गीत और ग़ज़ल-राकेश जोशी/ लेखनी-मार्च-अप्रैल 17


1
आदमी के लिए ज़िंदगानी तो लिख
धूप कोई कभी आसमानी तो लिख
छुट्टियों में भला, जाएं बच्चे कहाँ
हर किसी के लिए एक नानी तो लिख
हो शहर में कोई एक ऐसी नदी
जिसमें सबको मिले, थोड़ा पानी तो लिख
आज फिर बैठकर कोई कविता सुना
और जनता हुई है सयानी तो लिख
ये ज़मीं, आसमां हैं सभी के लिए
चाहे झूठी सही, ये कहानी तो लिख
मेरे बचपन के सपने में तू एक दिन
एक राजा तो लिख, एक रानी तो लिख
जिसमें ज़ुल्मो-सितम ख़त्म हो जाएंगे
वो सुबह हमको लेकर है आनी तो लिख
गांव, कस्बे, नगर, और सारे शहर
और सबकी है ये राजधानी तो लिख
हर किसी के लिए एक घर, एक दिन
भोर सबके लिए वो सुहानी तो लिख


2
तुम तहख़ाने से डरते हो
तभी तो आने से डरते हो
पत्थर से मिलते रहते हो
बुत बन जाने से डरते हो
तुम भी औरों के ही जैसे
धोखा खाने से डरते हो
गीत जो मैं लिखकर आया हूं
उसको गाने से डरते हो
सच्ची बातें वो कहता है
तुम दोहराने से डरते हो
लोग तो खोने से डरते हैं
तुम तो पाने से डरते हो
सुबह बहुत है दूर सभी से
उसको लाने से डरते हो
आंसू की लाचार नदी में
तुम बह जाने से डरते हो
कैसे बादल हो बोलो अब
अक्सर छाने से डरते हो
दुनिया की इन दीवारों से
सर टकराने से डरते हो
परिचय:
डॉ. राकेश जोशी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड में अंग्रेजी साहित्य के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. इससे पूर्व वे कर्मचारी भविष्य निधि संगठन, श्रम मंत्रालय, भारत सरकार में हिंदी अनुवादक के पद पर मुंबई में कार्यरत रहे. मुंबई में ही उन्होंने थोड़े समय के लिए आकाशवाणी विविध भारती में आकस्मिक उद्घोषक के तौर पर भी कार्य किया. उनकी कविताएँ अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं. उनकी एक काव्य-पुस्तिका “कुछ बातें कविताओं में”, एक ग़ज़ल संग्रह “पत्थरों के शहर में”, तथा हिंदी से अंग्रेजी में अनूदित एक पुस्तक “द क्राउड बेअर्स विटनेस” अब तक प्रकाशित हुई है. डॉ. राकेश जोशी की ग़ज़लों को दुष्यंत कुमार की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली ग़ज़लें माना जाता है. उनकी ग़ज़लों में आम-जन की पीड़ा एवं संघर्ष को सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है, इसलिए ये आज के इस दौर में भीड़ से बिलकुल अलग खड़ी नज़र आती हैं.
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