परिचर्चाः बस थोड़ा और-मनीषा परिहार/ नवंवर-दिसंबर 16

smiling-tears_nथोड़ा विचित्र है, पर इस स्वभाव से लगभग पूरी मानव जाति सुसज्जित है । भले ही पेट भरा हुआ क्यों ना हो परन्तु अगर दुसरे की थाली में कोई पसंदीदा मिठाई दिख जाये तो ना जाने क्यों पर यह कम्बख्त जीभ फिर से लपलपाने लगती है। उस दिन कुछ ऐसा ही हुआ , मगर इस बार 45 मिनट की वो छोटी सी मुलाकात मुझे मेरी जिंदगी, मेरी पहचान से रूबरू करा बैठी।
अपने 6 साल के बेटे को पार्क में खिलाने ले गयी थी में उस रोज़ , जहाँ मेरी मुलाकात हुई रेणुका शर्मा से और कुछ देर बात करने के बाद हम में अच्छी जान पहचान भी हो गयी , उसका कारण था हमारा एक ही यूनिवर्सिटी से होना ,फर्क बस इतना था की वो आज भी नौकरी कर रही थी और में नौकरी की तलाश। हमारी उम्र में भी कम से कम १५ साल का अंतर जरूर रहा होगा , मगर बाते यूँ हो रही थी की मानो किसी हमउम्र से अपना दिल सुना रही हुँ। और शायद यहीं कारण रहा होगा की उनसे मिलकर बहुत अच्छा लग रहा था।। वो एक कहावत है ना की पानी की प्यास कितने भी मीठे शरबत से नहीं बुझाई जा सकती है, परदेश में किसी देसी का मिलना भी उस एहसास से कम नहीं होता है। जैसे -जैसे उन्होंने अपने बारे में बतलाया मेरा उनसे प्रभावित होना स्वाभिक था। इकलौता बेटा मेलबोर्न से इंजीनियरिंग कर रहा था ,पति देव अमरीका में सांइटिस्ट थे ,और खुद तो वह मलेशिया के सबसे बड़े बैंक की कौरपोरेट हेड थी। उनके बारे में जानकर बस एक ही शब्द आया जुबां पर “वाओ” ……. आप तो ग्रेट हो ,पूरी लाइफ सेट है आपकी और फैमिली की साथ करिअर भी काफी अच्छा संभाल रखा है आपने। में उनकी तारीफ किये जा रही थी और वोह चुप-चाप सुने जा रही थी जैसे की उनको इन बातो से कोई फर्क ही नहीं पड़ता था। मैंने भी सोचा ठीक ही है भाई इतने कामयाब लोगों को तो आदत पड़ गयी होगी तारीफ सुनाने की। बात आगे बढ़ती की पसीने में लथपथ मेरा बेटा भागते हुए आया और मेरे पास पड़ी बोतल से घट-घट पानी पीने लगा और उसका माथा पोंछते हुए मैंने कहाँ “आराम से राजकुमार पानी गले में अटक जायेगा तो ख़ांसी आएगी”। …..
रेणुका शर्मा : राजकुमार नाम है तुम्हारे बेटे का ?
नहीं -नहीं नाम तो शौर्य है पर मेरा तो राजकुमार ही है ना, अब देखिये इतना बड़ा हो गया है पर आज भी पार्क मेरे बिना नहीं आता है ऐसा नहीं है की डरता है पर बोलता है की माँ तुम होती हो तो अच्छा लगता है ,भगवान जाने क्या अच्छा लगता है, मेरी बात सुनकर वो मुस्कुराने तो लगी मगर उनकी गुमसुम आँखें कभी मुझे तो कभी शौर्य को निहारती रही। पता नहीं क्या तलाश रही थी वो आँखें ,मानो क भुला बिसरा ढूँढ़ रही हो।
शौर्य के जाने की बाद में बोतल बंद कर रही थी की उन्होंने बात को आगे बढ़ाते हुए पुछा तुम क्या करती हो मनीषा ?
अब इतने प्रभावशाली परिचय की बाद अपने बारे में क्या बोलूँ यहीं सोच रही थी की उन्होंने मेरी उलझन को सुलझाने के अचूक प्रयास को करते हुए बोला की क्या बेतुका सा सवाल है ना, इतना प्यारा बच्चा है ,सारा दिन तो उसी के साथ निकल जाता होगा। बोल तो वह सच ही रही थी पर उनकी बात मुझे एक ताने की भांति चुभ रही थीं । पता नहीं ऐसा सब जगह होता है या हमारे देश की औरतों को ही इसका कॉपीराइट है की अगर कभी किसी भी कारणवश किसी पढ़ी लिखी लड़की को नौकरी छोड़ कर घर बैठना पड़े तो एक अजीब सी आत्म-ग्लानि के साथ वह जीने लगती है जैसे पता नहीं क्या पाप किया हो उसने और जब भी किसी सफल और काम-काजी महिला से मिलती है तो बस शुरू कर देती है रेडियो अपनी सफलताओं का और मजबूरियों का, की क्यों वो घर पर है। उस दिन में भी इसी तरह का क्लैरिफिकेशन देते हुए बोली :नहीं नहीं में एक जियोलॉजिस्ट हु ,IIT रूर्की से M.tech किया है,११ साल का एक्सपिरिएन्स है वह तो फैमिली के कारण छोड़ना पड़ा वरना काफी ब्राइट थी में भी , और रही बात नौकरी की तो वो में ढूँढ़ रही हूँ । पर यहाँ मलेशिया में डिपेंडेंट पास पर जॉब मिलना इतना आसान नहीं होता है आप तो जानती होगी ना ? फिर मेरी किस्मत भी आपकी तरह नहीं की जहाँ जाऊँ आराम से जॉब मिल जाये पर कोशिश जारी है। मेने अपनी सफाई खत्म ही नहीं की थी की मेरे कंधे पर हाथ रखकर उन्होंने बोला- तुम नौकरी से भी बेहतर काम कर रही हो ,खुशियाँ कमा रही हो ,किसी बेबुनियाद पहचान के लिए अपनी असल पहचान मत खोना। तुम्हारे दफ़्तर नहीं जाने से दफ़्तर बंद नहीं होगा पर तुम्हारे ना होने से तुम्हारे राजकुमार को जरूर फर्क पड़ेगा ,यह मेरा अनुभव है।
एक अलग सा दार्द था उस आवाज में ,मानो और दो शब्द बोलती तो आँखे अपनी सीमायें भूल कर बरसात की झरी लगा देतीं। अब कंधे पर हाथ रखने की बारी मेरी थी…. मैंने चाहा की वो खुद को संभालें पर मेरी कोशिश नाकामयाब रही और कुछ बूंदें छलक ही पड़ीं पलकों से। वैसे ठीक ही हुआ ,जो दर्द जुबान पर नहीं आ पाते उनको आँसुओ के रास्ते निकाल पाना आसान होता है।
जिंदगी में कुछ भी अकारण नहीं होता। हर घटना के पीछे एक रहस्य ,एक सीख छुपी होती है ,जो हम सिर्फ उसके घटने के पश्चात ही समझ पाते है। मिलने को तो हम ना जाने कितने लोगों से अक्सर मिलते रहते है मगर कभी कभी किसी अजनबी से हुई एक छोटी सी मुलाक़ात आपकी जिंदगी को क्या मोड़ दे दे इसका सही अंदाज़ा भी अकसर हम मुलाकात के बाद ही लगा पाते हैं।
फिर भी खुद को सँभालते हुए ,झूठी हँसी को अपने चेहरे पर बेतुके मेकअप के तरह लगाने की उनकी कोशिश हार रही थी। माहौल को थोड़ा बदलने के प्रयास में मैंने उनको ऊपर घर चाय पर चलने के लिए कहा और उन्होंने भी झट से हाँ कर दी और हमारे साथ ऊपर चली आईं।
में उनके लिए चाय बना रही थी और वह स्टडी में पड़ी कुछ किताबों के साथ अपना वक़्त बिताने की कोशिश कर रही थी। मुझे तो पता भी नहीं चला की कब उन्होंने मेरे एक पुरानी डायरी की कुछ पन्ने पढ़ लिए और अचानक से बोल पड़ी- मुझे नहीं मालूम था की विज्ञानं भी शब्दों की गहराई को नापता है। में तो समझती थी की तुम जियोलॉजिस्ट लोग सिर्फ तेल के कुएं की ही गहराई जानते होगे। उनकी बाते सुन कर में समझ गयी थी की उन्होंने शायद मेरी कोई कविता पढ़ ली है और गैस की आँच काम करके में स्टडी के तरफ भागी और अपनी डायरी उनसे लेते हुए बोली ” खाली समय किसी तरह तो बिताना है ना तो बस थोड़ा बहुत लिख कर अपना मन बहला लेती हूँ। ” मेरी बात को बीच में रोकते हुए उन्होंने बोला की अपना दर्द बताना हर किसी के बस की बात नहीं और ना अपना दर्द छुपाना ठीक होता है, नहीं तो वो नासूर बन जाता है । अच्छा है की तुम अपनी मन की बात कम से कम किसी तरीके से तो अपने मन से बहार ला पाती हो। बस मन से निकालकर यह भावनाएँ इस डायरी में कैद हो गयी है। इनको आज़ाद कर दो। हवा दो अपने शब्दों को वरना यह यहीं इस डायरी में अपनी साँसे तोड़ देंगे। तुम बहुत खुशनसीब हो जो वक़्त ने तुमको वक़्त दिया है खुद को निहारने का , पहचानो अपनी असली खूबसूरती को। अब तक की नौकरी तुमको पैसे कमा कर दे रही थी अब जिंदगी ने तुमको मौका दिया है सुकून कमाने का ,इसे खो मत देना।

तुमसे उम्र और तजुर्बे में बड़ी हुँ इसलिए बोल सकती हुँ की बिज़नेस टारगेट की जगह जो तुमने इन नन्ही किलकारी को दी है वह कभी बेकार नहीं जाएगी मगर हाँ इन पलो को अगर यूँ ही कोसती रही तो यह अनमोल लम्हे रेत की तरह फिसल जाएँगे और तुमको पता भी नहीं चलेगा।

भले ही हम कितना भी नाम और पैसा क्यों ना कमा ले मगर सुकून तो घर लौट कर ही मिलता है ना ,लेकिन घर अगर खाली हो तो वहाँ सुकून नहीं बल्कि सिर्फ झल्लाहट ही मिलेगी । अपने घर को कभी खाली मत होने देना ,रही बात नौकरी की, वो तो तुम काबिल हो जब चाहोगी कर लेना मगर इस वक़्त तुम्हारी जरुरत तुम्हारे बेटे को दुनिया की किसी भी आर्गेनाईजेशन से ज्यादा है। अपने रुके कदमों को कोसो मत यह एक क़यामयब परवरिश के लिए रुके है और किसी का रुकना उसकी रफ़्तार तो तय नहीं कर सकता।
हम अपनी अपनी जिंदगी में इतना उलझ जाते है की अपने उन शौकों की भी बलि चढ़ा देते है जो कभी हमारे जीवन का एक जरूरी हिस्सा रही थी । जैसे तुमको लिखने का शौक है वैसे मुझे गाने का था मगर कभी वक़्त ही नहीं मिला अपने शौक को हुनर में बदलूँ। तुम बहुत खुशनसीब हो जो तुमको आज वक़्त मिला है। …इसे जिओ और जी भर के अपने अरमान लिखो ,खूब लिखो और भरने दो उड़ान अपने शब्दों को।
थोड़ा और की खवाइश कभी खत्म नहीं होती है मेरी जान, मगर जिंदगी जरूर हो जाती है। इससे पहले की तुम्हारी खत्म हो इसे जी लेना,रोज़ अपने बच्चे के साथ धीरेृ-धीरे बड़ी होना,उसकी हर बात को जीना, माँ होने का पूरा लुफ्त उठाना, अपना हर शौक पूरा करना। यह सब हर किसी के नसीब में नहीं होता है।

ऐसा लग रहा था की उनकी छाती पर कोई बोझ है, और उनके होठों से छूटता हर शब्द अपनी जीवन की उन बातो को याद करके बोला जा रहा हो जो किसी कारणवश वह ठीक से जी नहीं पायी थी। अगर वासुदेव उनसे उनकी आखिरी इच्छा पूछेंगे तो वह अपना गुजरा वक़्त ही माँगेगी जिसे थोड़ा और के लालच में वह कही छोड़ आई थी। कितनी अजीब बात है 45 मिनट पहले जो मुझे एक सफल और खुश हाल इंसान लग रहा था वह कितना उदास और लाचार था।

इतने में शौर्य ने मुझे अंदर से आवाज़ दी की उसे होमवर्क में मिले सवालों के लिए मेरी ज़रूरत है। थोड़ी देर की इजाजत माग कर में अंदर चली आई और फिर जब लौटी तो रेणुका जी जा चुकी थी। मेज़ पर चाय का आधा भरा कप था और घर का आधा खुला दरवाज़ा। बिल्कुल उनके आधे-अधूरे जीवन की तरह।

दिखावटी खुशियों के लिए
हम अपनी अंदरुनी ख्वाइशों को मार देते है,
बस थोड़ा और की चाहत में,
अपना बहुत कुछ गवा देते है।

खुशियाँ कमाने के लिए
अपनों को रुला देते है,
बस थोड़ा और की चाहत में ,
अपना बहुत कुछ गवा देते है।

जीवन संध्या में
जब पैर वापिस घर को लौटे है,
तो आँगन सूना है मेरा
जा चुके है सब मेरी राह तकते-तकते
कमाने अपने हिस्से का बस थोड़ा और!