अपनी बात/ लेखनी-नवंबर-दिसंबर 17

क्रिसमस आ रहा हैः घोषणा इसबार बड़े जोर शोर के साथ गहरी बर्फवारी ने की है और फुट डेढ़ फुट  बर्फ में धंसा पूरा ब्रिटेन ही पिक्चर पोस्टकार्ड सा सज गया है। सारी दुविधा और आतंकवादी भय के बाद भी क्रिसमस की खरीददारी जोरशोर से चालू है। दुकानें जहाँ नए नए उपहारों से सज गई हैं, हर डाल पर बर्फ फूलों के गुच्छों सी जा लटकी है। ऊंचे पाइन के पेड़ तो मानो बर्फ का दुशाला ओढ़े खड़े  हैं। एक हल्के से हवा के झोके से या सूरज की किरण की गुनगुनाहट से जब ये अपने श्रंगार और दुशालों को झाड़ते हैं तो झरझर झरता बर्फीला दृश्य देखते ही बनता है। हमने भी इस अंक को परदेश में देश की झलकियों से , उसपर केन्द्रित रचनाओं से सजाने की कोशिश की है। प्रवास के सुख-दुखों को समझने और खंगालने की कोशिश की है। जानने की कोशिश की है कि क्या है एक आम प्रवासी और उसकी खुशी व असली संघर्ष की वजहें। 50 वर्ष से यहाँ रहते हुए भी क्यों खुद को देशी नहीं मान पाती हूँ  मैं और क्यों जिसे अपना मानती हूँ उस देश ने अपना मानना छोड़ दिया है, प्रवासी कहलाती हूँ वहाँपर…क्या यही यथार्थ है, चमड़ी के रंग का फर्क है या कुछ और भी नफे नुकसान की सोची-समझी बातें हैं?

घर बनाते या खुद को स्थापित करते प्रवासी को प्रवास में विषम से विषम परिस्थिति से भी अकेले ही निपटना पड़ता है बिना हारे या टूटे। उसके या किसी भी बात, व्यक्ति या संस्कृति को बनने और बिगड़ने में परिस्थिति का उतना ही हाथ होता है जितना कि खुद उसकी अपनी मनःस्थिति का। यही वजह है कि एकाकीपन और मानसिक संघर्ष आदि प्रवासी रचनाओं के प्रमुख विषय बनकर उभरे हैं। नसली भेदभाव , परिवारों की टूटन, बिखरन आदि अन्य विषय भी हैं जिनपर प्रवासी रचनाएँ मिलती हैं पर यह आधुनिक मानव समाज की समस्याएं हैं, प्रवास की ही नहीं। गरीबी या आर्थिक अभाव प्रवास की रचनाओं के विषय नहीं, हाँ औनर किलिंग, धोखाधड़ी और मानव तस्करी आदि हैं । बेवफाई और लव जिहाद हैं। शराब और अवैध संबंध हैं। खुली यौन प्रवृत्ति या हल्की अश्लीलता को भी कुछ रचनाकारों ने प्रचलित होने के लिए विदेशी संस्कृति के नाम पर अपनी रचनाओं में खुली छूट दी है । और देश की ही भांति यहाँ भी गुटबाजी, चापलूसी के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, पर यह बातें भी कहाँ  पर नही हैं…आखिर हैं तो हम हिन्दुस्तानी ही….वरना ये विदेशी, भाषा के रूप में ही सही, आज भी हम पर राज कैसे कर रहे होते…और फिर यह न हो तो परदेश में भी अपने देश जैसा कैसे महसूस हो…सिर्फ सरसों का साग और लस्सी का गिलास ही तो देश नहीं, भगत सिंह और गांधी ही तो देश नहीं, राधा कृष्ण और भोले बाबा ही तो भारत की पहचान नहीं, इनके मंदिरों के बाहर ही तो हमें जेबकतरे मिलते हैं और धोखाधड़ी करते जालसाज भी और यही हमारा देश है जहाँ गंगाजल सारी गंदगी के बाद भी तारने वाला ही है और समाज की सारी गंदगी साफ करने वाला अछूत है। गंदगी फैलाने वालों की पूजा होती है, पैर छुए जाते हैं ।

इसी विरोधाभास, बेहद व्यवहारिक दर्शन और सूझबूझ…करीब करीब जादुई चमत्कार-सी अद्भुत सहनशक्ति और क्षमा शक्ति…सबकुछ भूल जाने के सहारे ही तो भारतीय आगे बढ़ रहे हैं। दुश्मन को भी दोस्त बना रहे हैं। परोक्ष रूप से कहें या न कहें, सभी इस सहनशक्ति और इस जीवटता का लोहा मानते हैं। क्योंकि हम मस्त हैं, जैसे भी हैं और जिस भी हाल में हैं। आज तो हमारे रहन सहन का , खानपान का , मसालों का ही नहीं, भारतीय फैशन और सुंदरियों का जादू भी विश्व के सिर पर चढ़कर बोल रहा है। हाल ही में विश्व सुंदरी बनी मानुषी छिल्लर को लेखनी परिवार की तरफ से बहुत बहुत बधाई।

भारत की भेलपुरी सा ही कई रंग और कई-कई स्वाद लिए प्रस्तुत है आपके लिए लेखनी 2017 का छठा और वर्षांत विशेषांकः ‘ परदेश में देश’।  इस अंक के साथ हमसे जुड़ रहे हैं आपके प्रिय कवि स्वप्निल श्रीवास्तव जी अपनी बेहतरीन कविताओं के साथ माह के कवि के रूप  में और नमो नारायणी जी अपनी एक संस्मराणत्मक कहानी के साथ हैं। दोनों का ही लेखनी परिवार में हार्दिक स्वागत है। साहित्यकार रूपसिंह चन्देल जी से आपका परिचय करवा रही हैं विभा कुमारी जी एक बातचीत के दौरान और देवी नागरानी जी की सद्य प्रकाशित पुस्तक से गोवर्धन यादव जी लेखनी के पाठकों को मिलवा रहे हैं। साथ में हैं परदेश में देश के चन्द शब्द चित्र, लघुकथाएँ और सभी  नियमित स्थाई स्तंभ । परिवार के चुनमुनों के लिए चांद परियाँ और तितली में एक और नई कहानी व कविता ।

लेखनी का नया जनवरी फरवरी अंक और 2018 का पहला अंक विकास पर है। उपलब्धियों और अंधी दोड़ पर है…कहाँ तक, विशेशतः आणविक अस्त्र-शस्त्रों को लेकर। क्या यही असली ताकत है जो भय पैदा करती है, मानवता और पृथ्वी की कब्र खोद रही है ?
अगले 4 महीने मुख्यतः घुमाई में निकलने वाले हैं अतः-मार्च अप्रैल का अंक पर्यटन पर रखा है। कितना सुरक्षित है आज के माहौल में पर्यटन और कितनी जरूरी हैं यात्राएं हमारे जीवन में ? क्या आजभी भारत में अधिकांश यात्राएँ देवी-देवताओं से ही जुड़ी हैं या अब पर्यटन का भी प्रचलन बढ़ रहा है। कौनसी पसंदीदा जगह या देश है यात्रा के लिए आपकी निगाह में, आपके विचार, लेख , कविता ,कहानी आदि का सदा की ही भांति हमें इंतजार रहेगा। भेजने की अंतिम तिथि पहले अंक के लिए 15 जनवरी और दूसरे अंक के लिए 15 मार्च है। क्रिसमस और नववर्ष की अशेष शुभकामनाओं के साथ,

शैल अग्रवाल