कविता आज और अभीः लेखनी मई/जून 17

श्रद्धांजलि

बौड़मदास मेरा मित्र था

वह रोशनी का रखवाला
लड़ाई लड़ रहा था
अँधेरे के खलनायकों के विरुद्ध

उसे तो ख़त्म होना ही था एक दिन
उसके साथ केवल मुट्ठी भर लोग थे
जबकि अँधेरे की पूरी फ़ौज थी
उसके विरुद्ध

जीवन का अशुद्ध पाठ करने वालों को
सही वर्तनी और उच्चारण सिखाता था वह

सवेरा लाने के लिए लड़ा था वह
एक नाज़ुक दौर में
घुप्प अँधेरे के दानवों से …

काश , हर आदमी बौड़म दास हो जाए
सब के हृदय में सुबह की आस हो जाए

अगली बार

यदि आया तो
अगली बार बेहतर बन कर
आना चाहूँगा यहाँ

झूठ और अवसरवादिता के
अक्ष पर टिका हुआ नहीं
बल्कि मनुष्यता की धुरी पर
घूमता हुआ आना चाहूँगा

अपनों को और समय दूँगा
सपनों को और समय दूँगा

यदि आया तो
अगली बार दुम हिलाने
नहीं आना चाहूँगा
छल-कपट करके खाने
नहीं आना चाहूँगा

सही बात कहूँगा
तुच्छताओं की ग़ुलामी
नहीं सहूँगा

यदि आया तो
अगली बार सूर्य-किरण-सा
आना चाहूँगा
श्रम करते जन-सा
आना चाहूँगा

यदि आया तो
अगली बार
आँकड़ा बन कर नहीं
आदमी बन कर
आना चाहूँगा

आदमकद सोच

कितना भी उगूँ
जुड़ा रहूँ अपनी जड़ों से
जैसे गर्भ-नाल से
जुड़ा रहता है
गर्भ में पलता शिशु

कितना भी बढ़ूँ
बँधा रहूँ अपने उद्गम-स्थल से
जैसे बँधे रहते हैं प्रेमी-प्रेमिका
फ़ौलाद और चाशनी की
डोरी से

कितना भी सोऊँ
जगा रहूँ अपने कर्तव्यों के प्रति
जैसे जगी-सी रहती है
अबोध शिशु की माँ नींद में भी
बगल में पड़े शिशु के कुनमुनाने से

सुशांत सुप्रिय
A-5001 ,
गौड़ ग्रीन सिटी ,
वैभव खंड ,
इंदिरापुरम् ,
ग़ाज़ियाबाद – 201014
( उ. प्र. )
मो : 8512070086
ई-मेल : sushant1968@gmail.com

क्या लिखूं

मै भी कवि बनना चाहूँ,
मगर लिखूं तो क्या लिखूं …?

राम,श्याम, गौतम, नानक,
औ ईसा,कबीर,कुरान लिखूं |
जाति-धर्म-भाषा औ क्षेत्र में,
बटता हिंदुस्तान लिखूं ||

कलुषित हैवानों की संकीर्णता से,
धरती लहूलुहान लिखूं, या |
सत्य,अहिंसा और प्रेम का,
मरता वह इन्सान लिखूं ||

भ्रष्ट, नपुंसक,कुर्सी के दल्लालों का,
झूठा यशगान लिखूं, या|
कायरता, लोलुपता औ अन्धानुकरण से,
भारतीयता का होता अपमान लिखूं ||

भूखे,चिथड़े में,खुले गगन वालों का,
रोटी कपडा और मकान लिखूं |
या फांसी के फंदे पर झूले,
गरीब, मजदूर,किसान लिखू ||

कल्पना लोक की परियों संग खेलूं,
या यथार्थ का गान लिखूं |
झूठ लिखूं या सत्य लिखूं
या फिर झूठा सत्य लिखूं ,
मगर लिखूं तो क्या लिखूं …?
बृजेन्द्र श्रीवास्तव ‘उत्कर्ष’

“हम आ गये हैं !”

हम आ गये हैं !

हताशाओं को तूँ अग्नि दे !
भय से कर ले शत्रुता
किनारे खड़ा विश्वास है
गाँठ बाँध अब,मित्रता

हम आ गये हैं !

हाथ में पतवार है
बीच तूँ मझधार है
गंतव्य तेरा दिख रहा
सम्मुख जो संसार है

हम आ गये हैं !

कूद जा ! इस आग में
भय न खा ! तूँ आँच से
धैर्य रख,तप जा ! स्वयं
कुन्दन बना,जो राख से

हम आ गये हैं !

दूरदर्शी, जो हुआ
काल भी तूँ देखेगा
भयभीत होगी मृत्यु भी
जिंदगी को,सेंकेगा

हम आ गये हैं !

विचलित नहीं तूँ मार्ग से
चलता चला चल,सन्मार्ग पे
पवित्र होगी,आत्मा
अंततः, तूँ बोलेगा !

हम आ गये हैं !

धर्म नहीं ,ईश्वर नहीं
सत्य यही है जीवन का
प्रकृति है जो, पोषित करती
मातृत्व सा,इस उपवन का

हम आ गये हैं !

ध्रुव सिंह “एकलव्य”

नामौजूद प्रेम

एक सुबह
सूरज लाल नहीं था
एक सुबह नीला नहीं था आकाश
नहीं था गुलाबी गुलाब
घास सादा थी
लाल बत्ती पर मुश्किल था फ़र्क़ करना
बीच लाल और हरे के.…
एक सुबह सारे पोस्टर
हो रखे थे श्वेत श्याम
कुल मिलाकर उस सुबह में रंग नहीं थे
एक सुबह
नहीं बजा अलार्म
नहीं रँभाई गायें ना मिमियाईं बकरियाँ
नहीं टनटनाईं साइकिलों की घंटियाँ
कूड़े दूध और अखबार वाले गूँगे रहे
नहीं सुनाई दिए मोटरों के हॉर्न
पायलों-रुनकों की छनक
बर्तनों की खनक
एक सुबह खामोश रही बच्चों की खिलखिलाहट
कुल मिलाकर उस सुबह में आवाज़ नहीं थी
एक सुबह
फीकी थी चाय
कॉफी थी पानी सी
आमों में मिठास गायब थी
पराठों-आम्लेटों नमकीनों में नहीं था नमक
सैंडविच ब्रेड या पाव भी रोज से न थे
और न मसाले
मिर्च तीखी नहीं थी
एक सुबह करेले तक कड़वे न थे
कुल मिलाकर उस सुबह में स्वाद नहीं था
एक सुबह
बेला-चमेली में खुश्बू नहीं थी
न धूप-अगरबत्ती में
न केसर ना केवड़े में
न साबुन शैम्पू में
ना ही इत्र या परफ्यूम में सुगंध थी
जलेबियों से मीठी गंध नहीं उठी
बासमती में नहीं मिला सोंधापन
एक सुबह दिखा हवा में कुँवारापन
कुल मिलाकर उस सुबह में महक नहीं थी

एक सुबह
स्पर्श-स्पर्श नहीं था
चाय गर्म नहीं पानी में ठंडापन नहीं
ना लगी कमीजों में ढँक लेने जैसी बात
घर और बाहर तापमान एक था
नहीं थी मुस्कान में ताज़गी
न आलिंगन में ऊष्मा
न चुम्बन में सिहरन
न भय में कँपकँपी
कुल मिलाकर उस सुबह में एहसास नहीं था
सच कहें तो वो सुबह सुबह नहीं थी
उसमे सुबह जैसा कुछ नहीं था
क्योंकि उस सुबह प्रेम नामौजूद था
बीती रात नफरतों ने घेरकर क़त्ल कर दिया था उसका
डर जाता हूँ सोचते हुए
क्या हो जो
दुनिया की हर रात होने लगे ठीक ऐसी ही काली।

शेरिफ़ तुम्हे याद करते हुए

खेत में खड़ी लहलहाती फसलों की बालियाँ
खून सनी तलवारों से वज़नी होतीं
अगर तराज़ू होता
दुधमुँहे बच्चे को सीने से लगाए
किसी औरत के हाथ में

या विषय पर ली जाती राय
दीर्घ चुम्बन में व्यस्त किसी प्रेमी युगल से

दुनिया और भी बेहतर समझ पाती
दिल के इंसानियत से रिश्ते को
जो गाज़ा में बारूदी गंध के बीच उछलती लाशों को
सिनेमाई दृश्य न समझता इज़राइल
ना खा रहा होता बैठकर पॉपकॉर्न
ह्रदय विदारक रुदन देखते
चीत्कार सुनते हुए

पिशाचों ने रातों के बाद क़ब्ज़ा लिए हैं दिनों के हिस्से….

और ज़माना गर ऐसे ही मरदूदों का है
तो मुक़म्मल हुआ भीतर के ख़ौफ़ का
एक कंपकंपाहट भरी ज़ख़्मी आवाज़ के साथ बाहर आना
यूँ कहा जाना
कि ‘ज़माना खराब है’

इस बीच याद आते हो तुम शेरिफ़
ओ मेरे फिलिस्तीनी दोस्त!
भले तुम्हारे उपनाम ‘अब्देलघनी’ को
तुम्हारी तरह एपीग्लॉटिस से बोलना न सीख सका मैं
पर महसूस सकता था
जड़ों से कटने का दर्द तुम्हारी बातों से
जो पाया विरासत में तुमने

नहीं देखी तुमने कभी अपनी मादरज़मीं
सिर्फ सुने अपने पिता से उसके किस्से

माफ़ करना
मगर जब तुमने बताया था
अपने भाई को कैंसर हो जाने के बारे में
तब भी तुम नहीं उतार पाए थे अपनी आँखों में उतना पथरीलापन
जितना कि उतर आता था तुम्हारे फिलिस्तीनी ज़ख्म कुरेदने पर

अबकी फिर
बारिश के पानी से कहीं ज्यादा बरसी होगी बारूद
जिस्मानी तौर पर छूट चुके
तुम्हारे पुश्तैनी घरों की छतों पर

फिर तुम्हारे कुछ दोस्त-रिश्तेदारों के लहू को किया गया होगा मजबूर
उनकी देहों से बेवफ़ाई करने को
फिर बिछड़े होंगे कई सदा के लिए
बेवक़्त सुपुर्द-ए-खाक़ हुई होंगीं कई ज़िंदगियाँ
फिर यतीम और बेवाओं की आँखों से लावे बहे होंगे
फिर उस तरफ की कुछ नई सूनी कोखों ने
इम्तिहानों से आज़िज आकर उठाये होंगे हाथ दुआ में

काश सुन सकते तुम
जो ये हिन्दुस्तानी दिल रोता है तुम सबके लिए
खैर आँसू बहाने से क्या हल
क्या असर नाम भर के इंसानों पर

सो काश सुन सकता लहू ही कि
‘देह के भीतर ही बहा करो
गोलियों, खंजरों या बारूदों के
उकसावे में आ
आवारा हो जाना ठीक नहीं’

मुहब्बत जानती है

मुहब्बत जानती है
किसे कितना हँसाना है
कब खामोश रखना है
कब कितना रुलाना है
मुहब्बत जानती है
कितने में जी सकते हैं लोग
उसे कितना है याद रखना
कब उसको भुलाना है
कब सिंए रखने हैं होंठ अपने
मुहब्बत जानती है
मुहब्बत जानती है
कि कब उसको बुलाना है
मुहब्बत जानती है
है कब तक जगाए रखना मुझे
औ कब मुझको सुलाना है
और इस इल्म से नफ़रतों की झोली खाली है
क्यूँ न बचे रहने की जुगत में
मुहब्बत के हवाले कर दें खुद को!

-दीपक मशाल

‘स्वप्न और तुम’

जब मैं तुमको मिली थी
कैसी अल्हड़ थी, नादान थी .
रेत के सपने बुनती थी रात भर,
लहरें आती थीं और चुरा ले जातीं थीं
अपने बहाव के साथ .
पर जब तुम मिले तो दिखाए
काँच के रंगीन सपने मुझे .
बड़े ही सुहाने थे वो सपने
जो मैने तुहारे साथ देखे थे.
लेकिन पता नहीं था कि
बड़े ही नाज़ुक होते हैं .
ज़रा से झटके से टूट जाते हैं
और टूटने पर काँच की किरचें
चुभती हैं सीधे हृदय के अन्दर.
लहूलुहान हो जाता है अंतस् गहरे तक
काश! न दिखाए होते रंगीन सपने तुमने,
मैं वैसे ही अल्हड़-नादान सी बनी रहती
रेत के सपने बुनती रहती हर रात .
पर तुमसे मिलने के बाद…
अब मैं नादान नहीं रही
अब बुनूँगी अपने सपने
यथार्थ के धरातल पर .
वो सपने केवल मेरे ही होंगे
नहीं बाटूँगी किसी के साथ
नहीं,तुम्हारे साथ भी नहीं .
जानते हो क्यों?
क्योंकि…
जब हम मिले थे…
आदम और हव्वा की तरह .
सारी सृष्टि आलिंगन करती सी,
प्रेम के प्रतिबिम्बों को अंकुरित करती सी ,
सृजन से भरपूर …
हमारे चारों ओर आलोड़ित थी .
मंद समीर मेरी अलकों से अठखेलियाँ कर रहा था
और तुम …
तुम आदम थे, बल और पौरुष के प्रतीक
मैं कमलनाल सी कोमल, पर सहस्त्र-दल कमल सी पुष्ट .
मेरे मदमाते यौवन में बसा था धड़कते हृदय का स्पंदन .
लज्जापूर्ण रक्ताभ कपोल और अधरों में था कम्पन .
तुमने मुझे मिलन-सुख से सरोबार कर दिया .
आकाश का चाँद हमारे मिलन का गवाह बना
और चाँदनी को रिझाने लगा .
सागर की लहरें उमड़-उमड़ कर आकाश को छूने लगीं .
सारी प्रकृति वासंती हो उठी .
और मैं …
तुम में समाहित होकर तृप्त हो गयी .
पर लगता है तुम तृप्त नहीं हुए,
कैसे होते?
जितनी बार तुम मेरे पास आते
उतनी ही बार तुम्हारी पिपासा बढ़ती जाती .
तुम आदम थे, बल और पौरुष के प्रतीक ,
तुम्हारा पौरुष तुम्हे तृप्त होने ही नहीं देता था .
मैं तुम्हारे प्रेम के उपहारों से लदी-फंदी सी
अपने आप में ही संयत रही .
और तुम ?
अपने पौरुष का बल दिखाने
नयी-नयी मंज़िलें तलाशने लगे.
मेरे आकर्षण से छिटक कर दूर …
न जाने कहाँ-कहाँ भटकने लगे .
अधीर और बेबस होकर मैं …
सिंदूरी अंगारे की तरह सुलगती रही
और आज तक सुलग रही हूँ
तन से भी मन से भी .
अपने रक्तरंजित स्वप्नों के साथ,
अपने रक्तरंजित स्वप्नों के साथ.

आज पूरा विश्व रंगा है मेरे जैसी
स्त्रियों के सम्मान के रंगों से
पर कोई रंग नहीं जो मेरे
इन स्वप्नों को प्रेम के रंग से
सराबोर कर दे…
तुम भी नहीं.
-शील निगम

साझा सपना

सुना है मैंने प्रेम पकता है वियोग में
लेकिन कब तक कितना
पता नहीं
ऊनींदा सा
पलको की धीमी धीमी चाप के सहारे
उतर रहा हूं मैं
तुम्हारी मधुर स्मृतियों की घाटी में
और फिर अचानक
कब चला आया हूं मैं तुम्हारे सपने में
पता ही नहीं चला-
हमारी सांझी प्रीत का
साझा सपना है यह शायद
देख रहा हूं मैं
                  तुम एक विशाल आभा चक्र लिए
आकाश गंगा में तैर रही हो
और खेल खेल में सूरज को पकड़ कर तुमने
अपने माथे की बिंदिया बना लिया है
चांद सितारों की सीढ़ि से उतरती
अल्हड़ किशोरी सी इठलाती इतराती तुम
अपनी स्मित की चांदनी बिखेरती
चली आ रही हो मेरी ओर
और मैं समंदर के किनारे
एक टूटी नांव पर खड़ा
बावरां सा आलिंगनातुर
निहार रहा हूं तुम्हें अनिमेष
देख रहा हूं मैं
कि कृतिकाओं के जंगल में
बैचेन हिरणियां दौड़ रही हैं
इधर से उधर बदहवास
शायद उनकी नाभियों में से
कस्तूरी चुरा कर उड़ेल दी है तुमने
अपने सिर पर
बौरां उठा हूं मैं…
यह तुम्हारे आलोक की खुशबू है
या तुम्हारी खुशबू का आलोक
पिघल रहा है मेरा अहं
तुम्हारे आलिंगन की ऊष्मा से
तुम्हारे सपने से निकल कर जाते हुए
मेरा मन बहुत भारी है…
 -मुरलीधर वैष्णव