कविता आज और अभी/लेखनी-मार्च-अप्रैल 17

“तुम नारी हो ।”


1
तुम नारी हो
हिस्सा हो जीवन का
आधी दुनिया ही नहीं
तुम दिवा रात्रि का
सृष्टि द्वार भी हो
उषा फैलाती हो
एक बदली हो ,जब चाहे
बिज़ली बरसाती हो
बहती पुरवाई हो
तुममे ही है ,प्राणों का सम्मोहन
सच कहूं तो तुम ही हो
जग की मुस्कान
इसलिए उडो
पंख फैला कर
खुले आसमान में
क्यूंकि न होगी पूजा
न कोई मसीहा आएगा
तुम्हारी शक्ति सृज़न का
सृजन ही तुम्हें
आकाश दिलायेगा ।
2
‘नारी विमर्श ।’
यह कैसा विमर्श है
नारी की पहचान
ढूँढ़ने को
मोहल्ले -गाँव -चौपाल
शहर -गलियो में
देश विदेश से
आ रहे हैं प्रबुद्धजन ?
जबकि वह चाँद को छू आई है
ओलम्पिक में धाक जमाई है
खोल कर अपने बँधे पंख
उसने उड़ान में
नयी ऊँचाई पायी है
वो कहना चाहती है
इंसान ना मानों आप
परिंदा मान कर ही
आज़ाद क्यों नहीं छोड़ देते?
एक अदद ज़मीन
और हौंसलों का आसमान
क्यों नहीं छोड़ देते
जहाँ वह उन्मु््क्त उड़ सके
अपने फैले पंखों के साथ
डॉ. सरस्वती माथुर
ए-2,सिविल लाइन
जयपुर-6

मेरे प्रश्न 

मेरे प्रश्न
तुम्हारे विरोध में नहीं
मगर अफ़सोस कि
नहीं कर पाते हैं ये समर्थन भी
 
ये प्रश्न हैं
सिर्फ और सिर्फ खालिस प्रश्न
जो खड़े हुए हैं
जानने को सत्य
ये खड़े हुए हैं धताने को उस हवा को
जो अफवाह के नाम से ढंके है जंगल
 
ये सर्दी, गर्मी, बारिश
और तेज़ हवा में डंटे रहेंगे
तब तक
जब तक इनके लिए
मुझ तक भेजे गए तुम्हारे उत्तर के लिए
नहीं हो जाते मजबूर
ये मेरे हाथ, मन और मष्तिस्क
देने को पूर्णांक
 
सनद रहे
कि ये प्रश्न इन्कार करते हैं
फंसने से
किसी छद्म तानों से बुने झूठ के जाल में
ये इन्कार करते हैं
भड़कने से
बरगलाए जाने से
बहलाए जाने से
फुसलाये जाने से
 
ये हुए हैं पैदा
सोच के गर्भ से
 
यूं ही नहीं…
इन्हें उत्पन्न होने को किया गया था निमंत्रित
जानने के हक के अधिकार के द्वारा
 
और ये अधिकार हुआ था पैदा
स्वयं इस सृष्टि के जन्म के साथ
भले ही तुम्हारे संविधान ने
तमाम लड़ाइयों के बाद ही
इसे दी हो मंजूरी
 
देखो नीचे खोलकर अपनी अटारी की खिड़की
प्रश्न खड़े हैं
करो पूर्ण उत्तर देकर युग्म
और समयावधि तुम्हें है उतनी ही
जिसमे कि ना जन्मने पायें प्रतिप्रश्न
न मेरे मन में
और न ही प्रत्यक्षदर्शियों के..
उतनी ही
जितने में कि
ना मिल पायें कुछ और स्वर
मेरे स्वर में..
दीपक मशाल 

हाँ तुम ही !

आधी रात हुई है
आँगन सूना सा
कुछ सितारे चमक रहे है……
बादल घिरे है…..
ठंडी हवा से मन मुस्कुराता है
जैसे नशीला बहाव
शांत खडा ये पारिजातक
ठंडी लहर के साथ करवट बदलती
टहनियाँ तुम्हारी याद दिलाती
सफ़ेद चादर से फैले फूलों के देखकर
तुम्हारी सादगी और शांत.स्वस्थ मन
जो जीवन की कठिनाईयों से
लड़ने के लिए मुझे स्थिरता देता है
हर पल….
कुछ चीटियाँ रेंगती सी
कानाफूसी करती हुई….
मगर तुम हमेशा कहती हो…
यही जीवन है जिसके बीच हमें
रहना है खुश…
तुम नहीं जानती
मेरे लिए तो तुम हो |
यही अहसास जीने का मकसद है
हर्षोल्लास से भरे
तुम्हारे विचारों ने
हमेशा मुझे खुश रखा
जीने का नया तरीका और बदल दी
मेरी पूरी ज़िंदगी को तुमने
जिसे मैं चाहता था |
वही तुम हो
हाँ तुम ही !
-पंकज त्रिवेदी

प्यारा गुलाब

1.
कॉटों पर खड़ा मुस्कुराता
रूप गंध लुटाता
सब के मन भाता
पर खिलते ही
तोड़ लिया जाता
कभी देवता पर चढाने के बहाने
कभी घर को सजाने वास्ते
कुटता पिसता नित नित
बोतलों में बन्द बिकने को
बाजारों में पहुंचा दिया जाता
खूबसूरत कब सुरक्षित यहाँ
गुणी कब सम्मानित यहाँ
परोपकारी नहीं पूजित जहाँ
सहृदय नित नित तिरस्कृत
मिटकर ही जाना गुलाब ने

2.
आज भी किताबों के पन्नों में
सूखे सिसकते कितने दबे गुलाब
गुजरा जमाना था वह भी हमारा
अब ना वो रंग ना रूप ना आब
फिदरत है यह भी तो इन्सान की
मुनाफे की ही सोचना
रिवायत है यह भी उसकी दुनिया की
किसी को गुलाब कहना
और किसी और के जूड़े में
इन्हें टांकना
सराहना किसी को, किसी को सहलाना
सच्चे झूठे शब्दों में ही जीता है ये
शब्दों में ही महकता यहाँ
प्यार का गुलाब।
-शैल अग्रवाल

खो गई चीज़ें

वे कुछ आम-सी चीज़ें थीं
जो मेरी स्मृति में से
खो गई थीं

वे विस्मृति की झाड़ियों में
बचपन के गिल्ली-डंडे की
खोई गिल्ली-सी पड़ी हुई थीं

वे पुरानी एल्बम में दबे
दाग-धब्बों से भरे कुछ
श्वेत-श्याम चित्रों-सी दबी हुई थीं

वे पेड़ों की ऊँची शाखाओं में
फड़फड़ाती फट गई
पतंगों-सी अटकी हुई थीं

वे कहानी सुनते-सुनते सो गए
बच्चों की नींद में
अधूरे सपनों-सी खड़ी हुई थीं

कभी-कभी जीवन की अंधी दौड़ में
हम उनसे यहाँ-वहाँ टकरा जाते थे
तब हम अपनी स्मृति के
किसी ख़ाली कोने को
फिर से भरा हुआ पाते थे …

खो गई चीज़ें
वास्तव में कभी नहीं खोती हैं
दरअसल वे उसी समय
कहीं और मौजूद होती हैं

2.
वे जो वग़ैरह थे
वे बाढ़ में बह जाते थे
वे भुखमरी का शिकार हो जाते थे
वे शीत-लहरी की भेंट चढ़ जाते थे
वे दंगों में मार दिए जाते थे

वे जो वग़ैरह थे
वे ही खेतों में फ़सल उगाते थे
वे ही शहरों में भवन बनाते थे
वे ही सारे उपकरण बनाते थे
वे ही क्रांति का बिगुल बजाते थे

दूसरी ओर
पद और नाम वाले
सरकार और कारोबार चलाते थे
उन्हें भ्रम था कि वे ही संसार चलाते थे

किंतु वे जो वग़ैरह थे
उन्हीं में से
क्रांतिकारी उभर कर आते थे
वे जो वग़ैरह थे
वे ही जन-कवियों की
कविताओं में अमर हो जाते थे …

-सुशांत सुप्रिय