कहानी समकालीनः सेंध-शैल अग्रवाल

घर में चार कमरे हैं– खाने का, पकाने का, बैठने का और सोने का।

सब कुछ सुनिश्चित और सुनियोजित। बँटे इन कमरों सी ज़िंदगी भी बँट गई है उनकी। बैठने और सोने वाला कमरा आदमी के हिस्से में आता है जहाँ बैठा-बैठा वह व्हिस्की के गिलास के साथ ताश के पत्तों को एक ख़ास अंदाज़ से बिछाता और उठाता रहता है—-क्रम से —सब कुछ सुनिश्चित और सुनियोजित।

खाने और पकाने वाले बचे दोनों कमरों में अकेली औरत बेचैन-सी दिनभर घूमती रहती है–आदमी वहाँ सिर्फ़ खाना खाने आता है और वह भी जब खाना मेज़ पर लग जाए तब, वरना उसके मुँह और दिमाग़ दोनों का ही ज़ायक़ा ख़राब हो जाता है। औरत को लगता रहता है कि घड़ी और आदमी के दिमाग़ ने एक मिला जुला षड़यंत्र रच रखा है उसके ख़िलाफ़। औरत जल्दी जल्दी घर के सब काम निबटाने की कोशिश में लगी रहती है जिससे कि थोड़ा वक्त मिल जाए उसे भी और वह भी घर के उन दूसरे कमरों में आ-जा सके पर मन के अंदर गुड़ुप-गुड़ुप उठती-डूबती आवाज़ों से कभी उबर नहीं पाती औरत— द्रौपदी के चीर सा कामों का छोर ही कभी नहीं मिल पाता है उसे।

जब बहुत थक जाती है तो मछली सी थुथने उठाकर गहरी साँस लेने लगती है, मानो अगले दो तीन घंटों की औक्सीजन एक साथ ही फेफड़ों में भर लेगी। झूठे बरतनों को धोती-उठाती, साफ़-सुथरे बरतनों को झूठा करवाने के लिए मेज़ पर फिर से सजाते हुए, उसे वक्त ही नहीं मिल पाता कि इस समन्दर से बाहर आ पाए या बाहर की दुनिया को देख तक पाए। उस अजेलिया के पेड़ तक भी नहीं जा पाती वह तो, जो उसकी अपनी खिड़की के पास खिला झूमता रहता है। सर में गूंजती आवाज़ों का समन्दर जब असह्र हो जाता है तो कभी-कभी उन लहरों को काग़ज़ पर उतारकर मन हलका कर लेती है औरत — बस यही खेल है उसका अपना और यही एकमात्र मनोरंजन भी। कौन सा समंदर ज़्यादा बड़ा और गहरा है– आँख के आगे बिखरा काम का या अंदर मथते शोर का, कभी यह जान नहीं पाई है औरत।

सब्ज़ियाँ काटते-काटते आज फिर से उसने वही आवाज़ें सुनी हैं –कुतुर–कुतुर–कट-कट। क्या है जो उसे और उसके पिंजर को काटे जा रहा है– आवाज़ उसके अपने अंदर से आती हैं या इन कटती सब्ज़ियों से या फिर बाहर कहीं दूर से– किसी अनजानी जगह, अनजाने वतन से–क्या पता? पकड़ नहीं पाती कुछ भी वह औरत, न उस खिलखिलाती किशोरी को जो दुनिया बदलना चाहती थी और ना ही बाहर उड़ते उन रंग-बिरंगे बादलों को, जो कभी-कभी आज भी पास आने का दूर कहीं उड़ चलने का वक्त-बेवक्त इशारा करते रहते हैं। चार कमरों के बंद इस मकान में गूंजते रहना, मानो आदत-सी हो गई है उसकी और जब आदत पुरानी हो जाए तो असल नक़ल का भेद भी तो मिटा ही देती है।

आदमी ख़रीददारी करके लाया है और दरवाज़े की घंटी बेतहाशा बजाए जा रहा है। हाथ की अध कटी सब्ज़ी वहीं छोड़, औरत दौड़ती है और सामान से भरे थैले ले लेती है। आदमी के आते ही घर की हर चीज़ में एक करेंट सा लग जाता है। एक व्यस्तता और तुरंतता व्याप जाती है चारों तरफ़। आदमी की आँखों में जीत और मालिकाना कड़क है और औरत की आँखों में असंतोष—अभी लगा दो वरना खराब हो जाएगा। मैं ले तो आया हूँ । आगे का अब सब काम तुम्हारा, मुझसे किसी मदद की उम्मीद मत करना।

सड़ाक-सड़ाक पीठ पर पड़ते कोडों की आवाज़ मिल चुकी है उस धीमी-धीमी कुतुर-कुतुर में अब।–क्या यह कहना ज़रूरी था, प्यार-से भी तो कही जा सकती थी यही बात? हताश् औरत वहीं बैठी रह जाती है। आदमी लाल आँखों से गुर्राता है अब यह भी मैं ही करूँ क्या ? तुम दिन भर घर में बैठी आराम फ़रमाती रहा करो, बस। बाहर जाओ चार पैसे कमाओ तो समझ में आएगा सब कुछ। औरत को कुछ सुनाई नहीं दे रहा बस वह याद करने की कोशिश कर रही है कि कब और कितने साल पहले यह आदमी प्यार से या सहज होकर बोला है उससे ?

दुखती पीठ और कंधों के दर्द को अनसुना करती औरत हड़बड़ा कर उठ जाती है, पर मन का दर्द लाख दबाने पर भी बूंद-बूँद छलक ही पड़ता है। आँखें पोंछते देख, आदमी एकबार फिर ग़ुस्से से आग बबूला हो उठा है और सामान उठाकर एक एक करके बाहर फेंकने लग जाता है। खेल अब ख़तरनाक मोड़ ले चुका है। औरत झपटती है, हाथ से सामान ले लेती है और वहीं ज़मीन पर पटक देती है। शेरनी सी बिफर जाती है–क्या चाहते हो आखिर तुम –क्या बिगाड़ा है मैं ने तुम्हारा–क्यों इतना तिरस्कार करते हो –कभी-कभी तो मशीन भी रुक ही जाती है। आदमी के होंठ व्यंग में तिरछे हो जाते हैं मुझे पता है कितना काम करती हो तुम– बैठी-बैठी ही थक जाती हो, शायद।—

औरत रोना नहीं चाहती, ना ही बतलाना चाहती कि सुबह से काम करते-करते कितना थक गई है वह। वैसे भी अब और बोलना या सोचना कुछ भी संभव नहीं उसके लिए। बस्स् आदमी ही बोले जा रहा है– मैं कुछ नहीं करूँगा, सुना तुमने। ख़रीदकर भी नहीं लाऊँगा। खुद ही लाना–दो ही दिन में ही सारी अक़्ल—यह कड़क ठिकाने लग जाएगी।

एक भय अब औरत को जकड़ने लगता है —भूख का भय, तिरस्कार का भय –कर्तव्य में असफल होने का भय। उसके पास तो पैसे भी नहीं हैं — किससे माँगेगी–माना इससे ही माँग ले, पर गाड़ी भी तो नहीं, कैसे ला पाएगी वह यह सब। सामान से भरे बैग ढोते-ढोते पूरी जवानी निकाल दी है उसने। इन्हीं बाँहों से कंधों पर अकेले ही तो ढोया है सब कुछ— बच्चे, यह आदमी, घर का इंट-गारा सभी कुछ — बिना किसी सहायता के। पर अब यह संभव नहीं। दुखते कंधे को सहलाती हताश् औरत आदमी को तोलती नज़रों से देखने लग जाती है पर आदमी अब दूसरी तरफ़ देखने लगा है। औरत के अंदर का विवेक फिर से जाग उठता है परंतु वह आदमी अबतक अपना सारा विवेक खो चुका है– कसकर मेज़ पर हाथ मारता है —मेरी तरफ़ यूँ मत देखो, कोई ग़लत बात नहीं कह रहा हूँ मैं।—रोटी प्लेट से उछलकर मेज़ पर जा गिरती है —गंदी हो गई यह– नहीं खा सकता इसे, मैं अब ।— आदमी एक बार फिर से गुर्राता है ।

सारी ग़ुस्सा को शांत आवाज़ में समेटे औरत रोटी उठाकर अपनी प्लेट में रख लेती है— कोई बात नहीं मैं खा लूँगी, तुम दूसरी ले लो। आदमी हार नहीं मानता। बड़ा नहीं महसूस होने दे सकता वह इस औरत को — और तुरंत ही वही रोटी उसके हाथ से छीनकर खाने लग जाता है। गड़े नाखूनों की जलन अब जलती आँखों में घुलकर और भी तेज महसूस होने लगी है औरत को। बंद कुहनियों में सर छुपाए वह औरत अब सब कुछ भूल जाना चाहती है—छुप जाना चाहती है इन अनुभवों से— इस आदमी से, ज़िल्लत की इस ज़िंदगी से— खुद अपने ही अंदर उफनती नफ़रत की एक नज़र से।

मंहगी सिल्क की साड़ी से आँसू पोंछती औरत को अब बरसों पुरानी वह माँ की नौकरानी याद आ रही है —- अनपढ़ पति उसे भी तो ऐसे ही शराब पीकर पीटता था– पर सामने बैठा आदमी तो बहुत पढ़ा लिखा और ऊँचे ओहदे पर है। शायद ताक़त का नशा शराब से भी तेज हो? आदमी खाना खा लेता है और तश्तरी सिंक में पटक देता है। हर झूठन को उठाना यही अब उसकी सजा है, मानो वह घर में क़ैद उस औरत से कहना चाह रहा हो।

बाहर बैठने वाले कमरे में बैठा आदमी फिर से आवाज़ें देने लगता है। थकी औरत सब कुछ भूलकर दौड़ती है। पड़ोसी आया है, आदमी कहता है- चाय लगा दो, समोसे बना लो। पड़ोसी आदमी से कहता है- कितने भाग्यशाली हो तुम जो आज के जमाने में ऐसी बीबी मिली है तुम्हे। मुझे तो सब काम खुद ही करने पड़ते हैं। समोसे की कौन कहे दफ़्तर से थककर लौटी बीबी को भी खुद ही खाना बनाकर खिलाना पड़ता है। -बाहर काम करने वाली, मर्दों की बराबरी करने वाली औरतें मुझे कतई पसंद नहीं– मूछों पर ताव देता आदमी तलख आवाज़ में गूंज उठता है। पड़ोसी की गरदन झुक जाती है मानो सामने बैठा वह आदमी उसके आदमी होने का सर्टिफ़िकेट माँग रहा हो।

ठंडे पानी के नीचे सिर डाले खड़ी औरत अब सारा कूड़ा बाहर फेंकने को बेचैन हो उठती है। कभी वह भी बहुत ही समर्थ और क़ाबिल थी। याद आता है कि मिलने वाला हर शख़्स यही तो कहा करता था –पर यह बात तो बहुत पुरानी है, आज तो थके मन और लिजलिजे हाथों से वह कुछ भी नहीं सँभाल पाती–ख़ाली तश्तरी तक झनझना कर छिटक जाती है अक्सर ही उसके हाथों से।

बिन के अंदर बैठा भूरी आँखों से कुतुर-कुतुर करता वह सहमा चूहा तक अविश्वास से घूर रहा है उसे। दोनों में से कौन ज़्यादा डरा है वह या चूहा—किसकी ज़िंदगी ज़्यादा बेईमानी है, औरत के लिए निश्चय कर पाना मुश्किल हो चला है अब तो?

झूठे बरतनों को समेटती औरत फिर से पकाने वाले कमरे में उबलने को लौट आती है। वह रोना नहीं चाहती—हारना भी नहीं चाहती, मुश्किल से घर बनाया है उसने। पर कुतरे जाना ही क्यों लिखा है औरतों की किस्मत में ?

विधाता पर, खुद पर– औरत को खीज आने लगती है– गलती कहाँ हुई और किससे हुई?—माँ से दादी से या फिर खुद उससे ही—या फिर शायद पूरी इस औरत जात से ही? पर घर तो किला है –उसका खुद का बनाया हुआ अपना सुरक्षित किला और वही तो इसकी महारानी है— औरत यह बात अच्छी तरह से जानती है। माँ ने बार बार यही समझाया था उसे। उसके पहले नानी ने माँ को, और शायद उसके भी पहले नानी को उनकी माँ ने ।—-कुतुर कुतुर फिर सुनाई देने लगती है। वही तेज होती आवाज़ें— और अब तो इनके संग बाहर और अंदर गिरते पानी की आवाज़ें भी आ मिली हैं। इन सारी आवाज़ों से बचने के लिए औरत कानों को कसकर पल्लू से ढाँप लेती है।

कौन ज़्यादा असुरक्षित है वह या चूहा, नहीं जानती वह, परंतु थकना नहीं चाहती औरत। लड़ाई चाहे कितनी भी असह्र हो, हारना नहीं चाहती वह। आँसू पोंछती औरत फिर से झूठे बरतन धोने में लग जाती है। क्योंकि साफ़ बरतनों को एकबार फिर से झूठे होने के लिए सजाना ही होगा–यही तो कहानी है जिन्दगी की—सच पूछो तो पूरे नारी संसार की–पर क़िलों में ही तो सेंध लगती है–और रानी हो या नौकरानी–अच्छा हो या बुरा, यह क़िला उसका अपना ही तो है जैसे कि वह बद्मिजाज आदमी ?

इतने सारे क्योंकि से घबराई औरत सोचती है चूहा ही सही है– उसे उठाकर बाहर नहीं फेंक पाएगी वह। सेंध तो लग चुकी है; खुद उसके अपने अंदर तक। अब कुछ भी अलग कर पाना संभव नहीं। खुद को बहुत गंदा और लाचार महसूस करती है औरत।

बस वही दिन-रात, लगातार सेंध भरने की एक और नाकाम कोशिश में एकबार फिर से जुट जाती है औरत—- यह जानते हुए भी कि सेंध भरते ही वह कुतुर-कुतुर कहीं और से शुरू हो जाएगी।

ऊपर सोने के कमरे से आवाज़ें आ रही हैं, अभी काम ख़त्म नहीं हुआ क्या तुम्हारा, सोना नहीं है आज? आओ तो मेरे लिए कौफी लेती आना!

– –अभी आई। कौफी बनाते-बनाते औरत जबाव देती है। औरत जानती है कि थका हारा सिपाही जंग नहीं जीत पाता, किले नहीं बना पाता—-और औरतों को तो हारना आता ही नहीं।

औरत अब अपनी सारी थकान सारी तलखी भूलकर, वापस अपने काम में व्यस्त हो चुकी है जैसे कि टुकुर-टुकुर उसे देखता चूहा भी। …