छंद और दोहेः सपना मांगलिक/लेखनी नवंबर-दिसंबर 16

मुक्तामणि छंद

Kohra

1
आएगी मंजिल नजर,कष्ट इतना उठालो।
भूल नाकामियां सभी,हौसले फिर जुटालो ।।
2
जन्नत मरे न बिन मिले,राज अनमोल जानो।
निकल धरा की गोद से,दौड़ आसमां थामो।।
3
जूझ भले पाषाण से,छिटक दूर तुम जाओ।
रिपु को भी यूँ प्रेम का,जल सम पाठ पढ़ाओ।।
4
बंधी नौका सम खड़े ,जीवन बहता पानी।
तुम बह धारा संग लो,रच दो नई कहानी।।
5
बन चन्दा की तुम किरण,दर्द का तम मिटा दो।
सीने की तपती धरा,नेह का गुल खिला दो।।
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सपना के दोहे
Kohra
1
लो टूट प्रेम के गए,सुन्दर थे जो कांच।
आज दिलों पर कर रही,नफरत नंगा नाच।।
2
प्रेम धागा तोड़ चला,बाँधा हमसे बैर।
समझे जिसको अपना हम,हुआ आज वो गैर।।
3
दूर गया कोई नहीं, सब हैं रहते पास।
मन को फिर क्या सालता, हरपल रहे उदास।।
4
हैरान हूँ मैं देखकर,झूठ के ठाठ-बाट।
तिकड़मबाजी का चलन,सच है बिकता हाट।।
5
देत अल्लाह बांग तू,काम करे जल्लाद।
बेटा झगडे बाप ते,होवे खुद बर्बाद।।
6
हाथ थाम आतंक का,करते फिरें विनाश।
पेशावर जैसी भले,बिछती जाएँ लाश।।
7
अशिक्षा नर्क समान है, काहे करती खेद।
ज्ञान दीप जलाकर तुम,अन्धकार दो भेद।।
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बाल दोहे
Kohra

1
दुनिया से अनजान है,नन्हा सा ये फूल।
तौर तरीके,बंदिशें,बिछते पग पग शूल।।
2
मन दर्पण सा राखता,मैल न जापै होत।
झूठ सच में फरक नहीं,ना ही मन में खोट ।।
3
बेटी में देवी बसे ,बालक बसता श्याम।
ऊँच नीच या जात से,भला उसे क्या काम।।
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सपना मांगलिक
फ659 कमला नगर आगरा
email- sapna8manglik@gmail.com