कहानी समकालीनः खेल-खेल में-शैल अग्रवाल/ लेखनी -मई-जून 17

ताश के पत्तों के लिए सबसे उदास दिन था वह।…
सूरज भी नहीं निकला था उसदिन और जादूगर ने भी उन्हें छुआ तक नहीं था।
दिनभर बूंदाबांदी होती रही थी और रात को तो जमकर लगातार ही पानी गिरा था। इतना पानी-कि देखकर ही सारे पत्ते डर गए । कागज के जो थे बेचारे।
उनके मन में तूफान था पर बाहर कहीं कोई हलचल नहीं थी। मानो सबकुछ ही गुमसुम और उदास था। सब के मन को वही एक खबर कचोट रही थी। उनके अस्तित्व का तो उसके बिना कोई अर्थ ही नहीं था। बिना उसके तो कुछ भी नहीं थे वे।
मानो भगवान ही रूठ गया था उनसे।
उनका भगवान ही तो था वह, मां-बाप और रचयिता…। जैसे चाहे नचाता पर वक्त आने पर खुद भी उनके मोह में नाचता, बंधा खड़ा रहता हमेशा उनके आस-पास ही।
उन्हें संचालित करता, मायावी भांति भांति के खेलों का संसार रचता, मनोरंजन करता और उसी ने आज इतनी बेरहमी से कह दिया कि अब वह नहीं है। था, पर अब और नहीं है उनके लिए । कहाँ गए? पूछा तो बोला -अतीत में।
मुझसे संपर्क मत करना, कर भी नहीं पाओगे।

घुट गए थे तब वे सभी अन्दर ही अन्दर । इतना निठुर कैसे यह ?

बात असल में यह थी कि सभी कहने लगे थे कि ये ताश के पत्ते एक गलत लत बन चुके थे जादूगर की। कुछ और करता ही नहीं था वह। चौबीसों घंटे बस उन्ही के साथ रहता…महामाया परेशान हो गई थी। क्रोध आता था उसे । जलन होती थी इनसे।

वे और गलत लत! कागज व प्लास्टिक से बने निर्जीव ताश के पत्ते!…

इसके पहले कि वह उदास आंसू जादूगर की आंख से ढुलके, महामाया उसे देख तक पाए, जादूगर ने खुद ही पोंछ दिय़ा आंसू अपनी कमीज की आस्तीन से।

नहीं मिलने की कोशिश करेंगे हम तुमसे । सभी ने एकसाथ भरे गले से कहा था तब।

मुझे मालूम था कि तुम मेरी इच्छा की कद्र करोगे ।

और जादूगर ने मुंह फेर लिया उनसे।

‘ जाओ मेरे बच्चों, खुश रहना।’ ‘अलविदा’ आदि और भी बहुत कुछ कहना चाहता था जादूगर पर शब्द मानो उसके गले में ही रुँध गए।

नहीं,पर हम जादूगर को यूँ उदास और अकेला भी तो नहीं रहने दें सकते। पत्तों ने कहा।
क्या मानव दुनिया में सन्यास इसी को कहते हैं? कोई दूसरा उन्ही में से बोला।
उन्हें जादूगर की यह विवशता कतई समझ में नहीं आई। वे नहीं समझ पाए कि यह भी उसी जादूगर का ही कमाल था और वह उनकी सहनशीलता और लगन की परीक्षा मात्र ले रहा था, जैसे राम ने सीता की ली थी कभी।

नहीं सीता राम की कहानी उनकी कहानी नहीं…वे इतने समर्थ और शक्तिशाली नहीं।

फिर हम तो किसी सोने के मृग पर ललचाए भी नहीं। ईंट की बेगम बोली। और कोई राक्षस भी नहीं यहाँ तो जिसे राम को इस बहाने मारना हो, लीला रचनी हो…

बच्चो, चुप हो जाओ, अब ! जादूगर चीखा।

वैसे मन में तो वह भी यही चाहता था कि हमेशा उन्ही के साथ रहे।

साथ नहीं तो इतने पास तो अवश्य ही रहे कि उनका हालचाल मिलता रहे उसे।

जैसे भगवान अपने इन्सानों की खबर लेता रहता है?

चिड़ी के गुलाम से चुप न रहा गया और उसने उदास स्वर में पूछ ही लिया।

हाँ, वही है हमारा सबसे बड़ा हितैषी, सबसे बड़ा मित्र।

उसी के जादू से ही तो हम हाथों में पहुंचते ही जीवित हो जाते हैं। कोई भी लड़ाई जीतते और हारते हैं। पान की बेगम ने मुस्कुराकर एकबार फिर सभी को सांत्वना देने की कोशिश की।

पान की बेगम सब समझ रही थी। जादूगर भी जानता था , बावन पत्तों की जनसंख्या वाले उस समूह में पान की बेगम ही सबसे चतुर थी और उसे सबसे अधिक समझती थी। उसके मन की बात कहने से पहले ही समझ जाती थी। असल में तो उसी की वजह से यह सारा खेल रचा था जादूगर ने। सबसे पहले सिर्फ पान की बेगम को ही तो बनाया था उसने अपने साथ और मनोरंजन के लिए। फिर इतना प्यार करने लगा उस भोली-भोली आँखों वाली बेगम से कि डर गया अपने ही प्यार के मोहजाल से और चार चार बादशाह, तीन और बेगम सहेलियाँ चार चार गुलाम सहित चालीस बच्चे पूरा बावन पत्तों का एक नया संसार रच दिया उसने और एक छोटी सी डिब्बी में बन्द करके सदा के लिए खुद से दूर कर दिया उसे। फिर भी तड़प नहीं गई तो एक सुरक्षित घर तक बसा लिया सशक्त महामाया के साथ उसने अपना। फिर भी उस डिब्बी को खुद से दूर नहीं किया। लगातार पान की बेगम की याद आती रहती उसे और अक्सरही वह उस सिराहने पड़ी गड्डी को उठाता, सहलाता और वापस रख देता। खोलता या खेलता नहीं था। कभी-कभी तो बड़ा मन करता कि पान की बेगम को कम से कम देख ले एकबार। पूछ ले उससे कि वह ठीक तो है। पर डरता था शायद अपनी महामाया से।

ऐसी उदास और अकेली विदा ली थी उसने। जो ना तो पहले कभी किसी ने ली थी और ना ही दी थी किसी को। पत्ते वाकई में उदास नहीं, बेहद उदास थे। बहुत प्यार जो करते थे वे अपने जादूगर से।

हम यही हैं जब भी मन करे आवाज दे देना हाजिर हो जाएंगे। पता नहीं जादूगर ने सुना भी या नहीं पर वे जानते थे कि नहीं रह नहीं पाएगा जादूगर भी उनके बिना, जैसे कि वे नहीं रह पाएँगे ।

जाओ, हमसे जितना दूर जा सको, चले जाओ। रोते हुए हुकुम के बादशाह ने तो यह तक कह दिया था उससे अपने दुख और क्रोध में।

धाँय-धाँय मानो बन्दूक चल गई थी फिर तो चारो तरफ। सबके मन धुँआ धुँआ थे और आँखें सीली-सीली।
जादूगर तो सह गया । बहुत प्यार जो करता था उनसे परन्तु महामाया को बात चुभ गई। बरस पड़ी वह। देखती हूँ कैसे मिल पाते हो तुम सब अब अपने जादूगर से ? क्या कहा तुमने-चले जाएं हम यहाँ से? जाओगे तो तुम सब। औकात ही क्या है तुम्हारी?…तुम हमारी ही दया पर जीने वाले, हमसे ही जाने को कह रहे हो ? हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी ! देखो, क्या हाल करती हूँ मैं तुम्हारा !

उसने चारो बादशाह सहित पूरी ताश की गड़्डी उठाई और घर की खिड़की से पूरी ताकत के साथ दूर फेंक दी गुस्से में। घर के सभी दरवाजे और खिड़कियाँ भी ताले चाभी से बन्द कर लिए।

सांय-सांय बर्फीली हवा चल रही थी। बाहर सबके सब ठिठुरने लगे। चालीसो छोटे पत्ते क्यारियों में इधर-उधर पेड़-पौधों में अटके सुबक रहे थे और राजा रानी गुलाम वगैरह सब ड्राइव पर बिखरे पड़े थे, पत्ते-पत्ते आवारा और बेसहारा हवा में इधर-उधर दुखी भटकते।

जादूगर कुछ देर तो चुपचाप उन्हें उदास आंखों से देखता रहा फिर जब न रहा गया तो बाहर आया, पत्ते समेटे और उनके साथ-साथ खुद भी डिब्बी में घुस गया…जोकर के रूप में। उन्हें वह शक्ति दे दी कि वे अब अपनी सभी कमियों को खुद ही पूरा कर सकते थे। जैसा चाहें वही रूप धरकर वह उनकी मदद करता है अब। साथ में बैठकर हंसता खेलता भी है जब उसका मन चाहे और महामाया को कुछ पता भी नहीं चल पाता अब तो।

ताश के पत्ते जान गए हैं-दूर-पास, हार-जीत और कुछ नहीं, मन का ही एक खेल है! जीवन को भी लोग वैसे ही तो खेलते हैं जैसे उन्हें-पूरे भ्रम और चतुराई के साथ।

हाँ, महामाया को जरूर लोगों ने अक्सर ही हंसते और रोते देखा है, खुद से पूछते और आश्चर्य करते सुना है-

एकबार फिर ये सब इतने खुश और शान्त क्यों और कैसे? उसका अपना जादूगर भी !