कविता धरोहरः अयप्प पणिकर, त्रिलोचन/ लेखनी-मई-जून 17

मालूम नहीं था कि प्यार क्या है

फुलवारी में बिखरी पंखुरियों के बीच
तिनकों की नोक पर
जीवन के प्रकाश से स्फुरित
ओस कण देखने तक
मुझे मालूम नहीं था कि प्यार क्या है

नवजात शिशु के चेहरे को
जिन्दगी की सच्चाई समझती
ढुलकते आँसुओं को पोंछती
मां की दुर्बल मुस्कान देखने तक
मुझे मालूम नहीं था कि प्यार क्या है

किसके लिए पैदा हुए हैं हम
किसने बनायी हैं ये अद्भुत सिढ़ियाँ
जब तक यह जाना कि
जितना देते हैं उतना ही पाते हैं
मुझे मालूम नहीं था कि प्यार क्या है।

कल चमेली खिली, चाँदनी
लता बन तारों पर लिपट गयी
काल नशे में डूबने लगा
इसके बाद क्या शेष जानने को है
जब तक मैं यह सब नहीं समझ सका
मुझे मालूम ही नहीं था कि प्यार क्या है।

युद्ध खत्म हुआ, सपने अंकुरित हुए
जनता फूलों के सिंहासन पर आ बैठी
रात और दिन आते और जाते रहे
जब तक मैने राग को विलास बनते नहीं देखा
मुझे मालूम ही नहीं था कि प्यार क्या है

दूर सपनों की सुनहरी लहरों पर
आदमी की विस्तरित आशाएँ संवारते
भाव गीतों का रुदन सुनने तक
मुझे मालूम ही नहीं था कि प्यार क्या है
-अयप्प पणिकर ( अनुवादः रति सक्सेना)

प्यार वही

जब भौंरे ने आकर पहले पहल गाया,
कली मौन थी। नहीं जानती थी वह भाषा
इस दुनिया की कैसी होती है अभिलाषा
इससे भी अनजान पड़ी थी। तो भी आया

जीवन का वह अतिथि, ज्ञान का सहज सलोना
शिशु जिसको दुनिया में प्यार कहा जाता है,
स्वाभिमान मानवता का पाया जाता है
जिससे नाता। उनमें कुछ ऐसा है टोना

जिससे यह सारी दुनिया फिर राई-रत्ती
और दिखायी देने लगती है। क्या जाने
कौन राग छाती में लगता है अकुलाने
इन्द्रधनुष-सी लहराती है पत्ती-पत्ती।

बिना बुलाये जो आता है प्यार वही है।
प्राणों की धारा उसमें चुपचाप बही है।
-त्रिलोचन