लेखनी/Lekhni

 

लेखनी/Lekhni- नवंबर-दिसंबर 17 परदेश में देश

लहरों ने बहाया, किनारों ने बुलाया
खिलते रहे नए देश में नए वेश में
बिखर-बिखर के भी जुड़ते संवरते
अजनबी माटी में नई खुशबूएं भरते…
शैल अग्रवाल

 

लेखनी/ Lekhni- सितंबर-अक्तूबर 17 एक भाषा एक देश

हवा और पानी पर
कोई रूख तो करे
तभी घर से निकलेगें लोग
तब तक हम चुप क्यों रहे
हम अपनी प्रतिबद्धता के कारण लड़ेगे।

–अग्निवेद

 

लेखनी/Lekhni- जुलाई- अगस्त 17 ये किताबें

“प्रतिमा में सजीवता-सी
बस गयी सुछवि आँखों में
थी एक लकीर हृदय में
जो अलग रही लाखों में। ”
-जयशंकर प्रसाद

 

लेखनी/Lekhni-मई-जून 17 प्रेम और युद्ध में

” अपहरण आक्रमण अत्याचार
या फिर फूलों के शस्त्र और
बस प्यार ही प्यार
किसने कहा कि सब नेक है
युद्ध और प्यार में
प्यार में संयम और युद्ध में नियम
वरना आखेटी मन के हैं शिकार
दोनों ही युद्ध या प्यार…”
– शैल अग्रवाल

 

लेखनी/Lekhni- मार्च-अप्रैल 17 ख्वाबों बीच हकीकत

ख्वावों की झोली बीच हकीकत
जैसे तारों बीच चंद्रमा,आधा अधूरा
पूरा होने को बेचैन यूँ चमके-दमके
पूरा होते ही पर घट फिर से खाली
हुलस-हुलस बीने जादूगर ने
जाने कितने सुलझे-उलझे सपने
शैल अग्रवाल

 

लेखनी/Lekhni- जनवरी-फरवरी 17 नई शुरुवात

दुनिया देश समाज हम
सब कुछ तो वही का वही
फिर भी चाह सदा ये रही
नया कुछ करेंगे
बदलेंगे जर्जर और अनचाहा
नहीं निभानी कोरी रस्म बस
अब वह अभिनंदन की…
-शैल अग्रवाल

 

लेखनी/Lekhni-नवंबर-दिसंबर 16 ये सरहदें

विश्वबन्धु हैं हम
आगे बढ़ेंगे पर
सबको साथ लेकर
रोड़े मत डालो, कांटे न बिछाओ
ये कंटीली नफरत की सरहदें
खड़ी न रह सकेंगी
प्यार की आंधी में अब
विश्वबन्धु हैं हम…
-शैल अग्रवाल

 

लेखनी/Lekhni-सितंबर-अक्तूबर 16 केन्द्र से परिधि तक- नारी अस्मिता विशेषांक

तुम्‍हें लिख सकता तो लिखता….तुम्‍हें कह सकता तो कहता……
तुम्‍हें रच सकता तो रचता……बस सोचता रहा…
इस सोच में भी पूरे कहां समाए तुम…………
-माया मृग

 

लेखनी/Lekhni-जुलाई-अगस्त 16 महाभारतः अंधे युग का गूंगा सच

” झूठी थी सारी अनिवार्यता भविष्य की।
केवल कर्म सत्य है
मानव जो करता है, इसी समय
उसी में निहित है भविष्य
युग-युग तक का!”

– धर्मवीर भारती

 

लेखनी/Lekhni-मई-जून-16 समंदर

आधा चाँद मांगता है पूरी रात
पूरी रात के लिए मचलता है
आधा समुद्र
आधे चाँद को मिलती है पूरी रात…
आधी पृथ्वी की पूरी रात
आधी पृथ्वी के हिस्से में आता है
पूरा सूर्य
-नरेश सक्सेना

लेखनी/Lekhni-मार्च-अप्रैल 16 अमिट

” सूरज एक नाव है, जो पच्छिम की लहर से डूब गई…सूरज रूई का एक गोला है, जिसे गहरी आंधी ने धुन दिया…सूरज एक हरा जंगल है, जो सूख कर सरकंडा बन गया है…सूरज दिल की आग से खाली है, इसने मेरे दिल की आग से कोयला मांगकर अपनी आग सुलगाई थी…सूरज सूइयों की एक पोटली है, जो मेरे पोरों के आर-पार हो गई है…सूरज एक खौलती हुई देग़ है, जिसमें आज मेरे इश्क़ को बैठना है… सूरज एक पेड़ है, जिस पर से किसी ने किरनें तोड़ ली हैं…सूरज एक घोड़ा है, जिसके ऊपर से उजाले की काठी उतर गई है…सूरज एक दीया है, जिसे अंबर के आले में रखकर जलाया जा सकता है…सूरज मेरे दिल की तरह है, जो घबरा कर अंधेरे की सीढ़ियां उतर जाता है…सूरज एक बुझा हुआ कोयला है, जिससे अंबर लकीरें खींचकर किसी की राह देखता है…सूरज एक उम्मीद है, जिसके बिना रातें काली चीलों की तरह आसमान में उड़ रही हैं…”
-अमृता प्रीतम

लेखनी/Lekhni-जनवरी-फरवरी 16 किसकी धरती

” चाँद पर घर और मंगल पर पानी
हवा में की हमने हजार बातें
और तरसती रही यह धरती
कही गोली कहीं गंडासे खाती ”
शैल अग्रवाल

लेखनी/Lekhni-लेखनी-अक्तूबर-नवंबर 15 लेखनी सानिध्य 2015 विशेष

आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य,
मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य।
गोपालदास नीरज

लेखनी/Lekhni-अगस्त-सितंबर 15 बिछुड़ते समय

A book of verse, underneath the bough,
A jug of wine, a loaf of bread – and thou
Beside me singing in the wilderness –
Ah, wilderness were paradise now!
~ Omar Khayyam

लेखनी/Lekhni-जून-जुलाई 15 ये नावें

” लहर लहर डूबे-उतराए, नित नित सबको पार लगाए
नाविक तेरी यह नैया नयनों में नित स्वप्न जगाए”
शैल अग्रवाल

लेखनी/Lekhni-अप्रैल-मई 15 खिलती महकती ऋतु की आस में

एक खंडहर के हृदय सी एक जंगली फूल सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही गाती तो है।”
-दुष्यंत कुमार

लेखनी/Lekhni-फरवरी मार्च 15 होली है!!

रोलीमय संध्या ऊषा की चोली है।
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।
हरिवंश राय बच्चन

लेखनी/Lekhni-अक्तूबर-नवंबर 14 धर्म-अधर्म

” एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द जुबाँ,
कल को शायद मेरी आवाज़ वहाँ तक पहुँचे । ”
गोपाल दास नीरज

लेखनी/Lekhni-अगस्त-सितंबर 14 लौटना

“लौटेगा तुम तक ही बारबार इस पार कभी उस पार कभी
लहरों पर हो-हो सवार तूफानों से जूझ कभी
पानी का ये बुदबुदा प्यासा तो कमजोर नहीं…”
-शैल अग्रवाल
http://www.lekhni.net/old-blog/index2.html

लेखनी/Lekhni-मई-जून 14 सृजन

   ” तुम सत्य रहे चिर सुन्दर!
     मेरे इस मिथ्या जग के 
     थे केवल जीवन संगी
   कल्याण कलित इस मग के। 
जयशंकर प्रसाद

लेखनी/Lekhni- अप्रैल 14 भिखारी

” रोटी-सा चांद
  सपनों का आकाश
   भूखों का नहीं। ”

   -शैल अग्रवाल            
                                                                                      

लेखनी/Lekhni-मार्च 14 चीन्ही-अनचीन्ही

” इस पाप-पुण्य की दुनिया में,
   कुछ उजले कलकल सोते देखे।
   मन के वीराने वन प्रान्तर में,
   खिलते कुछ हरियल पौधे देखे।
   कल मैंने मन के कुछ कोने देखे।”
        अनूप शुक्ल

लेखनी/Lekhni फरवरी 14 अमृत कलश या विषघट

“सरल से भी गूढ़, गूढ़तर
  तत्त्व निकलेंगे
  अमित विषमय
  जब मथेगा प्रेम सागर
  हृदय ।”
शमशेर बहादुर सिंह

लेखनी/Lekhni जनवरी 14 उम्मीद की किरण

” लाख भंवरें हों नदी में
   पर कहीं पर कूल भी है।
   शाख पर इक फूल भी है॥ ”
    -कुँवर बेचैन

लेखनी/Lekhni-दिसंबर 13 नहीं, अंत नहीं

  ” भूखी चिड़िया ने पलटे फिर फिरके सूखे पत्ते
     और थकी गिलहरी सो गई डाल पे भूखी
      सर्द हवाओं ने कहा तब पलट पलट
      नहीं, नहीं यह सृष्टि का अंत
       शिशिर के बाद ही तो, देखो
        आता है फिर से बसंत… ”
        शैल अग्रवाल  
        
लेखनी/Lekhni-नवंबर 13 रौशन अंधेरे

” जान गए, बस कहा न जाए ,
   रात ,सुबह को क्या समझाए |  
मन का दीप जला कर रखना ,
  फिर अँधियारा कब टिक पाए।”
       ज्योत्सना शर्मा                                  

लेखनी/Lekhni-अक्तूबर 13 भाषान्तर समन्वय विशेषांक

   ” छलना थी, तब भी मेरा 
      उसमें विश्वास घना था 
      उस माया की छाया में 
      कुछ सच्चा स्वयं बनाथा।” 
  जयशंकर प्रसाद 
     
लेखनी/Lekhni-सितंबर 13 प्रगति और परंपरा

” सपना झरना नींद का
   जागी आंखें प्यास
    पाना, खोना, खोजना
    सांसों का इतिहास। ”
निदा फाजली                                                                

लेखनी/Lekhni-अगस्त 13 आपद्काल

“पत्थर के शहर,पत्थर के खुदा, पत्थर के ही इंसा पाए हैं 
  तुम शहरे मुहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आए हैं !’
सुनीता जैन

                                           
लेखनी/Lekhni-जुलाई 13 तलाश

      इस विकल वेदना को ले 
       किसने सुख को ललकारा 
       वह एक अबोध अकिंचन 
        बेसुध चैतन्य हमारा। ”
             जय़शंकर प्रसाद                                     
                                     

लेखनी/Lekhni-जून 13 रचना धर्मिता

” मै अपलक इन नयनों से
  निरखा करता उस छवि को 
   प्रतिभा डाली भर लाता
   कर देता दान सुकवि को। ”
जयशंकर प्रसाद

लेखनी/Lekhni-मई 13 सूरज

 किरणों का दिल चीर देख सबमें दिनमणि की लाली रे
चाहे जितने फूल खिलें, पर एक सभी का माली रे..
‘ दिनकर’

लेखनी/Lekhni-अप्रैल 13 किसके हैं ये शिलालेख

 ” शब्द बनकर बह चले मेरे सब चन्दा औ तारे
    बहुत जतन से जो चूनर पर थे टांके
   पक्की गांठ लगाकर टांका वह जोड़ा था
   सूंई तो बहुत नुकीली थी, धागा ही कुछ छोटा था ”
शैल अग्रवाल

लेखनी/Lekhni-मार्च 13 फागुन के रंग

 ” पलट पलट मौसम तके, भौचक निरखे धूप,
    रह रहकर चितवे हवा, ये फागुन के रूप।”
         विनोद शुक्ल

लेखनी/Lekhni-जनवरी-फरवरी 13 विद्रोह के स्वर

     ‘हवा में कोई सिसकता है
       सुर्ख़ पत्ते ओस में
       चुपचाप
       ढुलते चले जाते
       आख़िर किसलिए
.     ..प्राण में केसर बरसता है
      आज के दिनमान की परछाइयों में
       किरण का मासूम वैभव
      वा में कोई सिसकता है’ —
शमशेर

लेखनी/Lekhni-दिसंबर 12 रौशनी की तलाश में

  ” कटेंगे तभी यह अंधरे घिरे अब,
    स्वयं धर मनुज दीप का रूप आये |
    जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना 
    अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये | ”
गोपालदास नीरज

लेखनी/Lekhni-अक्तूबर 12 मिथक और परंपराएँ

दरिया है बहता पानी, हर मौज है रवानी
  रुकती नहीं कहानी
  जितना लिखा गया है उतना ही वाकया हो
  यह बात तो ग़लत है”
निदा फाज़ली

लेखनी/Lekhni-सितंबर 12 समय

“अच्छा-बुरा सब रेत पर लिखा
  रेतघड़ी में  कैद समय
  झर-झरके होगा संपूर्ण
  लहर-लहर फिरा फिर-फिरके ”

लेखनी/Lekhni-अगस्त 12 आज़ाद भारतः कितना स्वाधीन, कितना सुखी ?

   ‘ तन जलता है¸ मन जलता है
      जलता जन–घन–जीवन
      एक नहीं जलते सदियों से
      जकड़े गर्हित बन्धन।
     दूर बैठकर ताप रहा है¸ आग लगाने वाला
     मेरा देश जल रहा¸ कोई नहीं बुझाने वाला।’
शिवमंगल सिंह ‘सुमन’       

लेखनी/Lekhni-जुलाई 12 आधे अधूरे

         “रोया फिर फिर मुड़ मुड़के
          धरती का वो चटका कोना
           बूंद बूंद में भीगी धरती
           एक बूंद ना मेरे पास…”
शैल अग्रवाल

लेखनी/Lekhni-जून 12 यात्रा विशेषांक

“जा रहा हूँ चला, जा रहा हूँ बढ़ा,
पर नहीं ज्ञात है किस जगह हो?
 किस जगह पग रुके, किस जगह मगर छुटे
 किस जगह शीत हो, किस जगह घाम हो,
मुस्कराए सदा पर धरा इसलिए
 जिस जगह मैं झरूँ उस जगह तुम खिलो।”
गोपालदास नीरज

लेखनी/Lekhni मई 12 धूप

सूप-सूप भर
धूप-कनक
यह सूने नभ में गयी बिखर:
चौंधाया
बीन रहा है
उसे अकेला एक कुरर।
अज्ञेय

लेखनी/Lekhni-अप्रैल 12 हास्य-व्यंग्य विशेषांक

“दर्द में से फूटता है                                         
  हँसी का निर्झर
अनुभूति जन्म लेती है
चोट के अंतर में
रात काली न हो
  तो व्यर्थ है- तारों का सौंदर्य।“
विष्णु प्रभाकर

लेखनी/Lekhni-फरवरी 12 राग विराग

” मैं बल खाता जाता था
  मोहित बेसुध बलिहारी
 अन्तर के तार खिंचे थे
 तीखी थी तान हमारी ।”
जयशंकर प्रसाद

 
लेखनी/Lekhni-जनवरी 12 नववर्ष विशेषांक

 ”   गीत नवल,
     प्रीति नवल,
    जीवन की रीति नवल,
    जीवन की नीति नवल,
    जीवन की जीत नवल ! ”                                                                  
हरिवंशरॉय बच्चन

लेखनी/Lekhni-दिसंबर 11 धर्म की मानवता या मानवता का धर्म

” मंदिर मस्जिद की दुनिया में                                                                      
   मुझको  पहचानते कहाँ हैं लोग ”  
       निदा फ़ाज़ली

लेखनी/Lekhni-नवंबर 11 अद्भुत रिश्ते-माँ

” प्रतिमा में सजीवता-सी
बस गयी सुछवि आँखों में
एक लकीर हृदय में
जो अलग रही लाखों में। ”
जयशंकर प्रसाद

लेखनी/Lekhni-अक्तूबर 11 नारी शक्ति

”    कल मैंने धरती माँगी थी
      मुझे समाधि मिली थी,
      आज मैं आकाश माँगती हूँ
       मुझे पंख दोगे ?”
ऋषभ देव शर्मा

लेखनी/Lekhni-सितंबर 11 प्रवास से

” एक चेहरा साथ-साथ रहा जो मिला नहीं,
  किसको तलाश करते रहे कुछ पता नहीं |
  शिद्दत की धूप तेज़ हवाओं के बावजूद,
  मैं शाख़ से गिरा हूँ नज़र से गिरा नहीं।”
बशीर बद्र

लेखनी/Lekhni-अगस्त 11 सपनों का भारत

   तुमुल कोलाहल कलह में, मैं हृदय की बात रे मन !
   विफल होकर नित्य चंचल 
   खोजती जब नींद के पल
  चेतना थक सी रही तब, मैं मलय की बात रे मन!
जयशंकर प्रसाद

               
लेखनी/Lekhni-जुलाई 11 मेरा शहर

छलना थी, तब भी मेरा
उसमें विश्वास घना था 
उस माया की छाया में 
कुछ सच्चा स्वयं बना था। ”     
जयशंकर प्रसाद             

लेखनी/Lekhni-जून 11 रिश्ते

“ हम अगर तोड़ दें उस पार के जंगल का तिलिस्म
घर से फिर भाग के क्यूँ लोग उधर जाएँगे ”
लक्ष्मीशंकर बाजपेयी

लेखनी/Lekhni-मई 11 स्वाधीन कलम

कोई जनता को क्या लूटे
 कोई दुखियों पर क्या टूटे
 कोई भी लाख प्रचार करे
 सच्चा बनकर झूठे-झूठे
 अनमोल सत्य का रत्‍नहार,
लाती चोरों से छीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम ”
गोपाल सिंह नेपाली

लेखनी/Lekhni-मार्च-अप्रैल 11 बासंती सवाल

मन टेसू टेसू हुआ तन ये हुआ गुलाल
अंखियों, अंखियों बो गया, फागुन कई सवाल।”
दिनेश शुक्ल

लेखनी/Lekhni-जनवरी-फरवरी 11 आगत का स्वागत

   ” तिमिर चीरता थके न स्वर्णिम 
उद्घोष ज्योति का, उद्घोष सत्य का
विदा विगत से,आगत का स्वागत्
जयति जयति ज्योतिर्मय नव प्रभात। ”

लेखनी/Lekhni- दिसंबर 10 मृत्यु अंत या एक और शुरुआत

”  डूबते सूरज की आंखों में था उगते सूरज  का सपना    
अंधियारा तोडेगा अब  आकर  मेरा  वह  अपना।  ”  
शैल अग्रवाल

लेखनी/Lekhni-नवंबर 10 संसार एक खुला बाजारः समस्या .ा समाधान?

“यह  दीप, अकेला, स्नेह भरा,
है गर्व भरा मदमाता, पर
इस को भी पंक्ति को दे दो। ”
अज्ञेय    

लेखनी/Lekhni-अक्तूबर 10 मानिनी

” कह न ठंडी सांस में अब भूल वह कहानी
आग हो उर में तभी दृग में सजेगा पानी
हार भी तेरी बनेगी माननी जय की पताका
राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी।”
महादेवी वर्मा             

लेखनी/Lekhni-सितंबर 10 शिक्षा विशेषांक

” रोज दिन के बस्ते में मां एक नया सूरज रखती है, रोज ही रात हो जाती है ।                                                             
न  बेटा  ही उठकर पढ़ता   है, न मां  आदत बदल   पाती  है ।। ”
शैल अग्रवाल

लेखनी/Lekhni-अगस्त 10 मेरा भारत

भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है
 एक देश का नहीं, शील यह भूमंडल भर का है
 जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है
 देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्कर है
निखिल विश्व को जन्मभूमि-वंदन को नमन करूँ मैं !”
रामधारी सिंह ‘दिनकर’

लेखनी/Lekhni-जुलाई 10 सावन विशेषांक

अलि घिर आए घन पावस के !
द्रुम समीर कंपित थर-थर-थर
 झरती धाराएँ झर-झर-झर
 जगती के प्राणों में स्मर शर
 बेध गए कस के …   
सूर्यकांत त्रिपाठी  ‘निराला  ‘                             

लेखनी/Lekhni-जून 10 अवसाद

” तुम कौन! हृदय की परवशता? सारी स्वतंत्रता छीन रही,
  स्वच्छंद सुमन जो खिले रहे जीवन-वन से हो बीन रही!”
जयशंकर प्रसाद

लेखनी/Lekhni-मई 10 पर्यावरण प्रदूषण

कटे हुए हर पेड़ से, चीखा एक कबीर
मूरख, कल को आज की, आरी से मत चीर”
नरेश सांडिल्य

लेखनी/Lekhni-अप्रैल 10 तारे दूर के -वंचना विशेषांक

मेरी दास्ताँ का उरूज था तेरी नर्म पलकों की छाँव में  
मेरे साथ था तुझे जागना तेरी आँख कैसे झपक गई 
बशीर बद्र                                          

                                                                          
लेखनी/Lekhni-मार्च 10 फागुन विशेषांक

रचा महोत्सव पीत का, फागुन खेले फाग,
 साँसों में कस्तूरियाँ, बोये मीठी आग।”
दिनेश शुक्ल

लेखनी/Lekhni-फरवरी 10 खोया स्वर्ग-एक तलाश

  स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा,
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था,
  ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को
 एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है ?
 है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है ? 
हरिवंश राय बच्चन

लेखनी/Lekhni-जनवरी 10 बाल विशेषांक

” नव चेतना के नए पंख ले,
  नव विहान हो, उन्मुक्त उड़ान हो! 
  खग, तुम थकना ना जीवन भर!!”
         शैल अग्रवाल

लेखनी/Lekhni-दिसंबर 9 अनुवाद विशेषांक

“हल्की हल्की बारिशें होती रहें
  हम भी फूलों की तरह भीगा करें

  आँख मूँदे उस गुलाबी धूप में
   देर तक बैठे उसे सोचा करें

   दिल मुहब्बत दीन दुनिया शायरी
   हर दरीचे से तुझे देखा करें  ”
कुंवर बेचैन

लेखनी/Lekhni-नवंबर 9 धुंध के पार

सन्नाटा वसुधा पर छाया,
 नभ में हमनें कान लगाया,
 फ़िर भी अगणित कंठो का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं
  कहते हैं तारे गाते हैं ”
हरिवंशराय बच्चन

लेखनी/Lekhni-अक्तूबर 9 पर्व महोत्सव

”  जाल चांदी का लपेटो,                                                                                         
खून का सौदा समेटो,
आदमी हर कैद से बाहर निकलकर ही रहेगा।                     
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर  ही रहेगा।”
गोपाल दास नीरज                     

लेखनी/Lekhni-सितंबर 9 हिमालय विशेषांक

       ” मेरे नगपति! मेरे विशाल!
         साकार, दिव्य, गौरव विराट्,
         पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल
         मेरी जननी के हिम-किरीट 
         मेरे भारत के दिव्य भाल।”
रामधारी सिंह ‘दिनकर’

लेखनी/Lekhni-अगस्त 9 देश हमारा-कल,आज और कल

 ” हिमगिरि-सा उन्नत तव मस्तक,
    तेरे चरण चूमता सागर,
    श्वासों में हैं वेद-ऋचाएँ
    वाणी में है गीता का स्वर
ऐ संसृति की आदि तपस्विनि, तेजस्विनि अभिराम।
   मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।”
भगवती चरण वर्मा        

लेखनी/Lekhni-जुलाई 9 समन्वय विशेषांक

   “लहर पर लहर पर लहर पर लहर
सागर, तुम कुछ कहना नहीं चाहते
तुम होना चाहते हो… ”
अज्ञेय

लेखनी/Lekhni-जून 9 फुरसत का एक दिन

” तुम्हें खोजता था मैं,
    पा नहीं सका,
    हवा बन बहीं तुम, जब
    मैं थका, रुका ।”
    सूर्यकांत त्रिपाठी ‘ निराला ‘

लेखनी/Lekhni-मई 9 आँगन की चिड़िया

“घुमती हूं अपने पिंजर में
 बिना खटखटाए दरवाजा
 उगती हूँ अपनी आँखों में
 आप ही चुपचाप
 कहती हूँ आप-आप से
 रब्बा! मैंने देखी है उसकी
 आँखों में अपने लिए नमी।”
जया जादवानी

लेखनी/Lekhni-अप्रैल 9- समान अधिकारः एक अटका हुआ सवाल

 ”  आँसू से भींगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा –
     तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधिपत्र लिखना होगा।”
-जयशंकर प्रसाद

लेखनी/Lekhni-मार्च 9- हास्य-व्यंग्य विशेषांक

 पिचकारी यह रंग बिरंगी
 लाल गुलाबी प्यार भरी
 पीली एक उमंगों वाली
 और हरी हरियाली-सी
 महकी-महकी यादोंभीगी
 खुशियां बन तुमतक जाए!”
 शैल अग्रवाल

Lekhni-फरवरी 9 वक्त की शाख पे खिलते पल

लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो
ऐसे दरिया का कभी ऱुख नहीं मोड़ा करते
-गुलजार

लेखनी/Lekhni-जनवरी 9 -गांव की ओर

” गए बरस की दहशतगर्दी
  ठिठुरन सी भर गई नसों में,
नया बरस 
कुछ तो गरमाहट लाए ……… ”
           रिषभ देव शर्मा

लेखनी/Lekhni-दिसंबर 8 -अनेकों में एकः इन्द्रधनुषी भारत (लोक संस्कृति विशेषांक)

कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर ।।
संत कबीर

लेखनी/Lekhni-नवंबर 8- शरद विशेषांक

नाँव द्वार आवेगी बाहर,
स्वर्ण जाल में उलझ मनोहर,
बचा कौन जग में लुक छिप कर
बिंधते सब अनजान!
-सुमित्रानन्दन पंत

लेखनी/Lekhni-अक्तूबर 8-भारतीय चेतना के  आदर्श मर्यादा पुरुषोत्तम रामः Legend that shaped our nation’s psyche) 

रामनाम मनिदीप धरि जीह देहरी द्वार। तुलसी भीतर बाहिरहुँ जौं चाहति उजियार।।
राम चरित मानस        `
            

लेखनी/Lekhni-सितंबर 8- रिश्ते

” मानव जीवन बेदी पर, परिणय है विरह मिलन का 
   सुख-दुख दोनों नाचेंगे, है खेल आँख का मन का”  
-जयशंकर प्रसाद

लेखनी/Lekhni-अगस्त 8- स्वदेश

‘तन तो आज स्वतंत्र हमारा, लेकिन मन आज़ाद नहीं है।’    
                     गोपाल दास ‘ नीरज’ 

लेखनी/Lekhni-जुलाई 8 -नदी विशेषांक

 ” जीवन-सरिता की लहर-लहर,
   मिटने को बनती यहाँ प्रिये
   संयोग क्षणिक, फिर क्या जाने
   हम कहाँ और तुम कहाँ प्रिये ।
   पल-भर तो साथ-साथ बह लें,
   कुछ सुन लें, कुछ अपनी कह लें ।”
-भगवती चरण वर्मा

लेखनी/Lekhni-जून 8 य़ुवा विशेषांक

  “उठो
   पांव रक्खो रकाब पर
   जंगल-जंगल, नद्दी-नाले कूद-फांद कर
   धरती रौंदो
   जैसे भादों की रातों में
   बिजली कौंधे
   ऐसे कौंधो…”
   -भवानी प्रसाद मिश्र

       

लेखनी/Lekhni-मई 8-घर की ओर

” ज़मीं भी उसकी,ज़मी की नेमतें उसकी
ये सब उसी का है,घर भी,ये घर के बंदे भी
खुदा से कहिये, कभी वो भी अपने घर आयें!”
-गुलजार

लेखनी/Lekhni-अप्रैल 8-नारी

“सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जायेगा

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जायेगा”
                   बशीर बद्र

लेखनी/Lekhni-मार्च 8 – पहली वर्षगांठ पर

“चमन में बज रही है फूलों की पायल
सुरभि के स्वर पवन को कर रहे चंचल
किरण कलियां गगन से फेंकता कोई
किसी का हिल रहा लहरों भरा आंचल!”
  -राजनरायण बिसारिया 

लेखनी/Lekhni-फरवरी 8 हम तुम

” चाहे गीता बाँचिए, या पढ़िए कुरान/ मेरा तेरा प्यार ही हर पुष्तक का ज्ञान।”
-निदा फाजली-

लेखनी/Lekhni-जनवरी 8 -स्वागत नववर्ष

खग तुम उड़ते रहना जीवन भर
गोपाल दास नीरज

लेखनी/Lekhni-दिसंबर 7- गीत और ग़ज़ल विशेषांक

हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए ।
चराग़ों की तरह आँखें जलें, जब शाम हो जाए ।

                -बशीर बद्र

लेखनी/Lekhni-नवंबर 7 -ज्योति पर्व

A candle looses nothing by lighting another candle.
Annonumous

लेखनी/Lekhni-अक्तूबर 7- ज्योति पुंज बापू

” An eye for eye only ends up making the whole world blind….Culture Of the mind must be subservient to the heart.”
– Mohan Das Karamchand Gandhi. 

लेखनी/Lekhni-सितंबर 7- एकांत / Discovering the beauty of silence

In you the worlds arise
Like waves in the sea.
It is true!
You are awareness itself.
So free yourself
From the fever of the world.

-Ashtavakra Gita 15:7

लेखनी/Lekhni-अगस्त 7- हिन्दी के बढ़ते कदम / Indians rediscovering themselves

कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन, दौरे जहां हमारा
मोहम्मद इकबाल

लेखनी/Lekhni-जुलाई 7

बरखा विशेषांक
अंक 5-वर्ष 1

आज वारि लो झरता झर-झर
भरे हुए मेघों से हैं;
फोड़ गगन आकुल जल-धारा
थमती नहीं कहीं भी है।
-रवीन्द्रनाथ टैगोर

लेखनी/Lekhni-जून 7

तपिश
अंक 4- वर्ष 1
ॅ”धूप किनारे पेड़ खड़े हैं साए के नीचे सड़कें
कितने हैं जो यूं दुख सह औरों को सुख देते।” 
-शैल अग्रवाल
                                                       

लेखनी/Lekhni-मई 7-

सुमन समारोह
अंक 3-वर्ष 1

“आज खिले हैं कल बिखरेंगे
बिखर-बिखरके फिर संवरेंगे
कोमल है तन-मन इनका
पर इरादा अटल और पक्का ”
-शैल अग्रवाल

लेखनी/Lekhni-अप्रैल 7 –

सच की तलाश में/Reflecting upon truth
अंक 2 -वर्ष 1

‘ इतना सुख जो न समाता, अन्तरीक्ष में जल थल मे।
उनकी मुठ्ठी में बन्द था, आस्वासन के छल में।’
-जयशंकर प्रसाद।

लेखनी/Lekhni-मार्च 7 –

एक सपना जो आँखों में किलका
अंक 1-वर्ष 1

प्रथम वर्ष की पांख खुली है,
शाख-शाख-किसलयों तुली है,
एक और माधुरी घुली है,
गीतों-गन्ध-रस वर्णों अनुपम।
– सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

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