कहानी समकालीनः जीने की शर्तः शैल अग्रवाल

सावन का महीना और विश्वनाथ गली की वह भीड़ भरी उमस–श्रृद्धालु भक्तों के गँगा-नहाए पैरों की कीचड़ में लथपथ, बेहद सनी-पुती और चिपचिप। किसने कहा था निवेदिता से कि यहाँ आए और वह भी किसी और दिन नहीं, सोमवार के दिन।  ऐसा वैसा सोमवार भी नहीं, सावन का पहला सोमवार;  जब भगवान के साथ-साथ चोर-उच्चकों का भी भोग लगता है यहाँ पर!  खुद को  ही बारबार कोसती- सम्भालती, गली के एक सिरे से दूसरे तक उमड़ती भीड़ के धक्के खाती, वह आखिर अपनी प्रिय चूड़ियों की दुकान के आगे पहुँच ही गई —बिना एक कदम चले, बिना किसी प्रयास के । और सबसे विशेष बात तो यह थी कि बिना किसी दुर्घटना के।
यह बात नहीं है कि निवि यह सब जानती नहीं थी,  समझती नहीं थी। पूरा बचपन गुजारा है उसने इसी शहर में– आँखें खोली हैं इसी धरती पर। ड्राइवर दुर्गा ने भी तो बहुत समझाने की कोशिश की थी-आज नहीं बिटिया रानी, आज रहने दो। पर निवेदिता के पास समय ही तो नहीं था, एक और कल ही तो नहीं था। कल तो फिर हमेशा की तरह उसे दूर, बहुत दूर ले जाएगा और फिर उसके अपने ये लोग, अपना यह शहर, ये खट्टी-मीठी यादें, सब बस एक धुँधला-सा सपना बनकर ही तो रह जाएँगीं, दूर कहीं अटकी, एक और ऐसी-ही सुबह के इँतजार में। और निवेदिता वहाँ विदेश में बैठी पूरे साल भर तक फिर बस बाट जोहती ही  तो रह जाएगी।…

“आओ दीदी, क्या बात है अबकी बार बहुत दिनों बाद आईं”,
देखते ही दुकानदार गद्दी से ही चहक कर बोला-‘जा मोहन, दीदी के लिए एक ठंडा तो ले आ।’
” नहीं-नहीं रहने दो मैं अभी मिश्राजी के यहाँ से ठँडाई ही पीकर आ रही हूँ। तुम बस जरा अपनी सबसे अच्छी चूड़ियाँ और बिन्दियाँ दिखा दो।”
” ला चल, अच्छा  जरा वह कलकत्ते वाला नया माल निकाल—दीदी भी क्या कहेंगी-”
दुकानदार ने मुँह की पीक को उँगलियों से पोंछते हुए लड़के के सर पर हलकी सी चपत जमा दी, बिल्कुल वैसे ही जैसे सवारी को आता देखकर ताँगे वाला आराम करते घोड़े को हलके से थपथपा देता है।
चूड़ियाँ क्या, एक मायाजाल थीं। सुनहरी, रुपहली, चमकती-खनकती। निवी को पहनने से भी ज्यादा इन्हें जमा करने का शौक था। वैसे भी, वहाँ इँगलैंड में कहाँ इतना यह सब मिल पाता है। हमेशा की तरह आज भी यह बनारस से जाते-जाते निवि की आखिरी खरीददारी थी।

इसके पहले यँत्रवत् वह वह सब कर चुकी है जो हर साल ही करती है- घाट पर चुपचाप बैठकर हमेशा की तरह याद करना कि किस-किसको यहाँ पर खोया;  नहीं, शायद अकेले छोड़ा ? और फिर अकेले ही चुपचाप मल्लू की नाव में बैठकर घूमना—मझधार में जाकर जलती चिताओं को घँटों घूरना और यूँ ही सोचते रह जाना– कैसा होगा यह– कौन होगा—जाने किस-किस से बिछुड़ा होगा– आदमी, औरत– बच्चा, बूढ़ा? जाने कितनों को असहाय छोड़ा होगा इसने भी–न जाने कौन-कौन बिलख रहे होंगे इसके लिए भी– और अन्त में उस हठी सोच का, हमेशा की तरह वहीं, उसी  एक बिन्दु पर आकर मचल जाना—बारबार याद दिलाना—देख निवि, तेरे मम्मी-पापा भी यहीं, ऐसे ही धुँए-धुँए तिरोहित हुए होंगे–इसी घाट पर—अपनी निवी को आखिरी बार बस देखने भर के लिए तरसती आँखों से भटकते हुए। ढूँढ निवि, ढूँढ, इस मिट्टी में, इस हवा में और इस गँगा के मटमैले पानी में–शायद अब भी वहाँ कहीं कोई तेरा इँतजार कर रहा हो? मौत में इतनी ताकत नहीं होती जो सबकुछ मिटा दे—कुछ न कुछ तो रह ही जाता है– आहटों, आवाजों और सपनों में छुपा हुआ। और फिर हमेशा की ही तरह अँत में मल्लू का उतावला होकर पूछना–

” चलें बिटिया सूरज तड़क आया है-?” और निवी का चुपचाप वैसे ही, हाँ, काका- कहकर वापस लौट आना।

दीन दुनिया से बेखबर अपनी ही सोच में डूबी निवि यँत्रवत् चूड़ी के डब्बे पर डब्बे छाँटे और पलटे जा रही थी। बड़ी लगन से एक-एक छाँटकर वह बिन्दियों की तरफ मुड़ी ही थी कि पीछे से बुर्के में से आवाज आई-

” यह लो पैसे और यह सभी पैक करके मुझे दे दो।”

निवी अपने कानों पर विश्वास न कर सकी– ‘ कौन है यह ? वह जो घँटे भरसे इस सड़ियल गर्मी में चिपचिप खटी है–सड़े फूलों, कीचड़ और पीक व पसीने की भभक में नहाई है उसका क्या होगा ? ‘

पलटकर मुड़ी,  ‘  देखूँ तो सही, यह अभद्र देवीजी आखिर हैं कौन ? ‘

” पर बहनजी यह चूड़ियाँ तो इन्होंने पसँद कर ली हैं। आप दूसरी पसँद कर लीजिए– एक से अच्छा एक माल है।”

दुकानदार ने उसकी उलझन और परेशानी को अपनी व्यापार-कुशल विनम्रता में लपेटकर बुरकेवाली के आगे पेश कर दिया। वह जानता था कि औरतों में अक्सर-ही ऐसा ही होता है। जो चीज एक को पसँद आती है, दूसरी को भी निश्चय ही, वही पसँद आती है– चाहे चूड़ियाँ हों या साड़ियाँ। यह तो उसकी रोज की ही समस्या थी। वह जल्दी-जल्दी कागज में चूड़ियों को लपेटकर आँखों के आगे से ओझल करने लगा।

” नहीं मुझे तो यही चाहिएँ।”

बुरके वाली औरत की आवाज में एक हठ, एक आग्रह था। स्तँभित निवि कुछ भी कह पाए इसके पहले ही वह दुराग्रही अपरिचिता खुद ही बोल उठी –

” परेशान क्यों हो रहे हैं आप, इसी के लिए तो खरीद रही हूँ मैं भी यह सब।”

निवेदिता विश्वास न कर सकी–‘ कौन है यह जो उसपर इस तरह से मेहरबान है, अधिकार जता रही है? माना पूरा बनारस ही अब उसे अपने कुनबे जैसा लगता है, पर यह तो हद ही हुई जा रही है- वह भी बीच बाजार में- यूँ, इस तरह से? ‘

धड़कते दिल से पीछे मुड़कर एकबार फिर ठीक-से देखा उसने–आवाज कुछ पहचानी हुई सी थी–कौन हो सकती है यह— कहीं रिज्जू तो नहीं, रिज्जू -यानी कि उसके बचपन की सहेली रिजवाना शेर। उसकी कॉलेज के दिनों की सबसे मस्तमौला, सबसे सीधी, सबसे पगली सहेली। हाँ वही बदामी बड़ी-बड़ी हिरणी सी भोली और कटीली आँखें बार-बार उसके असमँजस पर मुस्कुरा रही थीं। बुरके की काली जाली से झाँक-झाँककर अपनेपन का नटखट इजहार कर रही थीं।

***

यूँ तो हरसाल ही बनारस में घूमते-फिरते, सामान खरीदते निवेदिता ने अक्सर सोचा था कि उसकी सब सहेलियाँ आखिर कहाँ गायब हो गईं? कोई दिखती क्यों नहीं ? मिलती क्यों नहीं? पर यूँ चूड़ियाँ खरीदते-खरीदते अचानक ही रिज्जू का इसतरह से मिल जाना– उसने तो सपने में भी नहीं सोचा था– दिल बल्लियों उछलने लगा। पुरानी यादें बरसाती बाढ़ सी मन को डुबोने लगीं। दौड़कर सहेलियों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया। शायद दोनों के ही भावावेश में काँपते शरीर को सहारे की बहुत जरूरत थी।
” कहाँ थी तू अबतक– ऐसे गधे के सिर से सींग की तरह कैसे और कहाँ गायब हो गई थी?”
दोनों की ही खुशी और जुबाँ एक-सी ही थी। दोनों ने ही हँसते-रोते, आँसू पोंछते एक साथ शिकायत की और फिर दोनों ही जवाव देने की बजाय खिलखिलाकर हँस पड़ीं। दोनों के ही सवाल खुद ही जवाब बनकर उँगली पकड़े-पकड़े उन्हें बीस साल पुरानी यादों की गलियों में ले चले। शब्दों और यादों में होड़ लग गई, देखें अब कौन पहले वहाँ तक पहुँचता है।

” अच्छा तो यह जमाना आ गया है– खुद बिना बताए चुपचाप शादी कर ली। पराए वतन में जा बसीं और शिकायत कर रही है– सचसच बता क्या तुझे नहीं लगता कि शिकायत मुझे करनी चाहिए ?”- रिजवाना की आँखों में प्यार भरा उलाहना था।
” चल कहीं बैठकर आराम से बातें करते हैं। ”

गल-बहियाँ डाले सहेलियाँ चल पड़ीं– आसपास कहीं बैठने की जगह ढूँढती हुई।

दोनों ही ग्राहकों को यूँ बिना कुछ खरीदे बगैर ही जाते देख दुकानदार घबरा गया, बोला– ” दीदी इन चूड़ियों का क्या करूँ ? ”
दोनों ही बातों में मगन हो चुकी थीं। की हुई खरीददारी का किसी को भी होश नहीं था अब।
” हर पैकेट के दो-दो पैकेट बना दो। जो तुम्हारे पास न हों, उन्हें आधी-आधी कर दो। दुर्गा बस अभी आकर सब ले जाएगा।”  उत्साह और प्यार से खनकती आवाज में निवेदिता पलटकर बोली और फिर बिना जबाब का इन्तजार किए, चल भी पड़ी।
दुकानदार फिर से एक-एक करके सब बन्द पैकेट खोलने लगा। उचक-उचककर मैचिंग जोड़ियाँ ढूँढने लगा। इसबार उसे यह फालतू की मेहनत कतई नहीं खल रही थी। आखिर निवी जैसे खरीददार रोज-रोज तो नहीं ही आते।
” तो यह दुर्गा क्या अभी तक है तुम्हारे यहाँ?” रिज्जू ने आश्चर्य के साथ पूछा। ” यह वही दुर्गा है न जो हमेशा तेरे साथ रहता था जीप पर—वही दुर्गा है न, जो घँटों दरगाहों और दरख्तों पर धागे बाँधता, औलाद के लिए दुआएँ माँगता, मारा-मारा फिरा करता था ?”
” हाँ-हाँ, वही दुर्गा। तुझे तो अभी भी बहुत कुछ याद है। अब बुढ़ापे में बिचारा कहाँ जाएगा– पर हाँ इसके यहाँ कभी कोई बच्चा वगैरह नहीं हुआ, पर अभी भी यह बस बच्चों की ही ड्यूटी करता है। उन्ही को अपने बच्चे समझता है। यह भी खुश है और घरवाले भी। इसे बच्चे मिल जाते हैं और घरवालों को एक जाना-पहचाना भरोसे-मँद, जिम्मेदार, समझदार गार्जियन– ड्राइवर तो कहीं भी कई मिल जाएँगे, पर इसके जैसा अपना समझने वाला नहीं।”
” अच्छा मार गोली दुर्गा को। तू सुना तेरे क्या हाल-चाल हैं? कहाँपर तेरी ससुराल है–कितने बाल-गोपाल हैं और हमारे जिज्जू मियाँ कैसे हैं–तेरा कितना ख्याल रखते हैं –हमसे कब मिलवा रही है उन्हें तू ?

उत्साहित निवेदिता सवाल पर सवाल पूछती चली गई बिना रुके और देखे कि रिजवाना का चेहरा बुझ गया था, काली बदलियों से घिर आया था—
” चल, घर नहीं चलेगी तू–अब भी पास ही में, उसी पुराने अब्बू के घर में ही रहती हूँ मैं—सबसे खुद ही मिल लेना। मैं जानती हूँ कि आज भी तू अपने जीजू से मिलकर बहुत खुश होगी क्योंकि तू उन्हें अच्छी तरह से जानती है।”
रिजवाना निवि के लिए अनबूझ पहेलियों की गुत्थी बनती जा रही थी।
“क्यों नहीं – होना भी चाहिए। आखिर साली हूँ उनकी।”
रिजवाना की बुझी आँखों में झाँकते हुए सँभावित तूफान से डरी निवेदिता सहमे गले से बोली। घर ज्यादा दूर नहीं था। वहीं पुलिस थाने के पीछे, चौक के पास ही तो रहती थी रिजवाना। कुछ नहीं बदला था। वही पतली मोड़दार गलियों कि भूल-भुलैया से निकल कर निवी आज बीस साल बाद फिर से उसी आँगन में खड़ी थी और गुजरा कल यादों के पँख लगाकर पक्षी सा सामने उतर आया था।
आगे एक साफ-सुथरे पलँग पर मौसीन लेटा हुआ था। हाँ वही मौसीन। उनकी कक्षा का कवि और शायर मौसीन –लड़कियों की साड़ियों पर, पल्लुओं पर हँस-हँसकर शायरी लिखनेवाला, शरारती मौसीन। हर ईद पर डब्बे भर-भरके केवड़े और गुलाबजल की खुशबू में डूबी सेवियाँ बाँटने वाला मौसीन। उसके वे मासूम शेर तो आजतक निवि की तनहाइयाँ गुदगुदा जाते हैं पर आज वह दौड़कर आगे नहीं आया। बस वहीं लेटे-लेटे ही चहका–वही शरारती मीठी-मीठी चुटकियाँ लेते हुए—
” वल्लाह, आज तो हमारी नन्ही किरन पूरा गोल-मटोल आफताब बनकर देहलीज़ लाँघ आयी है।”
” देखो मौसीन, इस उमर में तो सुधर जाओ। क्यों अब भी पिटने की ख्वाइश पर ही जिन्दा रहते हो?”

निवि ने भी उसी उत्साह से बिछुड़ी हुई मित्र-मँडली का स्वागत किया। पर लंगड़ी वह खुशी ज्यादा देर तक टिक न सकी, उत्साह की बैसाखियों पर दौड़ न सकी। एक दर्दीला अपाहिज अहसास दोनों बाँहें फैलाए निवि की अगवानी में पूरी हिम्मत के साथ आगे खड़ा था।

” अब देखो ना निवि, तुम्हारी सहेली के प्यार ने कितना निकम्मा कर दिया है मुझे–पलँग से ही नहीं उतरता मैं तो। ” बच्चों-सी सहजता से मौसीन ने आसपास घिर आई उदासी को तोड़ना चाहा।

” कब मौसीन—आखिर कैसे ? किसकी नजर लग गई इस खुशमिजाज खूबसूरत जोड़े को?”

प्रश्नों के अजगर निवि के चारो तरफ मुँह बाए खड़े हो गए और सारी पीड़ा को झट बँद पलकों में छुपे आँसू सा समेटकर निवि ने स्वागत में मुस्कुराते हुए मौसीन को  गले से लगा लिया।

” तो अब तो शहँशाह ने तलवार की जगह फिर से कलम उठा ली होगी। बस फरमान पर फरमान ही लिखते होंगे-? मजाक किनारे, सच-सच बताओ मौसीन यह सब कब और कैसे?  ”

निवि और खुशी का मुखौटा पहने नहीं रह सकी।

“या खुदा अभीभी वही उतावलापन। तुम लड़कियों में कभी बुजुर्गियत और ठहराव आता भी है या नहीं। पच्चीस साल में लिखा यह जिन्दगी का रिसाला पाँच मिनट में ही कैसे सुना दूँ मैं अब तुम्हें। बयानगी के लिए हर साल को कम-से-कम पाँच-पाँच मिनट तो दो।”

मौसीन सहज हो कर बोला।

उसके बाद जो कुछ उस भावुक शायर, कर्मवीर की जुबाँ से निकला, गर्म चाय की प्यालियों के साथ भी उसके ज़हन में जमता चला गया। दर्द की उन उघड़ती परतों ने निवि को दुनिया के वे सब घिनौने चेहरे दिखा दिए, जिनकी घृणा और हवस में हर सच्चे और क्रान्तिकारी का,  स्वप्न-दृष्टा का, बस वही हाल होता है जो मौसीन का हुआ। पर निवि भी एक-के-बाद-एक, मौसीन का सारा दर्द अपने अन्दर समेटती चली गई। एक अच्छी सहेली की तरह उसे उनकी हर पीड़ा की साझेदारी चाहिए थी।

” याद है निवि, जब हमने मिलकर बहुत सारे कार्ड बनाए थे।”–मौसीन कहे जा रहा था-” मोर्चे पर लड़ रहे जवानों की मदद के लिए। और फिर उन पैसों को जमा करके अपने हाथों से शास्त्रीजी को दिया भी था ?”
” हाँ-हाँ।” उन गमकती यादों में डूबी निवी बोली- ” और फिर वहीं बस-स्टौप पर तुमने अपनी वह कविता भी तो सुनाई थी मुझे। ”
निविने याद आजाने के उत्साह में बात बीच में ही काटकर पूरी कविता ही दोहरा दी—

” सुबह के बजे आठ थे, सजे-बजे उनके ठाठ थे

इठलात बलखाती चली जा रही थीं

मैने आहें भी भरीं इशारे भी किए

पर जालिम ने मुड़कर नहीं देखा

क्या रोडवेज की बस थी

नहीं-नहीं कॉलेज गर्ल थी।

निवि की आवाज में आज भी वही पुरानी बच्चों-सी पुलक थी।
” सच निवी, इतनी ज्यादा याद हैं तुम्हें, हमारी वे नादानी की दास्तानें। क्या इतना याद करती थीं मुझे ? फिर कभी खत वगैरह क्यों नहीं लिखा? हाँ ! उसी दिन शुरु हुआ था मेरी जिन्दगी में आजतक चल रही इस जिहाद का कभी न खतम होने वाला यह खतरनाक सिलसिला और मेरी जिन्दगी अजीबो-गरीब शर्तों में बाँट दी गई थी। उस दिन बस से उतरते ही, वहीं, अपनी ही गली की मोड़ पर मुझे अगुआ कर लिया गया था, वह भी आँख पर पट्टी बाँधकर। फिर पूरे एक हफ्ते उस बन्द अँधेरे कमरे में मैं सोचता रह गया– कौन हैं यह लोग और क्या चाहते हैं आखिर मुझसे?  मेरा कसूर क्या है आखिर –इनका मकसद क्या है ? मैं तो कोई रईसजादा भी नहीं जो मेरे एवज में इन्हें कोई मोटी रकम ही मिल जाए–फिर मैं यहाँ पर, इसतरह से कैद क्यों ?”
” उन अँधेरों में बँद मेरी सोच घुलती रही। आँसू बन-बनकर बहती रही। पर साफ और खुलासा कुछ भी नहीं हुआ। पूरे हफ्ते यूँ ही बन्द रहने के बाद मेरी पेशी हुई। और बिना किसी दलील के मुझे खबरदार करके तुरँत छोड़ भी दिया गया। फिर कोई ऐसी-वैसी हरकत की तो मार दिया जाएगा–नहीं उससे भी बद्तर, लूला-लँगड़ा करके छोड़ दिया जाएगा– ऐसी जाने कितनी हिदायतों के साथ। देख तो नहीं पाया कि वे लोग कौन थे, पर आवाजें बहुत ही ज्यादा पहचानी हुई थीं। बिल्कुल अपने मौलाना जैसी, कुनबे वालों जैसी। पर, निवि आजतक मैं सोच नहीं पाया कि ऐसी-वैसी से उनका मतलब क्या था? जहाँतक मुझे मालूम है मैने कभी कोई गिरी हरकत नहीं की है। इश्क तक भी तो देखो बस एक अपनी बीबी के साथ ही किया है। तुम्हारी सहेली इसकी गवाह है।”

मौसीन ने उदासी के माहौल पर एक और मजाक का नाकाम मुल्लमा चढ़ाना चाहा।

” पर जाने क्यों निवि, उसके बाद हरपल ही मुझे लगने लगा कि कोई मुझपर निगरानी रख रहा है। पीछा कर रहा है मेरा। और इससे मेरे इरादों में थोड़ी और फौलादी सख्ती आ गई। धधकती वादी सा मेरे अन्दर भी एक नाइँसाफी का ज़ज़बा सुलगने लगा। जीवन के इस धर्मयुद्ध में कौरव-पाँडवों की तरह दोनों तरफ मेरे भी अपने ही खड़े थे और मुझे भी बस सच का ही साथ देना था, क्योंकि चाहे भगवान कहूँ या ईशू, धर्म का साथ न दूँ तो बदनाम तो हरहाल में बस मेरा अपना खुदा ही होगा। और अल्लाह-गवाह है मैने कभी उसे और दीन-ईमान को रुसवा नहीं होने दिया है। षडयँत्र से भरी एक रणभूमि बिछती चली गई मेरे आगे और मैं अर्जुन सा चाहकर भी कभी उबर न सका।  भाग न सका। हरबार ही किसी बेबा बहन या लाचार मां के आँसुओं ने मुझे रोक लिया। हर बेबस बीमार अनाथ के हाथ मेरे अपने गिरेबाँ को घेरे हुए थे। क्योंकि अत्याचार करने और सहने वाले, दोनों ही मेरे अपने ही तो थे। मैं जाता तो कहाँ जाता ?  किससे भागता, किससे न्याय माँगता ? अफसोस बस यही था कि मेरे पास गाण्डीव या कृष्ण नहीं थे। थी तो बस, तुम्हारी यही मुझ में विश्वास रखने वाली सहेली और मेरी  सस्ती-सी यह कलम। दुर्भाग्य तो देखो मेरा –सबका होते हुए भी मुझे किसीने नहीं अपनाया। मैं हिन्दू नहीं था क्योंकि रोज नमाज पढ़ता था और बुजुर्गों ने मुझे मौसीन नाम दिया था। मुसलमान नहीं था, क्योंकि हिन्दू औरतें मुझे राखी बाँधती थीं। भैया कहती थीं। मैं हर अन्याय से लड़ने वाले की खैरियत के लिए बाबा विश्वनाथ से दुआ माँगता भटकता रहा। चमचम का पानी और दरगाह की ताबीज बीमारों में बाँटता रहा। दोनों कौमों की ही आँखों में काफिर और हरामी रहा। आजतक नहीं जान पाया कि आखिर हूँ कौन मैं? इतना जरूर जानता हूँ कि इसी धरती में मेरे अम्मी-अब्बू आज भी सोए हुए हैं और इसकी हिफाजत और अमन ही मेरी जिम्मेदारी है। मेरा फर्ज है। एक टूटे पत्ते-सा आज भी इन गँगा की लहरों पर मैं बह तो रहा हूँ– पर बिना इसमें भीगे–  सूखा-सूखा ही। कोई शिकायत नहीं कर रहा तुम से, ना ही अपने नसीब को रो रहा हूँ , पर तुम्ही बताओ निवि जिस मिट्टी में पैदा हुआ, पला बढ़ा क्या उसकी पहचान ही मेरी सही पहचान नहीं? माना मेरी माँ को लोग जमीला आपा कहते थे पर मेरी मौसी का नाम शान्ती भी तो है। मैं तो बस नफरत और झूठ को हटाना चाहता हूँ। चाहे वह मुसलमानों के प्रति नफरत और अफवाह फैलाने वाले पोंगा पँडितों ने बिखेरी हो या छम्मन चचा और रसूलमियाँ के मजहबी खतरों ने।
अपना-अपना दुख लेकर लोग मेरे पास आने भी लगे थे और मैं सुनने भी लगा था, समझने लगा था उन्हें।

…फिर सुख-दुख, हिन्दु या मुसलमान का  घर देखकर तो नहीं आते। जीवन की तरह ये भी तो किसी मजहब की जागीर नहीं ? और अपनी इन नापाक नासमझियों के लिए मुझे दोनों तरफ से ही धमकियाँ मिलने लगीं। गलियों-कूचों में पीटा जाने लगा। पर मैं बदल तो नहीं पाया। रेत में सर छुपाकर अँधा कैसे हो जाता मैं ?

और फिर एकदिन वह खूँखार और शर्मनाक दिन भी आया जब तँग आकर मेरे अपने कुनबेवालों ने ही मुझे अगुआ कर लिया। अधमरा करके अँधेरे कोनों में फेंक दिया ताकि मैं किसी से न मिल सकूँ, कहीं आ-जा न सकूँ। फिर से उन्हें अपने मौला और मौलवियों के आगे शर्मिंदा न कर सकूँ। क्योंकि न तो उनके कहे मुताबिक मैं इन काफिरों की सँगत छोड़ रहा था और ना ही अपने इँकलाबी तौर-तरीके।

उनके मजहबी वतन जाने की दावत भी तो कबूल नहीं की मैने। मेरी हरकतों से सब खतरे में पड़ गए थे। पूरा ढाँचा ही टूट रहा था। वे करते भी तो क्या करते ? और तब मुझे पहली बार पता चला था कि कुछ भी नहीं हूँ मैं। मैं किसी का बेटा नहीं– किसी का भाई नहीं। बस एक काजल की कटोरी हूँ। जो भी मेरे पास आता है बस काला होकर ही जाता है। पर करूँ भी तो क्या करूँ—जिन्दगी भर ही तो जला हूँ मैं– पराई आग में तपना अब तो आदत हो गई है यह मेरी -मजबूरी है मेरी। ”
” आँखों में बसालो तो रूप भी तो सँवारते हो तुम ही। माथे पर टोना बने उनकी रक्षा भी तो करते हो तुम ही।”  निवि ने हँसकर कहा–
” पर कुछ भी तो नहीं बदल पाया मैं— हाँ, तुम्हारी साहसी सहेली ने आगे बढ़कर मेरा दामन जरूर थाम लिया। मुझसे निकाह करके– मुझ बिखरते को सहारा देकर, सबको सन्न कर दिया था  इसने। आज इसने न सिर्फ मुझे जिन्दा रखा है बल्कि मेरे सभी हौसले भी बुलन्द किए हैं। मुझे बारबार याद दिलाया है कि मैं भी उसी शहर का रहने वाला हूँ जहाँ की गँगा पापियों के पाप और गन्दगी को अपने में समेटकर भी बस गँगाजल ही देती है। मैं आज यहीं घर में बैठा गरीब बच्चों को पढ़ाता हूँ। अपने रिसालों और नज्मों के जरिए अपनी बात लोगों तक पहुँचाता हूँ -इस उम्मीद से कि शायद बदली में घिरी यह रौशनी थोड़ा-बहुत उजाला दे ही पाए। आज इस इक्कीसवीं सदी में अगर दो-चार को भी इन मजहबी दायरों से निकाल पाऊँ, इन्सानियत की रौशनी में ला सकूँ तो अपने को सुफल मानूँगा। सच्चा मुसलमान मानूँगा। यह बात दूसरी है कि मेरी बात सुनने वाले ज्यादातर मेरी तरह ही गरीब और लाचार लोग होते हैं जिनके पास खोने और अपना कहने को कुछ भी नहीं होता। उनके तो राम और रहीम दोनों ही बस अन्न के चन्द दाने हैं। तुम ही बताओ निवि, कब और कैसे मैं काफिर हो गया? यह तो बुत-परस्ती नहीं ? अपने पड़ौसी को खुद सा प्यार करो, यही बात तो हर मजहबी किताब सिखलाती है हमें। फिर मैने कहाँ और कैसे गलत पढ़ और सीख लिया ? बचपन से ही वालिद और कुरान-शरीफ से भी तो बस यही सीखा था मैने। अगर हर मजहब की जुबाँ एक है– हर इँसान की शकल खुदा ने अपनी शकल में बनाई है, तो तुम ही कहो इसमें मेरा कुसूर कहाँ पर है ? क्यों मैं दूसरों की शर्तों पर जीऊँ ? पता नहीं एक सीधा-सच्चा इँसान बनने के लिए मुझे अभी और न जाने किन-किन इम्तहाँ से गुजरना होगा ? बाँसुरी के छेदों सी सातसुरों से छिदी-भिंदी यह जिन्दगी हमें पीड़ा जरूर देती है पर है तो आजभी बहुत ही सुरीली और रसमय। बस हमें बजाना और सुनना आना चाहिए। जाने कब  इन रीते छेदों को अपनी साँस दे पाऊँ ? ना जाने कब इस दुनिया के ठेकेदारों का दामन इतना बड़ा हो पाए कि दीन दुखियों को पनाह दे सके, आँसू पोंछ सकें ?
नहीं कहता कि मैं भी कुछ ज्यादा कर पाया हूँ– हाँ इनके दर्द में बस रोया जरूर हूँ। सिर्फ निजी लालच को ही शह नहीं दी मैने। बेपाक धमकियों से डरा नहीं हूँ मैं। झूठ के आगे घुटने नहीं टेके हैं मैने–हाँ, तुड़वा जरूर लिए हैं। तुम चाहो तो इसे मेरा कुसूर कह सकती हो–क्योंकि जो खुद अपाहिज हो गया, अपनी हिफाजत नहीं कर सका, वह दूसरों की हिफाजत कैसे कर पाएगा?”
” ना मौसिन, इतना दर्द और बोझ अपने दिल पर मत लो। इतना निकम्मा न समझो खुद को। हम सभी को तुम्हारी–तुम जैसे लोगों की बहुत जरूरत है। अक्सर ही लोग जो चाहते हैं बस कह नहीं पाते। फिर गुस्सा भी तो प्यार का ही दूसरा पहलू है। अपनेपन का यह भी  तो एक प्रतीक है। यह सभी थके-हारे और कमजोर लोग हैं। थकी माँ भी जब किसी और से कुछ नहीं कह पाती, तो गोद के बच्चे को ही पीट डालती है। यह बात दूसरी है कि फिर उसके रोने पर खुद भी फूट-फूटकर रोने लग जाती है। अक्सर ही यह कमजोर शब्द भावनाओं का बोझ नहीं उठा पाते और अर्थ का अनर्थ हो जाता है। तुम तो कवि और शायर हो खुद ही सब जानते और समझते हो। अर्थ-अनर्थ पर फिर याद आ रही है तुम्हारी ही एक हल्की-फुल्की-सी कविता जो तुमने बजरे में गँगा की लहरों पर घूमते हुए हमें सुनाई थी।”
मँत्र-मुग्ध सा मौसीन सब सुन रहा था, देख रहा था। अपने अतीत को, उस प्यार-दुलार की मीठी फुहार को–पुलका जानेवाले उस ठँडी हवा के झोंके को। मौसीन आँखों के जरिए सारा सुख मन के खजाने में बन्द कर लेना चाहता था। शरारती निवि उसे छेड़े जा रही थी –” मौसीन वही पति के चोट खाकर बेहोश हो जानेपर बड़ी बी की फरियाद वाली तुम्हारी कविता –हाँ वही, जिसे सुनकर आज भी हम सबके पेट में हँसते-हँसते दर्द हो जाता है। ”
“डाक्टर,डाक्टर जल्दी आओ, मेरे घर में एक एक्सीडेंट हो गया

पति मेरा जो अभी तक पूरे सेंस में था, गिरते ही नानसेंस हो गया।”

निवि अपनी रौ में बोले जा रही थी -“जानते हो मौसीन भावों के अतिरेक में अक्सर ही लोग ऐसी-ही उलटी-सीधी जुबाँ बोलते हैं। कभी लब्ज़ साथ नहीं देते तो कभी कहने की क्षमता ही नहीं होती। वो सब जिन्होंने तुम्हें उलटा-सीधा कहा है, मन ही मन तुम्हारी बहुत इज्जत करते हैं। पर डरते भी हैं कि कहीं तुम उन्हें छोड़कर दूसरे खेमे में न चले जाओ। इसीलिए उलटे-सीधे नामों से बुलाते हैं–डराते धमकाते हैं। तुमसे हरदम जुड़े जो रहना चाहते हैं। तुम्हें खुदसे बाँधकर रखना चाहते हैं। शब्दों पर मत जाओ, उनकी जरूरतों को, इरादों को, कमजोरियों को समझने की कोशिश करो। जानते हो मौसीन कमजोरों के सरपर सच्चे-झूठे, पचास तरह के हौवे होते हैं–हजारों मजबूर शर्तें होती हैं।”
” जानता हूँ निवि अच्छी तरह से जानता हूँ–मैने भी पापीसे नहीं बस पापसे ही घृणा करने की कोशिश की है। यही करता आया हूँ बचपन से ही मैं भी। पर जानती हो निवि, गाँधीजी भी कहते थे कि अहिंसा का पाठ शेर ही पढ़ा सकता है एक चूहा नहीं। ”

” मैं चाहती हूँ मौसीन कि तुम्हारी यह कहानी अब बस बनारस की गलियों में ही नहीं, यहाँ के हिन्दू-मुसलमानों की जुबाँ पर ही नहीं— देश-विदोशों के हर कोने में गूँजे। हर कान से टकराए। क्योंकि सूफी-सँतों का कोई देश नहीं होता। मजहब नहीं होता। आकाश-सा उन्हें भी बाँटा नहीं जा सकता। वे तो हवा, पानी और रौशनी की तरह हरेक के लिए होते हैं। हर देश के हर प्राणी के होते हैं। अगले वर्ष विश्व-शान्ती सम्मेलन है–हिस्सा लेने आओ। बोलो, आओगे ना मौसीन– आना जरूर— आमलोगों की जुबाँ ही आम लोगों की समझ में आती है। तुम्हारे आने से अपने शहर की—इस देशकी–इस मानव समाज की, इन्सानियतकी, खुद शान्ती और मित्रता जैसे शब्दों की गरिमा में चार चाँद लग जाँएँगे। वैसे भी तो तुम्हें आनेवाली पीढ़ियों को अभी बहुत कुछ देना है, सिखाना है।”
”  क्यों जर्रे को आसमान पर बिठा रही हो निवि, अगर मेरे भोले-बाबा ने चाहा, तो हम सब की यह इच्छा भी ज़रूर ही पूरी होगी।”                                                                                                                                                                                  मौसीन ने अपनेपन से छलकती आँखों को पोंछते हुए एक तपस्वी, एक सूफी जैसी दृढ़ता और लगन से यह चुनौती भी स्वीकार कर ही ली।…

 

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