मौरिशस की डायरी-शैल अग्रवाल

उद्घोष

मैं प्रवासी या अप्रवासी नहीं
गिरमिटिया मजदूर भी नहीं
भारतवंशी तो हूँ पर आपका रक्तबीज नहीं
हर बात मानूंगा, हाँ में हाँ मिलाऊँगा
ऐसी अपेक्षा मत करना
मौरिशियन हूँ मैं
और गर्व है मुझे अपने मौरिशियन होने पर
विगत कल, आज और आने वाले कल पर
अपने पूर्वजों पर
जिन्होंने श्रम-पसीने से सींचकर
यह सतरंगी धरती हमें सौंपी
जीने के, कभी हार न मानने के संस्कार दिए…

गर्व हुआ था तुम्हारी यह गर्वीली हुंकार सुनकर
स्वाभिमान देखकर, पर इतना तो बतलाओ, मित्र
पीछे छूटे भारत के लिए, हिन्दी के लिए
प्यार और सम्मान, जुड़ने की चाह
शेष तो आज भी तुम्हारे मन में?

***

एक सवाल

उसने कहा-
डोडो गायब हो चुका
सौ साल पहले धरती से
मोर एक रंगबिरंगा खूबसूरत
पर कमजोर पक्षी तुम्हारा
आया कैसे उबारने डूबते नहीं
मिट चुके डोडो को
कैसा मजाक है यह
पूछ तो लेते कमसेकम
हमसे हमारे बारे में

ताड़ के इन पेड़ों पर नहीं
गन्ने के खेतों में बहा था
हमारा खून-पसीना
जिन्होने हमें रोटी-रोजी दी
जीने की सुख-सुविधाएँ दी
इस धरती को स्वर्ग बनाया
हमारे श्रम को, पसीने के
इन प्रतीकों को पहचानो
मित्र कहते हो तो,
जुड़ना चाहते हो तो,
हमें ठीक से जानो !

उसका हर उच्छवास
शर्मिंदा कर रहा था
सोचने पर मजबूर कर रहा था
क्या बह गए फिर से हम तूफान में
विस्तार और व्यापार के उन्माद में !

***
गलत मत समझना मित्र

संस्कृति की संवाहिका है भाषा
पर संस्कृति का आधार नहीं
भाषा मात्र विस्तार नहीं
भाषा मात्र व्यापार नहीं

नए देश, नए तटों पर
खुद ही जा पहुंचेगी यह
प्रेमियों के उर में लिभड़ी लिपटी
जिह्वा पर उनकी
स्वतः ही हंसती किलकती

अपनों को तलाशते आए हम
जुड़ने की अद्भुत चाह लिए
रंग-रूप चाहे जो भी हो
अपनेपन का अटूट अहसास लिए
गलत मत समझना, मित्र

निश्चल बहती इस नदी में
उतरकर तो देखो
जी भरकर डूबो या तैरो
साधारण-सा दिन भी तुम्हारा
उत्सव ना बन जाए तब कहना !

***

वह चिड़िया सतरंगी

आ बैठी जो ठीक सामने
चहकती-किलकती
फिर-फिरके चेतना की डाली पे
वह चिड़िया सतरंगी थी

झूमती, उड़ती, मन लुभाती
शाख शाख फुदकती कुतरती
दंश देती परों से तुरंत ही
पात-पात सहला भी जाती

वह चिड़िया रंगबिरंगी थी
जानी, कुछ अनजानी-सी
अनजानी उस धरती पर
जाने-पहचाने गीत गाती

उड़ने को पर पल पल तत्पर
पास होकर भी बेहद दूर लगी

आज यहाँ कल और कहीं
घर, सीमा, कोई देश नहीं
खुले आकाश में
उन्मुक्त उड़ानें भरती

मिलने का सुख इसे था
ना बिछुड़ने का ही दुख
पास आते ही उड़ जाएगी फिर
मुड़-मुड़कर जो निहारती दूर कहीं से

वह चिड़िया सतरंगी-सी
पंख फैलाए उड़ने को थी तत्पर
बस एक सपने-सी लगी!


-शैल अग्रवाल

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