दो लघुकथाएँः सीताराम गुप्त/ शैल अग्रवाल/लेखनी-नवंबर-दिसंबर 17

प्रतिद्वंदी

गोष्ठी प्रारंभ होने का समय तो हो चुका था लेकिन गोष्ठी प्रारंभ नहीं हुई थी। अभी आठ-दस व्यक्ति ही पहुँच पाए थे क्योंकि आज सर्दी बहुत थी और सुबह घना कोहरा भी था। वैसे भी वक्ता को ज़्यादा जल्दी होती है पहुँचने की श्रोता को नहीं लेकिन जब श्रोता ही नहीं होंगे तो वक्ता कर भी क्या सकते हैं सिवाय इंतज़ार करने के। गोष्ठीपति ज्ञानेन्द्रगुप्तजी गाव तकिये के सहारे बैठे दो-तीन ख़ास लोगों से बतिया रहे थे। बाक़ी लोग अलग से किसी रोचक चर्चा में व्यस्त थे। तभी सुमित मिश्र ने अंदर प्रवेश करते हुए हाथ जोड़ कर सबका अभिवादन किया।
सुमित मिश्र को देखते ही शांति प्रकाश ने चहकते हुए कहा, ‘‘आइये मिश्रजी नमस्कार! आजकल तो आप कमाल का लिख रहे हैं। आपके लेख इतने अच्छे और प्रेरक होते हैं कि बस बार-बार उन्हें ही पढ़ते रहो। हमारी तो सोच ही बदल दी है आपने। आपकी सोच बेहद सकारात्मक और दृष्टिकोण वैज्ञानिक है। सबसे पहले आपका कॉलम ही पढ़ता हूँ।’’ मिश्रजी कुछ ज़्यादा ही सिकुड़ गए। सर्दी की वजह से नहीं अपितु प्रशंसा सुनकर। बेहद विनम्र और संकोची स्वभाव के हैं मिश्रजी। दूसरों की प्रशंसा शायद ही करते हों, लेकिन खुद के लिए भी ज़्यादा लच्छेदार बातें सुनना उन्हें पसंद नहीं। झूठी प्रशंसा करने और सुनने से तो उन्हें चिढ़ ही है। कोसों दूर हैं किसी भी प्रकार की राजनीति से।
इतने में गोष्ठीपति ज्ञानेन्द्र गुप्तजी की धीर-गंभीर आवाज़ गूँज उठी, ‘‘शांति प्रकाश जी मैं तो इनके लेख बहुत पहले से देख रहा हूँ। कई बार तो बहुत अच्छा लिखते हैं। इनका धैर्य भी अनुकरणीय है। वस्तुतः हमारी गोष्ठी से जुड़े दस-पंद्रह व्यक्ति हैं जो हीरे हैं और मिश्रजी को भी मैं उनमें से एक मानता हूँ।’’ इसके बाद गुप्तजी सुमित मिश्र को संबोधित कर पूछने लगे, ‘‘सुमित कोई किताब-विताब भी छपी कि नहीं अभी तक?’’ सुमित मिश्र कुछ उत्तर देते इससे पहले ही गुप्तजी ने विषयांतरण करते हुए अगला प्रश्न दाग दिया, ‘‘आपका कॉलम लगभग कितने शब्दों का होता है? मैं समझता हूँ हज़ार-बारह सौ से अधिक शब्द नहीं होंगे। हाथ से लिखे तीन-चार पेज़ के लगभग होंगे। हाथ के लिखे एक पूरे पेज़ में ढाई-तीन सौ के लगभग शब्द बैठते हैं। वैसे इस कॉलम का कलेवर थोड़ा विस्तृत हो जाए तो अच्छा रहे। इतने कम शब्दों में बात बनी नहीं। अच्छा हाथ से लिखकर भेजते हो या टाइप कराके भेजना पड़ता है?’’
गुप्तजी अभी और कुछ पूछते या कहते इससे पहले ही सिद्ध कुमार जैन ने प्रवेश किया और सुमित मिश्र पर नज़र पड़ते ही अपने मनोद्गार प्रकट करने लगे, ‘‘मिश्रजी हम तो आपके दीवाने…’’ उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि गुप्तजी ने अत्यंत गंभीरतापूर्वक कहा, ‘‘पर्याप्त लोग आ चुके हैं। अब ऐसा करते हैं कि आज की गोष्ठी का प्रारंभ करते हैं। कृपया गपशप बंद कर दें। फालतू बातें बाद में जलपान के दौरान कर लेंगे।’’

सभी आगंतुकों ने खड़े होकर आँखें बंद कर लीं और प्रार्थना में लीन हो गए। गोष्ठीपति ज्ञानेन्द्र गुप्तजी की प्रार्थना आज कुछ जल्दी ही सम्पन्न हो गई थी। उन्होंने आँखें तो नहीं खोलीं लेकिन बीच-बीच में कनखियों से सुमित मिश्र को अवश्य देख लेते थे।

सीताराम गुप्ता
ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,
दिल्ली-110034
फोन नं. 011-27313954/27313679

प्रतिद्वंदी

‘पापा बहुत बीमार हैं। अंट-शंट बोले जा रहे हैं। मेरा जी घबड़ा रहा हैं। ’
बूढ़ी मां ने दो हफ्ते से पत्नी के संग घूमने गए बेटे के पास फोन लगाकर तुरंत ही बिनती की ।
‘ तो मैं क्या करूँ ? अपने बड़े बेटे को बुला लो, वह भी तो कुछ देखे भाले, क्या उसका फर्ज नहीं कुछ ! ‘
‘ नहीं आ रहा है। कह रहा है-जब कैश, जेवर , घर-दुकान सब उसको सौंप दिए हैं तो वही सेवा करे। या सिर्फ पान-फूल की सेवा ही करने को है वह और हम हाड़-मास खटाने को!’
‘तू ही आजा। तू तो जानता है , बड़ी भी बोलने में कम नहीं। तेरे पापा को कुछ हो गया तो अकेली मैं कैसे संभालूंगी!‘
‘ अड़ौसी-पड़ौसियों से मदद ले लेना। मुझे परेशान मत करो। कह दिया न, नहीं आ सकता अभी।‘
‘ रोज का ड्रामा है अब तो यह इनका । जाने कबतक हमारी ही छाती पर मूंग दलेंगे दोनों।‘
बहू ने भी तुरंत ही हाँ में हाँ मिलाई। और तब बेटे ने तुरंत ही फोन काट दिया।
‘इससे तो न होते ये बेटे। बांझ ही भली थी मैं। ‘
माँ अब हिचकियाँ लेकर रो रही थी।
‘क्यों बेकार में कोस रही है , देखना अगली ही गाड़ी से शाम तक जरूर आ जाएँगे दोनों। यहाँ इस पराए देश में उन्ही के लिए तो बसे थे हम।’
बूढ़े बाप को अभी भी अपने लायक बेटों पर पूरा भरोसा था । आंखें बन्द करके विश्वास करते थे वे दोनों पर।

उधर ओमान के बाजार में बेटा पत्नी को मंहगा हीरों का हार दिला रहा था। माँ-बाप जिएं या मरें, अब कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता था उसे।

सूखे छिलकों से क्या रस की उम्मीद करनी! जी भरकर पहले ही निचोड़ लिया था उसने और निचुड़े छिलकों की जगह बाहर कूड़े में ही होती है, वापस घर में नहीं- जानता था वह ।

घर और दुकान पर तो पहले से ही कब्जा कर लिया था, अब पिता की अंटी से सारा कैश भी निकलवा लिया। 200 हजार पौंड बूढ़े बाप से यह कहकर ले लिए कि बहुत अच्छी डील है फ्लैट की, सोना उगलेगा। साल भर में ही पैसे दुगने न हो जाएँ, तो कहना। इससे भली और क्या बात हो सकती थी लालची बाप की निगाह में। क्या हुआ जो नाम उसका न होकर छोटे बेटे और बहू का होगा! कुछ भी और आगे मिनट भर भी तो नहीं सोचा बेबकूफ बाप ने।-ठठाकर हंस पड़ा वह।

इसके पहले कि भाई, बहन को भनक तक पड़े, या वह अपना हिस्सा मांगने आ धमकें, वह खुद ही सब कुछ हड़प चुका है और बहुत खुश था अपनी इस चालाकी पर! क्या पता बुढ्ढा कब लुढ़क जाए या फिर सारा कैश उन्हें ही दे जाता। यह काम तो उसे करना ही था। यही नहीं, जाने से पहले चौके में ताला लगाना और गैस बन्द करना भी नहीं भूला है वह।

‘ पीछे से पूरा घर गरम करने की क्या जरूरत ? मौका चाहिए फालतू में पैसा व्यर्थ करने को। कमरे में हीटर और स्टोव तो रख ही दिया है। चाय-खिचड़ी सब उसपर भी बन जाएगी। ‘

सिर्फ भाई-बहन ही नहीं, बूढ़े मां-बाप भी अब उसके प्रतिद्वंदी थे और आंखों में खटक रहे थे। विरासत में मिलने वाली उसकी लूट दिन-प्रतिदिन व्यर्थ में ही कम जो होती जा रही थी।…

-शैल अग्रवाल