ललितः हिमालय और गंगा का महत्व- गोवर्धन यादव / लेखनी -नवंबर-दिसंबर 17

सूर्योदय के होते ही उसकी किरणें धरती पर एक नया वितान सा तान देती है. कलियां खिलकर पुष्प में परिणित हो जाती है, कमल खिल उठते हैं, और मधुप अपनी राग छेडने लगते हैं. मंद-मंद हवा के झोंके बहने लगते हैं. ऎसे दिव्य समय में गृहस्थ बिस्तर से उठ बैठता है और नित्यक्रियाकर्म से निजात पाकर नहाने को उद्दत होता है. वह चाहे किसी नदी में नहा होता है अथवा अपने स्नानघर में ,पानी से भरा लोटा सिर पर पडते ही उसके मुख से यह श्लोक उच्चारित होने लगता है. “गंगाश्च यमुना गोदावरी………..
नहाते समय एक अद्भुत आनन्द की प्रतीति उसे होने लगती है और उसे लगता है लोटे में भरे जल में मां गंगा,यमुना और सरस्वती का जल उसके लोटे में समा गया है और वह उसमें स्नान कर रहा है. इससे आप समझ सकते हैं कि इस देश के वासी नदियों को कितना महत्व देते हैं. गंगा फ़िर साधारण नदी नहीं है. वह तो साक्षात भोले शंकार की जटाओं से निकलकर इस धरा पर अवतरित होती है. हिमालय से निकलकर गंगा, जिस-जिस स्थान से बहती हुई निकाली है,उसके पावन तट पर श्रद्धालु उसकी आरती उतारते हैं. और समवेत स्वरों में गाने लगते हैं
जय गंगा मैया मां जय सुरसरी मैया।
भवबारिधि उद्धारिणी अतिहि सुदृढ़ नैया।।
हरी पद पदम प्रसूता विमल वारिधारा।
ब्रम्हदेव भागीरथी शुचि पुण्यगारा।

आदिगुरु शंकराचार्यजी मां गंगा की स्तुति करते हुए कहते हैं
दॆवि! सुरॆश्वरि! भगवति! गङ्गॆ त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गॆ ।
शङ्करमौलिविहारिणि विमलॆ मम मतिरास्तां तव पदकमलॆ ॥ 1 ॥

[हे देवी ! सुरेश्वरी ! भगवती गंगे ! आप तीनो लोको को तारने वाली हो… आप शुद्ध तरंगो से युक्त हो… महादेव शंकर के मस्तक पर विहार करने वाली हो… हे माँ ! मेरा मन सदैव आपके चरण कमलो पर आश्रित है…

रॊगं शॊकं तापं पापं हर मॆ भगवति कुमतिकलापम् ।
त्रिभुवनसारॆ वसुधाहारॆ त्वमसि गतिर्मम खलु संसारॆ ॥ 9 ॥

[ हे भगवती ! मेरे समस्त रोग, शोक, ताप, पाप और कुमति को हर लो… आप त्रिभुवन का सार हो और वसुधा (पृथ्वी) का हार हो… हे देवी ! इस समस्त संसार में मुझे केवल आपका ही आश्रय है…
सुखदेवजी राजा परीक्षितजी को कथा सुनाते हुए मां गंगाजी की महिमा का बखान करते हुए कहते हैं

धातु: कमण्‍डलुजलं तदरूक्रमस्‍य,
पादावनेजनपवित्रतया नरेन्‍द्र ।
स्‍वर्धन्‍यभून्‍नभसि सा पतती निमार्ष्टि,
लोकत्रयं भगवतो विशदेव कीर्ति: ।।

“ राजन् ! वह ब्रह्माजी के कमण्‍डलुका जल, त्रिविक्रम (वामन) भगवान् के चरणों को धोने से पवित्रतम होकर गंगा रूप में परिणत हो गया। वे ही (भगवती) गंगा भगवान् की धवल कीर्ति के समान आकाश से (भगीरथी द्वारा) पृथ्‍वी पर आकर अब तक तीनों लोकों को पवित्र कर रही है। ( श्रीमद्भा0 8।4।21)

गंगावतरण की कथा को पढने पर ज्ञात होता है कि गंगा धरती पर आने से पहले स्वर्ग में रहती थीं.]

एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान श्री रामचंद्र के पूर्वज रघुकुल के चक्रवर्ती राजा भगीरथ ने यहां एक पवित्र शिलाखंड पर बैठकर भगवान शंकर की प्रचंड तपस्या की थी। इस पवित्र शिलाखंड के निकट ही 18 वी शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण किया गया। ऐसी मान्यता है कि देवी भागीरथी ने इसी स्थान पर धरती का स्पर्श किया।

एक अन्य कथा के अनुसार पांडवो ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गये अपने परिजनो की आत्मिक शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ का अनुष्ठान किया था।

शिवलिंग के रूप में एक नैसर्गिक चट्टान भागीरथी नदी में जलमग्न है। यह दृश्य अत्यधिक मनोहार एवं आकर्षक है। इसके देखने से दैवी शक्ति की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है। पौराणिक आख्यानो के अनुसार, भगवान शिव इस स्थान पर अपनी जटाओ को फैला कर बैठ गए और उन्होने गंगा माता को अपनी घुंघराली जटाओ में लपेट दिया। शीतकाल के आरंभ में जब गंगा का स्तर काफी अधिक नीचे चला जाता है तब उस अवसर पर ही उक्त पवित्र शिवलिंग के दर्शन होते है।

आप यह भी भली-भांति जानते ही है कि भगवान शंकर हिमालय पर्वत पर वास करते हैं. और हिमालय की पुत्री का नाम पार्वती था. पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के नाते उनका नाम पार्वती पडा. पार्वतीजी ने कडी तपस्या कर भगवान शंकर को अपने पति के रुप में पाना चाहा और इस तरह शिव और पारवतीजी का विवाह हुआ.

बाबा तुलसीदास जी ने बालकाण्ड में मां पार्वती के जन्म को लेकर लिखा है

“सती मरत हरि सन बरु मांगा.जनम-जनम शिव पद अनुरागा
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाईं.जनमी पारवती तनु पाई(दोहा ६४/३)

बाबा तुलसीदासजी ने यहां हिमाचल का महत्व प्रतिपादित करते हुए उसे कितना सम्मान दिया है, पढकर जाना जा सकता है कि वह कोई साधारण पर्वत नहीं है,बल्कि मां भगवती का पिता है और भगवान शिव शंकर का श्वसुर

भगवद्गीता में स्वयं श्री कृष्णजी अपने मुखाविंद से अर्जुन को अपने ऎश्वर्य के बारे में बतलाते हुए कहा है

“रुद्राणां शंकरश्चास्मि वेत्तेशो यक्षरक्ष्साम
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम (श्लोक२३)

अर्थात-मैं समस्त रुद्रों में शिव हूँ, यक्षों तथा राक्षसों में सम्पत्ति का देवता”कुबेर” हूँ, वसुओं में अग्नि हूँ और समस्त पर्वतों में” मेरु” हूँ.( हिमालय की एक चोटी का नाम सुमेरु है.)

“महर्षीनां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम*
यज्ञानां जपयज्ञोsस्मि स्थावराणां हिमालयः (श्लोक-२५)

अर्थात;- मैं महर्षियों में भृगु हूँ ,वाणी में दिव्य ओंकार हूँ, समस्त यज्ञों में पवित्र नाम का कीर्तन(जप) तथा समस्त अंचलों में “हिमालय” हूँ.

“पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम
झषाणां मकरश्चस्मि श्रोतसामस्मि जान्ह्वी (श्लोक-३१)

अर्थात ;- समस्त पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ, शस्त्रधारियों में राम,मछलियों में मगर तथा नदियों में “गंगा” हूँ

बाबा तुलसीदासजी ने बालकाण्ड में गुरु विश्वामित्र के मुखारविंद से श्री राम को गंगा के अवतरण की बात बतलाते हुए लिखा है

“चले राम लछिमन मुनि संगा* गए जहाँ जग पावनि गंगा
गाधिसूनु सब कथा सुनाई* जेहि प्रकार सुरसरि महि आई”(चौपाई-२१२/१)
तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए* बिबिध दान महिदेवन्हि पाए
हरषि चले मुनि बृंद सहाया* बेगि बेदेह नगर निअराया( २१२/३)

श्रीराम और लक्ष्मण मुनिवर विश्वामित्र के साथ आगे चले और वहाँ जा पहुँचे जहाँ जगत का कल्याण करने वाली गंगा है. वहाँ पहुँचते ही गाधिनन्दन विश्वामित्र ने गंगाजी की पवित्र कथा सुनाई. जिस भांति वह पृथ्वी पर आई थीं. तब प्रभु ने ऋषियों के सहित स्नान किया. ब्राह्मणॊं ने भांति-भांति के दान पाए. फ़िर मुनि भक्तों के साथ हर्षित हो चले और शीघ्र ही वे जनकपुर के समीप पहुँच गए.

वनगमन के समय प्रभु श्रीराम अपनी प्रजा के लोगो को नींद में सोता छॊड गंगाजी के तट पर सीत्ताजी के सहित आते हैं. उनके साथ सचिव सुमंत थे.

“सीता सचिव सहित दोउ भाई * सृंगबेरपुर पहुँचे जाई
उतरे राम देवसरि देखी * कीन्ह दंडवत हरषु विशेषी
लखन सचिवं सिय किए प्रणामा* सब कुख करनी हरनि सब मूला
कहि कहि कोटिन कथा प्रसंगा * रामु विलोक्कहिं गंग तरंगा
सच्वहिं अनुजहिं प्रयहि सुनाई * बिबुध नदी महिमा अधिकाई
मज्जन कीन्य पंथ श्रम गयऊ * सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ
सुमिरत जाहिं मिटै श्रम भारु * तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारु (चौपाई ८६/१.२.३.

लक्ष्मण, मंत्री और सीताजी ने गंगाजी को प्रणाम किया. रामजी ने सबके साथ सुख पाया. गंगाजी आनन्द-मंगलों की जड है तथा सब सुखों के देने वाली और सब दुखों को हरने वाली है. करोडॊं कथा-प्रसंगो को कहकर श्रीराम गंगाजी की लहरों को देखने लगे. उन्होंने मंत्री, लक्ष्मण और सीताजी को भी श्रीगंगाजी कि महा महिमा सुनाई. सबने स्नान किया जिससे मार्ग का श्रम दूर हो गया और पवित्र जल पीते ही मन मुदित हो गया. जिसका स्मरण मात्र से भारी श्रम मिट जाता है

गंगाजी के उस पार जाने के लिए उन्होंने मल्लाह को बुलाया और उस पार उतर गए. गंगाजी के प्रति आपार श्रद्धा और विश्वास से भरी सीता ने मां गंगाजी को प्रणाम करते हुए कहा-हे माता ! मेरा मनोरथ पूर्ण कीजिए जिससे कि मैं स्वामी और देवर के साथ सकुशलपूर्वक लौट कर आपकी पूजा करुँ. सीताजी की प्रेमरस में सनी विनती सुनते ही गंगाजी के पवित्र जल में से श्रेष्ठ वाणी हुई;_ “ हे रामजी की प्रिये सीते ! सुनो, आपका प्रभाव संसार में किसे विदित नहीं है ? आपके देखते ही लोग, लोकपाल हो जाते हैं. सब सिद्धियां हाथ जोडॆ हुए आपकी सेवा करती है. आपने मुझे जो बडी विनती सुनाई है. सो वह कृपा करके मुझको बडाई दी है. तो भी देवि !,” मैं अपनी वाणी सफ़ल हो के लिए आपको आशीष दूंगी. आप अपने प्राणनाथ और देवर के सहित कुशलता से अयोध्या में लौटॊगी. आपकी सारी मनोकामनाएं सफ़ल होंगी और संसार में आपका शुभ यश छा जाएगा.”(अयोध्याकांड चौपाई १०२)

प्रभु श्रीराम गंगा-यमुना के संगम पर आते हैं. बाबा ने यहां इस दृश्य का बडा ही मनोहारी चित्रण किया है.