पढ़ते पढ़ते-अज्ञेयः शैल अग्रवाल/ लेखनी-मई-जून 17


अज्ञेय शती पर डॉ. ओम निश्चल द्वारा संपादित अज्ञेय की प्रेम कविताओं का संचयन ‘जियो उस प्यार में जो मैंने तुम्हें दिया है’ अज्ञेय की कविताओं के सम्मोहन और समाधिस्थ कर देने वाली भंगिमा का अचूक उदाहरण है। ओम निश्चल के शब्दों में, ‘एकांतिक लेखक करार दिए जाने के बावजूद उन्होंने अपने को करेक्ट और मार्जित करनेका यत्न नहीं किया। वे आदि से अंत तक अपनी उसी भंगिमा को जीते रहे जो उन्हें औरों से अलग, उदात्त और विरल बनाती रही है।

पढ़ते-पढ़ते….
-शैल अग्रवाल

सच है कि कविता या रचना, समयकाल से परे है और रचयिता से महती, अपने रस और अमरत्व दोनों में ही; परन्तु इस बात से भी तो नकारा नहीं जा सकता कि कवि द्वारा ही रची और जनी जाती है यह; भाव और समय दोनों विशेष की परिधि में- गहन अनुभूति या वेदना तहत। अतः दोनों का परिलक्षित होना भी स्वाभाविक है।
…वक्त की निर्झरणी में बहते हुए भी, यह स्वतंत्र धारा बूंद-बूंद का अस्तित्व और परिवेश की मिट्टी समेटे रहती है और धारा-सी ही अपनी दिशा व गन्तव्य ( पाठकों के मन ) की राह भी स्वयं ही चुनती है। सीधे शब्दों में कहूँ तो कितना भी तटस्थ होकर लिखे, रचनाओं का वही मिज़ाज होता है जो रचयिता का है। अज्ञेय की रचनाओं के संदर्भ में तो यह बात और अधिक मुखरित है।

अज्ञेय की जन्‍मशती पर तमाम आयोजनों के साथ उनके विभिन्‍न पहलुओं पर बहुत से काम हुए। उन पर तमाम आरोपों को लेकर तीखी बहसें भी हुईं किन्‍तु अज्ञेय का कद साहित्‍य में वाकई में अलग, दूर-से ही पाठकों को दिखता है। अपने तटस्थ और शान्त ओज से विचलित-तो करता-सा पर तुरंत ही सम्मोहन की समाधि में ले जाता हुआ । अज्ञेय की कविताएं भी मानो एक सांसारिक और सन्यासी मनोवृत्ति का विलक्षण समिश्रण हो… देह की गुफा में बैठी सन्यासी-सी एक संतुष्ट आत्मा…जो होकर भी वहाँ नहीं है और नहीं होकर भी सदा है।

किशोरावस्था में ही अज्ञेय की कविताओं से पहला परिचय ‘नाच’ और ‘उधार’ कविता के माध्यम से हुआ था और वे ऐसी मन में पैठीं कि आज भी एकाकी पलों में स्वतः गूंजती हैं। जहॉं तक प्रेम कविताओं का ताल्‍लुक है अज्ञेय की कविताएं अपनी सहजता और समर्पण में चमत्कृत करती हैं, एक नश्वर कोमलता के साथ, जैसे पंखुड़ियों की नोक पर बैठी ओस की बूंद…या मंदिर में बसी धूप की गंध।
अंगार में वे कहते हैं-
‘ जिसे कुछ भी , कभी कुछ से नहीं सकता मार
– वही लो, वही रखो साज संवार
यह कभी न बुझने वाला प्यार
प्यार का अंगार। ‘
प्यार की शाश्वतता से ही नहीं, वे मनुष्य की नियति से भी अवगत हैं-

‘प्यासी है, प्यासी है गागर यह
मानव के प्यार की
जिसका न पाना पर्याप्त है
न देना यथेष्ट है
पर जिसकी दर्द की अतार्किक पहचान
पाना है, देना है, समाना है। ‘
एक और खूवसूरत चित्रात्मक बानगी देखें-
मछलियाँ
न जाने मछलियाँ है या नहीं
आखें तुम्हारी
किंतु मेरी दीप्त जीवन-चेतना निश्चय नदी है
हर लहर की ओट जिस की
उन्हीं की गति
काँपती-सी
जी रही है
पिरोती-सी रश्मियाँ
हर बूँद में।

2)
क्षण भर लय हों – मैं भी, तुम भी
ओर न सिमटें सोच कि हमने
अपने से भी बड़ा किसी भी ऊपर को क्यों माना।

3)
प्यार के तरीके तो और भी होते हैं
पर मेरे सपने में मेरा हाथ
चुपचाप
तुम्हारे हाथ को सहलाता रहा
सपने की रात भर…

हिंदी में आधुनिकता के जनक माने जाने वाले अज्ञेय अपने उपन्‍यासों, कविताओं, कहानियों, यात्रावृत्‍तांतों से हमारे समय की सर्जनात्‍म्‍क भाषा का एक मानक हमारे सामने रखते है। इस किताब को पढ़ना …कविताओं से गुजरना सुखद ही नहीं बेहद सुखद है। अज्ञेय-सा कवि और उसपर से ओम निश्चल जी की पारखी आँखें व संवेदनशील कवि हृदय द्वारा मोतियों सा चयन व कुशल सम्पादन..इंद्रियों और आत्मा दोनों के लिए ही छप्पन भोग-सा आयोजन है यह, हाल ही में किताबघर से आई ‘जिओ उस प्यार से जो मैंने तुम्हें दिया है’ नाम की यह किताब।
2011 कई साहित्यिक स्मरणीय विभूतियों का जन्मशती वर्ष रहा है और अपने-अपने तरीके से सभीने उन्हें याद भी किया है । अज्ञेय प्रेमियों के लिए यह भी एक सुखद आश्चर्य ही है कि भांति-भाति के आरोपों और तीखी बहसों के बाद भी, अज्ञेय, केदार नाथ अग्रवाल, नागार्जुन व शमशेर जन्मशती के दौरान संयोग से सबसे ज्‍यादा काम अज्ञेय पर ही हुआ । यह पुस्‍तक भी इसी संदर्भ की महत्‍वपूर्ण कड़ी है। अज्ञेय की प्रेम कविताओं का यह संचयन कविता प्रेमियों के लिए निःसंदेह यादगार सिद्ध होगा।