कहानी समकालीनः तपिशः शैल अग्रवाल

“ जी जनाब. कहां ले चलूं…?”

हाथ हिलाते ही, मिनटों में सामने आ खड़ा  वह औटो-चालक उस उम्र का था, जब लोग घरों में बैठकर आराम करते हैं, पोते-पोतियों के संग खेलते हैं। उसकी आंखों की धधकती लपट और झुलसी हुई रंगत बता रही थी कि शायद उसकी  जरूरतों  का, विस्तार उम्र से कहीं ज्यादा लम्बा था, पर उन कपड़ों की सादगी, चेहरे की सौम्यता और बातचीत का सलीका तो कुछ और ही कहानी कह रहे थे. बारबार सोचने पर मजबूर कर रहे थे कि सामने खड़ा यह आदमी निश्चय ही बेहद संयमी और कुलीन है, फिर इस शांत और संतुलित आदमी को भरी गर्मी में औटो ही चलाने की क्या जरूरत पड़ गई, कौनसी ऐसी मजबूरी है जो इसे इस उम्र में भी यूं गली-गली भटका रही है- चाहकर भी कुछ सोच-समझ नही पाया मैं ? मुझे तो बस घूमना  था औटो में…क्या फर्क पड़ता है, आदमी जवां है या बुढ्ढा… इस उम्र में इसे इतनी मेहनत करनी भी चाहिए, या नही— वैसे भी यह सवाल मेरे सोचने के नहीं, उसके परिवार के लिए थे और फिर  जिन्दगी  कब हरेक के साथ वफा करती है ; भगवान ने भी तो पांचों उंगलियां एक सी नहीं बनाईं—सबकी अपनी-अपनी किस्मत है ! बेलगाम घोड़े-सी सरपट दौड़ती उस सोच को पलभर में ही, मात्र एक हलके से गरदन के झटके की चाबुक  से ही, यथार्थ की ओर मोड़ लिया था मैंने।

“हुज़ूर कहां चलेंगे आप?”, खुद में गुमसुम देखकर आखिर उस सामने खड़े बुजुर्ग ने दुबारा पूछ ही लिया मुझसे।

“कहीं भी, जहां सैलानियों की भीड़भाड़ हो,  सुहाने मंजर और खूबसूरत चेहरे हों। नयन तृप्ति भी हो और साथ-साथ भयानक इस गर्मी से भी निज़ाद मिले। आसपास, या जहां भी तुम्हारा जी चाहे…कोई अच्छा और वातानुकूलित मॉल भी चलेग! मेरे लिए तो। “

इसके पहले कि वह विनम्र औटोवाला मुझसे कुछ और पूछे, मैं उसकी औटो में बैठ चुका था और यही नहीं, सवारी मिलते ही सैर-सपाटे की मौज में भी आ गया था। मेरे लिए यह वक्त अब ज्यादा सोचने-समझने का नहीं, भारत को आंखों में भरकर साथ ले चलने का था। पल-पल को जी भरकर जी लेने का था। कल रात देखी उस नई फिल्म का गीत अनायास ही सीटी की एक फड़कती धुन बनकर होठों पर मचलने लगा। परन्तु वह औटोवाला मेरे इस अनायास  और अनियंत्रित उत्साह से ज़रा भी सहमत नहीं लगा। सिकुड़ी हुई भौंहें बता रही थीं कहीं कुछ ऐसा था जो बेहद ही आपत्ति-जनक लग रहा था —मेरी भाषा और भूषा दोनों में ही उसे।

अपनी रंग-बिरंगी मार्क्स-स्पैन्सर की टी-शर्ट और हाफ-पैंट पर मैने  एक भरपूर नजर डाली और फिर सब ठीक तो है, के अन्दाज से उसकी तरफ देखने लगा, मानो कह रहा होऊं, ‘ अरे भाई, आज़ाद देश है मेरा। और फिर कुछ ही दिनों के लिए तो इंगलैंड से भारत आया हूँ, वह भी घूमने का मन बनाकर, दफ्तर जाने के लिए तो नहीं! फिर भला कौन होगा ऐसा जो खुश होनेपर, ऐसे  मौज-मस्ती के आलम में  भी गुनगुनाता न हो ?’

अपनी रंग-बिरंगी मार्क्स-स्पैन्सर की टी-शर्ट और हाफ-पैंट पर मैने  एक भरपूर नजर डाली और फिर सब ठीक तो है, के अन्दाज से उसकी तरफ देखने लगा, मानो कह रहा होऊं, ‘ अरे भाई, आज़ाद देश है मेरा। और फिर कुछ ही दिनों के लिए तो इंगलैंड से भारत आया हूँ, वह भी घूमने का मन बनाकर, दफ्तर जाने के लिए तो नहीं! फिर भला कौन होगा ऐसा जो खुश होनेपर, ऐसे  मौज-मस्ती के आलम में  भी गुनगुनाता न हो ?’

आमिर और काजल पर फिल्माया गया वह सुरीला गाना भी किसी को नापसंद और आपत्ति-जनक हो सकता है, यह  मैं सोच ही नहीं सकता था। जाने क्यों यूं बेकार में ही चिड़चिड़ा रहा  था  वह … लगता है धूप चढ़ गई  थी  उसे ! वह बुजुर्ग सा दिखने वाला औटोवाला अब पलपल मेरे मन में एक नया प्रश्न उठा रहा था…होता कौन है यह मुझे यूँ आंखों ही आंखों में आंकने और तौलने वाला ? सब बूढ़े एक से ही होते हैं शायद… (अगले पल ही मैं खुद, मन ही मन, इतना बूढ़ा और खूसट न होने के लिए भगवान को धन्यवाद दे रहा था और अनायास ही उसके प्रति उठी सहानुभूति  में थोड़ी कमी भी महसूस कर रहा था।) जून की तपती दोपहरी की हवा आंच की लपटों सी झुलसा रही थी … चेहरे और बांहों पर थप्पड़ मारे जा रही थी, पर चारो तरफ आदमियों का रेला था, ट्रैफिक जाम था। इँगलैंड में रहकर वह ‘ पागल कुत्ते और अंग्रेज ही भरी दुपहरी में घर से बाहर निकलते हैं’’,यह कहावत कई बार सुनकर भी,  इंगलंड लौटने से पहले आखिरी दिन की घुमाई का लोभ संवरण नहीं कर पाया था मैं.. !.चाहे कितनी ही धूप हो या गरमी, बेखबर दिल्ली की ये सड़कें कब धक्कम-धक्का और चहल-कदमी से खाली रह पातीं हैं.?.. तो मैं अकेला ही नहीं, सैकड़ों और भी पागल हैं इस  दुनिया में, देखकर मैं खुलकर मुस्कुराए बगैर न रह सका।    छोड़ो इन बातों को, मुझे क्या पड़ी, लू खाए या बीमार पड़ें सब —मस्ती और खरीददारी के इरादे से निकला हूँ , तो आज बस वही करूंगा !

एक बार फिरसे मैने खुदको एक नये उत्साह से लैस कर लिया था। ‘ वाह, क्या बोल लिखे हैं लिखने वाले ने, और क्या धुन बनाई है बनाने वाले ने…चांद सिफारिश करता जो हमारी—-‘ मेरा इरादा अब जोर-जोर से गाने का बन ही रहा था, कि एकबार फिर उसी बेबाकी से टोक दिया उसने  मुझे।

“ आशिक मिज़ाज लगते हैं ज़नाब?  “

“  नहीं भाई, लोफर किस्म का आदमी नहीं हूँ मैं।  बरसों बाद मुल्क लौटा हूं, इसलिए चप्पा-चप्पा आंखों में भर लेना चाहता हूँ। “  मेरे लिए  अब अपनी सफाई में कुछ कहना बहुत ही ज़रूरी हो चला था, पर जाने क्या था उन भेदती छोटी-छोटी, सलेटी और  मटमैली पड़ती  आंखों में कि ज्यादा कुछ और न कहकर, पूरा विषय ही बदल दिया मैने।

“ सुना है देश ने बहुत तरक्की कर ली है, खुशियाली से झूम रहा है—दो वक्त का खाना ही नहीं, बिजली पानी सबकुछ ही मयस्सर है आजकल  ? ” , चढ़ते पारे को नीचे लाने के लिए मैने आधे मसखरेपन  और आधी सच्चाई के साथ अटपटे-से लगते कई प्रश्नों की बौछार कर दी उसपर।“होगा.! “, मेरे उत्साह को पूरी तरह से अनसुना और अनदेखा करते हुए उसने उतनी ही बेबाकी और बेरुखी से ज़बाव भी दे दिया।

“क्यों खुश नहीं दिखते तुम देश की तरक्की से ? ‘’ मैं उसकी अनमयस्कता पर हैरान था।

“कैसे खुश रह सकता हूं, मुझे भीख मांगने का पेशा जो नहीं आता—वैसे भी हर आदमी तो सबकुछ खा और पचा नहीं पाता, कईयों का हाज़मा बेहद नाजुक होता है ज़नाब और कईयों के तो यह चेहरे के ठीक आगे जड़ी नाक तक आड़े आ जाती है?”

लंबी-पतली नाक पर आंख पड़ते ही, आंखों ही आंखों में तैरती हंसी होठों पर मचलने लगी। बात असल में यूं थी कि नाक तो अच्छी भली  और सुगढ़  ही थी, पर नीचे का नज़ारा ज़रूर उसीकी ही तरह बिगड़ैल और बेतरतीब  लगा मुझे।

“क्या मधुमक्खी के छत्ते-से ये दाढी-मूंछ दिक किए रहते हैं तुम्हें? “, मैने एकबार फिर हल्की-सी चुहल करनी चाही।

और तब उसने पलटकर पहली बार बेहद ही बुज़ुर्गाने अन्दाज़ से मेरी तरफ देखा और इसबार तो एक दबी सी मुस्कान भी दिखाई दी मुझे उन खुश्क और भिंचे-भींचे, पतले होठों पर, पर तुरंत ही जज़बातों की उष्मा को पसीने की धार की तरह ही पेशानी से पोंछकर तटस्थ भी हो गया वह।

‘बेकार है इतने रूखे और खब्ती आदमी से सर खपाना ’, सोचकर मैने बैठे-बैठे ही दोनों हाथ आगे बढ़ाकर हलका-सा झटका  दिया  और औटो के वे धूल-भरे बंधे परदे खोलने चाहे, शायद लू से ही थोड़ी बहुत राहत मिले !

पर तुरंत ही “ नहीं ज़नाब, नहीं खुलेंगे !” , कहकर उसने गाड़ी की स्पीड थोड़ी और बढ़ा दी। फिर थोड़ी ही देर बाद अपने आप ही रुक-रुककर पुनः बोलने लगा वह , “  वैसे भी बन्द परदों में तो घुट जाओगे ज़नाब। बरसात के बाद का सूरज है, कड़क तो होगा ही…पर यह तपिश ही तो अपनी  किस्मत है ! ‘’

मुझसे नहीं, शायद अब वह खुद से ही बातें कर रहा था। आवाज मानो किसी गहरे अंधे कुंए से आ रही थी… गूंजती हुई और अस्पष्ट। कहे शब्द मुश्किल से ही सुन और समझ पा रहा था मैं। हां, सोच की जाने किन-किन गोल भंवरों में फंसा वह उसी रीते आकाश-सा लगा मुझे, जहां से उसे उतारने की कोशिश में, पिछले कई मिनटों से मैं उलझ चुका था।

उसे तो पर शायद चन्द सही शब्द तक नहीं मिल पा रहे थे मुझ जैसे अज़नबी से एक साधारण-सी  बात-चीत तक करने के लिए—अंत में बेहद ही फसफसे और दर्द में गुंथे वे शब्द खुद ही हवा में तैर आए,  “ मेरी बिट्टो की गड्डी है यह ज़नाब ! ‘’

तब… एकबार फिर बिल्कुल ही चुप हो गया वह और मुझे लगा कि अभी तक के मेरे हर हल्के-फुल्के फितरों से…व्यर्थ की बातचीच से, वह चुप्पी कई-कई गुना ज्यादा वज़नी और मुखरित थी।  मुझे यूं सोच में डूबा देखकर और ज्यादा देरतक चुप न रह सका वह।“क्यों परेशान होते हो ज़नाब, घूमने के लिए आए हो, घूम-फिरकर खुशी-खुशी वापस लौट जाओ। कुछ नहीं मिलेगा फालतू की बातों में उलझकर। “

मुझे लगा कि अब वह बहुत कुछ कहना चाह रहा है और मुझसे जुड़ भी रहा है। कितना सही था मैं… उसके बाद तो औटो की ही स्पीड से बिना रुके लगातार बोलता ही चला गया था वह। भावनाओं का अब एक ऐसा बहाव था मेरे चारो तरफ जिसमें  सारा शोर डूब  चुका था, मानो किसी बरसाती नदी ने किनारे तोड़ दिए थे, मानो विचारों की  एक  सुलगती भट्टी में पकने के लिए जा बैठे थे हम —घर से निकलते वक्त मैने कब सोचा  था कि अपनी छुट्टी का आखिरी दिन यूँ गुज़ारूंगा मैं !

“ आज तो जिधर भी देखो, यही इस देश का सबसे बड़ा पेशा है हुज़ूर। गरीब और ज़रूरत-मन्द ही नहीं, राजे-महाराजे, नेता-अभिनेता, सेठ-साहूकार सभी लाइन में लगे रहते हैं —सबके हाथों में वही एक कटोरा रह गया है.अब तो., बस। मेहनत-मज़दूरी तो कोई करना ही नहीं चाहता। सबको मुफ्त की चाहिए,। या तो लोगों के बिस्तर इतने गुदगुदे हो गए हैं कि किसीकी आंख ही नहीं खुलती, या फिर इतने अंधे हो गए हैं इस कमाई के पीछे कि घरबार तक का होश ही नहीं रह गया…मान-मर्यादा और सही-गलत तो बहुत दूर की बात हो गई ! ”, अपने आक्रोश में बोलता ही जा रहा था वह। मन की विष्तृणा अब उसके चेहरे पर ही नहीं, आवाज़ तक में थी, फिरभी एक-एक शब्द बहुत ही तौल-तौलकर बोल रहा था वह।

“कैनौट-प्लेस की तरफ ले चलूं जनाब, वहां उस इलाके में आए दिन ही कुछ-न-कुछ चलता रहता है आप जैसे लोगों के लिए…अब आपको उन विदेशियों की तरह कुतुब-मीनार और लाल-किला तो दिखा नहीं सकता मैं…ऐसे आपकी भी लम्बी सैर हो जाएगी और मेरे भी चार पैसे बन जाएंगे ? वैसे भी सुना है आप जैसे, बाहर से आए लोग इतनी कमाई करके आते हो पौंड और डालरों में कि हमारे रुपयों का कोई मोल ही नहीं रह जाता आपकी निगाह में ? ’’

“हाँ , हाँ , क्यों नहीं ! ’’ मैने तुरंत ही विषय बदलना चाहा।

‘ नहीं, ऐसी बात नहीं है, एकबार भारतीय तो मरते दमतक भारतीय।  हम भारतीय पौंड में कमाएं या डौलर में, पर सोचते तो हमेशा रुपयों में ही हैं। ‘ चाहकर भी ऐसा कुछ न कह सका मैं उससे। पता नहीं अब मैं उसकी गरीबी पर शर्मिन्दा था या अपनी फिजूलखर्ची पर—पर एक बात निश्चित थी कि मेरा वह बेफिक्र और मौज-मस्ती वाला मिज़ाज पूरी तरह से गम्भीर और भारी हो चला था…वही गम्भीरता और उदासी फिरसे पीछे-पीछे आ लगी थी… जिसे चार साल पहले यहीं कहीं, भारत में पीछे छोड़  गया था मैं।

दिन को पर अब ऐसे तो नहीं खराब होने दूंगा मैं…मैने तुरंत ही जेब से कीमती काला चश्मा निकाला और आंखों पर लगा लिया। औटो अब एक कुशल नटी की तरह ही कारों और बसों के बीच मुश्किल से बची जगह से भी अपने लिए रास्ता और संतुलन बनाता रफ्तार से आगे बढ़ रहा था और मेरी आँखें हर नये पुल और भव्य इमारत को प्रशंशात्मक दृष्टि से देख, परख और सराह रही थीं। ओह, तो यह प्रगति मैदान है, अब ऐसा लगता है…इतना आलीशान और सुन्दर ! हैरान था मैं दिल्ली की प्रगति पर। अभी भी आंखों के आगे अम्मा-बाबा और यारों के साथ घूमी हजारों दिल्ली की नुनखुरी यादें पसीने की गिरती बूंदों सी सरोबार किए जा रही थीं मुझे। बीच-बीच में बातचीत को जारी ऱखने के लिए कुछ सवाल भी पूछ लिया करता था मैं उससे।

“.तो, क्या यह मैट्रो चालू हो गयी ? “

उसने पलटकर फिर मेरी तरफ बेहद आश्चर्य के साथ देखा—साफ था कि देश की तरक्की का मेरा ज्ञान ड्राईंगरूम में बैठकर भारतीय चैनल पर देखी खबरों तक ही सीमित रह गया, परन्तु इतना तो उसे भी मानना ही पड़ेगा कि भारत के बारे में आई हर खबर को, आज भी, चार साल बाद भी, उतने ही मनोयोग से सुनता और देखता हूँ मैं,, जितना कि तब, जब यहां दिल्ली के इसी उत्तम नगर में रहता था।

“ हां, हां, ज़नाब कबकी, अब तो बाबू ही नहीं, सारे ये चार पैसे कमाने वाले दुकानदार भी, गाड़ी स्टेशन पर  ही  छोड़कर जाते हैं। “

“शायद धीरे-धीरे यह भीड़भाड़ भी कम हो जाए ? “

एकबार फिर मेरी प्रवासी आंखें एक सुनियोजित और समृद्ध भारत के सपने देख रही थीं।

“ नहीं ज़नाब, जब तक बढ़ती जन-संख्या नहीं रुकेगी,  यह भीड़भाड़ नहीं रुक सकती। शिक्षा की बहुत जरूरत है देश को। कोई होश नहीं किसीको और ना ही कर्तव्य-बोध अपने किसी भी दायित्व के प्रति ! जब एक बूढ़ी मां को नहीं संभाल पाते ये नौज़वान, ज़वान बहन को नहीं संभाल पाते, तो भारत मां की क्या ऱखवाली कर पाएँगे,  देश के बारे में कैसे सोच पाएंगे? “ , बोलते बोलते भावुक हो चला था वह और उसकी आवाज़ गहराकर थर्राने लगी थी। इतनी साफ-सुथरी भाषा और इतनी सुलझी सोच और औटो चलाने का पेशा—वह आदमी अब मेरे लिए रेशम की एक ऐसी चिकनी, फिसलती गुत्थी बनता चला जा रहा था जिसका हर मुलायम सिरा पलक झपकते ही एक नई गुत्थी में तब्दील हो जाता है। चाहकर भी पर कुछ भी तो नहीं पूछ पा रहा था मैं उससे— अब वह मात्र एक औटो-चालक नहीं रह गया था, घंटे भर के साथ ने और भी बहुत कुछ जानने का कौतुहल जगा दिया था मेरे मन में?

“ कितना कमा लेते होगे तुम रोज़ रोज़, इस तरह से यह औटो चलाकर ?” खुद को रोकते-रोकते आखिरकार पूछ ही बैठा था मैं।“ ..एक अकेले आदमी की आराम से गुज़र हो जाए, इतना तो कमा ही लेता हूं, जनाब !”

उसकी गरदन आत्म-विश्वास से तनी हुई थी और अब तो वह भी गीत गुनगुना रहा था—शायद बातचीत को वहीं खतम कर देना चाहता था। मैं सोचने पर मज़बूर था कि मुझे इतना व्यक्तिगत सवाल नहीं पूछना चाहिए था। और तब न चाहते हुए भी, मेरी गरदन एक बेचैन अन्दाज़ में बेमतलब ही इधर-उधर घूमने लगी, मानो मुझसे कह रही हो कि जिन्दगी के अनगिनत कठिन निर्णय की तरह एकबार फिर थोड़ी जल्दबाज़ी कर चुके हो तुम। मैं खुद को, अपनी सोच को एकबार फिरसे एक नयी उलझन के कटघरे में खड़ा कर चुका था।

“अरे, ज़रा रोकना भाई। लो, बीस रुपये लो और वह ठंडे फालसे खरीद लाओ। कई बरस हो गये यूँ फालसे खाए— वहां इंगलैंड में तो ये मिलते ही नहीं। और हां, दस, दस रुपये के दो पैकेट बनवाना, एक अपने लिए और एक मेरे लिए।  कोई अच्छा थोड़े ही लगूंगा मैं, अकेले-अकेले खाते और तुम्हारे साथ दिनभर घूमते? और हां, मसाले का नमक डलवाना मत भूलना।”

जाते-जाते पलटकर मैने उसे एकबार फिरसे याद दिलाया।

“नहीं जी, सब ठीक लगता है। और फिर हमारा तो यह पेशा ठहरा ! क्या पता हमारी आपकी अगली मुलाकात कभी हो भी, या नहीं… और अगर हो भी तो, हम एक दूसरे को पहचान तक पाएँ, यह तक ज़रूरी नहीं ? “

फालसों का पूरा पैकेट मुझे पकड़ाते हुए वह पहली बार खुलकर मुस्कुराया था।

अब एकबार फिरसे मस्त होकर वह अपना वही पुराना गीत गुनगुनारहा था। …गीत के बोल जाने-पहचाने से ही थे, पर पूरी तरह से पकड़ में नहीं आ रहे थे। या फिर उसकी सोच की तरह ही रहस्यमय और गडमड हो चुके थे वे भी । कभी ‘ चलत मुसाफिर मोह लिया रे ‘ सुनाई देता तो अगले पल ही ‘ अबकी बरस भैया को बाबुल ’ या फिर कुछ और वही पुरानी गुरुबानी और पंजाबी तोड़े।

गरमी की उस तपती लू में उन स्वर लहरियों की वीरानगी और उदासी दुगनी महसूस हो रही थी मुझे—एक खलिश-सी थी उसकी आवाज़ में।

क्या वाकई में इतना उदास है यह सामान्य-सा दिखता आदमी या मेरी कल्पना-शक्ति ही बहुत ज्यादा सक्रिय, संवेदनशील और प्रखर हो चुकी है यूं सबसे दूर-दूर और अकेले-अकेले रहते-रहते ? मैं अभी उस सुरीली गुत्थी का एक भी सिरा किसी भी छोर से पकड़ तक पाऊं कि एक बेहद ही झटके वाली क्रूर-क्रिच की आवाज के साथ वह दौड़ता-भागता औटो रुक गया और औटोवाला पागलों की सी बदहवासी-से कूदता-लांघता सामने के फुटपाथ पर जा पहुंचा। यही नहीं, मेरे देखते-देखते ही उसने सामने सहमी-सहमी खड़ी उस लड़की को उन लड़कों के चंगुल से परे धकेलकर दूर भेज दिया। मैं भी तो तीर की तरह दौड़ता, यह जा वह जा, वहीं उसके पास आ खड़ा हुआ था।

छेड़छाड़ करते उस लोफर से लगते लड़के के गाल पर अब वह थप्पड़ पर थप्पड़ रसीद किए जा रहा था। पता नहीं कैसी गिद्ध-सी दृष्टि पायी थी उसने, जो इतनी दूर से, इतनी भीड़भाड़ के बाद भी कुछ नहीं छुपा रह पाया था पैनी  उन आंखों से—लड़कों की गुंडागर्दी, बद्तमीज़ मनमानी और लड़की की मज़बूर परेशानी सभी कुछ !

अब पूरी तरह से आपे से बाहर हो चुका था वह। बिफर चुका था। शेर की तरह दहाड़ और गुर्रा रहा था। मन की अगन् और उठते गिरते हाथ का कड़ा बिजली सी बरपा रहे थे चारो तरफ। अपने ही आक्रोष के आवेग से कांप और हांफ रहा था वह। बेरहमी से बालों से पकड़कर लड़के को लथेड़ते-घसीटते मन न भरा  तो अब लात, घूंसे और थप्पड़  किसी की कोई गिनती नहीं रह गयी थी उसके पास। एक-सी रफ्तार से पीटते-पीटते जब वह खुद भी पूरी तरह से लस्त हो चला, तो गुस्से से हांफते-हांफते ही, दूर पड़ी चुन्नी उठाई और लड़की को उढ़ा दी, मानो वह लड़की जिसके साथ अभी-अभी यह अवांछनीय घटना घटी थी, उसकी कोई बेहद नज़दीकी…सगी, उसकी अपनी बहन या बेटी थी।

मुफ्त के तमाशबीनों की सामने फुटपाथ पर अब अच्छी-खासी भीड़ जमा हो चुकी थी । अब तक चुप-चुप सबकुछ देखती-सहती भीड़ में अचानक ही होश आ गया। क्या हुआ, क्या हुआ की खुसुर-पुसुर मधुमक्खी के छत्तों-सी चारो-तरफ भिनभिनाने लगी और तब खबर लगते ही पुलिस भी वहां डंडा हिलाती  आ पहुंची और लोफर से लगते दोनों लड़कों के साथ औटोवाले के हाथों में भी हथकड़ी डाल दी।

पर ठीक वहीं, खम्बे से सटी और मलमल की सफेद चुन्नी में मुंह छुपाए, भयभीत वह चौदह-पंद्रह साल की लड़की अभी भी रोए ही जा रही थी। अनचाहे और आकस्मिक हादसे से अकेले ही उबरने की कोशिश में खंबे को मुक्कों से रहरहकर पीटे जा रही थी। ( सहेली तो पहले ही उसे अकेला छोड़कर, भाग खड़ी हुई थी)। पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदती धीमी-धीमी आवाज में सुबक-सुबककर खुद से ही कुछ कहती वह लड़की अब दबी दबी हिचकियां भी ले रही थी, मानो इन दरिंदों की भीड़ और अंधे पुलिस वालों के आगे आने की हिम्मत ही नहीं थी उसमें—या फिर शायद बेहद ही थक और पूरी ही तरह से टूट चुकी थी वह बेमतलब के इस फसाद से।

“ इन्हें क्यों इस तरह से लिए जा रहे हो तुमलोग…इनका तो कोई भी दोष नहीं… यह तो बस मुझे और नेहा को उन गुंडों से बचा रहे थे?”

अब मेरे लिए और तटस्थ रह पाना संभव नहीं था। सान्त्वना देते हुए, उसकी पीठ पर हाथ रखकर मैने पूछा , “ क्या तुम इनकी बेटी हो?”

“नहीं..!”

“.इन्हें जानती हो?”

“…नहीं!”हर ज़बाव के साथ मेरा आश्चर्य दुगना होता जा रहा था।‘ बेगानी शादी में अब्दुला दीवाना’ तो बहुत देखे थे , पर ‘ बेगाने दुःख में अब्दुला दीवाना’ से मिलने का यह मेरा पहला ही मौका था। उसे बचाना मेरे लिए कितना जरूरी था नहीं जानता मैं, पर मैने बज़ाय दूसरा औटो पकड़ने के, खुद को उसके पीछे-पीछे ही चलते पाया। पुलिस चौकी में पहुंचते ही फोन आ चुका था और वह दोनों अपराधी लड़के तुरंत ही छोड़ भी दिए गये थे, क्योंकि उनमें से एक किसी मंत्रीजी का बेटा था और दूसरा उसका खास दोस्त और किसी बड़े पुलिस –अधिकारी का बेटा।

औटो वाले के हाथों बुरी तरह से पिटने के बाद भी, उन दोनों के चेहरे पर एक बेहद ही क्रूर और विजयी मुस्कान थी और उन्होंने ‘ सैंया भये कोतवाल तो हमें डर काहे का ‘ के भाव से औटोवाले की तरफ देखा, मानो उसे चेतावनी दे रहे हों, ’ देखा हमसे भिड़ने का नतीज़ा…मच्छर से मसल दिए जाते हैं तुम्हारे जैसे लोग!‘ हां, सारी सज़ा तो अब अकेले ही भुगतनी थी उसे अब, जो गलती उसने की थी और जिस नाइंसाफी ने उसे इतना भड़काया था…दोनों की ही ! हथकड़ी में जकड़ा और घुटनों में मुंह छुपाए बैठा वह औटोवाला, एक पिंजरे में बन्द शेर-सा बेहद निरीह और लाचार लगा मुझे…सरकस में प्रदर्शित शेर की तरह ही उसपर कार्यवाही होनी तो वाकई में अभी बाकी ही रह गई थी?

“ तो तुम मारपीट का भी धंधा करते हो ?”  सामने पड़ी हुई फाइल बन्द करते हुए थानेदार जोर से गरजा और  “ सारी मर्दानगी दो दिन में ही निकाल दूंगा… स्साले “ कहकर मुंह में आई भद्दी गाली पान की पीक के साथ ही वहीं थूक दी । छींटे अब सामने दीवाल पर ही नहीं, मेजपर और सामने जमीन पर बैठे औटो वाले के बालों तक पे बिखर चुके थे और देश के कानून की दशा और बेहूदगी की खुले आम बयानगी कर रहे थे। अभी वह ज़बाव देने के लिए मुंह तक खोल पाए, इसके पहले ही तड़ाक-तड़ाक से दो डंडे  उसकी झुकी पीठ पर और पड़ गए, पर उसके शरीर में कोई हरकत नहीं हुई। वह बैठा-बैठा बस उसी सामने बिछी टूटी –फूटी, खुरदुरी जमीन को ही घूरत रहा… जब से वे गुंडे सीना ताने छूटकर गए हैं, यूं ही बुत बना बैठा है वह… यह जमीन बेगुनाह और लाचारों के शरीर पर पड़ते कोड़ों से चटकी या फिर देश के भ्रष्ट और अंधे कानून से, शायद यही सोचता और गुनता-बुनता-सा ?

मुझे लगरहा था कि इतना तटस्थ-सा दिखते हुए भी अपने हालात की पेचीदगी को भलीभांति  समझ रहा था वह…शायद अभ्यस्त था इस नाइंसाफी का…जानता था कि एक और रात उसे यहीं, इसी हवालात में ही गुज़ारनी होगी। और कितना सही था मेरा यह अनुमान ,  अगले पल ही,” रातभर भूखे-प्यासे हवालात में बन्द रहोगे, तो अगली बार खुले सांड-सा यह मारपीट का जोश तो नहीं ही उठ पाएगा तुम्हारे अन्दर ! “कहकर उसे लौकअप में बन्द कर दिया गया ।

सलाखों के पीछे से जब आँख मुझपर पड़ी, तो हाथ जोड़ते हुए बेहद ग्लानि के साथ उसने मेरी तरफ देखा और विदा में हाथ जोड़कर सिर झुका लिया। पहली बार उसकी स्वाभिमानी आँखों में शर्म का अहसास था और चन्द भीगी बूंदें भी थीं कोरों पर, मानो अवांछनीय इस घटना के लिए, मुझे घुमा न पाने के लिए बेहद शर्मिंदा था वह। उसकी भलमनसाहत और उसके साथ हुए अन्याय से मैं खुद कटा जा रहा था और उसके दुख से कहीं न कहीं बहुत गहरे जुड़ भी चुका था। मेरा ध्यान अब उसकी तारतार हुई कमीज़ और पैंट पर था जो इस घटना की तरह ही उसकी इज्जत ढकने में पूरी तरह से असमर्थ हो चली थी, यही नहीं, कई छोटी-मोटी खरोचों के साथ-साथ, दांई हथेली के पास मार-पीट के दौरान हुआ एक बड़ा-सा घाव भी था, जो रिस-रिसकर बहता कपड़ों को ही नहीं, पहनने वाले तक को और भी दयनीय स्थिति में लिए जा रहा था।

पता नहीं उन सूअर के बाल वाली थानेदार की चुंधी आंखों में शरम न जाने कहां से आ गई या फिर चाभी दराज में रखकर वह आश्वस्त हो चला था, थानेदार उसकी तरफ घूमा और थोड़ी सी नरम आवाज में पूछने लगा, “ क्या तुम्हे इन बाबूजी के हाथ कोई संदेश भेजना है घरपर ? ” यही नहीं, मेरी तरफ देखते हुए हाथ हिलाकर मिलने का इशारा  तक कर दिया उसने।

क्या पूछूँ और कैसे मदद करूं, मुझे पता नहीं था, पर मेरे हाथ अगले पल ही बैग के अन्दर सैवलौन का ट्यूब ढूँढ रहे थे और दवा के साथ ही उसके हाथ पर चार सौ रुपए ऱखकर मैने खुदको उससे यह पूछते हुए पाया,

“ क्यों ठीक हैं ना, या फिर कुछ और भी दे दूँ ! बताओ अगर घर पर किसी से कुछ कहना है तो कह दूंगा मैं…कम-से-कम एक फोन तो कर ही सकता हूं तुम्हारे लिए ?”

“ मेहर हो वाहे गुरुजी की आपपर ! मेरा घर में इंतजार करने वाला कोई नहीं है ज़नाब। हां, इस नंबर पर फोन करके कह दीजिएगा कि संतसिंह औटोवाला आकर औटो जरूर ले जाए और यह रुपये भी उसी को ही दे दीजिएगा—बाकी हिसाब मैं एक दो दिन के बाद खुद ही आकर कर लूंगा!“ उसने एकबार फिर अपनी उसी बेहद सधी और शान्त आवाज़ में ही मुझे जबाव दिया, पर न जाने क्यों मेरा गला खुद-ब-खुद भर आया था और कोट की जेब के अन्दर बन्द मेरी मुठ्ठियां भिंचने लगीं। अब मेरा  मन भी उस भ्रष्ट थानेदार पर दो-चार लात-घूंसे चलाने को कर रहा था, पर ऐसा कुछ भी नहीं किया मैने…खुद को संयत करते हुए उससे विदा ले ली  और नम्बर कसकर मुठ्ठी में पकड़े  कायरों सा तुरंत ही बाहर भी  निकल आया।

“अपराधी पकड़े जाएं या छूटें, पर तुम हिम्मत मत हारना ! कम-से-कम तुम्हारी सुदर्शन-चक्र-सी यह उर्जा अपराधियों के मुखौटे तो उघाड़ ही रही है…मान-हनन तो कर ही रही है पापियों का…कुछ और नहीं तो जनता को सचेत तो कर ही रही है। तुम्हारी जैसी अन्याय और अभद्रता के खिलाफ लड़ने की आंच और हिम्मत तो मुझमें है ही नहीं शायद….तभी तो पलटकर भी नहीं देखा मैने, यूं अकेला ही छोड़ दिया तुम्हे —या फिर शायद दूसरों के दुःख की निजी सुःख के आगे कभी कोई अहमियत ही नहीं रही मेरी आंखों में ?” जैसा कुछ होठों ही होठों में बुदबुदाता मैं थाने के बाहर खड़ा-खड़ा खुद से ही बातें किए जा रहा था। फोन करने के ठीक बीस मिनट बाद ही संतसेंह आ पहुंचा और मेरे हाथों से चाभी का गुच्छा लेते-लेते उसकी नम आंखें बह चलीं।

“ थके हाथ-पैरों और बूढ़ी आँखों से ठीक से पूरी देखभाल न कर पाएंगे बच्चियों की, शायद यही सोचकर यह औटो किराए पर ली है इन्होंने तो।…पर यह सब इनके बस की बात नहीं, वह भी इस उम्र में!…कितनी बार समझाया है मैने ! आप ही बताओ, हर आदमी तो प्रेसिडेंट बुश नहीं ही बन सकता ना ? “

मेरी तरफ देखे बगैर या मेरी बात सुने बगैर ही अपनी ही धुन में बोले जा रहा था वह।

“ गरमी-सरदी, अंधड़-पानी ही नहीं,  हारी-बीमारी तक की परवाह नहीं रही अब तो इन्हें।.. किस आग में जल रहे हैं और किस लगन की धूनी लगा बैठे हैं करतार भाई,  अच्छी तरह से जानता भी हूँ और समझता भी हूँ मैं, पर यह तपिश कहीं इन्हें ही न राख कर दे…करौलबाग की अच्छी-खासी चलती दुकान, जनकपुर का कारखाना, सभी कुछ तो स्वाहा कर चुके हैं, घरबार सुख-चैन सभी कुछ…। अब बस एक जान ही तो रह गई है वह भी देखो कितने दिन की ! अब तो रोज-रोज बस यह होता रहेगा. हुज़ूर…लौकअप में ही गुजरेगा इनका बुढ़ापा…कितनी बार समझा चुका हूँ,, पर बन्दा न जाने किस मिट्टी का बना है?”

उसकी आवाज अब पूरी तरह से फसफसी और भर्राई हुई थी।

“ और बाबूजी, वह तो अच्छा है कि आगे पीछे कोई नहीं। वैसे यह ज़िद भी तो खुद इनकी अपनी ही है कि इस उम्र में भी , दो वक्त की रोटी  तक खुद ही कमाकर खाएँगे, वरना इन जैसे फरिश्तों के लिए रोटियों की कोई कमी थोड़े ही है…अपना घर फूंककर दूसरों के लिए दिए की तरह उजाला देने वाले आखिर कितने मिलेंगे आपको…सोने तक में खोट हो सकता है, परन्तु अपने करतार भाई में नहीं!”

गला खंखारकर वह अपने को एकबार फिर संयत कर चुका था पर मैं देख रहा था कि अंदर ही अंदर उसकी यादों और आँसुओं में एक होड़ लग चुकी थी।

“पूरा मोहल्ला ही इनके एहसान तले दबा पड़ा है, जनाब। सुख्खी चाची सही ही कहती थीं कि खुद को ही करतारा के रूप में बसा लिया है रब ने  हमारे  मोहल्ले में । किसी का छोटा-बड़ा कैसा भी दुख हो, बन्दा हमेशा ही मदद के लिए सबसे आगे-आगे खड़ा दिखता है। जानते हो बाबूजी, आज का यह बूढ़ा कमजोर-सा करतारा, औटो चलाने वाला करतारा कभी दिल्ली का जानामाना नागरिक करतार सिंह दुग्गल हुआ करता था। इनकी ड्राई फ्रूट्स की सबसे बड़ी और अच्छी दुकान थी यहां करौल बाग में। लावारिश बच्चों को अक्सर ही बैठे-बैठे काजू और किशमिश खिलाता दिखता था। —गरीब और अभागों को अक्सर कपड़े और जूते भी बांटा करता था यह तो। किसी का दुःख तो आजभी रत्तीभर बर्दाश्त नहीं  है इसे—बेटियों का खास करके! ऐसा बांका, समझ और दबदबे वाला इन्सान तो हमारे पूरे मोहल्ले में दूसरा और कोई नहीं था जनाब। वह तो जस्सी बेटी की लाश जबसे नाले के पास मिली, आपा खो चुके हैं करतार भाई…पागल से हो गये हैं। …जाने किसकी नज़र लग गई इनके भरेपूरे और सुखी परिवार को? कहां-कहां नहीं ढूंढा हमने उन अपराधियों को …पुलिस…मंत्री,कायदे-कानून सबके ही दरवाजे खटखटाए…धरती आकाश सब एक कर दिए थे करतार भाई ने, पर क्या हाथ लगा, कुछ भी तो नहीं। पर इस मुहिम में टूटे नहीं ये, हां बेघर और बेकार ज़रूर हो गये। आज भी सोते-जागते हरेक से बेटियों की ठीक से देख-रेख और लालन-पालन करने को ही कहते घूमते दिखते हैं …परिवार के हर सदस्य की सुरक्षा के लिए सचेत रहने को कहते हैं। एक चौकस चपरासी की तरह दिनरात मोहल्ले की गश्त लगाते रहते हैं ये।

दूसरों के बच्चों को छाती से लगाकर अपनी आग ठंडी करने का हुनर भलीभांति आता है करतार भाई को, मज़ाल है जो इनके आगे एक भी आंसू बह जाए किसीका…कभी घर का सामान बेचकर अनाथ लड़कियों की शादी कराते हैं तो कभी, कहीं भी बेमतलब ही भिड़ जाते हैं—बस इनके आगे बच्चियों के साथ कोई ज़रा सी बद्तमीजॉ भर कर दे, या मात्र एक सीटी ही बजाकर तो देख ले! पर अब एक इनके ही यूँ अकेले-अकेले लड़ते भिड़ते रहने से दुनियाभर के ये सारे लफंगे-लुच्चे खतम तो नहीं हो जाएँगे ज़नाब…मिटना तो दूर की बात क्या सुधरेंगे भी ये?”

संतसिंह ने एक गहरी सांस ली और पल भर के लिए बोलते-बोलते रुक गया, मानो सिर्फ उन बहते आंसुओं को ही नहीं, खुद अपने ही खून की घूंट भी पीने की कोशिश कर रहा हो। पर अभी उसकी बात खतम नहीं हो पाई थी…अन्दर ही अन्दर बहुत कुछ ऐसा था, जो निरंतर ही मथे जा रहा था उसे…कुछ ऐसा जो उसने अभी तक बताया ही नहीं था मुझे।

” बन्दा करे भी तो क्या करे साहब, सदमा ही कुछ ऐसा है…एक ही तो बेटी थी इनकी… वह भी बुढ़ापे की औलाद…कोई भी तो अरमान पूरे नही कर पाए अपने ! शादी के पूरे सोलह साल बाद हुई थी बेटी और मां भी तो जापे में ही चल बसी थी। बीस साल से बिना मां की बेटी के मां-बाप दोनों खुद ही तो रहे। दूसरी शादी तक नही की। कहते थे कि दूसरी आएगी तो बेटी को दुःख देगी। आखिर खुद भी तो सौतेली ही मां के ही हाथों में पले-बढ़े थे ! अपने सारे दुःख तो हंस-हंसकर सह लेते, पर बेटी का  दुख  कैसे गंवारा कर पाते… और देखो कैसी फूटी किस्मत लेकर पैदा हुई हमारी जस्सी बेटी कि मरते वक्त दरिंदों के हाथ चिथड़े-चिथड़े होकर ही लाश बूढ़े बाप के हाथ लगी…मरने के पहले एक, दो नहीं, पता नहीं कितने दरिंदों का शिकार हुई थी बेचारी कि लुटे तनपर इज्जत ढकने को एक चिथड़ा तक नहीं था —दर्द से फटी आंखों तक को तो पलकों का सहरा नहीं मिल पाया बाबूजी?”

याद आते ही वह लम्बा चौड़ा जवान सन्तसिंह दुःख में दोहरा होता चला गया और ऱिक्शे का सहारा लेते-लेते फफक-फफककर रो पड़ा। किं-कर्तव्य-विमूढ़ मैने तसल्ली देनी चाही, पर कोई फायदा नहीं था। अभी भी अपनी उसी डरावनी यादों की दुनिया में ही भटक रहा था वह. तो..लगता था अभी बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए थे  उस अभागी और नृशंस हत्या को और जख्म अभी तक ताजे ही थे।

” न करे भगवान, पर पापी इस दुनिया में जाने कितनी मासूम बच्चियां इन हालातों से गुजरती होंगी ! बोलो बाबूजी पर सबके बाप तो ऐसे दुख में पागल नहीं हो जाते…कनून हाथ में तो नहीं ले लेते?”

जैसे वह रुक-रुककर और धीरे-धीरे बोल रहा था, मुझे नहीं लग रहा था कि उसे पूरी तरह से विश्वाश दिला पाऊंगा मैं,  शायद यह जस्सी का ही दर्द था, जो उसे भी कहीं गहरे ले डूबा था।

” दुनिया में जीना है तो आम आदमियों की तरह इसके सारे कयदे-कनून तो मानने ही पड़ते हैं, साहब ! अच्छी लगे या बुरी, पर यह दुनिया कब हमारे हिसाब से चलती है, हमें ही इसके हिसाब से चलना पड़ता है…अच्छा बुरा सब कुछ ढोते-सहते। हाल ही में हुए उस निठारी कांड के बारे में तो आपने सुना ही होगा… कम-से-कम खबर तो लगी ही होगी आपको भी, …ज्यादा देर की तो खबर नहीं, पर क्या कर पाया कोई…चारो तरफ बस एक  दहशत सी ही तो फैलकर रह गई थी और एकबार फिर हमसब अपने अपने घरों में चूड़ियां पहनकर बैठे रहे। अब तो  कोई बच्चों को घर के दरवाजे तक खेलने नहीं जाने देता। ना ही सौदे-भाजी के लिए ही भेजता है। शाम होते ही मोहल्ले की सारी चहल-पहल गायब हो जाती है। उल्लू बोलने लग जाते हैं। बच्चों की किलकारियां तक गुम हो चुकी हैं। अब  तो शायद ही कोई आदमी अपनी परछांई तक पर भरोसा कर पाए कभी !”

इसके पहले कि मैं उसे कुछ समझाऊं, वह खुद ही एक निष्कर्ष पर पहुंच चुका था। सवाल पूछने की अब उसकी बारी थी।

” क्या आप वाकई में ऐसा सोचते हो कि अब फिर दुबारा कभी ऐसा नहीं होगा…सारे अपराधी पकड़ में ही आ जाएंगे…सुधर जाएंगे?

क्या इतना भरोसा है आपको अपने समाज पर…इसकी कानून व्यवस्था पर, पुलिस और सरकार पर…खुद अपने आप पर? कुछ नही बदलेगा, दुनिया है जनाब,  जैसे चलती आई है, वैसे ही चलती रहेगी। करतारा जेल जाते हैं और यूं ही ले देकर छूट जाते हैं सब चोर-उचक्के । कुछ नहीं होता किसी का…किसी का ताऊ पुलिस कमिश्नर निकल आता है तो किसी का मामा मुख्य मंत्री। एक रावण के मरते ही दूसरा रावण पैदा हो जाता है …सच कहूं तो सबकी मिली भगत जो है, पुलिस नेता चोर-उचक्के सबकी शकल एक सी ही नजर आती है मुझे तो। किससे न्याय मांगें और किससे फरियाद करें ! दो चार पुतले जलेंगे , लाठी चार्ज होगा फिर सब शान्त…फाइल तक गायब। लोग भूल जाते हैं। पहले लोगों की आंखों में थोड़ी बहुत शरम तो थी , पर अब तो कनून और उसके रखवाले भी अच्छा-बुरा सब हजम कर लेते हैं…कुछ भी खा पीकर  डकारते तक नहीं ये लोग। ना ही इनका हाजमा ही खराब होता है। पता नहीं, कैसी आग लग गई है देश को …अपने इस समाज को….न्याय और कनून को ? आप ही बताओ बाबूजी, किसके पास इतना वक्त है, जो काम-धंधा, घर परिवार छोड़कर सड़कों पर उतर आए, कनून हाथ में ले ले…हर आदमी तो करतारा नहीं ही बन सकता ना ?”

मैं नहीं जानता कि संतसिंह मुझसे क्या तसल्ली या जबाव चाहता था, या फिर मैं उसे पल भर में ही कैसे समझा पाऊं कि अपने हित में कानून तोड़ना भले ही अपराध हो, जनहित में ऐसा करना क्रान्ति ही कहलाएगा। या फिर कब और किस मजबूरी के तहत्  दरिया से भी नरम दिल करतार सिंह दुग्गल जैसे इन्सान करतारा बन जाया करते हैं ? यह तलवार की धार-सी तेजी और कड़क …यह तड़प यों ही तो नहीं जागती मन में ? मानाकि हर वाद एक नशा होता है, भले ही वह आदर्शवाद या सुधारवाद ही क्यों न हो— पर जरूरत पड़ने पर जगधात्री मां भी तो चंडी बनी ही थीं…राम ने भी तो धनुष-बाण उठाए ही थे…एक आराम-तलब स्वार्थी जिन्दगी ही सब जीते रहे , तो सुच्चा सन्त कौन कहलाएगा? किसी को तो कृपाण और कटार उठानी ही पड़ती है….सफाई करनी हो तो, कोई तो मेहतर बनेगा ही !

पता नहीं मेरी बात उसकी समझ में आ रही थी या नहीं, या फिर पहले से ही वह यह सब सोच और समझ चुका था पर जिस तपिश में वह पिघल रहा था, उसकी लपटती आंच अब मुझे भी झुलसाने  लगी थी। मैने देखा सन्तसिंह अब बारबार कलाई पर बंधी घड़ी देख रहा था और घर वापस जाना चाहता था। बन्द हो आई अपनी गड्डी एकबार फिरसे उसने स्टार्ट कर ली थी।

” कहो तो आपको भी घर तक छोड़ दूं बाबूजी…अब आधी रात गए दूसरी गड्डी तो यहां पर मुश्किल से ही मिल पाएगी ?”

” हां, हां, क्यों नहीं !”, कहकर एकबार फिर मैं उसी औटो में बैठ चुका था, जिसमें बैठकर सुबह-सुबह दिल्ली घूमने के इरादे से घर से निकला था। हाँ,  चालक बदल चुका था….वक्त बदल चुका था और  मेरा वह सैलानी मन भी तो बदल चुका था। सुरीले गीतों की जगह अब फड़फड़ करते धूलभरे  पर्दे थे और पर्दों से आती बेहद गर्म हवा  थी, जो कि अभी भी थप्पड़ की तरह ही लग रही थी और दिमाग की एक-एक कड़कती नस को चीरे जा रही थी। एकबार फिर वही प्रगति मैदान, जामा मस्जिद.,  कुतुब मीनार औ र लालकिला दिखे…तस्बीर से आंखों के आगे से दौड़ते-भागते , पर बिल्कुल ही बेजान और आकर्षण-हीन। देखते-देखते पूरी दिल्ली को भी, मेरी थकी आँखों-सा ही सियाह अंधेरे ने ढक लिया  था और चारो तरफ एक रहस्यमय और निराश सन्नाटा पसरने लगा था।  पर मेरी बन्द पलकों के पीछे तो अभी भी घटनाओं का कभी न खतम होने वाला एक अद्भुत कालचक्र चल रहा  था।

परत-दर-परत दिनभर की घटनाओं के जाल से उभरकर जो तस्बीरें आँखों के आगे आ जा रही थीं, उनसे एक बात तो बिल्कुल ही स्पष्ट और साफ हुई जा रही थी, ‘ इतनी लगन और हिम्मत कितनों के पास होती है,’ माना कि यह एक बेहद  ही व्यक्तिगत और अलग मुद्दा है और बहुत ही  धैर्य व शान्ति के साथ ही सोचने -समझने की बात है , पर इतना तो तय है कि वक्त बदले या जमाना… आज भी , हज़ार खामियों के बाद भी, आग में तपते सोने -से करतार सिंह जैसे इन्सान इस धरती पर हैं, जो ना तो हार मानते हैं और ना ही  तकलीफों से टूटते-बिखरते  हैं.।…  नफे-नुकसान की सोचे बगैर ही ये तो बस वही करते आए हैं जो इन्हें सही लगता है, या फिर करना चाहिए, क्योंकि दिन-रात लौकअप में गुजारना…जीवन स्वाहा करना  तो इनके लिए आसान होता  है पर  एक और बहन या बेटी को लुटते  और मिटते  देख पाना  नहीं।…

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