माह विशेषः ये किताबेंः चन्द कविताएँ/ लेखनी-जुलाई-अगस्त 17


कुछ मेरे यार थे रहते थे मेरे साथ हमेशा
कोई साथ आया था,उन्हें ले गया,फिर नहीं लौटे

शेल्फ़ से निकली किताबों की जगह ख़ाली पड़ी है!
-गुलजार


रोज दिन के बस्ते में
माँ एक नया सूरज रखती है
रोज ही रात हो जाती है
न बेटा ही उठकर पढ़ता है
न मा आदत बदल पाती है!
-शैल अग्रवाल

किताब 1
किताबों में चलती कहानियाँ, चरित्रों से मिलतीं
चरित्र मिलते घटनाओं से घटी जो अतीत में
संवाद गायब थे, आवाजें थीं गुम
लिखा गया था गूंगा अतीत।

किताबें मौन रहती हैं बराबर, रहती हैं शांत
चंचल मन एकाग्र होता इनके पास
होतीं हमारे सवालों का जवाब
कभी करतीं सवाल जवाब।

किताबें ऊबती नहीं हमसे
मिलें उनसे जाने कितनी बार
रहतीं हमारे करीब, चाहे पढ़ें न पढ़ें
चलती समय संग साथ अक्षर के, जुड़े न जुड़े

चलती साथ सफर में हम चलें न चलें।
– अमरेन्द्र मिश्रा

किताब 2

किताबें कभी खत्म नहीं होतीं
उनके पन्ने बढ़ते जाते हैं।
जहाँ खत्म होना होता है, वहाँ से
एक नए अध्याय की शुरुवात होती है।

किताबें कभी खत्म नहीं होतीं…

-अमरेन्द्र मिश्रा

किताबें

एक पुराने दोस्त-सी
अलमारी से झांकती हैं
मुस्कुराती यादें टटोलती हैं
जब जब गुजरूँ बगल से
पास बुलातीं और बांहें फैलाकर
सीने से लग जाती हैं।

-शैल अग्रवाल

आदमी और किताब

आदमी और किताब
एक से ही खिताब
दोनों को ही चाहिए
एक जिल्द एक आवरण
जो बाँध सके
एक प्रसंशक एक आलोचक
जो इन्हें साध सके
शब्दों से बुना
इच्छाओं का सुनहरा जाल
कैद में जिसकी
शिकार और शिकारी
साथ-साथ
सम्भालो न तो
बिखर ही जाते हैं
दोनों
पन्ने और खयाल
आदमी हो या फिर
चाहे एक
किताब !
-शैल अग्रवाल