कहानी समकालीनः चुनौती-शैल अग्रवाल

कुंभ का महीना और भीड़ इतनी कि स्टेशन पर पैर रखने की जगह भी मुश्किल से ही मिलेगी- कुछ ऐसा ही सुन रखा था उन्होंने। रात के बारह, साढे बारह बजे तक स्टेशन पहुंच जाना जरूरी और सही लगा था उन्हें, तब । पर स्टेशन पहुंचते-पहुंचते आलम दूसरा ही दिखा। हड्डी कंपाती ठंड और गाड़ी का कहीं कोई अतापता ही नहीं। यूँ तो अच्छी तरह से पता करके ही चले थे वह घर से परन्तु शाम को तीन बजे तक आने वाली गाड़ी की रात में एक बजे तक पहुंचने की अभी भी संभावना ही दोहराई जा रही थी।
‘ इन गाड़ियों का कोई भरोसा नहीं रह गया … दस पंद्रह मिनट आगे पीछे होना बड़ी बात नहीं, क्या पता थोड़ी पहले ही आ जाए।‘ आशावादी थे. तो कुछ ऐसा-ही सोचकर वक्त से जल्दी ही चल पड़े थे वह घर से। अब कुली के साथ सारे प्रतीक्षालय देखने के बाद, कहीं पैर रखने तक की जगह नहीं मिल पा रही थी।

हार कर ओवरकोट की कालर ऊपर को की और सारे बटन भी बन्द कर लिए। मफलर भी गरदन पर ठीक से लपेट लिया। पर ठंड से फिर भी कांप रहे थे वह। कैप और दस्ताने छूकर देखे तो सुन्न पड़ती उंगलियों और जमे सिर पर ज्यों-के-त्यों मौजूद थे अभी, गिरे नहीं थे कहीं।

‘साहब, यहीं पर आपकी बोगी लगेगी और मैं गाड़ी आते ही आपको चढ़ाने वापस आ जाऊँगा। ‘ कह कर कुली भी गायब हो गया।
अब वे थे और उनकी तनहाई । ऐसे में सैम का ख्याल आ जाना स्वाभाविक ही था। उसी के लिए तो कर रहे थे वह यह भागदौड़। यह बेचैनी, यह कष्ट- इन्हे भी झेलने की आदत पड़ती जा रही थी अब तो उनकी। पिता थे आखिर –‘ न जाने कैसी और किस हालत में होगी , बेटी! ‘ भीगी कोरों को पोंछते हुए एकबार फिर सैम की सलामती की भगवान से प्रार्थना की उन्होंने और वहीं भीड़भाड़ से थोड़ी दूर, एक खाली बेंच पर जाकर बैठ गए। बर्फीले अंधेरे और स्टेशन की पीली रौशनी के साथ इर्द-गिर्द और अंदर-बाहर बेचैन करती खामोशी पसर चुकी थी। पलकें झपकना चाहती थीं परन्तु दिमाग सावधान कर रहा था। बगल में बैठा वह पागल-सा दिखता व्यक्ति कभी उन्हें देख रहा था तो कभी उनकी चमचमाती सैम्सोनाइट की अटैची को। खुद उसके पास उसका अपना एक भी सामान नहीं था। जरूर कोई उठाईगीरा या चोर उचक्का ही होगा -सोचने पर मजबूर हो चले थे वह।

ध्यान आया कि स्वभाव से बेहद सतर्क आज खुद एयर लाइन का टैग तक फाड़ना भूल गए थे ।

‘ बाहर से आए हो क्या साहब?’ उसने कीचड़भरी आँखें मिचमिचाते हुए उनसे पूछा।

‘नहीं तो। ’

कह तो दिया था उन्होंने पर नजरें मुंह चिढ़ाते उस टैग पर ही अटकी थीं उनकी। तुरंत ही फाड़कर जेब में रख लिया उसे। अब वह उन्हें और वे उसे बारबार टटोलती नजर से ही देखे जा रहे थे। जब और सहन न हुआ तो शायद उन्ही की राहत के लिए आवारा-सा दिखता वह आदमी कहीं और उठकर चला गया।
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दो घंटे बीत चुके थे। अभी भी हर आधे घंटे पर घोषणा ही हो रही थी –प्रयागराज अपने निर्धारित समय से आधे घंटे विलंब से आएगी…अब तो सुनना भी छोड़ दिया था उन्होंने। अकेले अपनी ही दुनिया में डूब चुके थे वह। दूर खड़े लैम्प पोस्ट की धुंधली पीली रोशनी में मूंगफली का एक दाना मुंह में जाता तो एक सामने बैठी बंदरिया की खुली हथेली पर । पहले तो दूर से ही ले रही थी, फिर धीरे-धीरे खिसकते-खिसकते बड़े भरोसे के साथ ठीक उनके सामने आ बैठी थी। आदमियों की भीड़-भाड़ से दूर, इस सूने छोर पर अबतक विश्वास का एक रिश्ता जुड़ चुका था उन दोनों के बीच। मूंगफली खतम होते ही तुरंत हाथ पसार देती थी और वह भी झट से अगला दाना रख देते उसकी फैली हथेली पर। बीच-बीच में बगल के खम्बे पर चिपका बैठा बच्चा भी एकाध मूंगफली झपट ही लेता था माँ से। ज्यादा नहीं, बस एकाध। वरना बड़ी-बड़ी आँखों से टुकुर-टुकुर देख ही अधिक रहा था । तभी अचानक एक चीत्कार के साथ बच्चा लपका और भयभीत मां की छाती से आ चिपका। बंदरिया भी आनन-फानन हाथ की मूंगफली फेंक चिपके बच्चे को कसकर अपनी सुरक्षा में लेते हुए, सामने खड़े बंदर पर जोर से गुर्राई । दाल गलती न देखकर, धमकाता-डराता-सा भारी भरकम वह बन्दर मुड़ा और दूसरी ओर चला गया। अब बच्चे के साथ बंदरिया भी पुल के नीचे के उस सपाट लोहे के हिस्से पर चली गई थी जो शायद उनका रैन बसेरा था। देखते-देखते कई और बंदर भी आ जुटे वहीं।

’ शहरी बंदर हैं तो क्या, पौ फटने को है। थोड़ा बहुत आराम तो इन्हे भी चाहिए ही। ’ , एक ठंडी सांस बरबस निकल गई उनके होठों से। ठंडी बेंच पर यूँ कड़कड़ाती ठंड में इंतजार करते पूरी रात निकली जा रही थी परन्तु गाड़ी की अभी भी कोई सूचना नहीं थी। बंदरिया के जाते ही एक बार फिर रहस्यमय सन्नाटा पसर चुका था उनके चारो तरफ।

कितना ध्यान रखते हैं यह जानवर भी अपने बच्चों का… आंसुओं से धुंधलाए चश्मे को साफ करके घड़ी देखी तो सुबह के चार बजने वाले थे। पर गाड़ी अभी तक नहीं आई थी।
’ क्या टैक्सी करके इलाहाबाद के लिए निकल लें? अरे नहीं, अब तो आ ही रही होगी गाड़ी, इतना इंतजार किया तो थोड़ा और सही। ’
शिथिल मन और शरीर दोनों ही सुन्न थे और हिलने तक की भी हिम्मत नहीं बची थी अब तो उनमें। छत्तीस घंटों से अधिक हो चुके थे घर से निकले और अभी तक लेटे भी नहीं थे जवाहर शास्त्री। लंदन से दिल्ली और फिर दिल्ली से कानपुर। कानपुर इसलिए कि खबरों की मानें तो, आखिरी बार सैम यानी समैन्था को यहीं कानपुर में ही देखा था किसी ने। शायद दादी से मिलने आई हो? आई तो थी, कह भी रही थीं माँ. पर माँ को तो कुछ पता नहीं सिवाय इसके कि पोती कुंभ नहाने गई है। एकबार बस एक बार कैसे भी वक्त की सूंई वापस कर पाते वह और सैम को न आने देते भारत ! रोक लेते वहीं, इंगलैंड में उसी वक्त ! सोच रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। मस्तिष्क पर हथौड़े-जैसे प्रहारों से बेबस जवाहर शास्त्री की आंखों में हाल की घटी घटनाएँ अटकी रील सी किरक रही थीं। दृश्य-ब-दृश्य घूम रही थीं ।

‘तो पापा मैं जाऊँ? देखूं तो सही इस आध्यात्म, आस्था और आडंबर के अनूठे संगम को! सुनते हैं एथेंस से भी बड़ा एक क्षणिक और कृतिम शहर खड़ा हो जाता है वहाँ पर संगम के किनारे और तब भी सब कुछ बेहद सुचारु चलता रहता है।‘

आर्कीटेक्ट की छात्रा समान्था, उस योजना और सामूहिक संचालन की कल्पना मात्र से उत्तेजित थी।

‘यह अनुभव विरल होगा मेरे लिए। प्लीज पापा! ‘

‘ नहीं, कोई जरूरत नहीं।‘

सत्रह वर्षीय किशोरी बेटी का वहाँ भीड़-भाड़ में जाना, सोच तक कंपा रही थी उन्हें।

‘पर सैम अकेली तो नहीं जा रही, सहेली टारा भी तो है साथ में।‘

पत्नी जैकलिन ने उत्साहित होकर बीच में ही उसकी सोच को शह दे दी और योजना सीलबद्ध कर दी।

‘ अगर मुझे छुट्टी मिल पाती तो मैं भी अवश्य ही जाती इनके साथ। सुना है, वहां आने वाला यह नागा साधु लोग बहुट पहुंचा हुआ सिद्ध पुरुष होता है। मेरा भी बहुत डिजायर था इन्हें देखने का, एकबार मिलने का। सुना हिमालय की कंदरा और जाने किस-किस उंचाई से नीचे उतरता है यह लोग कुंभ नहाने के वास्ते। ‘

जैकलिन का उत्साह भी सैम या तारा से कुछ कम नहीं था और तब उस सारे उत्साह और ललक को देखते हुए न चाहते हुए भी ‘हाँ’ कर ही दी थी उन्होंने भी।

‘हाँ। पर ध्यान रहे कि मन या पढ़ाई पर ज्यादा असर न पड़े और खाने-पीने का संयम और हर बात का ध्यान रखना होगा, तुम्हें । ’ इस कड़ी हिदायत के बाद ही जाने दिया था उन्होंने बेटी को। आखिर, बचपन में मां भी तो जाती ही थीं कुंभ नहाने। उन्होंने तो कोई बीमारी नहीं पकड़ी। गिरी-फिसली नहीं। यह बात दूसरी है कि वे खुद कभी नहीं गए। इतनी भीड़-भाड़ और दूसरों के शारीरिक निष्क्रमण के बाद उस पानी में डुबकी ले पाना…उनके बस की बात ही नहीं रही।

अगले दिन ही कुंभ में नहाने की अनुमति और आसपास के दर्शनीय स्थलों की लम्बी सूची लेकर सैम निकल पड़ी थी ब्रिटेन से। पहली बार भारत आई थी, उत्साह आसमान छू रहा था। दादी की गंगाजली में संगम का पानी लाने का वादा भी किया था उसने मां से। और अभी हफ्ता भी नहीं बीता होगा कि …बिना कुछ घूमे ही सैम लापता थी।.किसी को पता नहीं सैम कहाँ है, कैसी है? चार दिन बीत चुके हैं इस बात को भी और अभी तक उसका कोई पता नहीं चला ..भारत की पुलिस, होम औफिस किसी को भी नहीं। पुलिस का कहना है कि अगर डूबी भी होती तो अब तक कुछ तो पता चलता, लाश मिलती। … यह कैसे संभव है ! सैम समझदार है। जिम्मेदार है । पढ़ीलिखी है। अपना हित-अहित जानती है।…डूब नहीं सकती वह। अपहरित भी नहीं हो सकती… फिर गायब कैसे… कहीं नहीं जाती वह तो उनकी अनुमति के बिना। कैसे खो सकती है उनकी लाडली, बच्चा नहीं है सैम …वस्तु भी नहीं है जो इधर-उधर हो जाए या जेब में रखकर कोई चल दे, मन में झंझावत था और आँखों से आंसुओं का निर्झर ।
….

अचानक मानो वह सोया पड़ा प्लेटफार्म जग गया। भीड़ का रेला निकल आया था मानो चारो तरफ से। लोग बेतहाशा इधर से उधर दौड़ रहे थे।
’ तो साहब चलें, अपनी गाड़ी लग चुकी है।’
कुली अटैची सिर पर रखे चलने को तैयार खड़ा था और उन्ही से पूछ रहा था।

‘हां-हां क्यों नहीं।‘

जवाहर शास्त्री भी अपनी विचारों की तंद्रा से अधजगे-से यंत्रवत् बोले और कुली के पीछे-पीछे चल पड़े। कुली उनसे भी अधिक उम्र का ही दिख रहा था, अटैची के बोझ से गर्दन टेढ़ी हुई जा रही थी।

‘ सुनो तुम चाहो तो इसे घसीट भी सकते हो। पहिए हैं इसमें।‘

‘ दूर ही कितना है-आप बस आइए बाबूजी।‘

कुली समझदार था और भारतीय रेल व्यवस्था को उनसे बेहतर समझता था। मिनटों में उसने डिब्बे के अंदर बिठा दिया था उन्हें। पचास की जगह सौ रुपए दिए थे उन्होंने भी। और तब उसकी कृतज्ञ मुस्कान देखकर दुख के उस पल में भी उन्हें अच्छा ही लगा था। सामने की सीट पर अधेड़ सरदार दंपति बैठे हुए थे, उन्ही की उम्र के रहे होंगे, वे भी शायद कुंभ नहाने ही जा रहे थे। सामने कंबलों का ढेर पड़ा था और पास में ही आठ दस बन्द कनस्तर करीने से रखे थे। इनमें जरूर खाने पीने का सामान होगा बांटने के लिए। संगम पर दान भी तो किया ही जाता है- न चाहते हुए भी उनकी सोच अटकल पर अटकल लगाए जा रही थी।

‘सत् श्रीकाल जी। तुस्सी भी स्नान वास्ते जा रहे हो क्या वीर जी?’ सरदार जी ने गाड़ी के स्टेशन छोड़ते ही परिचय बढ़ाना चाहा।

‘ कल की पौष की पूरनमासी का खासा महत्व होन्दा है । हम भी इसी वास्ते दिन पड़ते ही पहुंचना चान्दे हैं। मौनी मावस तक वहीं रैंगे। साढा तो टेन्ट भी बुक्ड है। और आपका…?’

‘ हाँ, नहीं।‘

एक अटपटा-सा जबाव देकर सोने की निरर्थक कोशिश की जवाहर शास्त्री ने। गाड़ी आगे बढ़ने की वजाय पिछले दो घंटे से चार कदम बढ़कर फिर वहीं सिगनल पर ही खड़ी हो चुकी थी। ‘नौ-दस तक तसल्ली से रुकती, सांस लेती पहुंच ही जाएगी यह भी।‘ जवाहर शास्त्री ने ठंडी सांस ली और खुद को एकबार फिर तसल्ली देनी चाही। ’ वैसे भी ये सरकारी काम इसके पहले भला कहाँ हो पाते हैं! ’ खुदको बहलाते-फुसलाते पलटकर लेट गए वह। पर अभी भी उनकी आँखों में नींद का एक रेशा तक नही था।

माना स्पर्धा और प्रतिद्वन्दिता के इस तेज युग में दूसरों को रौंदकर आगे बढ़ जाना आम बात है पर उनकी सैम तो किसी के राह की बाधा रही ही नहीं कभी…बाधा बन ही नहीं सकती वह तो …फिर उसके साथ ऐसा क्यों हुआ ? मन ही मन योजना पर योजना बनाए जा रहे थे कि बेटी को कहां-कहां और कैसे-कैसे ढूंढना है? किस-किस की मदद लेनी है। ढूंढना तो उन्हें ही होगा। वैसे भी उनके बगैर यह काम कोई और कर भी तो नहीं सकता। उनकी बेटी है सैम, खोई नहीं, जरूर छिप गई होगी। बचपन से ही यह लुकाछिपी का खेल उसका प्रिय खेल जो है।’

बन्द पलकों के पीछे हर संभावित संभावना को खंगाले जा रहा था उनका मन।

क्रिसमस कैरोल सी सदा खुश और गाती चहकती इकलौती बेटी सैम …कैसे है से थी बन सकती है और बनने दे सकते हैं वह। चाहे कुछ भी कहे कोई, उनका मन कह रहा था कि सैम जिन्दा है और वह उससे अवश्य ही मिलेंगे। बिल्कुल इन हिन्दुस्तानी फिल्मों की तरह जहां कुंभ में खोए मिल जाते हैं। पर बीस तीस साल बाद नहीं। अभी ही ढूंढना है उन्हे। सोच मात्र से अवसाद और थकान की रेखाएँ कुछ कम हो चली थीं और एक धीमी मुस्कान और चमक उभर आई थी चेहरे पर।
राजतंत्र हो या प्रजातंत्र एक सुचारु शासन के लिए ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का अहसास …जिन्दगी में सपनों और विश्वास का बचा रहना आवश्यक है और शायद ऐसा पहली बार हुआ था, जब भारत में चारो तरफ विश्वास की कमी नजर आ रही थी उन्हें। ’ क्या खाएगी वह और क्या खिलाउंगी मैं अपनी पोती को। अब यह भारत तो रहने लायक जगह ही नहीं रही। अच्छा हुआ जो तू दूर जा बसा। पैसे हाथ में लिए घूमते रहो पर मजाल है कि कुछ भी शुद्ध मिल जाए यहाँ पर! हर चीज में ही मिलावट ।’ महीने भर पहले ही मां ने फोन पर आगाह किया था उन्हे। पर तब कब अनुमान हुआ था उन्हें स्थिति की जटिलता का…मां तुम्हारी तो आदत पड़ चुकी है बस शिकायत करते रहने की-कहकर फोन रख दिया था उन्होने।

होम औफिस का फोन और वह खबर, फिर एक बदहवासी की सी हालत में खुद भारत आना; जी हाँ वही भारत जहाँ आने के लिए वह महीनों तैयारी किया करते थे। आज, बस चन्द कपड़े और एक लम्बी भागदौड़। खबर ठीक से असर करे इतना भी वक्त नहीं था उनके पास तो।.इलाहाबाद पहुंचते ही वह खुद घटनाओं के चक्रवात में फंसे बगैर नहीं रह सके ।

सामने महाकुम्भ का मेला नहीं एक जादूनगरी पसरी पड़ी थी आँखों के आगे जहाँ ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा ‘धुन गूंज रही थी खुले मैदान के हर कोने से।…उनकी प्रिय धुन थी यह…, पर आज जाने क्यों कर्कश और अर्थहीन लग रही थी। चुभ रही थी कानो में।
’ हर जगह पाप भृष्टाचार। दरिंदगी में सबसे आगे।’
उनका सपनों का भारत बदल चुका था । घिनौना लग रहा था अब यह सब।.फूल-सी हंसती मुस्कुराती सैम को यूँ इस रेले में झोंकना, कितनी समझदारी थी… भरी दोपहर में अंधेरा छा गया था आँखों के नीचे । भरी दोपहरी का सूरज तक खोया लगा उन्हें इस भीड़भाड़ में।
वैसे तो बैग पर , पीठ पर सब जगह उन्होंने सैम की फोटो छपवा रखी थी, फिर भी बैग से निकालकर सैम और तारा की पोस्टरनुमा फोटो हाथ में ले ली थी उन्होंने और हर आते जाते राही से पूछ रहे थे- ’ क्या आप में से किसी ने इन दोनों लड़कियों को कहीं देखा है? ’ और हर तरफ निराशा ही हाथ लग रही थी उन्हें उस रेलम पेल में। किसी के पास फुरसत नहीं थी कि उनकी तरफ देखे तक।

अचानक ही वह सिरसे पैर तक भभूत में लिपटा नंग-धड़ंग साधू जोर-जोर से हंसता हुआ न सिर्फ उनके आगे आकर खड़ा हो गया अपितु साथ चलने का इशारा भी करने लगा, क्या पता इसीसे कोई सुराग मिल जाए। डूबते को तिनके का सहारा, जवाहर शास्त्री चुपचाप उसके पीछे चल पड़े।

अब वह जलती आंच के इर्दगिर्द बैठे साधुओं के झुंड में खड़े थे। तम्बू हर आधुनिक सुविधा से लैस था।

‘ यह प्रयागराज है। तीर्थों का तीरथ…तीरथाधिपति। सौभीग्यशाली हो , जो आज इस पर्व पर यहाँ मौजूद हो। त्रिवेणी संगम होने के कारण इसे यज्ञ वेदी भी कहते है। .यही वह जगह है जहाँ बृह्मा, विष्णु महेश तीनों ने य़ज्ञ किया था। जहाँ गंगा, जमुना और सरस्वती तीन-तीन नदियों का संगम हुआ। पदम पुराण में ऐसा माना गया है कि जो त्रिवेणी संगम पर नहाता है उसे मोक्ष प्राप्त होता है। जैसे ग्रहों में सूर्य तथा तारों में चंद्रमा है वैसे ही तीर्थों में संगम… ‘ सामने गद्दी पर बैठे गुरु जी का प्रवचन कर्कश और अरुचिकर ही था। जवाहर शास्त्री को इशारे से बैठने को कहा गया। उपस्थित सभी साधू नितांत नंगे और भभूत में लिपटे थे। किसी के गले में साप तो किसी की जटाओं में पक्षी। अजीब माहौल था। दूर तक भभूत लिपटे मुंहों में पीली आँखें थीं और सफेद चमकते दांत। पास ही एक शिविर महिला सन्यासिनों का भी था। कुछ सिर मुडे और जोगिया वस्त्रों में लिपटे बच्चे सेवा सुसुश्रा के कामों में लगे हुए थे। पर उनकी आंखें इन सबसे परे, दूरबीन की तेजी से सैम और टारा को ढूंढे जा रही थीं। अचानक उसी उम्र की एक विदेशी किशोरी आई और उनके हाथ में तुलसी अदरक का पेय देकर चली गई। सैम और टारा का अभी भी कहीं पता नहीं था। वहीं सामने एक साधु आग पर चलने का करतब दिखा रहा था। उनका मन किया कि वह भी आग पर चलें. या बेहतर होगा लेट जाएँ। दो मिनट को तो माथे पर लगातार ठकठक करती यह सोच सुन्न हो।
हिम्मत नही हारी थी उन्होने बस बेहद थक गए थे जवाहर शास्त्री। चलने को उठे और थोड़े और आगे बढ़े तो वही व्यक्ति फिर उनके कान के पास आकर फुसफुसाया-‘ कल सुबह बृह्म मुहूर्त में वापस यहाँ आना मत भूलना।‘

रजिस्ट्रेशन कैम्प पर पहुँचे तो बताया गया कि समैन्था शास्त्री अपनी सहेली तारा जौर्ज के साथ 14 जनवरी को वहाँ आई तो थी और टेन्ट भी रजिस्टर्ड है उन दोनों के नाम से, जो कि अब पुलिस के संरक्षण में है क्योंकि दोनों लड़कियां लापता हो चुकी हैं। किसी को अभी तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है कि वे जिन्दा भी हैं या….’ और तब पिता के चेहरे के बदलते रंग देखकर औफिसर बीच में ही चुप हो गया था।
सारी आइडेन्टिटी और जांच पड़ताल के बाद ही उन्हे अनुमति मिली थी अपना सामान उस टेन्ट में रखने की। सैम और तारा के बैकपैक कोने में पड़े मानो उन्हीका इंतजार कर रहे थे। सैम का सब सामान वैसे ही था जैसे कि उन्होने और पत्नी ने पैक किया था। कुछ नहीं खोया था सिवाय खुद सैम और तारा के। थके हारे जवाहर शास्त्री कुछ पल आराम करने के इरादे से बिस्तर पर लेटे तो कान में फिर वही आवाज गूंजने लगी- ‘ सुबह आना मत भूलना।‘

आंखें कब लगीं और कब खुल गई-पता ही नहीं चला उन्हें। बृह्म महूर्त ही था और माघ की अमावस भी। आज के नहान का महत्व ज्यादा था।
बाहर आए तो देखा- जलती मशाल लिए असंख्य साधुओं का रेला संगम की ओर बढ़ रहा था। सबके सब निर्वस्त्र और सिर से पैर तक भभूत में लिपटे हुए थे । पुरुषों के बाद संख्या में उनसे बहुत कम महिला साधुनी चल रही थीं, पंक्तिबद्ध। वे निर्वस्त्र नही थीं, उन्होंने एक भगुवा वस्त्र से खुद को ढक रखा था। और उनके पीछे थे चार छह ऐसे बच्चे जिनकी अभी दीक्षा नही हुई थी । हाथों में आटे का गोला था बिल्कुल वैसा ही जैसा कि पिंडदान के वक्त लिया जाता है। तो क्या आज यह सन्यास व्रत लेंगे यहाँ पर। चलो यह भी अच्छा ही हुआ, देखेंगे वह भी इनका दीक्षा समारोह। प्रभु कृपा से यह सुअववसर मिला, चाहकर भी ऐसा न सोच पाए वह। पहला स्नान का अधिकार, संसार से विरक्त नागा साधुओं का था। हो भी क्यों न नागा जीवन की विलक्षण परंपरा में दीक्षित होने के लिए पूर्णतः वीतरागी होना आवश्यक है। संसार की मोह-माया से मुक्त कठोर दिल वाला व्यक्ति ही नागा साधु बन पाता है, जानते थे वे।

साधु बनने से पहले खुद अपने हाथों से अपना ही श्राद्ध और पिंड दान करेंगे बच्चे। बाकायदा कठोर परीक्षा देते हैं ये जिसमें उनके तप, ब्रह्मचर्य, वैराग्य, ध्यान, संन्यास और धर्म का अनुशासन तथा निष्ठा आदि को प्रमुखता से देखा व परखा जाता है। तभी ये किसी मठ में स्वीकारे जाते हैं। फिर इनका जीवन खुद अपना कहां, बस धर्म और आध्यात्म को पूर्णतः समर्पित रहते हैं यह लोग । ऐसा कहीं पढ़ा था उन्होंने परव्तु मस्तिष्क स्वतः ही श्रद्दा से नहीं झुका आज।

अचानक हर हर महादेव की गगनभेदी गूंज के साथ रुंड-मुंड वे एक एक करके छपाक् छपाक जल में कूदने लगे। लठ्ठ, कृपाण, खड्ग, भाले चारो दिशाओं से चमक रहे थे और चमक रही थी राख पुते चेहरों से पीली आँखें और लाल मसूढ़ों में जड़े उनके वही सफेद दांत। आल्हाद और उन्माद का ललकारता पल था वह। लम्बी जटाओं से घुमावदार जलबूंदें दृश्य को कुछ कोमलता तो दे रही थीं, परन्तु अधिक नहीं। अजीब रोमांचक कुछ-कुछ डरावना सा दृश्य था वह..भय के साथ-साथ थोड़ी विष्तृणा भी जगी उनके मन में।
किसी के हाथ में खड्ग, किसी के में चिलम तो किसी के हाथ में चिमटा ही सही। कइयों के हाथ में तो लपलप करती तलवारें तक थीं। तो शस्त्र भी धारण करते हैं ये साधू ? जवाहर शास्त्री की विस्मित आंखों के आगे अभी तो कई और रहस्य अनावृत होने थे। सुना है इनमें से कइयों ने कुंडलनी जगा रखी है। कई असंभव काम कर सकते हैं-जैसे कि हवा में उड़ना , पानी पर चलना, मृतकों से बातें करना आदि… केंचुए सा रेगता अज्ञात का भय और आभास भयभीत कर रहा था उन्हे अब। अंदर तक कांप रहे थे वह।
उनके जल से निकलने के बाद ही स्त्री नागा और बच्चों की बारी आई।

बर्फ से ठंडे जल में डुबकी मारने के बाद अब वे विद्यार्थी से दिखते बच्चे पंक्ति बद्ध रेत पर बैठा दिए गए थे। बिठाते ही सर्व प्रथम उस्तरे से उनके बाल उतार दिए गए। भौंहें तक साफ कर दी गईं थीं। अपने इस नए रूप में अब वे अपरिचित और वीत राग से दिखने लगे थे। सारे गिरे बालों को खुद ही यंत्रवत् उन्होंने आटे में लपेटा और जल में बहा दिया, यह कहते हुए कि -आज से मैं अपनी इस पहचान, इस चोले का यहीं पर इसी वक्त त्याग करता हूँ क्योंकि यह शरीर , यह जीवन मिथ्या है और यह दुनिया एक छाया, एक स्वप्न, एक छलावा, एक भ्रम मात्र है। अब मेरा कुछ नहीं। मैं खुद को दुनिया के हित के लिए समर्पित करता हूँ।

जवाहर शास्त्री ने देखा, उस एक बच्ची के हाथ ठिठक गए थे। उसने अपना पिंड नही बहाया था। अब वह तनकर खड़ी थी।

‘ मैं नही मानती यह सब, स्वामी जी। क्योंकि अगर यह दुनिया एक भ्रम है, एक छलावा है तो फिर तो कोई मूर्ख ही उसके हित के लिए समर्पित हो सकता हैं, अपना सब कुछ त्याग सकता है! ‘

‘ सिद्धिमाया, मूर्ख बच्ची! पाठ के पहले ही शिष्य को प्रश्न का अधिकार नही। अनुशासन शिक्षा का पहला गुरु मंत्र है, वरना हमारे शास्त्रों में दंड का भी प्रविधान है तुम जैसे निरंकुश और उद्दंड शिष्यों के लिए। ‘

‘ मैं ऐसे तर्कहीन और नेहरिक्त अनुशासन को भी नहीं मानती। ‘

‘ और हम तुम्हे यह मनवा कर ही रहेगें।‘

‘ कैसे, बल से? ‘ लड़की ने पुनः विद्रोह किया।

‘ याद रखो , ताकत से तुम शरीर जीत सकते हो मन नहीं, मेरा। और बृह्म जिसे तुम हासिल करना चाहते हो वह तो बस मन या आत्मन् ही है, जिसे सिर्फ प्रेम से ही जीता जा सकता है। यही प्रकृति है और प्रकृति का नियम भी। इसी नियम से स़ृष्टि टिकी हुई है और यही इसके सृजन का आधार भी।‘
वह मानो हठ योग की साधना में जा बैठी थी -निर्धड़क और बेखौफ।

‘ और विनाश का भी। ‘ तड़ाक-तड़ाक गाल पर दो थप्पड़ पड़ते ही लड़की मानो अब और भी जिद पकड़ चुकी थी।

‘चुप हो जाओ सिद्धिमाया, नहीं तो।‘ औरत पुनः गरजी।

‘ नहीं तो क्या…जानवर तक परिचित हैं प्रेम की गुणवत्ता और ताकत से। आश्चर्य है कि आपलोग ही नहीं। पूरी सृष्टि इसी नियम पर ही तो जीवित है।‘

आवाज परिचित लगी जवाहर शास्त्री को और बात में दम भी।

अब एक हवलदार सी लगती हृष्ट-पुष्ट साधुनी बच्ची का सिर बारबार पानी में डुबोती कह रही थी बोल मेरे साथ-साथ-‘ मैं आज से इस दुनिया से अपने सारे रिश्ते नाते तोड़ती हूँ।‘

‘ नहीं।‘ लड़की को तो एक ही रट लगी थी-‘ यह कैसा धर्म है जो कर्तव्य और कर्म से विमुख होने की बात करता है-रणछोड़ बनाता है। सन्यास यदि पलायन है तो मुझे नही चाहिए यह सन्यास।‘

लड़की की बातें तर्कसंगत थीं। पक्ष में बोलना, उसे इस विषम परिस्थिति से बचाना अब जरूरी हो गया था उनके लिए । लड़की सैम की ही उम्र की थी। परन्तु सामने सिर मुडी और विक्षुब्ध सिर झुकाए खड़ी वह लड़की सैम से बहुत फर्क लगी उन्हें …बेहद दयनीय और टूटी हुई। वजन में आधी और देखने में बेहद बदसूरत। शायद रात का अंधेरा था जो उसके राखपुते चेहरे को काला व डरावना कर रहा था। फिर भी जाने किस दर्द से कटते वह आगे बढ़ते चले गए। ‘ बच्चा तो बच्चा…बचाना ही होगा इसे।‘

‘छोड़ो इसे । धर्म अनुशासन हो सकता है परन्तु जोर जबर्दस्ती नहीं। अगर यह नही चाहती तो तुम इसे सन्यासिनी कैसे बना सकते हो? वैराग जीवन पद्धति है जिसे सन्यासी खुद चुनता है। सजा नहीं।‘

पर साधुनी की पकड़ अभी भी ढीली नही हुई थी।

‘ छोड़ो, नही तो मैं पुलिस को बुलाता हूँ।‘ जवाहर शास्त्री गुस्से में गुर्रा उठे।

सुनते ही साधुनी की गिरफ्त ढीली पड़ गई। अब उसे संघ की इज्जत पर भी खतरा मंडराता जो नजर आ रहा था। तुरंत ही लड़की को छोड़ दिया उसने। पर उसका व्याख्यान और गुस्सा पूर्ववत् ही चालू था।

‘जा पलटना मत इसतरफ । वरना जिस खोपड़ी में पानी पी रही थी, हफ्ते भर के अंदर वैसे ही काम में तेरा यह सूजा सिर भी इस्तेमाल होगा। कलम करके रख दूंगी यहीं पर और देखती हूँ कौन आता है फिर तुझे बचाने। बहुत शौक था न कपाल विद्या और हठ योग सीखने का तुझे…., हमारी जड़ी बूटियों के बारे में जानने का…पर यह गुर साधना से आते हैं। कोरी बहसबाजी से नहीं।‘

और तब लाल आंखों को और लाल करते हुए एक लात लड़की की पीठ पर कसकर मारी उसने । इतनी कस कर कि लड़की फुटबाल सी घूमती उनके पैरों के पास आ गिरी।
जवाहर शास्त्री ने उठाकर लड़की को गले लगा लिया।

‘ यह कौन-सा तरीका है व्यवहार का-साधु हो या नो साधु! इसकी शिकायत तो पुलिस से होनी ही चाहिए। यह मुखौटा तो समाज के आगे उतरना ही होगा उन्हें।‘
सांत्वना देते हुए अब वह लड़की की पीठ सहला रहे थे, आंसू पोंछ रहे थे। पता नहीं ठंड की वजह से या अपमान की वजह से लड़की सिर से पैर तक थरथर कांप रही थी। जवाहर शास्त्री ने अपना दुशाला लड़की को उढ़ा दिया। अचानक जोर की गड़गडाहट के साथ मानो बादल गरजे और खुद उनपर बिजली-सी गिर पड़ी। अभीतक अपने ही अंधेरे में गुम वह लड़की पलटी और ‘थैंक्यू पापा‘ कहकर उनसे लिपट गई ।
चौंकने की अब उनकी बारी थी। थरथर कांप रहे थे वह और आंसू सिर से पैर तक भिगोने लगे थे उन्हें। मुंह ऊपर ऱौशनी की तरफ करके ध्यान से देखा-तो वाकई में उनकी अपनी सैम ही तो थी वह। दयालु है सर्वज्ञ ! पर इतनी पास होकर भी कितनी दूर चली गई थी लाडली। धिक्कार है उन्हे जो अपनी बेटी को इतने कष्ट झेलने दिए उन्होने। पहचान तक न पाए1 उनसे तो वह बन्दरिया ही अच्छी थी कैसे आनन-फानन बच्चे को बचा लिय़ा था उसने। एक खरोंच तक नही आने दी थी।

वह सहमा बच्चा , गुर्राता डराता बंदर सब कुछ पुनः आंखों के आगे घूमने लगे, सब कुछ ज्यों का त्यों ही तो है, आदमीयों की दुनिया हो या जानवरों की। वही आधिपत्य की लड़ाई है हर जगह। खोखली हैं यह सब दर्शन और आध्यात्म की बातें, बिना आपसी सद्भाव और स्नेह के। आदमी को बहुत कुछ अभी सीखना है-ज्ञान, धर्म तो छोड़ो, व्यवहार तक में प्रकृति से।

विदेश में भारतीय दर्शन के प्रौफेसर और हाल ही में घटा वह घटनाओं का दुश्चक्र…’यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता’- क्या ये अनुभव काफी नहीं जीवन से विरक्त हो जाने के लिए? भर्त्रहरि ने वह श्लोक मानो उन्ही के लिए तो लिखा था। भारत जिस पर उन्हें इतना गर्व था। जो उनकी शान और पहचान था- रणभूमि बन जाएगा उनके लिए, ऐसा कब सोचा था उन्होंने !

उन्हे लगा एक बार फिर वे उसी सर्द स्टेशन पर ही बैठे हैं। गाड़ी कहीं नहीं आई-गई है। सफर वैसा-का वैसा ही है और वहीं पर आज भी अटका पड़ा है, आधा-अधूरा…।

‘चल बेटा, यह जगह तेरे लायक नहीं,’ बेटी को लाड़ से अपनी सुऱक्षा में खींचते और गोदी में भरते- से वह बोले।

‘हाँ पापा, मोहभंग हो चुका है मेरा। पर कहीं देर न हो जाए…हमें तारा को भी इनके सम्मोहन से छुटाना है।‘

जवाहर शास्त्री बेटी से शत-प्रतिशत सहमत थे। काम कितना कठिन था भलीभांति जानते थे वह परन्तु उनकी आवाज में गूंजती आत्म-विश्वास भरी ललकार अब खुद उनके लिए एक चुनौती बन चुकी थी।…
‘ अवश्य बेटा। डर मत, तू। मैं हूँ ना! अब हम तीनो साथ ही वापस लौटेंगे।‘

मार्च 2014