कहानी समकालीनः पन्नों पर जिन्दगी-सपना मांगलिक/ लेखनी-मई-जून 17

आज एनएसडी के केम्पस में देखा ,यकीन ही नहीं हुआ अपनी आँखों पर ,वही बड़ी बड़ी बादामी आँखें वही रसभरे होंठ मगर गुलाबी चेहरा पतझड़ के मुरझाये सूखे पत्ते की तरह पीला ,मानो साख से टूटने को आतुर अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा हो .नहीं, मेरी आँखें तुम्हे पहचानने में धोखा नहीं खा सकती नंदू ,तुम्हे तो बंद आँखों से भी पहचान सकता हूँ सिर्फ तुम्हारी आहट से ,तुमसे टकराकर सुगन्धित हुई हवा से .जब देखा तो लगा तुम्हे आवाज दूं मगर किस हक़ से ?यही सोच आवाज गले में रुंध गयी और होंठ बस फडफडा कर रह गए .याद है नंदू ,तुम्हारी वो झरने की धारा सी कलकल करती खिलखिलाहट, तुम्हारी वह मस्त मलंग सी लापरवाह चाल,यौवन के उभारों की मादकता मानो एक तन में हजारों तन की तरुणाई समा गयी हो . जब कभी तुम्हें चिड़ाता या परेशान करता था तो तुम्हारे नयनों में लाल सुर्ख डोरे और नमी एकसाथ ऐसे प्रतीत होती थी, जैसे नदी में डूबते सूरज की लालिमा उतर आई हो .कभी कभी पुस्तक देते वक्त तुम्हारे हाथ मेरे हाथों से छू भर जाते तो तुम्हारे हाथों के साथ तुम्हारे सम्पूर्ण जिस्म में होने वाला कम्पन आज भी मुझे महसूस होता है .
वो किताबें ही थीं जिन्होंने हम दोनों को मिलवाया था और वह भी किताब ही थी जिसने ..खैर मैं एक गुमसुम पढ़ाकू लड़का तपती रेत की तरह अन्दर ही अन्दर सुलगता मगर मौन और तुम उस तपती रेत में बारिश की पहली फुहार सी शीतल, तुम्हारी मित्रता में ही मेरा मौन मुखर हुआ, सुप्त भावों को डायरी में लिखना तुमने ही मुझे सिखाया, मेरे बंजर ह्रदय में भावनाओं के पुष्प गुच्छ तुम ही ने खिलाये नंदू और आज जो में इतना बड़ा लेखक हूँ. भावनाओं के चितेरे की जो उपाधी इस जगत ने मुझे दी है उसकी प्रेरणा पुंज भी तो तुम ही हो.
मगर मैंने क्या किया ? रिश्तों और समाज का भय ? नहीं नहीं ,शायद पिताजी की ही तरह एक अमीर बाप की इकलौती बेटी से ब्याह कर समाज में रुतबे की जिन्दगी जीने का स्वार्थ?
हाँ ,शायद यही सच था तभी तो पिताजी की हर बात की तरह, ब्याह की बात भी मैंने सर झुकाकर स्वीकार कर ली थी. एक बार भी नहीं सोचा क्या सोचोगी तुम? कैसा महसूस करोगी ? जी सकोगी मेरे बिना या… नहीं, कुछ नहीं सोचा.
बचपन से ही मुझे क्या खाना है, क्या पीना है क्या पहनना है किस संकाय में पढना है सब पिताजी के तुगलकी फरमान निर्धारित करते रहे और हमारे बिछड़ने का फरमान भी तो उन्ही का था. जिसकी वजह से एक किताब की अदला बदली से शुरू हुआ रिश्ता एक किताब की अदला बदली पर समाप्त हो गया . पन्नो ने हमें मिलाया और पन्नों ने ही जुदा भी कर दिया. पर तुम्हे एक राज की बात बताता हूँ नंदू, यह पन्ने इतने निर्दयी भी नहीं थे, किताब से शुरू हुआ रिश्ता जब किताब पर खत्म हुआ तब एक मासूम बच्चे की तरह जो बड़ों से डांट फटकार खा एक कोने में अपने को सुरक्षित महसूस कर सिसकता है और फिर थोड़ी देर बाद ही नयी नयी कल्पनाएँ करने में वहीँ व्यस्त भी हो जाता है, ऐसे ही नंदू, मेरी डायरी के पन्नों पर हमारा रिश्ता छिपकर रहने लगा हाँ कुछ समय तक सिसक सिसक कर रोया जरूर, मगर पुन: वही सतरंगी सपने बुनने में और मन की मन से कहने में व्यस्त हो गया ठीक उसी मासूम बच्चे की तरह, और इस स्थान पर नंदू, हमारा रिश्ता अब तक महफूज है, क्योंकि यही वो एकमात्र सुरक्षित स्थान है जहाँ पिताजी के तुगलकी फरमान नहीं पहुँच सकते, मेरा भीरूपन और समाज के नीति-नियम भी हमारे रिश्ते की पवित्रता पर आँख नहीं उठा सकते.
यही वो स्थान है जहाँ में अपना जीवन अपने लिए जीता हूँ, खुश होता हूँ, रोता हूँ, अपने मन की कहता हूँ . और जिन्दगी की हर चोट सहने के लिए खुद को तैयार करता हूँ. नंदू तुम मेरे लिए द्रोणाचार्य की वह मूरत हो जिसके सामने बैठ मैं जीवन जीने की विद्या सीखता हूँ. तुम मेरी हर कहानी की नायिका हो, तुम्ही रूमानी आगाज, तुम्ही प्रेरणा देता अंत भी, तुम्हारी वजह से मैं उस निरीह औरत जिसे मेरी पत्नी बना दिया गया,को पत्नी का अधिकार दे सका. तुमने ही मुझे उसके प्रति मेरे कर्तव्यों का पाठ पढाया, आज मैं पूरे मनोयोग से एक पिता और पति का धर्म निभा पा रहा हूँ यह तुम्हारी ही देन है नंदू. सिर्फ और तुम्हारी, तुम्हारे बिना, तुमसे पूछे बिना, आज भी मैं कुछ नहीं कर सकता . सच कहूँ तो इन पन्नो पर तुम्हारा अक्स देखकर ही जिन्दा हूँ, मन की बातें लिखकर ही अपने होशो-हवास कायम रखता हूँ.
एक बात कहूँ नंदू ,आज जब तुम्हे देखा तो तुम्हारे अन्दर वो जीवंतता नहीं दिखी जो पहले हुआ करती थी. मेरी नन्दू तो पूर्णिमा का खिला खिला चाँद हुआ करती थी, गालों की रंगत ऐसी सुर्ख जैसे हजारों गुलाबों का अर्क निचोड़कर तुम्हारे कपोलों पर बिखेर दिया हो, आँखें जो जीवन का पर्याय हुआ करती थीं उफ्फ कैसी उदासी थी उनमें, यह उदासी क्यूँ थी नंदू ? इसकी वजह क्या है नंदू ? मैं जानना चाहता हूँ ? कहीं इसकी वजह मैं तो नहीं ? हे भगवान, यह तुम्हारे मुख की आभा को बसंत से पतझड़ की और अग्रसर करने वाला निर्दयी,निष्ठुर कहीं मैं तो नहीं ? नहीं ,कह दो कि यह मेरा भ्रम है नहीं तो अपराध बोध की अग्नि में बिना पश्चाताप किये ही जलकर भष्म हो जाऊंगा.

नंदू ,कहीं ह्रदय में तुम यह बात जरूर सोचती होंगी कि तुम्हें दुःख देकर मैं जिन्दगी के मजे ले रहा हूँ, है ना ? काश तुम जान पाती नंदू कि मैं जिन्दा होकर भी जिन्दा नहीं हूँ, नहीं हूँ जिन्दा नंदू . हर आती हुई सांस को मैं वहीं रुकने की बद्दुआ देता हूँ मगर कहते हैं ना कि दुआ –बद्दुआ नहीं इंसान का भाग्य उसे हंसाता और रुलाता है . तुम्हे याद है मैं जब तुमसे मिला तो तमाम अभावों के वावजूद मेरे लवों पर मुस्कान सजी रहती थी, मेरी वो मुस्कान तुम थीं नंदू, और जब से तुम मेरे जीवन में नहीं हो तो वह मुस्कान भी रूठ गयी मुझसे। आज पैसा है,शोहरत है सब कुछ है मगर वो मुस्कान गायब है खो बैठा हूँ अपनी हंसी। जो रह गया है मेरे पास वो है बैचेनी सिर्फ बैचेनी। रूह कंपा देने वाली बैचैनी। जैसे किसी ने अपने सामने अपने ही काल को देख लिया हो और उससे बचने के लिए वह भाग रहा हो निरंतर बेताहाशा भागता रहे और अंत में उसी काल के हास्यापद खेल का शिकार हो जाए . कैसी बिडम्बना युक्त जीवन है है मेरा नंदू, साबुत जिस्म मगर दिल चकनाचूर ,जिस्म यहाँ और दिल ना जाने कहाँ? ना दिल दिल से मिल सकता है और ना यह दिल वापस अपने जिस्म में आ सकता है, आह कैसी विकट स्तिथि में हूँ नंदू , सामने झील है और कंठ फिर भी सूखा, मेरे दिल की घाटी में भावनाओं का ज्वालामुखी संचित होता रहता है और एकांत मिलते ही फूट पड़ता है इस डायरी में .
मैं उस थके हुए कपोत की तरह हूँ नंदू ,जो तुम्हारे ह्रदय के कुंड में स्थित नेह के ताजा, शीतल जल के पान के लिए व्याकुल है. मगर इस कपोत की व्याकुलता का तनिक अनुभव करना नंदू ,कि चाहे कोई मार्ग हो जल ,थल या वायु कोई भी मार्ग, इस प्यासे पंक्षी को उस ह्रदय कुंड तक नहीं पहुंचा सकता . क्योंकि हर मार्ग पर सामाजिक बंधनों के शिकारी घात लगाए बैठे हैं कि कब प्रेम के पंक्षी दिखें और कब निशाना लगायें . सच कहूँ तो नंदू प्रेमियों से भी ज्यादा व्याकुलता प्रेम विरोधियों में होती है ,प्रेमी तो कुछ पल अपने प्रेम को याद कर चैन की सांस ले लेता है मगर यह प्रेम के दुश्मन हम प्रेमियों पर घात लगाने में ही अपनी सुख शान्ति खो देते हैं .
मेरी नंदू,मैं तुम्हारे साथ निष्ठुर ना पहले था और ना ही अब हूँ. मैं कल एक भीरु युवक था जो समाज और परिवार से डरता था और आज एक जिम्मेदार सामाजिक व्यक्ति जो समाज और परिवार से डरता है , मगर हमेशा से तुम्हारा नाम लेकर धड़कने वाला तुम्हारा सिर्फ तुम्हारा ह्रदय – उदय
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उदय ,
क्यों ,आखिर क्यों ? क्यों आये हो इतने वर्ष बाद फिर से मेरे सामने ,सोच रहे होंगे ना कि मैंने तुम्हे नहीं देखा ,या देखा भी होगा तो पहचाना नहीं ,मगर क्या दिल साँसों की गति भूल सकता है ? क्या नजरें खुली रखकर कोई रौशनी से चूक सकता है ? नहीं उदय ,मैंने तुम्हे देखा भी और पहचान भी लिया , बस नाटक कर रही थी जिससे तुम्हे महसूस हो कि मैं तुम्हे भूल चुकी हूँ . तुम मुझसे भौतिक तौर पर अलग हुए थे उदय, आत्मिक तौर पर नहीं। नफरत,ईर्ष्या और उदासीनता के कई अन्य रूपों में तुम जब तब मेरे सामने आ ही जाते हो या यूँ कहूँ कि कल तक प्रेम के रूप में तुम मेरे ह्रदय में रहते थे और अब नफरत बनकर मेरे दिल का चप्पा चप्पा घेरे हुए हो . तुम तो मेरे लिए जान देने की बात करते थे, फिर कैसे इतने निष्ठुर हो गए तुम उदय ? क्यों दिया धोखा मुझे ? प्यार के बदले प्यार ही तो माँगा था बस । क्या धन तुम्हारे लिए मन से ज्यादा अहमियत रखता था? और इसीलिए तुमने…काश कि एक बार धन के प्रति तुम्हारी आसक्ति का मैंने अनुमान लगाया होता . तुम्हारी कसम उदय, तन की कीमत पर ही सही मन मारकर भी धन का ढेर तुम्हारे क़दमों में लगा देती . इतनी समर्पित थी तुम्हारे लिए मैं . कुछ भी करने को, कुछ भी सहने को तैयार . उसके बाद भी तुम्हे कोई दोष ना देकर हमेशा मन मन्दिर के देवता की तरह पूजती। अपना सर्वस्व समर्पित करती । सच कहूँ तो मन में वह तुम्हारा मंदिर आज भी ज्यों का त्यों है । फर्क बस इतना है पहले तुम्हारी मूरत पर प्रेम के पुष्प चढ़ाती थी और अब नफरत के धतूरे , मगर पूजा आज भी करती हूँ रोज । आंसुओ के घी से तुम्हारे मन्दिर में भावों की जोत दिन हो या रात हरवक्त प्रज्वलित रहती है . बेशक तुमने मुझे तन्हा कर दिया उदय,मगर मैं हर समय तुम्हे अपने साथ रखती हूँ . क्योंकि मैं जानती हूँ कि तन्हाई का दर्द क्या होता है ? मौत से भी कहीं ज्यादा भयावह अकेलापन होता है, जानती हूँ। और जानती हूँ इसीलिए तुम्हे यह दर्द नहीं देना चाहती . तुमसे रोज लडती – झगडती हूँ , शिकवे-शिकायतें करती हूँ और बद्दुआएं भी देती रहती हूँ, मगर वह बद्दुआएं गलती से भी फलित ना हो जाएँ इसलिए मन ही मन उस परम पिता से तुम्हारी जिन्दगी और खुशियों की भीख भी मांगती हूँ . क्या करूँ विवश जो हूँ अपने प्रेम से, जैसे बीस वर्ष पूर्व थी और इसलिए उदय, तुम्हारा नाम लेकर तुमसे नफ़रत करके यह बीस वर्ष गुजार दिए, मगर तुम्हारे अलावा किसी और को इस जीवन में प्रवेश करने की इजाजत कभी नहीं दी . आज बीस वर्ष पश्चात् तुम्हें देखा, तुम पहले से भी ज्यादा थुलथुले हो गए हो, लगता है अपने वैवाहिक जीवन से बहुत खुश हो इतने खुश कि तुम्हारी खुशिया तुम्हारे पेट में एकत्र हो तोंद की शक्ल ले चुकी हैं . तुम्हे देखा तो मन हुआ कि पूर्व की भांति दौड़कर तुम्हारे सीने से लिपट जाऊं और तुम्हारे जिस्म की वही गंध अपनी साँसों में पुन: भर लूँ, जो अबतक मेरे जीवन का प्रमुख स्रोत है. लेकिन यह सुख कहाँ मेरे इस श्रापित जीवन में ? होता तो तुम मेरे साथ होते उदय मेरे पास होते . पर तुम नहीं हो , तुम्हारी यादें हैं, बस यादें . काश आज हम फिर एक किताब की अदला – बदली करें. घुमा दें विपरीत दिशा में इस वक्त की धुरी को और बदल दें किस्मत के उस निष्ठुर फैसले को, जिसने हमें एक दूसरे से अलग कर दिया था . कितनी लम्बी थी वो प्रतीक्षा जो मेरा ह्रदय ना चाहते हुए भी तुमसे मिलने की उत्कंठा में किया करता था । धड़कन दर धड़कन मानो हर धड़कन दूसरी धड़कन तक आने में सदियों का लम्बा सफ़र तय कर आई हो . लेकिन तुम मिले और कुछ ना कहा . मुझे बुरा लगा उदय ,मानो मेरे इलायची से प्रेम को अपने निष्ठुरता के हिमाम दस्ते में तुमने बड़ी ही बेरहमी से कूट दिया हो . और हमारा इलायची सा खुशबू बिखेरता प्रेम महज एक बुरादा बनकर रह गया हो . मैं हमेशा इस बुझे बुझे से मन में अपने नेह एवं राग के तेल से प्रेम दीपक प्रज्वलित करना चाहती थी उदय, मगर मन का दीपक तो बस तुमाहरे मन की लौ को छू कर ही प्रज्वलित होना चाहता है . दीवाली की रात हर दिए का भाग्य संवरता है मगर मेरे मन का दीपक हर दिवाली की रात बुझा ही रह जाता है . आज भी जब भी कोई किताब पढने बैठती हूँ तो ना जाने क्यूँ कहानी के हर पन्ने पर नायक की जगह तुम्हारी तस्वीर ही उभरती है और उस तस्वीर में तुम्हारी बड़ी बड़ी वही दो आँखें और उन आँखों में उमड़ता समुद्र सा गहरा और अथाह वही प्रेम नजर आता है उदय ,जो मेरा था सिर्फ मेरे लिए था ।
क्या आज भी उन आँखों में मेरे लिए वही प्रेम का समंदर है या वह किसी छोटे तालाब का रूप ले चूका है या कहीं ऐसा तो नहीं कि वक्त की धूप ने उसे सुखाकर उसका अस्तित्व ही मिटा दिया ?
कहो ना उदय, क्या आज भी अगर मैं तुम्हारे सामने आकर खड़ी हो जाऊं तो तुम वैसी ही प्रेम पगी आँखों से अपलक मुझे निहारोगे ?
मैं नहीं जानती उदय,कि उस स्तिथि में तुम कैसी प्रतिक्रिया दोगे ? लेकिन यह मन है ना उदय , हमेशा अपने फायदे की बात ही सोचता है. मेरा मन आज भी यही कहता है या यूँ कहो कि मैंने ही इसे ऐसा कहने को विवश किया है, कि तुम मेरे इन सभी सवालों का जवाब “हाँ आज भी और हमेशा ही “ कहकर दोगे. खैर छोडो यह सब बातें जो असंभव को संभव बनाने के सपने देखती और दिखाती है. अगर हमारे नसीब में एक दूसरे को यूँ जी भर निहारना लिखा होता तो हम जुदा ही क्यूँ होते . जानती हूँ बीता हुआ वक्त लौटकर नहीं आता, शायद इसलिए मैंने एक ऐसा पेशा चुना है, जहाँ हर जिन्दगी के फैसले मैं खुद ले सकूँ और किसी के साथ वो ना हो, जो हमारे साथ हुआ .
तुम्हारी नंदू
मैडम ,”आप जिस स्क्रिप्ट की प्रतीक्षा में थीं, समझिये वह आपको मिल गयी “. अनुपम लगभग चीखते हुए नंदिनी को स्क्रिप्ट थमाते हुए बोला .

नंदिनी झटपट अपनी डायरी बंद करते हुए स्क्रिप्ट सरसरी नजर से पढ़ती है .

”पन्नों पर जिन्दगी “ स्क्रिप्ट राइटर के नाम के आगे “अनजान “लिखा हुआ था .

नंदिनी –“टाइटल तो अद्भुत है और राइटर का नाम भी “ .

अनुपम – “मैंने लेखक को बाहर इन्तजार करने को बोल दिया है ,आप कहें तो अन्दर भेज दूँ ?”

नंदिनी ने सहमती में गर्दन हिलाई और अनुपम लेखक को बुलाने बाहर चला गया . दरवाजे पर कुछ ही देर में नोक करते हुए किसी ने प्रवेश किया, जिसे देख नंदिनी के हाथ से स्क्रिप्ट गिर गयी और चौंकते हुए दोनों के मुंह से निकला “तुम”

सपना मांगलिक
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