ललितः सखि बसंत आया-पद्मा मिश्रा/ लेखनी-मार्च-अप्रैल 17

सखि ,बसंत – -आया !

कहते हैं बसंत आता नहीं ले आया जाता है,बसंत मनोभावनाओं का ही प्रतीक होता है,-बसंत की मादकता अरण्य में शीतल मृदु बयार की सुगंध ले आती है,प्रकृति का स्वरुप निखर उठता है,पतझड़ के बाद पृकृति अपना पूरा श्रृंगार करती है,जैसे मन में व्याप्त निराशा के अंधेरों के बाद आशा की उजली किरण जीवन को उमंग और उत्साह से भर देती है,- — सुख-दुःख ,हर्ष-विषाद के पलों में भावनाओं की तरलता -संवेदना और अनुभूति भी बसंत के आगमन की कल्पना मात्र से परिवर्तित हो जाती है,–
”एक बार फिर लौटा है बसंत,
मुस्कराई कलियाँ भावनाओं की ,
दुःख के अंधेरों का होने लगा है अंत,
एक बार फिर लौटा है बसंत! ,
पतझड़ के झरे पत्ते, अतीत के कटु अनुभवों, अनुभूतियों की तरह जीर्ण ,पुरातन के नष्ट भ्रष्ट हो जाने के बाद नव पल्लवों ,नवांकुरों
की तरह नित नूतन को स्वीकारने का अद्भुत संदेश देते है बसंत -पंत जी ने कहा था –”द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र ! ,बसंत सृजन का उत्सव है,और नविन पत्रों-पल्लवों के अंकुरण को गति , देता है ,सृजन अधिष्ठात्री देवी होने के कारण वाक् देवी माँ सरस्वती की पूजा अर्चना भी की जाती है, निराला जी ने अपनी एक कविता में माँ वाणी को नमन किया है,–‘वर दे वीणा वादिनी वर दे,नव गति नव लय -ताल छंद नव -नव नभ के नव विहग वृंद को -नव पर नव स्वर दे -वर दे वीना वादिनी वर दे ”सवयम निराला जी का जन्म बसंत पंचमी के दिन हुआ था इसलिए उनकी आराध्या माँ वाणी ही थींइस बसंत माह में साहित्य-रचनाधर्मिता एवं सृजन से जुड़ेलोग निराला जयंती भी मनाते हैं – नित नूतनता का चिर संदेश लाता है बसंत -कब चुपके से चला आता है ,सूरज की लालिमा ,सरसों के फूलों की पीताभा ,और नील लोहित गगन का सौंदर्य द्विगुणित हो जाता है – हमारे प्रदेश में यह बसंत उत्स्व के रूप में संक्रांति ,पोंगल,बिहु,लोहड़ी जैसे त्योहारों के साथ धरती की हरीतिमा को साथ ले बसंत का पावन अभिनन्दन किया जाता है,संस्कृत साहित्य में ”गुप्त काल में ‘मदनिका; नामक उत्स्व मनाया जाता था, जिसका सम्बन्ध कामदेव व् रति के प्रणय प्रसंग से जोड़ा जाता था,वैदिक काल में भी बसंतोत्सव मनाने का उल्लेख मिलता है,
बसंत का आगमन देश-प्रदेश की सीमाओं के पार भी मन के राग-विराग से जुड़ा उमंग व् उत्साह का एक पर्व है,विशेष रूपसे हमारे झारखंड में यह पृकृति की पूजा-वंदना का और उसके प्रति मानव-जाति के समर्पण का पुनीत त्यौहार है,टुसु इसी का एक अंग है,आदिवासियों में इसे प्रकृति की देवी के रूप में पूजते हैं हमारे नगर जमशेदपुर में भी अनेक सामाजिक,सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संस्थाओं के द्वारा बसंत का स्वागत अतयंत भावभीने ढंग से करते हैं,बहुभाषीय संस्था ‘सहयोग’साहित्यिक संस्था होने के नाते साहित्यिक -कवि गोष्ठियों के रूप मेंबसंत की अगवानी पीले फूलों से और पीले वस्त्रों से श्रृंगार कर नृत्य-गान के रूप में भी मनाते हैं,डॉ जूही समर्पित इसे एक राग और उत्साह का पर्व मानती हैं ,मन की भावनाओं से जुड़ा होने के कारण मन की उदासी भी यह बसंत
भांप लेता है,– हर पात ,पात -हर किरण हर किरण ,
हर डाल ,डाल बिखरा बसंत ,
पर जिनकी खुशियां रूठीं हैं
उनके आंगन कैसा बसंत ?
सीमा पर देश की रक्षा के लिए लड़ने वाले वीर जवान हर राग रंग उत्स्व को भूल केवल देश के लिए समर्पित रहते हैं ,कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान कहती हैं –”वीरों का कैसा हो बसंत ?”
बसंत की श्री एवं वैभव का जीवन के हर्ष विषाद -राग-विराग से गहरा सम्बन्ध है ,बसंत है तो खुशियां हैं ,जीवन यदि बसंत है तो युवा मन सदैव उत्साह -उमंग से भरपूर रहा कर अपना लक्ष्य प्राप्त जरुर करेंगे — यह भी यह एक संयोग मात्र है कि पश्चिमी देशों के संपर्क से बसंत के महीने में ही ”वैलेंटाइन डे ”प्रेम का उत्सव भी अब भारत में मनाया जाने लगा है-, बसंत का ह्रदय खोल कर स्वागत करें -उसकी लालिमा और सृजन धर्मिता को जीवन में अपनाएं यही बसंतोत्सव का सन्देश है –तभी तो कहते हैं न कि ”बसंत आता नहीं ले आया जाता है ”