अपनी बात/ लेखनी मई-जून 16

baatहर समुद्र की अपनी पहचान होती है, जैसे कि इन्सान की होती है। ऊपर छाए आसमान के अनुरूप ही रूप रंग बदल लेते है ये, जैसे कि अच्छा-बुरा संग-साथ आदमी को बदल देता है। इस अंक का विषय समुद्र है, समुद्र जो हम सबको प्रिय है, समुद्र जिसके रहस्य और कल्पनाओं में कौन नहीं डूबा होगा। कई समुद्र यात्राएँ के अवसर दिए हैं जिन्दगी ने और घंटों मंत्रमुग्ध बहुत पास से देखा भी है मैंने इसकी लहरों को भांति-भांति की क्रीडाएँ करते, कभी तट पर बैठकर तो कभी पानी के जहाज पर मंत्रमुग्ध तैरते हुए। इसके हर रूप और रंग में एक चुम्बकीय अकर्षण है…हर बार ही आँखों के सहारे मन ने इसकी अतल शीतल गहराइयों में डूब जाना चाहा है, भीगा है। कहीं नीलम सा चमकदार गहरा नीला, कहीं हरा तो कहीं सफेद या ऊदे सलेटी से लेकर गहरे काले रंग तक का समन्दर…रहस्यमय गहराई, वहाँ वास करते भांति-भांति के जीवजन्तु और रत्नगर्भा प्रकृति आदिकाल से ही तो मानव जाति को लुभाता और भरमाता आया है यह अपने रहस्य और विस्तार से ।
आज जब अति आधुनिक जलयान हैं और जल यात्राएँ पहले से अधिक सुरक्षित और सुगम हैं, समुद्र मार्ग का प्रयोजन मात्र जीवोपार्जन व व्यापार ही नहीं, अपितु मनोरंजन भी है…मनोरंजन जो आज इस इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा व्यापार है। पर हम यहाँ सारे शोर-शराबे से दूर उस समुद्र की बात करेंगे जिस पर कवि और कलाकार दोनों ही न्योछावर हैं। ऐसा अदम्य शान्त आकर्षण और विरोधाभास है इसकी उछाल खाती लहरें और थिर अंतस्थल में कि विस्मित आँखें हटती ही नहीं। पुराणों की मानें तो देवता और असुर तक इसकी गहराई में जाने, मंथन करने से खुद को रोक नहीं पाए थे, वह भी मन्दार पर्वत की मथनी और वासुकी नाग की रस्सी बनाकर। कहीं नोहा की नाव बनकर इसने मानव सभ्यता और हमारे विश्व को इसने बचाया है तो कभी शिव के क्रुद्ध प्रलयंकारी डमरू की टंकार पर सबकुछ ही जलमय कर डाला है। हम सभी जानते हैं अलेक्जान्ड्रिया से लेकर द्वारिका तक जाने कितने शक्तिशाली और खूबसूरत नगर और सभ्यताओं को अपने अंतस् में संजोए बह रहा है यह, इसकी तो रेत के कण- कण तक में मानव-सभ्यता का इतिहास समाया हुआ है। जा ने कितने जीव-जन्तु और बनस्पतियों का घर है , आज भी तो इसके तह की खोज-खंगाल जारी है।
प्रकृति और पुरुष सृष्टि की शुरुवात से ही पूर्णतः एक दूसरे पर निर्भर रहे हैं…एक दूसरे के पूरक … प्रेमीयुगल से ही चिर सम्मोहन के आलिंगन में लिपटे हुए। पृथ्वी के बाद समुद्र की तरफ ही इन्सान अपनी जरूरतों के लिए सर्वाधिक मुड़ा है। इतनी जलपरियों, राक्षसों और रहस्यमय जीवजन्तुओं की कल्पना समुद्र की कोख में की है इस विस्मित मानव ने कि रत्नाकर इसके नाम का पर्याय रख चुका है।
शायद कुछ ज्यादा ही देखा, समझा और आत्मसात किया है हमने इसे, तभी तो शरीर के दो सर्वाधिक सुकुमार और शशक्त अंग-आँख और हृदय की तुलना इससे करते नहीं थकते हम। कितनी जगह आदमी को समुद्र सा गंभीर और रहस्यमय या लहरों सा चपल चंचल कहा गया है- फहरिस्त बनाने बैठेंगे तो पन्नों पर पन्ने भरते चले जाएंगे । खुद मेरी अपनी रचनाओं में समुद्र और लहरों का जिक्र…इसके रेतीले किनारे, जाने-अनजाने अक्सर आ ही जाते हैं। समुन्दर सी गहरी नीली आंखें तो पूरे विश्व में ही सौंदर्य का अप्रतिम प्रतिमान बन चुकी हैं । इसका खारापन, किरकिरी रेत सब कुछ भाती है हमें। सच ही तो है, बाहर से दिखता शांत स्वरूप परन्तु निरंतर चलती आंतरिक हलचल.. यह .हृदय और समुद्र की बड़वानल कहीं सच में एक ही तो नहीं। उठते-गिरते इन ज्वार-भाटों के साथ वाकई में यह कितना क्षणे रुष्टा, क्षणे तुष्टा आदमी के स्वभाव से मेल खाता है, सोचती हूँ तो आश्चर्य होने लगता है। सभी कुछ समझ या समेट ले, समझा दे, यह संभव ही नहीं, न समुद्र के लिए और ना ही माटी के पुतले मानव के लिए। ज्यादा उपमान और विश्लेषणों में न जाकर अपनी ही कविता की कुछ पंक्तियों से तुलना और अपनी यह बात यहीं खतम करती हूँ-
लहरों के उन्माद पर अंतःस्थल जो उलीच दे
उस सागर का मर्म रेत में बिखर जाता है
चित्रकारों और कवियों ने तो इसके विभिन्न रूप और और भावों को उकेरा ही, व्यवहारिक रूप में भी समुद्र मानव-सभ्यता के विकास का न सिर्फ साक्षी रहा है अपितु उसमें सहकर्मी और सहभागी भी। वैसे भी, जब पृथ्वी का तीन चौथाई हिस्सा जल ही जल है और मात्र एक चौथाई ही थल है, तो समुद्र को कैसे अनदेखा किया जा सकता है ! आज यातायात और व्यापार गांव, शहर और पड़ोसी देशों तक नहीं, महाद्वीपों में है। कदम-कदम पर इसकी जरूरत पड़ती है। कितने पानी पर किस देश का अधिकार है और मछुआरे कहा तक जाकर मछलिय़ाँ पकड़ सकते हैं इस पर तो आज भी एक से एक विकसित देशों तक में ठन जाती है। भूलजाते हैं सभी कि बहते पानी पर कानून लिखना या सरहदें खींचना इतना आसान नहीं। चित्रकार और कवियों ने तो इसके हर रूप को उकेरा ही है मानव सभ्यता और व्यापार के विकास में भी इसका योगदान महती है। एक तरफ तो यह अथाह जल राशि देशों और महाद्वीपों को आपस में जोड़ती है, दूसरी तरफ अनचाहे अक्रमणों के बीच चपल और दुर्गम अवरोध का काम करती है। भारत मानव सभ्यता के शुरुवाती युग में ही इतना आगे बढ़ सका, इसमें इसके तीन तरफ ( पूरब, पश्चिम और दक्षिण दिशा में लहलहाते समुद्रों का विशेष योगदान रहा है।
आर्थिक और सामाजिक प्रगति जैसी अन्य बातों के अलावा किसी भी देश की ताकत का अंदाज इस बात से भी लगाया जाता है कि उसकी नौ सेना कितनी आधुनिक और समयानुकूल है, कितनी जल सीमाओं की सुरक्षा में समर्थ है। कला साहित्य और दर्शन में तो चित्रकार और कवियों ने तो इसके हर रूप को उकेरा ही है मानव सभ्यता और व्यापार के विकास में भी इसका योगदान महती रहा है। एक तरफ तो यह अथाह जल राशि देशों और महाद्वीपों को आपस में जोड़ती है, दूसरी तरफ अनचाहे अक्रमणों के बीच चपल और दुर्गम अवरोध का भी काम करती है। भारत मानव सभ्यता के शुरुवाती युग में ही इतना आगे बढ़ सका, इसमें इसके तीन तरफ पूरब, पश्चिम और दक्षिण दिशा में फैले समुद्रों का विशेष हाथ है। चाहे व्यापार की बात हो या फिर मनोरंजन की समुद्र आज मानव समाज का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। कला,साहित्य और दर्शन में जो अपनी अथाह जलराशि सा आदिकाल से ही लहलहा रहा है उस सागर को गागर में भरना ना तो कभी संभव है और ना हमारा ध्येय या प्रयास ही, बस नुनखुरे इस विस्तार में थोड़ा साथ-साथ भीग लें, बह पाए तो प्रयास सार्थक समझूंगी…
लेखनी का अगला अंक हमने पौराणिक ग्रंथ महाभारत पर रखने का मन बनाया है जिसके लिए आपकी रचनाएं आमंत्रित हैं। रचनाएं हमें 10 जून तक मिल जाएंगी, तो सुविधा रहेगी। यह लेखनी का 103 वाँ अंक होगा और वर्ष 2016 का चौथा। 17 मार्च से आपकी लेखनी अपने इस सृजन यात्रा के दसवें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है और हर माह ही विभिन्न विषयों को लेकर ही आपके समक्ष प्रस्तुत हुई है। पिछले एक वर्ष से कुछ अपरिहार्य निजी स्वास्थ समस्याओं के चलते हर माह की जगह दो माह पर ही नया अंक दे पाना संभव हो पाया है और अब आगे भी यही द्विमासिकी प्रणाली ही अधिक अनुकूल व संभव प्रतीत हो रही है। विश्वास है कि यह द्विमासिकी व्यवस्था आप सभी के साथ और सहयोग के रहते पत्रिका के स्वरूप और सामग्री में और भी निखार लाएगी…
यह सृजन यात्रा यूँ ही चलती रहे, हमारा आपका साथ ऐसे ही बना रहे, ऐसी अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ,

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-शैल अग्रवाल