कहानीः अकारणः शैल अग्रवाल

Akaranशरीर यदि एक गाड़ी है, तो मन इसका इंजन। यही चलाता और साधता है सबकुछ पर यही उलझाता भी तो है। हाँ, यदि किस्मत अच्छी हो तो सुलझा भी यही देगा… कोई नहीं कह सकता कि मन के इन अंधेरों में कब कौन-सा बल्ब जल उठे और कहाँ पर क्या उजागर कर दे… फिर अकारण तो कुछ भी नहीं होता इस जीवन में…पर हमेशा कारण ढूँढ पाना, सब कुछ समझ ही जाना भी तो इतना आसान नहीं।…उसके लिए तो हरगिज ही नहीं। जाने किस उधेड़बुन में उलझ चुकी थी वह।

वह रात थी ही ऐसी रहस्यमय और डरावनी…परत दर पर परत खुद को उधेड़ती और बेहद अंधेरी। रास्ते भर ठंड और धुंध इतनी कि कुछ दिखाई ही न दे… घूमने के नाम पर बाहर निकलते ही वे सिर से पैर तक तरबतर हो जाते और फिर ऐसे ही, भीगे-भीगे और भारी-भारी कोटों को लादे घूमते रहे थे दिनभर ।

रिमझिम सुहानी बरसातों के इस देश इंगलैंड में भी अब ऐसी बारिश! अक्सर ही देखने को मिल जाती है। पर्यावरण विशेषज्ञों ने तो मौसम के इस बदलाव के लिए टूटती ओजोन लेयर से लेकर बदलते रहन-सहन व खान-पान, जाने किस-किस को दोष दे डाला है !

भारत से सद्य आए बुजुर्ग मां बाप भी साथ थे, जो अभी तक इस मौसम से अभ्यस्त नहीं हो पाए थे। बस, बेटी दामाद का मन रखने के लिए ही आयोडेक्स मल-मलके जैसे-तैसे साथ-साथ घूम रहे थे। हड्डी कंपकंपाती उस ठंड और तूफानी मौसन में 200 मील ड्राइव करके और दिनभर धूमने के बाद, रात में दस बजे के करीब ही वे कैंट स्थित मित्र के घर पहुँच पाए।

यूँ तो वे लंदन में भी रुक सकते थे, परन्तु मित्र का विशेष आग्रह था कि उसके घर पर ही उनका रैन बसेरा हो। इसी बहाने थोड़ी गपशप हो जाएगी और बड़ों का आशीष भी मिल जाएगा उसके परिवार को। मित्र का आग्रह अब भला वे कैसे टालते…वादा किया था तो पहुँचना तो था ही !

लम्बी ड्राइव और अंधेरी रात के साथ-साथ थकान का ही असर था कि पहुंचते ही जंगल जैसे मित्र के फैले और खामोश बगीचे से, हवा को चीरती इक्की-दुक्की पंक्षियों की आवाज तक भयभीत कर दे रही थी उसे । वैसे भी रात के नीरव में उल्लुओं का कर्कश चीत्कार बड़े-बड़े सूरमाओं का दिल दहला सकता है। तभी चमगादड़ों का एक समूह भी तो आंख के आगे से उड़ा था। सभी अपशगुन हो रहे थे। थकान थी या फिर किसी अनहोनी का भय, अब तो हालत यह थी कि हर आहट और चूँ, चाँय पर भी वह मन-ही-मन भगवान को याद कर ले रही थी।

ड्राइव पर कार की हेडलाइट पड़ते ही मित्र बाहर आ गया और बडे ही उत्साह से मिला. मानो खिड़की पर बैठा-बैठा ही इंतजार कर रहा था। यूँ तो कुछ देर साथ बैठे भी थे वे और थोड़ी-बहुत गपशप भी हुई थी, परन्तु कौफी के तुरंत बाद ही बाकी की बातें सुबह –कहकर उठ पड़े थे और पूछने लगे थे –‘सोने का इंतजाम कहाँ किया है?’

सभी बेहद थक चुके थे और बिस्तर तलाश रहे थे ।

….

ऊपर सीढ़ियों के सामने के दो कमरों में उनके सोने का इंतजाम किया गया था। मित्र का घर बड़ा और आरामदेह था। चार-चार शयन कक्ष थे। मुख्य शयनकक्ष में सपत्नी मित्र और बगल के कमरे में उसकी दोनों बेटियाँ, सोने चली गईं। नीचे हॉल के बगल के कमरे, स्टडी में भी एक दीवान है-जरूरत पड़ने पर उसे भी इस्तेमाल किया जा सकता है, मित्र-पत्नी ने सोने जाने से पहले यह भी बताया था उसे।

मेहमान शयमकक्ष में मां बाप को और उनकी छोटी बेटी के कमरे में पति को जबरन बच्चों सहित सुलाकर जब वह नीचे उतरी, तो कमरा खोलते ही, एक धूलभरे, बेचैन भभके ने स्वागत किया उसका।
अरुचिकर, छोटा और घुटन भरा था कमरा, पर अगले पूरे दिन पुनः पतिदेव को ही कार चलानी थी, इसलिए उन्हें यहाँ सोने देना सरासर अन्याय ही होगा- सोचा उसने।

सारे स्नेह और मर्दानी जिद के बावजूद भी, वह अकेली ही नीचे आई थी। जरूरी था कि पति रात मर पैर फैलाकर चैन से सो लेते।…

कहने को तो अध्ययन कक्ष था वह, परन्तु सुविधानुसार सभी तरह से इस्तेमाल किया जाता था। किताबों के साथ साथ खिलौने रखने के लिए भी …ऐसे खिलौने जिन्हें कभी-कभी ही छुआ जाता हो, शायद।… पूरी तरह से बच्चों के सामान से भरा था कमरा। एक कोने में पढ़ने के लिए मेज कुर्सी, जिसपर कम्प्यूटर और प्रिंटर आदि रखे थे तो दूसरी तरफ जैसे-तैसे जगह बनाकर, दीवान पर लगा बिस्तर…जो थोड़ा छोटा होने के बावजूद भी पर्याप्त ही था उसके सोने के लिए। हाँ. किताबों और खिलौनों से भरे दफ्ती के तीन चार डिब्बे जरूर बिस्तर के सामने ही एक के ऊपर एक करीने से रखे थे और उसकी थकी आँखों में गड़ रहे थे। एक गिटार भी वहीं, उनके ऊपर ही रखा था जो रात में वक्त-बेवक्त उठने पर ध्यान नहीं दिया, तो गिर भी सकता था। सबसे पहले उसने उठकर गिटार को मेज के नीचे सुरक्षित किया फिर ही जाकर बिस्तर पर लेट पाई।

थक तो वह गई ही थी, लगा कि लेटते ही सो भी जाएगी।…

सो भी गई थी, परन्तु सोते-सोते अचानक एक तीव्र दर्द के बेचैन अहसास से उठ बैठी। बेचैनी और भय इतना, मानो पीठ में अदृश्य दांत धंसे हों । पल भर को तो हिल तक नहीं पाई। फिर तुरंत ही, होश आते ही, जैसे-तैसे एक ही झटके में रजाई फेंककर उठ खड़ी हो गई। बत्ती जला कर देखा तो कहीं कोई कीड़ा-कांतर नहीं था। आश्चर्य इतना कि तकिया, रजाई व चद्दर सब उलट-पलट दिए।
कहीं कुछ नजर नहीं आया तो सोचा-नीचे गिर गया होगा…. मारा नहीं तो वापस बिस्तर पर चढ़ जाएगा। मन में मानो कैसे भी चैन नहीं था अब । तुरंत ही उकड़ूं बैठकर नहीं, ठंडी जमीन पर, लेट कर बिस्तर के नीचे झांकने लगी, तो मानो अगले पल धडकन ही रुक गई उसकी।

बिस्तर के नीचे एक के ऊपर एक चार-पांच मुस्टंडी, डरावनी गुड़िया बेतरतीबी से पड़ी धूल खा रही थी। गुड़िया- जैसी कि विश्वनाथ गली में बिकती हैं या फिर गुडिया पर्व पर गंगा में विसर्जित की जाती हैं … ठंडी और भूसे से भरी खुरदुरी –सी, अरुचिकर और मुर्दों-सी दिखती पुरानी गुड़िया। पर अचानक ही उनके आपस में गुत्थम गुत्थ हाथ और निर्जीव शरीर उठते गिरते से जान पड़े उसे, मानो सांस ले रही थीं वे । अब तो हंसती हुई-सी भी दिखने लगी थीं… उसकी कायरता का मजाक उड़ाती-सी।

विवेक कह रहा था पर, ऐसा कैसे संभव है? और उसका वह तर्कहीन डर अब पूर्णतः बेकाबू हो चला था।

लाल डोरे से कढ़े मुंह पर ताजे खून के धब्बे तक दिख रहे थे, जबकि भय के मारे आँखें बन्द थीं उसकी।

‘ तो क्या बिस्तर पर भी ये ही थीं..’, यह क्या-क्या और क्यों सोचे जा रही है वह? फालतू की बातें हैं । कपड़े की निर्जीव गुड़िया हैं, ये! ‘

माथे पर छलक आए ठंडे पसीने को पोंछकर, भटकती सोच पर तुरंत ही लगाम लगानी चाही उसने। पर वापस वहीं सो पाना संभव नहीं था अब उसके लिए ।

बचपन से ही विचलित करती आई हैं ये गुड़िया। क्यों? रहस्य तो आजतक नहीं जान पाई है वह ! हाँ इतना अवश्य जानती है वह कि अहसास हमेशा ही, इतना ही तीव्र और कष्टकर रहा है।

वशीकरण की सी मनःस्थिति में एकबार फिर अधमिंची आँखो से ही बिस्तर के नीचे झुककर दोबारा झांका उसने, तो पाया कि कपड़े की मैली, बदरंग पड़ी वे बेजान गुड़िया अभी भी वहीं पर वैसे ही पड़ी थी, एक भी उठकर खड़ी नहीं हो पाई थी और वाकई मे उठकर उसका पीछा करने में असमर्थ थीं। पर जाने क्यों मन कुछ भी मानने को तैयार ही नहीं था। बारबार लग रहा था कि उठ बैठेंगी और उसे जकड़ लेंगी। उसे तो यह तक लगा कि औंधी पड़ी-पड़ी वे गुड़िया एक दूसरे के कान में जाने क्या-क्या रहस्यमय योजनाएँ बना रही थीं। कभी भी उठकर धावा बोलने को तैयार थीं। निश्चय ही दुष्ट आत्माएँ बसती हैं इनके अंदर। काली शक्ति की कुटिल दूत-सी हैं ये , या फिर अनजान छूतभरी लाशों जैसी। छूते ही शायद कोढ़ ही फूट पड़े उसके शरीर से। इन्हें तो तुरंत ही जला देना चाहिए। लिजलिजी विष्तृणा से मन भर आया उसका।

गुड़्डों का रूप तो और भी विकराल था । कुछ की तलवारें दूसरों के पेट में धंसी हुई थीं तो कुछकी खुद उनकी अपनी ही गर्दन में। जाने कितने-कितने क्रूर अत्याचारियों की आत्मा दिखने लगी थी अब उसे उनके अंदर। जाने कब और किस अगले-पिछले जनम में इनके चंगुल से निकलकर भागी थी वह। छटपटाहट और बेचैनी अभी भी ज्यों कि त्यों ही थी।

एक अज्ञात भय गला घोट रहा था उसका। अब उन्हें देखना तो दूर, उनके आसपास होना मात्र उसे जड़ करने को पर्याप्त था।

ऐसी बात नहीं कि मन में बस नफरत ही नफरत हो इनके प्रति। शो केस में सजा कोई-कोई गुड्डा कभी बेहद अपना-सा और खास भी लगा है उसे, जैसे कि कोई-कोई गुड़िया भी। पर पास जाने को, हाथ लगाने को, ना तो मन ही किया कभी और ना ही हिम्मत ही हुई कभी।

अपने हिस्से के इस अबूझ कायरपन में अक्सर ही वह बेहद लाचार भी महसूस करती है ।

‘क्यों इतना सारा भय और अंधेरा लेकर पैदा हुई थी, तू … सबसे अंधेरी, सबसे काली रात को … मौनी अमावस्या के दिन!’

दादी ने उसके डरपोक और विचिश्र स्वभाव को देखकर कई बार झिड़का और समझाया भी था उसे। पर मेरे बस में तो नहीं था दादी दिन छांटना- रुँआसी वह बस इतना ही कह पाई थी।

सुनते हैं हठ योगी कड़ी साधना करते हैं इस दिन । क्या पता वह भी कोई ऐसी ही योगिनी रही हो और उसका अनुष्ठान बीच में ही भंग कर दिया गया हो और अब उसी की सजा भुगत रही है वह। तभी तो ये अंदरूनी अंधेरे भांति-भांति के रूप धरकर घेरे ही रहते हैं उसे। और उन्हें सुलझाने के प्रयास में मन की ही नहीं, जाने किन-किन अगले पिछले जनम की गुत्थियों में उलझ कर रह गई है वह।…कुछ भय तो बेहद आम से ही हैं जैसे कि अपनों को खोने का भय, मृत्यु का भय, जो सभी महसूस करते हैं, परन्तु कुछ बेहद अबूझ और जटिल भी तो, जैसे कि यह कपड़ों की गुड़ियों वाला।…

फिर बात यही तो नहीं रुकती, एक छठी इंद्रिय भी तो है उसके पास, जो कभी तो एक सहृदय मित्र-सी घटनाओं का पूर्वाभास दे देती है, तो कभी एक षडयंत्रकारी दुश्मन-सी पूर्णतः उलझाकर रख देती है।
वह रात भी ऐसी ही रहस्यमय रात थी। बाहर पास ही किसी पेड़ पर उल्लू अभी भी चीत्कार किए जा रहा था। उठकर देखा तो बाहरवाली खिड़की ठीक से बन्द थी।

अब वह पूरी तरह से ठंडी और पसीने से लथपथ थी , बिल्कुल उन्ही पुरानी गुड़ियाओं की तरह। बस उनके बीच में जाकर अवश लेटना ही बाकी रह गया था। क्या पता तब उसकी आत्मा भी हमेशा के लिए वहीं कैद होकर रह जाए । बचाना ही होगा अब उसे खुदको जब तक वक्त है। विवेक से अधिक भय ने जकड़ लिया था अब उसे। भय का भीषण ताण्डव चलने लगा था उसके चारो तरफ। भागना चाहा तो पैर वहीं के वहीं जमते चले गए। चीखना चाहा तो गले में आवाज ही नहीं थी। इसके पहले कि कोई बड़ा अनर्थ हो, तब कैसे भी हिम्मत जुटाकर तेजी से कमरे के बाहर निकल आई वह।

विकल, दरवाजे लुढ़काए ही नहीं , की होल में लगी चाभी को भी कांपती उंगलियों से दो, तीन बार घुमाया । यही नहीं, फिर-फिरके धक्का भी दिया और देखा भी कि ताला ठीक से बन्द हुआ भी है या नहीं। इस असंभव सी परिस्थिति में भी मन ही मन हंस रही थी वह। पागलपन की हद है यह तो- ‘ भला कपड़े की गुड़िया कैसे चलकर बाहर आ सकती हैं-‘वैसे ही जैसे कि बिस्तर पर।‘ भय था कि किसी भी तर्क को सुनने या मानने को तैयार ही नहीं था। जानते हुए भी कि वे सारी डरावनी गुड़िया कमरे में बंद थीं और वह उनकी पहुँच से दूर बाहर ड्राइंग रूम में खड़ी थी। पर वह अब खुद को संयत नहीं कर पा रही थी।

खुद के ही विचार तरह-तरह से डरा रहे थे उसे।

दिसंबर महीने की कड़ाके की ठंड थी और हड़बड़ी में रजाई तक अंदर छूट गई थी उससे परन्तु अब वह वापस कमरे में कैसे जा सकती थी?

घड़ी देखी तो रात के दो ही बजे थे। लम्बी रात आगे थी। पर किसी को जगाना भी तो ठीक नहीं। ‘ सभी बेहद थके हैं ।’ –सोचते-सोचते वहीं सोफे पर उकड़ूं-सी लेट गई वह। एक गद्दी का सिराहना लगा लिया और कोट के अंदर जैसे-तैसे थरथर करते हाथ पैरों को छुपा लिया ।

पर लाख कोशिशों के बावजूद भी नींद अब थकी आँखों से दूर जा छिटकी थी और यादों ने एक और नया चलचित्र चला दिया था बोझिल आँखों के आगे।

बरसों, बरसों पुरानी बात है यह… मुश्किल से चार-पांच साल की ही रही होगी। दशाश्वमेध घाट पर दमघोटू भीड़ थी। आसपास के गांव से आई सैंकड़ों लड़कियों के हाथ में बेंत और भूसे की बनी छोटी-छोटी टोकरियाँ थीं और उन सबके अंदर पीली, गुलाबी गोटे लगी साड़ियाँ पहने कपड़े की गुड़िया लेटी हुई थीं।

इतनी सारी गुड़िया?

हाँ आज गुडिया पर्व है न ! ये सब गंगा में बहाई जाएंगी।

पापा ने बताया तो भय और आश्चर्य से उसका मुंह खुला-का खुला रह गया। फिर लपक कर पापा की गोदी में चढ़ गई थी वह। बेहद बेबस और लाचार लगी थीं उसे वे सारी गुड़िया। इन्हें यह मृत्युदंड क्यों आखिर, इनके साथ तो बस खेला जाता है?…अबूझ रहस्य ही तो था यह भी बाल मन के लिए।

अब गंगा में नहाना तो दूर , नीचे पैर रखना तक संभव नहीं था उसके लिए। जैसे तैसे सीढ़ियों पर ही पानी के छींटे देकर लौट आए थे दोनों , बाप बेटी। फिर घर आकर पापा के साथ बैठ कर गुड़िया का हरे रंग का किमखाब का मंहगा और सुंदर लंहगा सिला था उसने । साथ में गुलाबी रंग की रेशमी चूनर भी। दोनों पर ही मोती और गोटे भी टांके गए थे। यही नहीं, लौटते समय नारियल बाजार से छोटे छोटे गहने भी ले आए थे पापा। पायल, कड़े, करधनी और गले का हार सभी कुछ। कुछ भी तो नहीं छोड़ते थे पापा उसके लिए…सबकुछ ही बढ़िया से बढ़िया। फिर सब कुछ उन्होंने गुड़िया को पहना भी दिया था। अब गुड़िया वाकई में बेहद सुंदर लग रही थी… परन्तु सिर्फ दूर से …आगे जो हुआ, उसकी याद मात्र से पुनः उद्विग्न हो चली थी वह। करवट बदल के पुनः सोने की कोशिश की तो आँखें बन्द करते ही तस्बीर पुनः वहीं से वापस चलने लगी, जहाँ पर अभी-अभी छोड़ी थी उसने ।

‘ ले अपनी गुड़िया ले’ – कहकर पापा ने गुड़िया उसे फिर पकड़ानी चाही थी पर जाने क्यों भय की एक झुरझुरी रीढ़ की हड्डी तक कंपकंपा गई थी। हाथ में आते ही बेजान मुर्दे-सी ठंडी हो गई थी वह सजी संवरी गुड़िया और छिटककर दूर जा गिरी थी ।
अशुभ की आशंका मात्र से उसका मुंह दूसरी तरफ मुड़ गया था और आंखें स्वतः बन्द हो गई थीं। बस रोई या चीखी ही नहीं थी वह। पापा की बहादुर बेटी जो थी। पर भयभीत और कांपते हाथों से छिटक कर दूर जा गिरी गुड़िया को वापस उठाने की हिम्मत नही थी अब उसमें। भय से कांप रही थी वह। तब पापा ने बारबार गुड़िया उठाई थी और देनी चाही थी । निराशा साफ दिखाई दे रही थी उनकी आंखों में, परन्तु पकड़ना तो दूर, देखने तक की हिम्मत नहीं बची थी उसके पास ।

आज भी तो वही सिलसिला है।…

एक-से-एक सुंदर गुड़िया खरीदी गईं , बनाई गईं, और फिर फेंक भी दी गईं या फिर इधर उधर कर दी गईँ। एक बार उठाकर नीचे रख दी तो कभी वापस हाथ में नहीं ले पाई है वह इन्हें । धड़कनें अब भी धोंकनी की तरह ही चलती हैं देखते ही।

सिलसिला कब और कैसे शुरु हुआ, याद नहीं, बस इतना याद है कि हमेशा से ही डर लगा है उसे इनसे , बहुत डर। कोई बताए या न बताए , इनके आसपास होने का आज भी तुरंत अहसास हो जाता है उसे और फिर एक ठंड़ा रहस्यमय डर अपंगु कर देता है उसे। बिल्कुल वैसा ही जैसा कि मुर्दे की काठी का शरीर से छू जाने पर लगता है, जैसा कि हाल में जिठानी की मृत हथेलियों पर मेंहदी लगाने के आग्रह पर लगा था। या फिर अंतिम चरण-स्पर्श के समय ठंडी बिछुओं से सजी पैर की उंगलियों के छू जाने पर लगा था…। जानती है कि इस तरह के भय की जरूरत नहीं जीवन में , फिर भी डर है कि लगातार पीछा करता रहा है…वह भी एक रहस्यमय जासूस की तरह। डर जिसके रहते आठ साल की उम्र में ही पूरे स्कूल में उपहास का विषय बन गई थी वह।

शुरुवात के दो तीन वर्ष तक तो कैसे भी छुपा रखा था उसने यह सब नन्हे नटखट सहपाठियों की टोली से । सारे भय को मन के अंदर ही अंदर दबाए, छुपाए चार साल की बच्ची भी आँख बन्द करके चुपचाप निकल आती थी स्कूल की उस सजी संवरी गुडियों की अल्मारी के आगे से । प्ले टाइम में उन बच्चों से दूर रहती जो उन गुड़ियों से खेलते। किसी को भी पता नहीं चलने दिया था उसने अपनी इस अकारण और हास्यास्पद कमजोरी के बारे में। साथियों के आगे तमाशा नहीं बनना है-इतना बोध या समझ थी उस छोटी-सी उम्र में भी ।

पर उस दिन पता चल ही गया था सबको । सहेली ने लंदन गए पिता से अपने साथ-साथ उसके लिए भी गुड़िया मंगवाई थी। उसकी सबसे प्यारी सहेली जो थी। गुड़िया बेहद सुंदर और मंहगी व बेहद प्यारी भी थी। भूरे बालों और नीली आंखों वाली उस गुड़िया ने एक सुंदर सा हैट भी पहना हुआ था। गुलाबी सलोना मुंह तो सिरैमिक का था पर हाथ पैर और बदन वही कपड़े के लिजलिजे, ठंडे और मुर्दे से बेजान ही थे। और तब यहीं आकर उसका सारा उत्साह ठिठक गया था। इसी बेजान मुर्दीले ठंडे अहसास से ही तो डर लगता था उसे। डर जो दम-घोटू था। गले में पत्थर-सा अटक जाता था।

गुड़िया देने आई, तो बजाय गुड़िया को हाथ में लेने के वह तेजी से दूर भागी थी। और तब कक्षा के हर बच्चे को पूरी कहानी समझ में आ गई थी । तुरंत ही एक बड़ा कौतुक…मज़ाक बन गई थी वह सबके लिए। यही नहीं, कक्षा के सबसे शरारती लड़के विपिन ने तो गुड़िया लेकर पूरे स्कूल में ही दौड़ा दिया था उसे। पर पकड़ नहीं पाया था वह उसे। वैसे ही जैसे कि वह गली का मरघिल्ला-सा कुत्ता भी नहीं पकड़ पाया था उसे , जब गलती से स्कूल से लौटते समय पूंछ पर पैर पड़ गया था उसका।

भय भी तो अद्भुत शक्ति देता है, रहस्य बचपन से ही भलीभांति जान गई थी वह। यह बात और है कि घर पर पता चलने पर, और प्रिंसिपल से शिकायत होने पर उसके पिता ने जमकर बेल्ट से पिटाई की थी उस शरारती लड़के की और अपने पिता के साथ उससे माफी मांगने भी आया था वह घर पर। देखकर संतोष तो हुआ था, पर डर नहीं गया था उसका। डर, जिसकी याद मात्र विचलित करने को, ठंडा करने को पर्याप्त है आज भी।

शिक्षक ने कहा था कि मैं अपने हाथ में पकड़ूंगा गुड़िया, फिर तुम इसे छूना और मुझे विश्वास है कि तब तुम्हें डर नहीं लगेगा। …पर ऐसा कुछ नहीं हुआ । मौका ही नहीं दे पाई वह उन्हें। विश्वास ही नहीं कर पाई इतना उन पर। जब पापा के हाथ में रखी गुड़िया डरा सकती है, तो संभव ही नहीं कि किसी और के हाथ की न डराए…बहुत कोशिश की थी पापा ने भी तो…। हर दूसरे दिन एक नयी गुड़िया बनाते। कहीं भी जाते तो अन्य खिलौनों के साथ गुड़िया ही खरीदकर लाते। वयस्क होने तक यही सिलसिला रहा। विभिन्न प्रान्तों से विभिन्न वेशभूषा की गुड़िया। दूर- सुदूर देशों की अनूठी गुड़िया। खड़ी गुड़िया, बैठी गुड़िया , नृत्य करती गुडिया, तरह तरह की उन गुड़ियाओं से पूरा कमरा भर गया था उसका। करीब करीब जितनी गुड़िया उतनी ही किताबें थीं तब उसके कमरे में।… फिर भी बेटी का डर नहीं गया तो उन सभी गुड़ियों की सामूहिक चिता भी जलानी पडी थी पापा को ही, वहीं घर के पिछले बगीचे में।…

यूँ तो उनके दयालु स्वभावानुसार गली के गरीब बच्चों में भी बांट सकते थे पापा वे मंहगी गुड़िया , पर शायद जानते थे कि उनमें से ही कोई एक दिन गुड़िया लेकर उसे डराने पहुँच जाएगा। कितना प्यार करते थे अपनी पगली बेटी से और कितना सोचते थे उसके बारे में हर पल… याद करते ही, आज भी तो आंखें छलक ही पड़ती हैं उसकी।

या फिर शायद पहली बार तब डरी हो वह, जब गुड़ियों का एक जोड़ा सिंदूर से मुंह पुता बगीचे में कटहली चंपा की डाल पर टंगा दिखा था पांच साल की बच्ची को और मेहरी ने मां से कहा था- ‘ भगवान हर अलाय-बलाय से बचाए, मांजी। यह तो निश्चय ही काला जादू जान पड़ता है। ‘

बात जाने कैसी मन में जा धंसी थी कि आज तक हर गुड़िया काले जादू को लेकर ही घूमती नजर नहीं आती हैं उसे। या, वह दिन रहा होगा, जब घर के दरवाजे पर आलपिनों से बिंधी और कड़वे तेल में डूबी, औंधे मुंह पड़ी वह गुड़िया जिसके मिलते ही कोई हाथ भी नहीं लगा रहा था, उसे।

‘ कौन जाने, कैसा टोटका है बाबूजी। अब कौन अपनी जान माल का खतरा ले।‘- कहकर सभी नौकर पीछे हट गए थे। सौ का नोट भी लालच नहीं दे पाया था उन्हें। तब एकबार फिर पापा ने ही उस बदनसीब गुड़िया को ठिकाने लगाया था। हाँ माँ जरूर बारबार डरी-डरी सबके लिए प्रार्थना किए जा रही थीं और वह- एक डरी सहमी बच्ची महीनों अनिष्ट की आशंका से कांपती रही थी। या फिर इस भय की शुरुवात जरूर तभी हुई होगी जब वह खुद से भी बड़ी एक जापानी गुड़िया दिल्ली के पहले अंतर्राष्ट्रीय मेले से खरीदकर ले आई थी और करौंदे के पेड़ के नीचे बनाए गुड़ियों के घर में बिठाकर रातभर भूल गई थी । और अगली सुबह कपड़े की वह गुड़िया रातभर तेज आंधी पानी सहती , बदरंग मुर्दे सी एक ओर ढुलकी मिली थी उसे। भयानक दिख रही थी। सुना तो यह भी था कि 11 साल बड़े भाई ने बदहाल गुड़िया की गर्दन को दरांत से रैंद कर बगीचे के पिछले हिस्से वाली पानी की टंकी में फेंक दिया था। वहीं जहाँ शहतूत और इमली के पेडों की कतार थी और जिनपर रहती चुड़ैलों की कहानी सुनाना वे कभी नहीं भूलते थे। फिर तब जब वह आधी झूलती गर्दन के साथ बदरंग बदबूदार गुड़िया फूलकर और भी कुप्पा हो गई थी, तो देख मुर्दा कहकर खूब डराया भी था उसे। मां बताती हैं कि महीनों बुखार नहीं उतरा था उसका ।

जाने अनजाने, यादों और अहसासों की ये गुत्थियां अक्सर यूँ ही तो गहरे जड़ जमा लेती है। हद तो उस दिन भी हो गई थी जब वह खुद ही बेटी के लिए विभिन्न देश-विदेश से लाई सुंदर गुड़ियाओं को बिस्तर के ऊपर एक रैक में करीने से सजा आई थी। गुड़ियाओं के शरीर का कोई भी हिस्सा कपड़े का बना न हो, खरीदते वक्त विशेष ध्यान रखती थी वह। इसलिए उनसे डरने का तो सवाल ही नहीं उठता था। पर शाम को ही पहली बार घर आए मित्र ने देखते ही कह दिया- ‘ इतनी बड़ी-बड़ी गुड़िया और यूँ लटकी हुई ! बिल्कुल कब्र से उखाड़े बच्चों सी लग रही हैं, ये तो।‘

कहकर वह तो चला गया था, पर उन्हें वह फिर उस कलात्मक नजर से वापस कभी नहीं देख पाई थी वह।

उसके बदलते चेहरे के रंगों को देखकर और दफ्ती के डिब्बे में बन्द करके उन्हें गैराज में ले जाते देखकर, पति ने समझाया था – ‘ मानसिक बीमारी से त्रस्त है यह आदमी। इसकी बातो पर ध्यान मत दो। ऐसे जरा-जरा-सी बात पर विचलित होओगी, तो कैसे जिओगी?‘ कैसे अब वह समझाती पति को कि भय मात्र एक रसायनिक प्रक्रिया ही तो नहीं …कुछ अबूझ और अनजाना-सा भी तो है जो आगाह करता रहता है आगत से । सावधान रहने को, लड़ते रहने या पलायन करने को बाध्य करता है। जड़ हो जाता है विवेक, तब। निर्जीव, एक धोंधे-से अपने ही मन की अनदेखी कंदराओं में जा छुपने को बेचैन हम, खुद को बचाते, सहारा ढूँढते, बिना कुछ जाने या सोचे-समझे कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं, तब। एक तरह की विवशता ही तो है यह भी, वरना सारे ये छठी इंद्रियों वाले अहसास चुटकियों में समझ में ही न आ जाते !

वजह जो भी हो, पर आज जब वह पचास से ऊपर हो चुकी है , भय ज्यों-का-त्यों साथ है और वह मानती है कि हास्यास्पद है। पर जरूरी तो नहीं कि हर बात तर्क से ही जानी-समझी जाए। कोई पागलपन या फिर किसी अगले पिछले जन्म का अवचेतन अनुभव या आत्म-संचय या आत्म-सुरक्षा की भावना या कोई सेफ्टी मैकेनिज्म भी तो हो सकता है यह हमारा। ‘

रात के नीरव सन्नाटे में घड़ी की टिकटिक के साथ उसकी सांसें जोरदार लय देने लगी थीं । नगाड़े-सी सुनाई दे रही थीं उसे। शायद ह्रदयाघात की शुरुवात ऐसे ही होती हो और शायद यही इन गुड़िया का षडयंत्र भी रहा हो ! पर यह सब वह कहती किससे ? किसके साथ बांटती, जो उसकी बात को समझता और मानता ? सच तो यह था कि कहती भी तो क्या कहती? जानती जो थी कि सुनने वाले हंसेगे ही, कोई विश्वास नहीं करेगा उस पर…इतनी बड़ी होकर भी डरती है- वह भी कपड़े की गुड़िया से !
सोचते-सोचते , बैठे-बैठे ही सुबह हो गई ।

पापा जगे तो उसे देखते ही चिंतित हो उठे। पूछा, ‘ यहीं सोई थी क्या तू? हमारे पास ही आ जाती, या फिर एक बच्चे को उधर, हमारे पास भेज देती !’…

‘ नहीं पापा , आराम से सोई हूँ मैं यहाँ पर। बस अभी-अभी ही तो उठी हूँ। ‘

उसके सफेद झूठ पर कोई भी विश्वास नहीं करता, फिर पापा तो पापा थे। अविश्वास से एकटक घूरते ही रहे उसे। जब और न सहा गया तो आंख के नीचे जमी थकान को हथेलियों से पोंछते हुए होठों ही होठों में बुदबुदाई, ‘ पापा , आप तो जानते ही हो, नई जगह में सोने में थोड़ी बहुत परेशानी तो होती ही है।‘ …

अब पापा कैसे रुकते, तुरंत ही लाडली कैसे सोई, जानने के लिए कमरा भड़भड़ाकर खोल दिया।

इसके पहले कि वे कुछ जान या समझ पाएँ –बिजली की सी तेजी से वह भी दौड़ी और तुरंत ही उन्हें रोकती-सी उन तक जा पहुंची। प्रार्थना करती-सी पापा को कमरे से बाहर खींच लाई।

‘ प्लीज पापा, अब और नहीं। चलो, चलते हैं अब हम यहाँ से। रसोई घर में नाश्ते की तैयारी हो रही है। मैं मदद करने जा रही हूँ । पर अब आप वहाँ, प्लीज वापस मत जाना। थोड़ी धूल है उस कमरे में और मैं नहीं चाहती कि आपकी भी सांस फूले।‘

कहने को तो वह सब कुछ कह गई थी, पर जाते-जाते चोर नजरों से एकबार फिर उसने पापा की ओर देखा तो पाया कि पापा की झुकी और निराश आंखें निश्चय ही रात का सारा रहस्य जान चुकी थीं।…

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