विमर्शः परदेश में देश-शैल अग्रवाल/ लेखनी-नवंबर-दिसंबर 17

परदेश में देश

आज भारतीयों ने दुनिया के कोने-कोने में खुद को बेहद सफलता के साथ स्थापित कर लिया है। भारतीय मूल के व्यक्ति पार्लियामेंट के मेम्बर ही नहीं प्रधान मंत्री तक बन चुके हैं अपनाए हुए देशों में। जाने कितने डॉ. और इन्जीनियर कितने देशों की व्यवस्था संभाले हुए हैं। व्यवसाय की बात करें तो भी सबसे आगे हैं रेत में से भी सोना निकालने वाले हमारे भारतीय। जहाँ एक तरफ मुकेश अम्बानी जैसे व्यवसायी भारत ही नहीं, एशिया के सर्वाधिक संपन्न व्यक्ति बन चुके हैं, लक्ष्मी मित्तल और हिन्दूजा जैसी शख्शियत यूरोप में भारत का झंडा गाड़े हुए हैं। अमेरिका की तो पूरी सिलिकौन वैली ही भारतीयों ने संभाल रखी है और सारी उलझनों का तुरंत ही हल ढूँढ लाने वाले गूगल महाराज के सी एम ओ भी भारतीय ही हैं।

फिर भी परदेश तो परदेश और परदेश को देश बनाने या मानने में वही समस्याएं , वही भय होते हैं , जो अजान या अपरिचित से होते हैं, या अंधेरे में छलांग लगाते वक्त मन में आते हैं। कोई इसे मजबूरी कहता है तो कोई किस्मत, बस मनःस्थिति की ही तो बात है सारी । फिर आजके इस त्वरित संचार युग में तो कुछ अजनबी है ही नहीं। छिपा ही नहीं । देश-परदेश ही नहीं। जहाँ मौके हैं , जहाँ संभावनाएँ हैं , रोटीरोजी है, बेहतर जिन्दगी है वहीं जा बसता है आदमी चाहे वह देश में हो या परदेश । यह प्रवास की प्रक्रिया तो पशुपक्षिओं तक में है क्योंकि सुख समृद्धि की तलाश ही नहीं, आत्म सुरक्षा से भी तो जुड़ी है कहीं न कहीं यह प्रवृत्ति।

सबकुछ जानते समझते आदमी का प्रवास आज भी दो तरह का है …एक जो स्वेच्छा से जाते हैं, बेहतरी की तलाश में गए, ऐसे लोगों को परदेश में देश महसूस करते ज्यादा वक्त नहीं लगता। ना ही पीछे छोड़कर आए देश को पलपल याद ही करते हैं ये अपितु खुश रहते हैं अपने ऩए परिवेश में। जितना वक्त देश में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने में लगता है उतना ही या उससे भी कम इन्हें परदेश से देश और देश से परदेश जाने में लगता है। घर में बैठे-बैठे ही दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से जुड़ लेते हैं, बातचीत कर लेते हैं। भौगोलिक और सामाजिक पल-पल की खबरें और तस्बीरें मिलती रहती हैं इन्हें दूरदर्शन और अन्य संचार साधनों से। पर दूसरे वे हैं जो मजबूरी में या किसी भयवश प्रवासी बने। या तो इनकी मातृभूमि युद्ध का शिकार हुई या फिर किसी नैसर्गिक आपदा से बेघर हो गए। ये अवांझित प्रवासी हैं, खुदकी असुरक्षा की भावना आजीवन इनका पीछा करती रहती है। ये वो प्रवासी हैं जो कभी-कभी बहुत बड़े-बड़े कामों को अंजाम दे पाते हैं, बड़ी उपलब्धियाँ हासिल करते हैं क्योंकि इन्हें पूर्णतः हारी लड़ाई जीतनी होती है , इनके पास हारने को कुछ नहीं बचा होता।

इन प्रवासियों या शरणार्थियों को जहाँ जिस देश को घर बनाने जा रहे हैं , उसके बारे में कुछ पता नहीं रहता, क्योंकि  नहीं पता होता कि कौनसा देश स्वीकारेगा, शरण देगा और फिर उस नए देश , नए वातावरण से उनका सामंजस्य हो भी पाएगा या नहीं।  तन से और  मन से टूटे-भटके लोग हैं ये। फिर भी जिजीषा के रहते एक आरामदेह कोना या घर का प्रयास जारी रहता हैं। कइयों की तो पूरी जिन्दगी ही शरणार्थी कैंपों में ही निकल जाती है। घर बना भी पाएँगे या नहीं , जहाँ मनपसंद व्यक्ति और आराम की जानी पहचानी वस्तुएँ ( यदि हूबहू वही नहीं तो उनसे मिलती-जुलती जिन्हें पीछे छोड़ आए , पहचानने वाले, प्यार करने वाले हों, यह सब सपने इनकी प्रार्थनाओं में ही रहते हैं! इन्हें तो यह तक पता नहीं होता कि क्या उनका नया देश उन्हें आत्मसात् भी करेगा? आज की यह अशांति और आतंकवाद कहीं न कहीं इन शरणार्थियों की समस्या से भी गहरे जुड़ी हुई है।

तो प्रवास की पहली शर्त अपनाने की ही होती है और मांग सामंजस्य की। जिसने इस बात को समझ लिया उसका घर कहीं भी आरामदेह ही होगा चाहे वह किसी भी देश में क्यों न हो।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है , कहीं भी हो जो समाज में घुलते-मिलते नहीं, या समाज जिन्हें अपनाता नहीं, या तो आवारा बादल से अकेले-अकेले भटकते रहते हैं या फिर निराश मनःस्थिति के रहते कई ग्रन्थियों के शिकार हो जाते हैं। विक्षिप्त और आत्मघाती तक हो जाते हैं कई तो। देश हो या विदेश प्रायः एक सुचारु जीवन का अर्थ ही संतुलन व सामंजस्य है और  इसके लिए जरूरी है कि व्यर्थ के तनाव से दूर रहा जाए। सामंजस्य हर परिस्थिति में विवेक और संयम मांगता है। धैर्य की बहुत जरूरत है। दूसरों को कम, खुद को ही अधिक बदलना पड़ता है । कहाँ तक बदलें और कितना बदलें ऐसा नीर-क्षीर विवेक भी किस्मत या दैवीय आशीष से ही मिलता है, संस्कारों से मिलता है। नए वातावरण , नए परिवेश से सामंजस्य करने में कहीं किसी हीन मानसिकता या ग्रंथि का शिकार न होना, असुरक्षित न महसूस करना, इस बचाव की सारी तैयारी भी खुद ही करनी पड़ती है और मेरी नजर में एक आम प्रवासी के लिए यही प्रवास की सबसे बड़ी चुनौती है। प्रवास की ही क्यों, जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि परिस्थितियाँ और माहौल पल पल बदलते रहते हैं। सफलता में तो सैकड़ों इर्दगिर्द आ जुटते हैं परन्तु जैसा कि तुलसीदास कह गए हैं-‘ धीर धरम मीत और नारी, आपदकाल परखिए चारी।‘ धैर्यवान , पत्नी या मित्र का मिलना ही नहीं, खुद व्यक्ति का भी हर ऊँच-नीच में संतुलित रह पाना इतना सहज नहीं। नए सिरे से जड़ें जमाने के लिए सही जमीन, सही मिट्टी की जरूरत तो पड़ती ही है।

अगला सवाल उठता है किन संघर्ष और मानसिकता से गुजरता है इन्सान जब वह अपने देश, अपनी संस्कृति और अपने माहौल से निकलकर दूसरे देश में जा बसता है? क्या देश का माहौल, अपने देवी-देवता, मिर्च-मसालों और परिचित अन्य सामग्रियों को जुटा लेने से ही वापस आ जाता है सारा संतोष और चैन या फिर कुछ और भी है जो याद आता है, परेशान करता है प्रवासी को…ठीक से फलने-फूलने नहीं देता?

हम सभी जानते हैं जाति और रंग के भेदभाव, ईर्षा आदि से भी प्रायः जूझना पड़ता है प्रवास में, पर यह बुराइयाँ कहाँ नहीं, हाँ यह बात दूसरी है कि प्रवास में, अपनों के अभाव में ऐसी घटनाएँ और अधिक तीव्रता से महसूस होती हैं और यही वजह है कि रोटी-रोजी और सिर पर छत के बाद सर्वप्रथम वह अपनों की तलाश में निकल पड़ता है… मित्र और परिचितों के रूप में अपनों को जुटाता है। अपने यार दोस्तों का, एक-सी रुचियों वालों का गुट या समूह बनाता है। क्योंकि समूह में ही सामाजिक ताकत है। पहचान है। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, जानता है प्रवासी। अपने जिनके साथ वह मनमानी योजनाएं बना सके, मनोरंजन कर सके और कुछ ऐसे भी जिनके साथ वह निश्छल भाव से अपने सुख-दुख बांट सके। हंस-रो सके। प्रायः इस दूसरे रोल में भगवान के अलावा बिरले ही मिल पाते हैं उसे। क्योंकि ऐसे बड़े माता—पिता, गुरु हितैषी आदि तो सभी पीछे छूट चुके हैं। निजता व विश्वास की गहनता सदैव वक्त मांगती है और खुशकिस्मत ही हैं वे जिन्हें ऐसे एक भी मित्र या गाइड मिल जाते हैं विदेश की धरती पर। भगवान ही अकेला है जो सबका पिता है, जिसके पास कभी भी कोई भी, बिना किसी भेदभाव के फरियाद या शिकायत लेकर पहुंच सकता है। मदद ही नहीं, चमत्कारों की भी अपेक्षा कर सकता है। और वह सिर्फ सुनता है , दुख दर्द का प्रचार नहीं करता, चीभ चटकारे का मुद्दा नहीं बनाता। यही वजह है कि प्रवासी अपने घर के बाद आसपास ही एक भगवान के घर को भी तलाशने लगता है। यही वजह है कि धर्म ही नहीं, धर्मस्थान भी जीवन में अहम् स्थान रखते हैं और विदोशों में तो विशेषकर। चर्च के साथ-साथ मशरूम से उगते ये मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे पापों के प्रयाश्चित के अलावा एक सच्चे साथी, अपनी पहचान की तलाश भी तो हैं।…

ये धार्मिक संस्थान न सिर्फ आत्मिक बल देते हैं निराशा और भटकन में , अपितु जुड़ने का, अपनेपन का आत्मविश्वास और निजी समूह का अहसास भी देते हैं । और विदेशी अजनबी माहौल में यह कम संतोष की बात नहीं। व्यस्त जीवन शैली और संघर्ष मय जीवन के रहते भूलते जाते तीज-त्योहार, परम्परागत रीति-रिवाज और संस्कार आदि के आयोजनों द्वारा पीछे छूटे देश के प्रति उत्तरदायित्व का बोझ तक बांट लेते है अक्सर ही ये। यही वो जगहें हैं जो विदेश में पलते-बढ़ते बच्चों को देश की बोली , वेशभूषा को भूलने नहीं देते। ऩई पीढ़ी को पीछे छूटे संस्कार और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा आदि की त्योहारों के रूप में याद दिलाते रहते हैं। मिलने-मिलाने का मौका देते हैं, कुछ पल के ही सही वापस देश के पुराने वातावरण में कुछ हद तक पहुंचा देते हैं। संतोष की बात है कि हाल ही में देश के दूतावासों ने भी यह रोल अपनाया है और स्थानीय भारतीय मूल के लोगों से मेल-मिलाप बढ़ाया है।

नौस्टैलिजिया या पुरानी यादें प्रवासी जीवन का एक बड़ा हिस्सा हैं। तस्बीरें, संगीत, दावतों आदि के बहाने वह किसी-न-किसी रूप से इन्हें अपने आसपास जोड़े ही रखता है। यही वजह है कि बौलीवुड की फिल्में भारत से बाहर बसे भारतीयों का एक बड़ा मनोरंजन रही हैं। इन्होंने न सिर्फ देश की याद को जिन्दा रखा है , बल्कि भाषा को भी मरने नहीं दिया। प्रवासियों की अगली पीढ़ी की हिन्दी से पहचान ( जिनके घरों में हिन्दी नहीं बोली जाती) शुरु में सबटाइटल पढ़-पढकर देखी इन्ही देशी फिल्मों से हुई है। इनके प्रचलित और मधुर गानों से हुई है। कई विकसित देश जैसे अमेरिका कैनेडा आदि में इन्ही के सहारे बोलचाल की सरल हिन्दी पढ़ाने और सिखाने के सफल प्रयोग भी किए गए हैं। कहने का सिर्फ यही तात्पर्य है कि जहाँ चाह वहाँ राह निकल ही आती है। परिवार को बिखरने न देना यह प्रवास की ही नहीं, आज देश में भी समस्या है। इसके लिए भी अभूतपूर्व सहनशीलता और प्यार की दरकार होती है परिवार के सभी सदस्यों से , जो आज के स्वार्थी परिवेश में दुर्लभ ही है।…

अपनों की याद आना एक बात है पर उस याद में घुलते ही रह जाना दूसरी… सफलता की चकाचौंध करती कहानियों के साथ साथ नए वातावरण , नए परिवेश से सामंजस्य न कर पाने की वजह से हीन मानसिकता या ग्रंथि का शिकार होना असुरक्षित और अकेला महसूस करना आम समस्याएं हैं जो प्रायः नौकरी के लिए संघर्ष करते, परिवार से दूर और अकेले रहते प्रवासी युवाओं में दिखती हैं विदेशों में । प्रवास से कमाई करके नौका भर-भरके लौटने वालों की कहानी तो हम सत्यनरायण की कथा में भी सुनते आए हैं, परन्तु यहाँ बात लौटने की नहीं, वहीं पर बस जाने वालों की है। किन संघर्ष और मानसिकता से गुजरता है एक औसत दर्जे का आम इन्सान, जब अपने देश, अपनी संस्कृति और अपने माहौल से निकलकर दूसरे देश में जा बसता है? या फिर किस सुख वर्षा की रिमझिम के नीचे यूँ फलता-फूलता है कि अपनों की याद उसे विह्वल करना भी छोड़ देती है? क्या देश का माहौल , अपने देवी-देवता, मिर्च-मसालों और परिचित सामग्रियों को जुटा लेने से ही वापस आ जाता है देश या फिर कुछ और भी है जो याद आता है या परेशान करता है प्रवासी मन को?

यूँ तो अब सफल प्रवासियों की ऐसी भी खेप दिख रही है जिनके मां बाप हर वर्ष उनकी मदद करने वहाँ आते हैं , उनकी भी सैर हो जाती है और पोते पोतियों का भी इम्तहान आदि के वक्त में सही भरण-पोषण व साथ हो जाता है । नौकरी पेशा व्यस्त दम्पति के लिए भी यह कम राहत की बात नहीं । परन्तु समस्या वहाँ उठती है जहाँ ऐसे घरों में बूढ़े मांबापों की औकात नैनी और रसोइयों से अधिक नहीं रह जाती। या फिर वह मां-बाप जिनके बच्चों ने उनका जी भरकर ए.टी.एम मशीन की तरह इस्तेमाल तो किया पर लुटने के बाद वही उन्हें अवांछनीय बोझ लगने लगे। घर में ही कैद इन वृद्धों की जी भरकर दुर्गति होती हैं। कम-से-कम यहाँ के समाज में खुलापन तो है यदि बीमार और अशक्त मां बाप की देखभाल नहीं हो सकती तो उन्हें केअर होम में उनकी किस्मत पर छोड़ देते हैं बच्चे। समाज के आगे कोई झूठा मुखौटा नहीं और ना ही मां-बाप एशियाई मां-बाप की तरह अपना सब कुछ बच्चों को सौंपते हैं और ना ही बच्चे उन्हें अपने व्यस्त जीवन का कोई विशेष समय ही देते हैं परन्तु एशियाई परिवारों में कई पिछली पीढ़ी के अभी भी वैसे ही भावुक और भ्रमित अभिवावक है, जो बच्चों को बुढ़ापे की लाठी मान सर्वस्व न्योछावर करने को सदैव तत्पर रहते हैं और उनकी उदास सलेटी आँखों का दर्द या तो मंदिरों और गुरुद्वारों में भजन और गुरुबानी के स्वरों में फूटता और बहता है या फिर, उदास एकाकी अंधेरे घरों में। इसी दो संस्कृतियों के संघर्ष के चलते यहाँ भी कई वृद्ध भयानक त्रासदी से गुजर रहे हैं । यह एकाकी पन या उपेक्षा…यह उदासी ही प्रवास की सबसे बड़ी समस्या है उनके लिए जिनके अपने छिन चुके हैं !

दूसरी बड़ी समस्या बच्चों के लिए योग्य जीवनसाथी चुनने की है। अधिकांश बच्चे समझ और मान चुके हैं अब कि अरेंज शादियाँ गले में फांसी का फंदा हैं क्योंकि दोनों तरफ ही अपेक्षाएँ तो बहुत अधिक रहती हैं परन्तु सामंजस्य की इच्छा न्यूनतम … एक अच्छे रिश्ते के लिए जिस धैर्य भरी समझ और नेह की जरूरत होती है उतना वक्त ही नहीं आज के दौड़ते-भागते युवाओं के जीवन में। फलतः अधिकांश सफल असफल शादियाँ अब लव मैरिज ही हैं और परिवारों में प्रायः एक बड़े तनाव का कारण भी ।

आज जब हमारे खान-पान ही नहीं वेशभूषा और रहन-सहन हमारे दर्शन और सिद्धान्त तक ने विदेशियों को मोहित कर लिया है तो फिर भी क्यों एक हीनता का भाव, एक विदेशी चमक की ललक रहती है हम भारतीयों के मन में, क्या यह पूर्वजों के दासता भरे इतिहास की ही प्रतिछाया तो नहीं!

प्रवास का इतिहास देखें तो भय और असुरक्षा का भाव तो रहेगा ही प्रवासी के मन में, चाहे वह प्रवासियों की ही बाहुल्यता वाले देश में ही क्यों न हों, जैसे अमेरिका या औस्ट्रेलिया और कितने ही वर्षों से ही नहीं, कई पीढ़ियों से ही वहाँ पर रह रहे हों ! विशेषतः एशिया से आए और भारतीय तो सदा ही नौस्टैलजिया या यादों में ही जीते हैं- देश जा रहे हैं जब भी कहते है तो उनका तात्पर्य हमेशा वर्षों पहले पीछे छूटा देश ही होता है।  भारत से वापस लौटते समय किसी को भी यह कहते नहीं सुना कि अपने देश लौट रहे हैं, चाहे उनके पासपोर्ट का रंग कोई भी ही क्यों न हो। और यही आधी अधूरी मनःस्थिति है जो यदा कदा स्थानीय लोगों को अखरती भी है।

क्या है वह भय या दुख जो जुड़ने नहीं देता, दूर-दूर ही रखता है, तबभी जबकि हमारे अपने एक एक करके मिट चुके हैं और नई पीढ़ी नई मिट्टी में फलफूल रही है ? क्या यह सिर्फ चमड़ी के रंग का अंतर है…खान-पान और विचारों का फर्क है या फिर अपने अस्तित्व अपनी पहचान के पूर्णतः विलय हो जाने का भय भी आ समाया है इसमें !…