माह के कविः अतुल कनक/ लेखनी मई-जून 17


सारा आसमान रंग दूँ तुम्हारी चाहत के रंग से
या नदी में घोलकर तुम्हारी जाफरानी हँसी
पी जाऊँ उसे एक ही घूँट में/
या हवाओं से लेकर बाँसुरी बजाऊँ तुम्हारा पसंदीदा राग
या उमंगों के पाँव में बाँधकर घुँघरू नाचूँ तुम्हारे प्रेम में गली गली…
और वह भी अनंत काल तक यों ही/ बिसरा कर अपनी सुध सारी?
कहना तो चाहता हूँ कि प्यार हुआ है तुमसे मुझे
लेकिन असमंजस में हूँ कि कैसे कहूँ/
क्या यह संभव नहीं
कि किसी रोज तुम ही मुक्त कर दो मुझे इस असमंजस से
लेकर मेरे हाथों से बाँसुरी रखो अपने होठो पर
और इठला कर कहो कि प्यास सच्ची हो तो
आना ही होता है होठो तक प्रेम के दरिया को भी
जैसे चली आई हो गंगा किसी भक्त की कठौती में….

कहना तो होगा ही एक दिन तुम्हें/ कि प्यार हुआ है तुम्हें भी
बताना तो होगा ही नाम जो लिखा है अपनी मेंहदी में
सुनानी तो होगी वह कविता
जो सबसे छुपाकर लिखी है तुमने डायरी में अपनी
समझाना तो होगा कि मेरे प्रेमगीत पढ़कर…
इठलाते हुए क्यों कहती हो तुम
कि तुम्हें कुछ समझ नहीं आता…..
साझा तो करना ही होगा यह राज तुम्हें एक दिन
कि ये किसकी नींद में उतरकर देखने लगे हो सपने..
ये चुपचाप खुली हवा में आकर फैला देना अपनी बाँहें
या रात के सन्नाटे में उठकर ताकना चाँद को
या बार बार देखना अपना स्मार्टफोन इस इंतजार में
कि शायद आये हो कोई संदेशा प्रेम भरी मनुहार का/
कब तक छुपाए रखने देगा वह अहसास
जो बाँध देता है तुम्हारे मन के पाँवों में घुँघरू?
देखना एक दिन तुम्हें भी बताना होगा
कि तुमने किसे खरीद लिया है बिना मोल
कि तुम्हें सयाना बनाया है किसकी दीवानगी ने…..

तुमसे प्यार है/ यह बात तुम्हें बताऊँ या नहीं
इसी असमंजस में सदियाँ गुजर गईं/
कभी मौन हो मन ही मन जपा तुम्हारा नाम
कभी गीतों में गुँथी तुम्हारे होने की खुशबू
कभी नाचा सारी सारी रात तुम्हारी चाहत की उमंग में…
कभी रंग बनकर बिखर गया जीवन के कैनवाॅस पर
कि इसी बहाने छू लूँ तुम्हारे होने का एक रंग/
कई जन्म पहले थामकर मेरा हाथ
बहुत आहिस्ता से उतरे होगे तुम नदी में एक बार/
उसी दिन से हर लहर ने बाँध ली है पाँवों में पायल
उसी दिन से हवा के होंठों पर चली आई है बाँसुरी ।
मैंने पूछा था क्या मेरी तरह तुम्हारे मन में भी जागा है कोई सपना/
तुमने कुछ नहीं कहा/ बस, मुस्कुरा कर वाचाल नजरें टिका दी मेरे चेहरे पर
मेरे गीत, मेरी बाँसुरी, मेरा मौन, मेरी उमंगें- असमंजस में हैं तभी से
दुनिया को बता दूँ कि फिर कहीं प्रेम के देवता ने रास की तैयारी की है
या छुपा लूँ यह बात अपने आप से भी/
कि इस दुनिया में कीमती बातों को छुपा भी लेना चाहिए
बुरी मंशाओं की छुअन से …


आओ, कि मैंने आकाश पर टाँगी है मनुहारों की बाँदनवार
आओ कि मैंने चुराया है उगते सूरज की लालिमा से
चुटकी भर सिंदूर तुम्हारी कामनाओं के लिए
आओ, कि मैंने सारी रात जागकर सितारे पिरोए हैं नींद में
आओ, कि मैंने तुम्हारे नाम की मेंहदी रचाई है चाहत की हथेलियों में…
ये हवाओं में जागी सिहरन
ये मौसम के अधरों पर रखी बाँसुरी
ये नदी के पाँवों में बँधी पायल की अल्हड़ हँसी
सब विश्वास दिलाते हैं कि तुम आओगे, बाँह पसारे मेरी दुनिया में
आओ, कि अब पूर्णाहुति भी हो
जन्मों से चल रहे प्रतीक्षा के अखंड व्रत की/
आओ, कि दक्षिणा में मैं अपनेआप को सौंपना चाहता हूँ तुम्हें
ओ! प्रेम की दुनिया के इकलौते प्रजापति…..