालिस तक। अब भी अक्सर जाता हूँ। मुझे भारत बहुत अच्छा लगता है। वहां के लोग बहुत अच्छे हैं…खाना-पीना, रीति-रिवाज़ सभी कुछ। दुनिया में छुट्टी मनाने की एक बेहद अच्छी ज़गह है भारत। …कितनी वैरायटी है उस देश में।“

फिर खुद ही उसके पास आकर बोला, “ ले जाओ इसे। अच्छा लगेगा तुम्हे। लगेगा कि भारत ही वापस आ गया  तुम्हारे बगीचे में या फिर तुम खुद ही वापस भारत पहुंच गईं।“  अब रिधू कैसे रुक पाती, झटपट पैक करवाकर घर ले आयी। रास्ते भर आँखें सपने देख रही थीं। कभी पल भर में दिल्ली पहुंच जातीं चाणक्य पुरी के उस घर में, जिसके दरवाजे पर वह अमलतास का पेड़ था…वहीं, जहां वह दरबान बैठा करता था, तो कभी अपने लंदन के इस घर के दरवाजे पर अमलतास फूलों से लदा-फंदा दिखाई देने लगता उसे। वैसे तो उसकी पूरी गली पर ही ये अमलतास की टहनियां छतरी सी तन जाया करती थीं और जब-जब धूप से तपती सड़कों पर ये पत्तियां अपना सुनहरा कालीन बिछातीं तो रिधू तुरंत ही तपती धूप में भी चप्पल हाथों में लेकर चलने लग जाती।

वह तो यहां भी वे सारे ही पेड़ लगाएगी, जो भारत में उसके अपने कमरे की खिड़की के नीचे थे, पेड़ जो एक हल्के हवा के झोंके के साथ खुशबू भरभरकर उसका स्वागत किया करते थे … पेड़ जिनकी फूलों लदी टहनियां उसके कमरे की दीवारों को अपनी परछांइयों से तस्बीर सा सजा देती थीं… रात की रानी, हार-सिंगार, सभी कुछ तो। यूं तो यहां भी एपल ब्लौजम और चेरी ब्लौजम की पत्तियां वैसे ही झर-झर के सफेद गुलाबी कालीन बनाती हैं पर इनमें उन फूलों जैसी मस्त महक नहीं होती  और यह बात अक्सर ही रिधू की आत्मा तक को तरसाती रहती। गरमी की उन महकती रातों की याद आते ही आज भी रिधू का मन भारत के लिए तरसने लग जाता…पर कौन कहता है कि भारत छूट गया रिधू से… उसने तो कभी दूर ही नहीं होने दिया  भारत को खुदसे। जहाज में बैठते ही आठ घंटे में ही तो दिल्ली पहुंच जाती है वह …कभी कभी तो नागपुर वाली दीदी को ज्यादा वक्त लग जाता है घरतक पहुंचने में। अब दादा जी की मौत पर ही ले लो… दादा जी के बुलाते ही रिधू तो तुरंत ही पहुंच गई थी पर दीदी उनके गुज़रने के दो दिन बाद ही पहुंच पाईं थीं।

दूरियां तो बस मन में ही होती हैं और फिर जहां चाह वहां राह। अब रिधू को अपनी समझ और दूरदर्शिता पर कुछ कुछ भरोसा-सा होने लगा था या फिर उसने खुद को फुसलाना सीख ही लिया था।       “ सबकुछ मिलने लगेगा अब यहींपर धीरे-धीरे..इन सब्जी और मसालों की तरह ही।“ बच्चे उसके मन में उठती भारत के प्रति बेताबी को देखकर उसे समझाते न थकते। फिर रिधू खुदको भी तो रोज एक नई तसल्ली दे लेती थी, कभी यह कहकर कि, ये क्या समझेंगे अपनी मिट्टी से बिछुड़ने का गम, यह तो यहीं पैदा हुए हैं। तो कभी यह कहकर कि उसका दुःख बर्दाश्त नहीं होता इन बच्चों से इसीलिए तो नयी- नयी बातों से उसे बहलाना फुसलाना चाहते हैं। वैसे भी तो वही धरती-आसमान…सूरज, चांद तारे हैं सब जगह  …इतने दुःख की तो कोई बात ही नहीं। बस एक अपने लोग ही तो नहीं यहां पर ! पर अब  भारत में भी तो कौन बचा रह गया है…धीरे-धीरे सभी तो छूटते जा रहे हैं और फिर बेटी हो या बेटा किसी न किसी बहाने सबको ही तो घर छोड़ना पड़ता है…घर की तो छोड़ो, एकदिन तो यह शरीर तक छोड़ना पड़ता है ? रिधू ने नम हो आईं आंखें पोंछ डालीं, जबसे मम्मी पापा गए हैं, कैसी बहकी-बहकी बातें सोचने लग गई है वह और कितना बदला-बदला लगता है सब उसे, मानो धूप कुछ कम चमक वाली हो गई हो और चारो तरफ उमड़ती वह खुशी किसी ने चप्पा-चप्पा पोंछ डाली हो ..। अब तो वह बाजार में नई रेशमी साड़ियों की सरसराहट और चूड़ियों की खनक तक पुलकित नहीं कर पाती उसे। जबसे पापा गए है कहां इतना घूमती-फिरती है वह…फिर क्यों इतना सोचती है भारत के बारे में … अब तो उसके बच्चों के भी बच्चे हैं। यही तो है उसका देश और यहीं तो है उसका पूरा परिवार !

कुछ दिन पहले ही केली और नयनतारा के फूल तक देखे हैं उसने यहां पर—.यहीं. इसी पास वाली चौमुहानी पर ही। कितना अच्छा लगा था यहां इंगलैंड में इन्हें देखकर। स्नो ड्रौप्स के साथ-साथ सफेद-गुलाबी, प्याजी,प्याजी फूल। नीली नीली बूंदों में अनोखी छटा बिखरी पड़ी थी, मानो सियाह रात में आकाश रंग-बिरंगे तारों सहित नीचे उतर आया हो…।

और तब घंटों स्केच करती कई वह अलसाई दुपहरियां याद आ गईं थीं रिधू को जब वह किसी ऐसी ही छतनारी छांव में बैठी फूलों को निहारती रह जाती थी। अब पोती को सिखाएगी स्केच करना…पर पहले बोलना… कलम पकड़ना तो सीख ले लाडली… अपनी लंगड़ी दौड़ मारती सोचपर रिधू खुद भी मुस्कुराए बगैर न रह सकी।  किसने बोई खेती और किसने बुनी कपास?—दादी का मुहावरा अनायास ही मुंह से निकला तो रिधू को भी आश्चर्य-चकित कर गया! कितनी मां और दादी-सी ही होती जा रही है वह …कल ही तो खाने की प्लेट लेकर अवनी के पीछे-पीछे भाग रही थी, बिल्कुल वैसे ही जैसे दादी और मां उसके पीछे भागा करती थीं कभी? सामने शीशे में देख कनपटी तक लटके सफेद बाल को उसने बिल्कुल मां और दादी के ही अन्दाज़ मे ही कान के पीछे कर लिया और जी खोलकर मुस्कुरा पड़ी… मां दादी की तरह नहीं, तो किसकी तरह लगूंगी अब भला मैं ?

घर पहुंचते ही ठीक मेन गेट के पास हाइडरेन्जर की झाड़ के बगल में ही गाढ़ दिया रिधू ने उसे।

अब तो मानो रिधू के प्राण  ही लटक गए थे पौधे में। खिड़की से सटी खड़ी, निहारती ही रह जाती थी दिन भर उसे।

“शुरु शुरु में कुछ हफ्ते, दिन में दो बार  थोड़ा-थोड़ा गुनगुना पानी डालना।“ चलते वक्त उस आदमी ने हिदायत दी थी, पर रिधू तो पूरी तरह से व्यस्त हो चुकी थी उसकी देख-रेख में। जितनी बार चाय बनाने जाती, केतली में दुगना पानी उबालती और सबसे पहले बचा पानी पेड़ में जाता फिर किसी को चाय मिलती। दिन में बीस बार जाकर उन हरी-भूरी टहनियों को देख आती, कहीं कोई नई पत्तियों का कुल्ला तो नहीं फूटा …फूलों के नए गुछ्छे तो नहीं निकल आए? पर दो दिन बाद भी…बस वही दो गुच्छे ही लटके दिखाई दिये निराश रिधू को। वापस घर में लौटते ही पति ने मजाक किया, “ कल देखना पूरा पेड़ निकल आएगा वैसे ही चाणक्य पुरी की तरह ही …फूलों से लदा-फंदा, और खड़ा हो जाएगा तुम्हारे दरवाजे पर!”

रिधू भी तो यही चाहती थी, बिना कोई ज़बाव दिए, बस मन-ही-मन मुस्कुराकर रह गई …क्यों नहीं, देखना ज़रूर ऐसा ही होगा एक दिन !

दिन क्या, महीनों यूं ही निकल गए  उस बेसब्र इन्तजार में । कहीं-कहीं कुछ कुल्ले फूटे भी, एक-आध पत्तियां आईं भीं, पर खुद ही कुम्हलाकर भूरी भी पड़ गईं और चुपचाप झर भी गईं, पर रिधू आस न छोड़ पायी।

“ बीबीजी, आप कहो तो इस सूखी लकड़ी को निकाल दूं, अब हरी तो होने से रही।“ जितनी बार माली पूछता, उतनी ही बार रिधू खुद टूट जाती अंदर-ही अंदर। अब वह पेड़ बस एक पेड़ नहीं, रिधू की अस्मिता से जुड़ चुका था…उसकी नज़र में पूरे भारत की आशाओं से जुड़ गया था। अगर एक भारतीय पेड़ तक को न रोप पाई वह ,तो भारतीय मान्यताओं और संस्कारों को क्या रोप पाएगी इस धरती पर? इंगलैंड की इस धरती पर इसे तो जमना ही होगा… हजारों उन शहीदों की खातिर पनपना होगा, जिन्होंने देश के लिए जानें न्योछावर की थीं …आखिर हम भी तो इनके रंग में रंगे थे…हमपर से तो इनका रंग आज तक नहीं उतरा !.

एक आधुनिक आत्मविश्वास से भरपूर आज़ाद भारत के सपने की खातिर पनपना होगा इसे। हमारी इस गुलामी को भी तो एक अरसा गुज़र गया …वक्त और ज़माना दोनों ही बदलना चाहिए अब तो …यह सदी हमारी है, हमारे भारत की है…इसे तो पनपना ही होगा… फलना-फूलना ही होगा! कृत संकल्प-सी रिधू घंटों बैठी रहजाती पेड़ के आगे…  उस सूखती टहनी से बातें करती…उसका देश-प्रेम और स्वाभिमान दोनों ही बच्चों से मचलने लगते।

तरह- तरह की खाद डालती रिधू पेड़ में , पर पेड़ पर कोई असर नहीं होता। जाड़े भर पाले से बचाकर रखा उसने। रोज नई-नई पौलीथिन में लपेटती। आंधी, पानी तक को पास न आने दिया कभी। हाथों से सहलाती…घंटों बातें करती …इसलिए शायद मरा नहीं, पर रिधू की हिम्मत ही नहीं पड़ी कि कभी डंडी उठाकर एकबार देख तक ले कि पेड़ ने जड़ें पकड़ीं भी हैं या नहीं., उसे खुदपर… अपने भगवान पर एक
अटूट विश्वास जो था ? यह बात दूसरी है कि माली अब भी उसे सूखी लकड़ी ही कह रहा था, और वह बदरंग पड़ चुकी लकड़ी दिनरात खटकती रहती थी उसकी अनुभवी आँखों में।

मई जून सब निकल गए। घूरते-घूरते अब तो आंखे तक जलने लगतीं रिधू की पर एक नया पत्ता न निकला पेड़ में और तब बज़ाय इसके कि निराश हो, रिधू चौके में वापस जाती और एक केटल और गुनगुना पानी डाल जाती पेड़ की जड़ों में। पत्ते तो नहीं आए पर रिधू को पूरी तरह से विस्मित करते हुए एक चिड़िया ने जरूर घोंसला बना डाला दीवाल और टहनी की बीच बची उस जरा-सी जगह में। रिधू की कल्पना और आशा दोनों को ही एक नयी प्रेरणा मिली। कहते हैं इन पक्षियों की छठी ज्ञानेन्द्रियां बहुत तेज़ होती है। जरूर ही शुभ होगी यह जगह और फले फूलेगी भी, वरना चिड़िया बसेरा न करती यहांपर…रिधू बारबार सोचती और खुश हो लेती।

कुछ दिन बाद की ही बात है, उस दिन जब कार रिवर्स कर रही थी रिधू अचानक ही स्टीयरिंग फिसली और पेड़ से जा टकराई और तब सारी आशाओं पर पानी फेरता वह अनर्थ हो गया जिसकी रिधू कल्पना तक नही कर सकती थी। वह सपनों का पेड़…वह आधी सूखी, आधी हरी टहनी, कुचली और टुकड़े-टुक़ड़े होकर भय-विस्मित आँखों के आगे ही गिर पड़ी, बिल्कुल वैसे ही जैसे कभी अचानक ही देश-प्रेमियों के आगे इन अंग्रेजों ने भारत की राजगद्दी संभाल ली होगी…वैसे ही हज़ारों परिवारों को कुचलते उज़ाड़ते जैसे आज उसके हाथों चिड़िया का यह घोंसला उजड़ चुका था।

“ अच्छा हुआ जो यह तुमसे हुआ, अगर कहीं मुझसे हुआ होता तो तुमतो..”,.उसके चेहरे की असह्य पीड़ा देखकर पति आधी बात कहते-कहते ही चुप और चिंतित हो गए। रिधू कार से उतरी और दौड़कर धम् से आकर सोफे पर पड़ रही। “ रिधू यह चिड़िया का घोंसला तो बिल्कुल ही नही टूटा …पर बच्चे जरूर बहुत छोटे हैं।”,बहुत ही हिफाजत से चिड़िया के उन नवजात शिशुओं को हथेली पर उठाए पति आश्वासन दे रहे थे और घोसले को वहीं वापस दूसरी शाख पर टिकाकर आश्वस्त थे।

इतने नन्हे बच्चे…रिधू का कलेजा उमड़ा आ रहा था…नहीं बचेंगे ये। चिड़िया पलटकर आएगी ही नहीं। …आदम-गन्ध जो आ गई। सुबह तक सारे के सारे बिल्ली के पेट में होंगे। पलटकर बगीचे के उस कोने की तरफ देख तक नहीं पाई वह…ना ही चौबीसों घंटे बगीचे में रहने वाली रिधू कई दिनों तक बगीचे में ही वापस जा पाई और ना ही उन सूखे गुलाबों तक को काट पाई…कहीं वे चिड़िया के बच्चे डिस्टर्ब हो गए तो… अलबत्ता खिड़की और गुलाब की झाड़ पर बैठे वे नन्हे चिड़िया के बच्चे जरूर फुदक-फुदककर दिन में दस बार रिधू का हालचाल पूछ जाते और डालियों में उलझे उनके अधटूटे कच्चे पंख फड़फड़ा-फड़फडाकर नित नए संघर्ष और  जोश की कहानी सुना जाते उसे।

पड़ोसन और सहेली ली जब भी दिखती, रिधू से पूछती आजकल बहुत व्यस्त हो गई हो …बगीचे में भी नही दिखती? रिधू एक फीकी मुस्कान के साथ “ हाँ “ कहकर बात पलट देती। पर ली समझ चुकी थी कि कहीं कुछ ऐसा है जो कि खाए जा रहा है सहेली को—पर कैसे जाने —क्या करे वह , कुछ समझ में नही आ रहा था। कभी वह रिधू के लिए फेयरी केक बनाकर लाती तो कभी उसे अपने घर कौफी पर बुलाती पर रिधू को तो मानो गुमसुम रहने की आदत-सी पड़ती जा रही थी। “ सब ठीक तो है घरपर या तुम्हारे साथ ?”,कई-कई बार पूछा उसकी चिंतित सहेली ने और हर बार ही वही हल्की और छोटी-सी “ हां” कहकर चुप हो जाती रिधू।

कई-कई गार्डन सेंटर गई रिधू पर इंडियन लैबर्नम नहीं मिला। “ अगली बार भारत से ले आना ।” पति ने समझाने की कोशिश की। “ पर जरूरी तो नहीं कि वह भी पनपे ही !”  .दबाते-दबाते मन की बात होठों पर आ ही गई।

उसकी आवाज़ की गहराई और थर्राहट से दुःख का तो पता चल जाता था पर असली भेद शायद ही कभी कोई जान पाए…फिर ऐसी बातें कही भी तो नहीं जा सकतीं…एक नहीं कई-कई पीढ़ियों का दुःख था यह उसका…और वह भी बेहद अपना…।

तीन साल निकल गए इस बात को भी। गदर के 150 साल का फन्कशन था इँडियन एम्बेसी में, साथ में उसी विषय पर एक नुमाईश भी। तैयार रिधू जाने को निकली ही थी कि फूलों का एक गुच्छा एकबार फिर आँचल से लिपटा-लिपटा संग-संग हो लिया। चुपचाप गाड़ी में आकर गोदी में आन बैठा।

गुच्छे को पागल की तरह सीने से लगाए रिधू भावातिरेक से कांप रही थी। बरसाती नदी-सा भावनाओं का एक ज़लज़ला था अब चारोतरफ। मन में उमड़ा सारा वह पानी आंखों से बह निकला। नदी के रिसते दो किनारों-सी खुद को संभालती रिधू अपने ही आवेग में बही जा रही थी… राह के रोड़े , यादों की गीली मिट्टी, अच्छा बुरा सब साथ लिए और समेटे-सहेजे…।

यह लड़ाई उसके अस्तित्व की थी…जड़ें जमाने की ही नहीं, फलने-फूलने की भी थी…खुली हवा में सांस लेने की थी।

रिधू ने एक-एक करके सारे आंसू पोंछ डाले। अब हजारों यादें शंख सीपी सी इतिहास की रेत में पड़ी भी रह जाए, तो भी कोई फरक नही पड़ता, उसका विश्वास फल-फूल गया था। हजार कठिनाइयों और शकों से जूझता, एकबार फिर जीत चुका था।

नन्हा ही सही, अमलतास का वह पेड़ एक नहीं कई-कई गुच्छों के साथ पीले पंखुड़ियों के कालीन पर उसके स्वागत में खड़ा था …वह भी उसके अपने दरवाजे पर, और यहीं, इंगलैड की धरती पर। हर तपन से रखवाली कर रहा था उसकी , छांव दे रहा था उसे, जैसे कभी चाणक्य पुरी वाले अम्मा बाबा के घर पर दिया करता था।

रिधू का मन किया जी खोलकर हंसे। हर उस अविश्वासी को प्यार की ताकत बताए , जो इस पर विश्वास नहीं करते। उसके विश्वास ने जाने कौनसा बीज इस धरती में बो दिया था कि अब छांव ही छांव थी चारो-तरफ….आँखों को भी और मन को भी।

हर्षातिरेक से कांपती रिधू को ली ने आकर संभाला। “ अरे यह तो वही अमलतास का पेड़ है ना जो दिल्ली या भारत के कई और शहरों में दिखता है? हाइडरेंजर्स की तरह इसे भी तो लोग ड्राइव्स या सड़कों के किनारों पर ही लगाते हैं, हैं ना  ?“  इमीग्रेशन डिपार्टमेंट में सरकारी वकील की तरह नियुक्त ली को अक्सर ही भारत जाने के मौके मिलते रहते है और साधारण जन-जीवन के करीब आने के भी। “ हां, हां, वही है यह…इंडियन लैबर्नम। अब देखना हर बगीचे, हर घर में तुम्हे बस यही दिखाई देगा।“ पता नही किस अंदाज़ और भाव से कही थी रिधू ने यह बात कि ली को बहुत ही गंभीर कर गई और तब खुद को और माहौल को हलका करने के लिए मज़ाक किए बगैर न रह सकी वह।

“ हां, हां, क्यों नहीं। तुम एशियन की तरह  ही इसे भी यहां बसने में कोई वक्त थोड़े ही लगेगा। हम ब्रिटिश लोग हमेशा से ही बहुत सहनशील कौम हैं आखिर।“

यह क्या कह गई यह—कितनी गलत-फहमी है इन्हें खुद को लेकर, बेशर्म या अवसरवादी कहती तो शायद ज्यादा सही रहता…रिधू के सर से पैर तक आग लग चुकी थी…आंखों के आगे इतिहास के कई राख पड़ते पन्ने फिर से धधक उठे थे।

माना ली सहेली है, पर है तो ब्रिटिश ही, आखिर अपना रंग दिखा ही दिया , रिधू सोचे बगैर न रह सकी।

पर ली उसके मन में उठते तूफान को देख भी पा रही थी और समझ भी। उसे दुःखी करने का तो उसका कतई इरादा नही था। गले लगाकर बोली, “ चालीस साल से यहां रह रही हो , इतनी स्ट्रौंग इन्डियन आडेंटिटी रखोगी, तो जी नही पाओगी खुशी–खुशी। किसी भी क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ने देगी तुम्हें तुम्हारी यह अलग –थलग सोच और पहचान !”

रिधू का मन नही किया कि अब वह उसके साथ कहीं भी जाए, पर इतनी नरम दिल और सहृदय थी कि गुस्से में भी किसी का मन दुखाना आता ही नही था उसे।

“ क्या आदमी को अपने ही घर में मन-माफिक नहीं रहना चाहिए …खुश नहीं होना चाहिए?  आगे बढ़ते जाना क्या इतना ज्यादा ज़रूरी है ली ?” बस, यही पूछती चुपचाप कार में जा बैठी रिधू।

अब स्तब्ध होने की अंग्रेज सहेली ली की बारी थी। क्या सब वे हिन्दुस्तानी उसकी इसी सहेली की तरह स्वाभिमानी और द़ढ थे? कैसे उसके पूर्वजों ने इतने साल राज किया फिर …शायद नहीं…या फिर शायद कभी एक दूसरे के बारे में कुछ जानना ही नहीं चाहा  हो… !

पर वे दोनों सहेलियां एक दूसरे के बारे में आज बहुत कुछ नया जान चुकी थीं …कुछ ऐसा जो सच होकर भी उद्वेलित कर रहा था दोनों को और सोच से होड़ लगाती कार भी तो घुमावदार सड़कों पर उनकी सोच की ही रफ्तार से बढ़ी जा रही थी। उतरते ही दोनों ने ही एक दूसरे के उदास चेहरे को देखा और जबरर्दस्ती ही मुस्कुराने की असफल कोशिश की । जब नहीं रहा गया तो रिधू ने ही पहल की, “ मुस्कुराओ ली, तुम मुस्कुराती और चहकती हुई ही अच्छी लगती हो।“ उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए ली ने भी हँसने की कोशिश की  पर एक छोटी सी मुस्कान ही होठों पर खींच पाई ,“ तुम बहुत अच्छी, बहुत सरल हो रिधू।  भला तुम्हें उदास देखकर मैं कैसे खुश हो सकती हूँ? “ , उसकी गहरी रुँधी आवाज से रिधू जान गई थी कि सहेली झूठ तो नहीं ही बोल रही है और अगर अभी, इसी वक्त उसने इसे माफ नही किया तो रो भी पड़ेगी।

“देखो, आज भी तो तुम अपनों के ही बीच में हो, और अपने ही घर में हो रिधू।“

ली अभी भी सहेली की खोई मुस्कान नहीं ढूंढ पा रही थी।

और तब रिधू ने आगे बढ़कर ली को एकबार फिरसे गले लगा लिया। अब ली को गला खंखारने की बहुत ज्यादा जरूरत थी, कैसे भी अपने को संयत करती, रिधू के गले लगी-लगी ही वह दुबारा बहुत ही धीमी और भावभीनी आवाज मे रुँधे गले से कहने लगी,

” एक बात और बताऊं रिधू, मुझे पहले से ही पता था कि तुम यही कहोगी, जो तुमने आज और अभी अभी कहा और वही करोगी, जो किया भी। तभी तो तुम  मेरी सहेली हो।“

अब  खिलखिलाकर हंसने की रिधू की बारी थी, “ हमारे पूर्वजों के बीच जो घटा क्यों न हम उसे इतिहास के पन्नों में ही रहने दें ली, वैसे भी क्या किसी के कहने भर से फूल महक बदल देता है, हीरा चमक खो देगा? “

रिधू और ली के स्नेह-पगे आंसू एकसाथ ही सदियों से बंजर पड़ी नफरत और गलतफहमियों की दरारों से तारतार जमीं पर गिरे और उसे सींचने लग गए…जमीन जिसे कभी हजारों के खून ने रंगा था, नफरत की आग ने झुलसाया था।
रिधू को लगा आज जरूर ही कोई त्योहार होना चाहिए …होली, दिवाली-सा एक बड़ा त्योहार… आज न सिर्फ रिधू के घर में अमलतास फूला था, अपितु बरसों से भटकती, प्यासी और तरसती रिधू की जड़ें तक नम थीं… अपनी जमीन, अपना बसेरा पा चुकी थीं।…

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