दो लघुकथाएँः शील निगम/ लेखनी-जुलाई-अगस्त-17

उपहार

सड़क पर चलते चलते राज रुक गया.सामने ठेले पर पड़ी पुस्तकों में जानी-पहचानी पुस्तक दिखी. उसकी लिखी पुस्तक थी जो अन्य पुस्तकों के साथ १५० रूपए किलो बिक रही थी, यह उसका लिखा ‘कहानी संग्रह’ था जिस पर उसने बड़ी आत्मीयता से मुखपृष्ठ पर अपनी दिवंगत माँ की तस्वीर छपवाई थी.
पुस्तक हाथ में लेकर मन ही मन उसने कहा, ‘अरे ये तो वही पुस्तक है जिसे पिछले महीने उसने अपने दोस्त कमल को जन्मदिन पर उपहार स्वरुप दी थी. उसने किताब खोल कर पढ़ने की तो क्या, पुस्तक पर चढ़े प्लास्टिक कवर तक को उतारना आवश्यक न समझा, आज ये पुस्तक यहाँ… रद्दी की दुकान पर … राज की आँखें नम हो आयीं.
उसने अपनी पुस्तक कबाड़ी वाले से खरीद ली और सीधा कमल के यहाँ जा पहुँचा।
राज के हाथ में पुस्तक देख कर कमल बोल पड़ा, “अरे, फिर एक किताब ले आये?”
“नहीं, जिस दोस्त के पास मेरे लिखे साहित्य को पढ़ने का समय नहीं, यह उसके लिए नहीं है, कम से कम पुस्तक के अंदर की सामग्री को न देखते, पर मेरी माँ का तो सम्मान किया होता जिनके दुःख भरे जीवन की सारी कहानियाँ मैंने इस पुस्तक में लिखीं हैं. जिससे दुनिया जान सके कि एक औरत को अपने जीवन में किन-किन कठिनाइयों से गुज़रना पड़ता है? फिर भी वह लड़ती रहती है परिस्थितियों से, जीती है अपने परिवार के लिए?”
कमल की आँखें शर्म से झुक गयीं. उसने किताब को लेने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि राज ने उससे कहा, “नहीं मित्र! अब यह पुस्तक देने के लिए नहीं, तुम्हें एहसास कराने के लिए लाया हूँ. इस पुस्तक पर मेरी माँ का चित्र है जिनके हाथ की रोटियाँ और लड्डू खाने के लिए तुम लालायित रहते थे. ”
कमल ने वह ‘कहानी संग्रह’ राज के हाथ से ले लिया और माँ की तस्वीर को अपने माथे से लगा कर चूम लिया.

सारांश

“नानी, ये मोटी-मोटी पोथियाँ पढ़ कर बोर नहीं होतीं आप?” रानी ने नानी माँ से पूछा.

“ये ऐतिहासिक उपन्यास है, रोचकता है इसमें. पढ़ कर मज़ा आता है. समय भी अच्छा कट जाता है.”

“इतिहास पढ़ना यानि की गड़े मुर्दे उखाड़ना.” रानी ने कहा.

“नहीं रानी बिटिया, देश की बीती बातों का ब्योरा होता है देश के इतिहास में,नई पीढ़ी को जानना चाहिये.” नानी ने समझाया.

“पर समय कहाँ है? ये सब पढ़ने के लिये. इससे तो अच्छा है ऐतिहासिक फ़िल्म देखें दो-ढाई घंटे में पूरी कहानी ख़त्म.” रानी बोली.

“फ़िल्मी कहानियों में पूरा सच कहाँ होता है?” देखो न ‘रानी पद्मावती’ पर बनने जा रही फ़िल्म का क्या हश्र हुआ?”नानी ने समझाने की कोशिश की.

“हाँ देखा था, टी.वी. पर. सुना था कि ‘जोधा अकबर’ में भी ऐतिहासिक तथ्य कम कल्पना ज्यादा थी.”

“सच्ची कथा का आधार ले कर दर्शकों को आकर्षित करने के लिये फ़िल्मों में रोमांस के दृश्यों को कल्पना के सहारे डाला जाता है.” नानी बोलीं.

“इससे तो बेहतर बाहुबली 2 बनी जो पूरी की पूरी ही काल्पनिक है. पृष्ठभूमि नें पौराणिक प्रभाव होने से दृश्यों में भव्यता तो बहुत है. पर ख़ून खराबे के दृश्य ज्यादा हैं.जो मन को विचलित कर देते हैं.”

रानी ने कहा तो नानी ने अपने विचार प्रकट किये,
“हाँ, अंत में बेटे की वीरता को दिखाने के लोभ में फिल्म को लम्बा खींचने के बदले अगर देवसेना की वीरता भी दर्शाई जाती तो फ़िल्म में नारी और पुरूष के चरित्रों में संतुलन बन सकता था.” कहते हुए नानी अपने उपन्यास के पृष्ट पलटने लगीं.

“मैं तो इन उपन्यासों को पढ़ कर नेट पर ऐतिहासिक तथ्यों की प्रमाणिकता की भी जाँच करती रहती हूँं.” कहते हुए नानी ने उपन्यास में अपना ध्यान लगाने की कोशिश की.

इससे पहले कि नानी उपन्यास में उलझ जायें रानी ने उनका चेहरा अपने दोनों हाथों में ले कर प्यार से कहा,
“मेरी विदूषी नानी, अपनी ऐतिहासिक खोजों का सारांश मुझे भी बता दिया करिये.सहेलियों को बताऊँगी तो उनको भी हमारे देश का ‘इतिहास’ समझ में आयेगा.”