दो लघुकथाएंः खेल ही तो है-शैल अग्रवाल/ मैन इन यूनिफौर्म- विजय कुमार सप्पत्ति /लेखनी नवंबर-दिसंबर 16

खेल ही तो,
laghukatha logo

वे पड़ोसी कम, भाई-भाई अधिक थे। संग-संग स्कूल जाना, खाना-खेलना… एक का सुख-दुःख दूसरे की आंखों से झलकता।
जवान होते-होते एक लाइन खींचकर उन्हें दो खेमों में बांट दिया गया। फिर तो पूरा-का-पूरा दृश्य ही बदल गया। अब वे सरहदें ही सब कुछ थीं ।
सारा प्यार…सुख चैन सब भूल गए वे। कंटीली सरहदों के इस पार व उस पार एक दूसरे पर शक करते बन्दूक ताने दिनरात गश्त लगाते रह जाते । उन्हें तो उन मां के आंसू तक नहीं दिखते जो आज भी अपनी अपनी रसोई में दो-दो थाली सज़ा उन दोनों का ही इंतजार करती रहती हैं और फिर एक अनछूई थाली वैसे ही दीवाल के सहारे खड़ी कर देती हैं। छोटी-छोटी बातों पर लड़ते हैं वे अब। उनका कोई मसला नहीं सुलझता, किसी शिकायत या फरियाद की कहीं कोई सुनवाई नहीं।
कोई न्याय या सही राय देने वाला नहीं क्योंकि शतरंज का एक खेल ही तो हैं ये बंटवारे और वे मात्र प्यादे ।..

मेन इन यूनिफ़ॉर्म
laghukatha logo

(भाग एक)

धाँय ….धाँय ….धाँय …..

तीन गोलियां मुझे लगी ,ठीक पेट के ऊपर और मैं एक झटके से गिरा….गोली के झटके ने और जमीन की ऊंची -नीची जगह के घेरो ने मुझे तेजी से वहां पहुचाया , जिसे NO MAN’S LAND कहते है … मैं दर्द के मारे कराह उठा.. पेट पर हाथ रखा तो देखा भल भल करके खून आ रहा था .. अपना ही खून देखना … मेरी आँखे मुंदने लगी … कोई चिल्लाया , मेजर , WE ARE TAKING YOU TO HOSPITAL…..देखा तो मेरा दोस्त था …मेरे पास आकर बोला ” चल साले , यहाँ क्यों मर रहा है , हॉस्पिटल में मर “… मैंने हंसने की कोशिश की ,उसकी आँखों से आंसू गिरने लगे मेरे चहरे पर….

मेरी आँखे बंद हो गयी तो कई चित्र मेरे जेहन में आने लगे , मैं मुस्करा उठा, कही पढ़ा था की मरने के ठीक १५ मिनट पहले सारी ज़िन्दगी याद आ जाती है … मैंने अम्बुलेंस की खिड़की से बाहर देखा, NO MAN’S LAND पीछे छूट रहा था .. …ये भी अजीब जगह है यार , मैंने मन ही मन कहा … दुनिया में सारी लड़ाई , सिर्फ और सिर्फ जगह के लिए है और यहाँ देखो तो कहते है NO MAN’S LAND……

कोई और चित्र सामने आ रहा था , देखा तो , माँ की था , एक हाथ में मेरा चेहरा थामकर दुसरे हाथ से मुझे खिला रही थी और बार बार कह रही थी की मेरा राजा बेटा सिपाही बनेंगा ….मुझे जोरो से दर्द होने लगा …….अगला चित्र मेरे स्कूल की था , जहाँ १५ अगस्त को मैं गा रहा था , ‘नन्हा मुन्हा राही हूँ ,देश का सिपाही हूँ’ …….स्कूल का हेडमास्टर ने मेरे सर पर हाथ फेरा …मैंने माँ को देखा वो अपने आंसू पोंछ रही थी …..मेरे पिताजी भी फौज में थे …..ज़िन्दगी का विडियो बहुत ज्यादा फ़ास्ट फॉरवर्ड हुआ अगले चित्र में सिर्फ WAR MOVIES थी जिन्होंने मेरे खून में और ज्यादा जलजला पैदा किया ….

अगले चित्र में एक लड़की थी जिसके बारे में मैं अक्सर सोचता था…वो मुझे इंजिनियर के रूप में देखना चाहती थी , मैं आर्मी ऑफिसर बनना चाहता था .. एक उलटी सी आई , जिसने बहुत सा खून मेरे जिस्म से निकाला , मेरा दोस्त ने मेरा हाथ थपथपाया ..”कुछ नहीं होंगा साले “….अगली चित्र में उसकी चिट्टियां और कुछ फूल जो सूख गए थे ,किताबो में रखे रखे ..उसे वापस करते हुए मैंने NDA की ओर चल पड़ा …

अगले चित्र में हम सारे दोस्त ENEMY AT THE GATES की कल्पना अपने देश की सरहद पर कर रहे थे ….क्या जज्बा था यारो में, हमारे लिए देश ही पहला गोल था , देश ही आखरी गोल था……और , मैं आपको बताऊँ , WE ALL WERE WAITING FOR OUR ENEMIES AT THE GATE ………

अगली चित्र में मेरे माँ के आँखों में आंसू थे गर्व के ; तीन साल के बाद की PASSING PARADE में वो मेरे साथ थी और मैं उसके साथ था . हमने एक साथ आसमान को देखकर कहा ….हमने आपका सपना साकार किया ……..अगला चित्र एक तार का आना था , जिसमे मेरी माँ के गुजरने की खबर थी …..मेरी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा और मुख्य स्तम्भ गिर गया था … मुझे फिर उलटी आई …..मेरा दोस्त के आंसू सूख गए थे , मुझे पकड़कर कहा, “साले तेरे पीछे मैं भी आ रहा हूँ …..तू साले , नरक में अकेले मजे लेंगा..ऐसा मैं होने नहीं दूंगा” ……मैंने मुस्कराने की कोशिश की …

सबसे प्यारा चित्र मेरे सामने आया …..मेरी बेटी ख़ुशी की ……उसे मेरी फौज की बाते बहुत अच्छी लगती थी….मेरी छुट्टियों का उसे और मुझे बेताबी से इन्तजार रहता था … मेरी पत्नी का चित्र भी था वो हमेशा सूखी आँखों से मुझे विदा करने की थी …….उसे डर लगता था की मैं …..मुझे कुछ हो जायेंगा …. इस बार उसका डर सच हो गया था … मेरी बेटी की बाते …कितनी सारी बाते ….मेरी आँखों में पहली बार आंसू आये … मुझे रोना आया ..मैंने आँखे खोलकर दोस्त से कहा ..यार , ख़ुशी …….,इतनी देर से वो भी चुप बैठा था ,वो भी रोने लगा …….

अब कोई चित्र सामने नहीं आ रहा था …एक गाना याद आ रहा था ….कर चले वतन तुम्हारे हवाले साथियो….. मैंने दोस्त से कहा , यार ,ये सिविलियन कब हमारी तरह बनेगे .. हम देश को बचाते है ..ये फिर वहीँ ले आते है जिसके लिए हम अपनी जान……एक जोर से हिचकी आई मैंने दोस्त का हाथ जोर से दबाया …..और फिर एक घना अँधेरा………..

(भाग दो )

दूसरी सुबह कोई बहुत ज्यादा बदलाव नज़र नहीं आया मुझे इस देश में जिसके लिए मैंने जान दे दी….. ENEMIES WERE STILL AT THE GATE … अखबार में कहीं एक छोटी सी खबर थी मेरे बारे में …..राजनेता बेमतलब के बयान दे रहे थे ……किसी क्रिकेट में क्षेत्ररक्षण की तारीफ़ की खबर थी …..कोई ये भी तो जाने की एक एक इंच जमीन का क्षेत्ररक्षण करते हुए हम जान दे देते है …..कोई मीडिया का राज उजागर हुआ था …. कोई सलेब्रटी की मौत हुई थी जिसे मीडिया लगातार कवरेज में दे रहा था … कोई रिअलिटी शो में किसी लड़की के अफेयर की बात थी … मतलब की सारा देश ठीक-ठाक ही थी ……मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैंने जान क्यों दी …….मेरी पत्नी चुप हो गयी थी ..अब उसके आंसू नहीं आ रहे थे …मेरा दोस्त बार बार रो देता था ….और ख़ुशी…..वो सबसे पूछ रही थी ,पापा को क्या हुआ ,कब उठेंगे , हमें खेलना है न…………………………………

-विजय सप्पत्ति