माह विशेषः कुछ कविताएँ-शैल अग्रवाल/ लेखनी मई-जून 17

प्रेम में


आओ फिर से बांच लें
उन सभी प्रेम पत्रों को
जो कभी लिखे ही नहीं गए
वह मुस्कुराहट जो खो गई है
जिन्दगी की भीड़ में
उधार है आज भी
प्यार किसी एक उम्र एक पल की
सौगात तो नहीं

सूखी गुलमोहर की डाल पर
फिर खिल आए हैं
अनगिनत दहकते फूल
और ओस से भीगी
कलियों के गाल पर
फिर से है वही चमक
धरती की हरी चूनर सी
खिलती, ताजी और चटक
सूरज की पहली किरन ने
बदल दिए हैं उजाले में
रात के सारे अंधेरे ख्वाब
बारबार ही समेटती हूँ
पल, वह एक पल मोती सा
शफ्फाक़ और सफेद
खुद को ही बांहों में भरकर
बारबार चूम लेती हूँ
जब जब मुस्कुराकर
देखा है जिन्दगी
तुमने मुझे

गुलाब

कल जब उसने मुझे
गुलाब कहकर पुकारा
तो गुलाब ठठाकर हंस पड़ा
पगले, जिसे प्रेम करते हैं
उसी को कांटों पर जीने की
सज़ा नहीं देते…

लड़ना ही पड़ता है

प्रेम कोई छल या भुलावा नहीं
सहूलियत के सिराहने पड़ा प्रेमपत्र भी नहीं
ना ही सो सोकर जागता एक सपना
सोचने समझने की गुंजाइश हो तो
प्रेम ही कैसा…
पर वो जो अंधा कर दे
वह भी तो प्रेम नहीं
जो हार जाए, वह भी नहीं
किसने कहा कि सब जायज है
प्रेम और युद्ध में
रणछोड़,
माना कि एक ही बिसात है
प्रेम और युद्ध की
दोनों में मरकर अमर होते दीवाने
पर जीत हार एक नहीं
प्रेम की गलियों से चलकर ही
यहाँ तक पहुंचे हैं हम
अब जब
दांव पर लगा है सबकुछ
बात अपनी है, अपनों की है
सब पाने और खोने की है
तो भूलकर सब कुछ
चाहें या न चाहें
लड़ना ही पड़ेगा…

युद्ध स्तर पर

जिन्दगी से नाता तोड़
किसने बर्गलाया है
असहाय इस समय को
कैसा अंधेरा वक्त है यह
टूटी रस्सियों में बंधा
दर्द और खून सना
समेटने की फिराक में
फैलती ही जाती है नफरत
युद्ध स्तर पर
न गोलियों से डरती न बमों से
भरमाता ललचाता कौन है इसे
और और का कैसा है यह राक्षस
रौंदता-फांदता
नित नए बिगुल बजाता
आगे ही बढ़ता जाता…

डरे वक्त के डरे लोग

डूब जाते हैं बेगुनाह कई
घरों को छोड़ भय से भागते,
अनदेखे सुख को तलाशते
मारे जाते हैं छोटी डिग्गियों में छुपे
समुन्दर को पार करते
भूख प्यास व बीमारियों से बेहाल
और हम डरे वक्त के डरे लोग
अहसासों से वंचित,
मानवता व करुणा से वंचित
आरामदेह अपने-अपने घरों में बन्द
प्रार्थना करते दिन रात आँखें मूंद
‘आग अभी तो हमसे बहुत दूर है
दूर ही रखना इसे सदा…

हम नहीं तो तुम भी नहीं

ताकत की यह कुरसी,
शोहरत का यह ताज
लूट-खसूटकर जमा की
यह दौलत किस काम की
हम नहीं तो तुम भी तो नहीं
बच पाओगे
नफरत की इस लडाई में
तुम जो मारने से पहले
धरम पूछते हो अब…

चुभता बहुत

चुभता बहुत
किरच किरच कांच सा
बिखरा जो पड़ा आँख के आगे
किसी और का नहीं
हम सभी का दुख है
फांस-फांस आत्मा में धंसा
रेशे रेशे दम घोटता
मात्र खबर नहीं षडयंत्र है यह
मासूमों के खिलाफ
सभ्यता के खिलाफ
विकास के खिलाफ
दुनिया में फैली
भयंकर एक बीमारी है ।
कराहता दिन रात जो
अधमरा भूखा-प्यासा
दवा या उपचार बिना
कोई और नहीं
हमारा तुम्हारा
आने वाला कल है…

ैं