कहानी समकालीनः मौसम उपसंहार-अशोक गुप्ता/लेखनी-मई-जून 17

कमरा ओस से भीगा हुआ था. नम हवा अपनी मुट्ठी में मनहूसियत दबाये ठहर गयी थी. कमरे में दीवार को तीन तरफ से घेरता हुआ सोफा पड़ा था. बीच की चौरस जगह पर एक हरे रंग का कार्पेट बिछा था. उसके रोयों पर भी ओस की बूँदें चमक रही थीं. कम ऊंचाई वाले सोफे के पीठ पर रखी गद्दी को भी ओस ने भिगाया था जिससे उसका हरा रंग और गाढ़ा हो कर नज़र आ रहा था.
मैंने दामिनी को आज सुबह आठ बजे मिलने के लिए बुलाया था. मुझे उससे बहुत बातें करनीं थी. परसों जब मैंने उसे इसके के लिए फोन किया तो वह बहुत खुश हुई. बेहद व्यस्त उस लड़की के लिए यह दिन और समय बहुत ठीक था. उस दिन सुबह ग्यारह बजे उसे अपनी मां को लेकर नर्सिंग होम जाना था और उसके पहले दो घंटे का समय बहुत काफी था जो हम अपनी बात कह सुन सकें. कम से कम दामिनी ने तो ऐसा ही समझा था. वह खुश होने के कारण ढूँढने वाली लड़की है न…
मौसम अचानक बदल गया.
यह ‘अचानक’ बहुत सुविधाजनक शब्द है. बहुत सी स्थितियों को ढांपता है. वर्ना अचानक क्या हुआ..? अक्टूबर हमारे पेशे में मौसम बदलने का समय होता ही है, सभी चतुर सयाने लोग इस मौसम का इंतज़ार करते हैं और साल भर तैयारी करते हैं. कोई किसी से कुछ भी शेयर नहीं करता और कोई बादल देख कर गगरी भी नहीं फोड़ता.
आज मौसम बदला हुआ था… ओस ने मेरे ड्राइंग रूम को भिगा दिया था. हवा नम थी, ठहरी हुई, उसकी मुट्ठी में कुछ था… मनहूसियत का कोई नाम नहीं होता, इसलिए किसका नाम लूँ…?
दामिनी ठीक समय पर आयी थी. मेरा दरवाज़ा बाहर से इंटरलौक था. दामिनी को पता था कि उसकी एक चाभी दरवाज़े के सामने गमले के नीचे होती है. उसने दरवाज़ा खोला और अन्दर आ गयी. उसे अब मेरा इंतज़ार करना था. इंतज़ार तो वह महीनों से कर रही थी, लेकिन वह दोहरा इंतज़ार था. एक तो भाई की दूरदराज़ के स्टेशन से इस शहर में पोस्टिंग का, और दूसरे, इस इन्तजार के ख़त्म होने का. मै तो पिछले चार महीने से तैयार था, लेकिन यह शर्त दामिनी की ही थी. इसलिये दामिनी में धैर्य था. धैर्य का कारण यह भी था कि उसके भाई की पोस्टिंग के समय ही यह बात हुई थी कि बाद में उसका ट्रांसफर यहाँ कर दिया जाएगा. दामिनी आई, डाइनिंग टेबल पर फैले अखबार को देखते हुए बैठी और अपनी बाहों में धैर्य समेटे मेरा इंतज़ार करने लगी.
इंतज़ार मुझे भी था, लेकिन मुझमें धैर्य नहीं था. दामिनी नाम था उसका, और वह सचमच दामिनी ही थी… वह मेरे भीतर उमड़ते बादलों के बीच चमकती थी. बादल देख कर गगरी न फोड़ने वाला समझदार मुहावरा जिस दिन उसने मुझे सुझाया था, उसी दिन से मैं मन ही मन गगरी फोड़ने के लिए बेताब हो रहा था. आज शायद वह दिन होता, लेकिन अचानक मौसम बदल गया.
दामिनी को आने पर चाभी निकाल कर भीतर पहुंचना पड़ा था. इसका संकेत यह था कि मैं फिलहाल घर नहीं पहुंचा हूँ. लेकिन यह सच नहीं था. मेरे बरामदे से सीढियां ऊपर छत पर जाती हैं. उसी रास्ते बीच में एक दुछत्ती पड़ती है. पूरे कमरे भर ऊंची तो नहीं है, लेकिन उसमें मैंने एक मेज़ कुर्सी डाल रखी है, जहाँ मैं तब बैठ कर काम करता हूँ, जब मुझे किसी आने जाने वाले से बचना होता है. आज भी मैं वहीँ था. उस दुछत्ती में पत्थर की जाली से ढका एक रौशनदान है जिससे नीचे मेरा ड्राइंगरूम पूरा नज़र आता है. मैं वहां अपना एक ‘अचानक’ ले कर आया था, जो कल ही मुझे कुरियर से मिला था. मैं उसे दो बार पढ़ चुका था. मन पूरी तरह से उसके हक़ में बन रहा था, और उसी दिन से बन रहा था जिस दिन से मैंने उसके लिये तिकड़म लगानी शुरू की थी, लेकिन आज, जब से मेरा ड्राइंगरूम ओस से भीगने लगा तब से कुछ असमंजस छा गया मुझ पर. संवाद बहुत सी स्थितियों को अंगूठा दिखाने वाला था.
इस बदलते मौसम में मैं नीचे आ कर बैठी हुई दामिनी को देख रहा था.
कुछ देर तक वह मेरी शेल्फ से निकाल कर पत्रिकाएँ उलट पलट कर देखती रही. कुछ देर उसने अपने बैग में से निकाल अपना म्यूजिक सुना… पता नहीं कैसा म्यूजिक था वह जो दामिनी यकायक उदास हो गयी. उसने मेरी शेल्फ से एक कागज़ निकाला… कोरा कागज़. क्रीम कलर का बौंड पेपर, और उस पर पेन से कुछ लिखती रही. मैं उसे देखता रहा. वह बहुत एकाग्रचित्त हो कर लिख रही थी. लिखते लिखते उसके बालों की एक लट उसके गाल पर गिर आयी थी, जिसमे उसे और ज्यादा दिलकश बना दिया था. मुझसे ज्यादा देर देखा नहीं गया. मेरे भीतर तो अलग ही ढब के बादल गरज रहे थे. मैंने कुर्सी पर बैठे बैठे दूसरी और गर्दन घुमाई. उधर भी ऐसा ही एक जालीदार रौशनदान था. जहाँ से बाहर का पार्क नजर आता था. अक्टूबर की उस खुशनुमा सुबह में, जब धूप आकर खूब फैल चुकी हो, वहां लोगों का जमघट होना चाहिए था. लेकिन वहां मानो जैसे पतझड़ पसरा हुआ था. पार्क में सन्नाटा था और तेज़ हवाएं पेड़ों से एक एक कर के पत्ते तोड़ कर नीचे गिरा रहीं थीं. वहां से एक ऐसा ही पत्ता मेरे ड्राइंगरूम में भी आ गिरा था जैसे, ओस से लगातार भीगता हुआ पत्ता.
कमरे में ओस का गिरना जारी था.
मैंने फिर नीचे की ओर गर्दन घुमाई. दामिनी कमरे में पैर घसीटते हुए टहल रही थी. निरर्थक… उसके चेहरे पर ऊब उदासी के अलावा कुछ और भी इबारत उभरी हुई थी, जिसे मैं चाहता तो पढ़ सकता था. पर क्या मैं सचमुच पढ़ पाना चाहता था ?. इस गड़बड़ मौसम में कुछ भी निश्चित तौर पर कह पाना कठिन था.

उसके चेहरे पर गहरी व्यग्रता थी… मन का असमंजस था.. मैं भी उससे अपने भीतर का वह उतावलापन जाहिर कर चुका था, जिसके लिये मुझे शादी तक इंतज़ार करना चाहिये था. तब उसके चेहरे पर एक आक्रामक, लेकिन अधूरी सी ‘ना’ उभरी थी, और मैं आज के लिये मंसूबे बनाने लगा था… लेकिन अचानक मौसम बदल गया. मैं ऊपर से देख रहा था, शायद उसके भीतर की ‘ना’ पिघली हो. लेकिन मैं…?
दामिनी लिखते लिखते उठ कर टहलने लगती और फिर, टहलते टहलते, ठहर ठहर कर कागज़ पर लिखती जा रही थी… उसके शब्द मेरे सामने साफ़ भले ही नहीं थे लेकिन उसका तूफ़ान मैं समझ पा रहा था. मुझे मालूम है, उसको मेरा इंतज़ार करना कितना त्रस्त करता है. मेरे पास पहुँचने के पहले ही वह मन ही मन मुझसे बोलने बात करने लगती है. फिर जब बातें बार बार दोहराए जाकर बासी पड़ने लगतीं हैं, तब तक मुझे उसके सामने आना ही होता है नहीं तो वह बातों के बोझ से टूटने टूटने को हो आती है. मैं हमेशा इसके पहले उसको जा कर थाम लेता हूँ, पर आज…? मौसम सचमुच बहुत खराब है. मेरे देखते देखते दामिनी फिर मेज़ पर पहुँची थी. कुर्सी पर बैठ कर उसने बिना उठाये उस कागज़ को भर नजर देखा था और फिर सामने रखे गिलास को उठा कर उस में से पानी इस कागज़ पर उड़ेल दिया था. पानी की एक बड़ी सी बूंद ने उस कागज़ को पूरी तरह ढक लिया था और उस पानी के लेंस के नीचे लिखे हुए अक्षर जरा बड़े हो कर दिखने लगे थे. फिर अक्षर हिलते डुलते एक दूसरे से गले मिलने लगे… यह सारे अक्षरों को आपस में विलय होना था और सारे अक्षर अपने अपने अर्थ किसी गरल की तरह पीने लगे थे. दामिनी केवल चुपचाप उस कागज़ पर फैले अक्षरों के उदय और उपसंहार देख रही थी. फिर कागज़ ने पानी के एक लेंस को अपने भीतर सोख लिया. सारे शब्द अक्षर और मंतव्य कागज़ पर फैली किसी नीले बादल की आकृति में छिप गए.
मैं ऊपर से देख रहा था. बादल मौसम को बदलने की अजीब सी प्रकृति रखते हैं. ….फिर दामिनी उठी. उसने एक कुर्सी पर लापरवाही से पड़ा अपना बैग उठाया और उसमें से कुछ निकाल कर हाथ में ले लिया…घने अँधेरे आकाश में अचानक एक बिजली सी चमकी. उसके हाथ में उसके नीचे पहने जाने वाले दो छोटे कपड़े थे. वह उन्हें ले कर मेरे बाथरूम तक गयी और जब कुछ देर में लौटी तो उसके हाथ खाली थे, और उसके शरीर की आकृति कुछ चुस्त हो गयी थी. यह बिजली सीधे मेरे ऊपर गिरी… यानी यह अभागा मौसम दामिनी के समर्पण का दिन था, और मैं अपना चेहरा अपने अचानक से छिपाये यहां बैठा था.
मेरी दुछत्ती में बर्फ गिरने लगी.
उस समय सुबह नौ बज कर सैंतालीस मिनट हो रहे थे. दामिनी खुद को समेट कर चलने को तैयार हो गयी थी. उसने अपना बैग उठाया. एक उदास सी नज़र मेज़ पर पड़े उस भीगे हुए कागज़ पर डाली और चल पड़ी. मैंने दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ सुनी थी. गमला उठाये जाने और चाभी रखने में कोई आहट नहीं होती, लेकिन शायद हुई थी, जिसे बादलों की गडगडाहट ने छिपा लिया था.
दामिनी आई और चली गयी. मैं अपना ‘अचानक’ हाथ में लिये बैठा रहा. यह मेरा कैलिफोर्निया में स्कॉलरशिप का पत्र था, जिसके बीज मैंने करीब छः महीने पहले बोये थे और तिकडम में लग गया था. उसके करीब ढाई महीने बाद मुझे सुराग लगा था कि मेरा काम हो जाएगा. इस संकेत ने मेरे सपनों का आकार बदलना शुरू कर दिया था. मैंने तभी दूसरा पैंतरा चला था. जिस ऑफिस में दामिनी के भाई की पोस्टिंग हुई थी उसका मुख्यालय यहीं था. मैंने जुगाड़ लगा कर उसके भाई की यहाँ पोस्टिंग रुकवा दी थी, क्योंकि उसके यहाँ आते ही मुझे दामिनी से जुड जाना होता. मेरे माता पिता सब तैयार थे. अभी कल मुझे अपनी ‘खुशखबरी’ का पत्र मिला और कल ही मेरे पास उस एजेंट का फोन आया कि दामिनी के भाई की पोस्टिंग यहां से दूर, दक्षिण में होने की तैयारी है. इस फोन ने मेरी एक बेचैनी को मिटा कर मेरे भीतर दूसरी बेचैन को रोप दिया था. मैं रात भर एक कायर और डरपोंक इंसान में बदलता रहा और अपने इस बदलाव पर स्वीकृति की मोहर लगाता रहा. मेरी खुशखबरी का छाता बहुत छोटा था और मैं उसे भीगने से बचाना भी चाहता था. दामिनी को गये ढाई घंटे बीत गये. मैं नीचे उतरा. मैंने मेज़ पर से उस भीग कर सूख गये कागज़ को नहीं हटाया. मैं जस का तस बाहर की तरफ पड़ा. दरवाज़े की मेरी अपनी चाभी मेरी शेल्फ की दराज़ में पड़ी थी लेकिन मैंने उसे नहीं उठाया और बाहर आ कर गमले के नीचे से चाभी निकाली और ताला बंद कर के उसे जेब के हवाले कर लिया. अब उस चाबी की वह जगह बेमानी हो चुकी थी. मैंने सुबह अपनी गाड़ी अपनी पार्किंग में न रख कर के पीछे खड़ी की थी. वहां से मैंने अपनी कार उठाई और बिना सोचे चल पड़ा.. कार को शायद मालूम था मैं कहाँ जाऊँगा, और मुझे मालून था कि अब वहां जाना बेकार है.कार जीत गयी. मेरी गाड़ी उस नर्सिंग रूम के सामने थी जहाँ दामिनी को अपनी मां को ले कर आना था. मैं भी गलत नहीं निकला. दामिनी जा चुकी थी, लेकिन मुझे सामने पूर्वा नजर आई. दामिनी की सहेली और पड़ोसन. पता चला कि दामिनी तो मां को ले कर चली गई लेकिन वह उन टेस्ट्स की रिपोर्ट लेने रुकी हुई है जो दामिनी की मां को आज डॉक्टर ने बताये थे. उस रिपोर्ट को देख कर डॉक्टर नई दवा लिखेंगे जिसे लेकर पूर्वा दामिनी तक पहुंचायेगी. यह भी पता चला दामिनी आज रात मां को ले कर हफ्ते भर के लिये मामा के पास निकल रही है… वहां कोई उत्सव है शायद.
हफ्ता भर… यानी सात दिन. इस बीच तो बहुत कुछ हो जाएगा. उसके भाई को नई पोस्टिंग का पत्र मिल जाएगा. मेरे स्कॉलरशिप की खबर मेरे पापा मम्मी को मिल जायेगी जिसका मतलब होगा, जश्न का मौसम, जो मेरे कमरे और दुछत्ती से ओस और हिमपात के निशान को मिटा कर रख देगा.

सातवें दिन मैं फिर उसी नर्सिंग होम में था. जैसा कि पूर्वा ने बताया था, उस दिन भी दामिनी को अपनी मां को लेकर वहां डॉक्टर के पास आना था. मेरी मुलाक़ात दामिनी से वहीँ हुई. उसने मुझ से उस दिन की गैर हाजिरी के बारे में कुछ नहीं पूछा. उस दिन की हमारी मुलाक़ात में दामिनी की मां भी शामिल थी, भले ही बेहद खामोशी से.
उस दिन सारी बातें दामिनी ने ही कीं.
“ मेरा भाई वहां की नौकरी छोड़ कर अगले हफ्ते वापस आ रहा है. वह लोग उसे कोयम्बटूर भेज रहे थे… आखिर एक अनुभवी चार्टर्ड अकाउन्टेंट है वह. अब यहीं अपना काम शुरू करेगा. उसकी पुरानी दोस्त जिसके साथ उसे जिंदगी बितानी है, उसने भी पढ़ाई के आखिरी साल के साथ एक पार्ट टाइम काम ढूँढ लिया है. मेरी नौकरी तो पक्की है ही. चल जाएगा काम. मां भी खुश रहेगी. फिर भाई भी शादी कर लेगा… ऑल सेट.”
और तुम्हारी शादी…? क्या मामा के घर कुछ…?
मेरे पास बस यही विनोद विकल्प था जो कवच बन सकता था, लेकिन जिस तीखी निगाह से दामिनी ने मुझे देखा, वह भरभरा टूटने लगा. दामिनी ने मेरी बात का जवाब नहीं दिया, बस इतना कहा,
“ अपनी गाड़ी वहीँ अपनी पार्किंग में रखा करो. उस दिन पीछे खड़ी गाड़ी पर मोहल्ले भर के बच्चे उछल कूद रहे थे… और अब गमले के नीचे चाभी रखना छोड़ दो. बहुत हुआ बचपना.”

मौसम अचानक बदल गया. वह पारदर्शी कांच हो गया जैसे, जिसके आर पार मैं दामिनी को साफ़ नजर आ गया. एकदम नंगा, एक फुल स्केप कागज़ से खुद को बिला-वज़ह ढकते हुए… बहुत ना काफ़ी था वह एक टुकड़ा ‘अचानक’, और मैं चाह कर भी उस मौसम को बदल नहीं सकता था.
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