दो लघुकथाएँः शैल अग्रवाल/लेखनी-नवंबर-दिसंबर 17

बेकार

‘पापा बहुत बीमार हैं। अंट-शंट बोले जा रहे हैं। मेरा जी घबड़ा रहा हैं। ’
बूढ़ी मां ने दो हफ्ते से पत्नी के संग घूमने गए बेटे के पास फोन लगाकर तुरंत ही बिनती की ।
‘ तो मैं क्या करूँ ? अपने बड़े बेटे को बुला लो, वह भी तो कुछ देखे भाले, क्या उसका फर्ज नहीं कुछ ! ‘
‘ नहीं आ रहा है। कह रहा है-जब कैश, जेवर , घर-दुकान सब उसको सौंप दिए हैं तो वही सेवा करे। या सिर्फ पान-फूल की सेवा ही करने को है वह और हम हाड़-मास खटाने को!’
‘तू ही आजा। तू तो जानता है , बड़ी भी बोलने में कम नहीं। तेरे पापा को कुछ हो गया तो अकेली मैं कैसे संभालूंगी!‘
‘ अड़ौसी-पड़ौसियों से मदद ले लेना। मुझे परेशान मत करो। कह दिया न, नहीं आ सकता अभी।‘
‘ रोज का ड्रामा है अब तो यह इनका । जाने कबतक हमारी ही छाती पर मूंग दलेंगे दोनों।‘
बहू ने भी तुरंत ही हाँ में हाँ मिलाई। और तब बेटे ने तुरंत ही फोन काट दिया।
‘इससे तो न होते ये बेटे। बांझ ही भली थी मैं। ‘
माँ अब हिचकियाँ लेकर रो रही थी।
‘क्यों बेकार में कोस रही है , देखना अगली ही गाड़ी से शाम तक जरूर आ जाएँगे दोनों। यहाँ इस पराए देश में उन्ही के लिए तो बसे थे हम।’
बूढ़े बाप को अभी भी अपने लायक बेटों पर पूरा भरोसा था । आंखें बन्द करके विश्वास करते थे वे दोनों पर।

उधर ओमान के बाजार में बेटा पत्नी को मंहगा हीरों का हार दिला रहा था। माँ-बाप जिएं या मरें, अब कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता था उसे। फिर सूखे छिलकों से क्या रस की उम्मीद करनी! जी भरकर पहले ही निचोड़ लिया था उसने और निचुड़े छिलकों की जगह बाहर कूड़े में ही होती है, वापस घर में नहीं- जानता था वह ।

बेकार

घर और दुकान पर तो पहले से ही कब्जा कर लिया था, अब पिता की अंटी से सारा कैश भी निकलवा लिया। 200 हजार पौंड बूढ़े बाप से यह कहकर ले लिए कि बहुत अच्छी डील है फ्लैट की, सोना उगलेगा। साल भर में ही पैसे दुगने न हो जाएँ, तो कहना। इससे भली और क्या बात हो सकती थी लालची बाप की निगाह में। क्या हुआ जो नाम उसका न होकर छोटे बेटे और बहू का होगा! कुछ भी और आगे मिनट भर भी तो नहीं सोचा बेबकूफ बाप ने।-ठठाकर हंस पड़ा वह।

इसके पहले कि भाई, बहन को भनक तक पड़े, या वह अपना हिस्सा मांगने आ धमकें, वह खुद ही सब कुछ हड़प चुका है और बहुत खुश था अपनी इस चालाकी पर! क्या पता बुढ्ढा कब लुढ़क जाए या फिर सारा कैश उन्हें ही दे जाता। यह काम तो उसे करना ही था। यही नहीं, जाने से पहले चौके में ताला लगाना और गैस बन्द करना भी नहीं भूला है वह।

‘ पीछे से पूरा घर गरम करने की क्या जरूरत ? मौका चाहिए फालतू में पैसा व्यर्थ करने को। कमरे में हीटर और स्टोव तो रख ही दिया है। चाय-खिचड़ी सब उसपर भी बन जाएगी। ‘

विरासत में मिलने वाली उसकी लूट दिन-प्रतिदिन व्यर्थ में ही कम होती जा रही थी।

सिर्फ भाई-बहन ही नहीं, बूढ़े मां-बाप भी अब बेकार थे उसके लिए और आंखों में खटक रहे थे। …

-शैल अग्रवाल