कहानी समकालीन-बेटे का पत्रः बिभा कुमारी/ लेखनी- जुलाई-अगस्त 17

कैसे बताएँ वे कि क्या लिखा है-पत्र में। उनकी आँखें भर गईं। आँसू देख लराइन की माँ का गला भर आया-“मास्साब कोई अनहोनी त नईं होई गईल। हमर बेटा ठीक त है न।” मास्टरसाहब चंद्र्किरण बाबू को इसी गाँव की एक मुंहबोली दादी से सुना जुमला याद आ गया-“माई जी गाय सन, पूत जी कसाई सन।” नहीं-नहीं चाची कोई अनहोनी नहीं हुई है, लराइन बाबू सपरिवार मज़े में हैं। -“त फेर मास्साब अपने रोबै कहिने छिए।” अब तक अपने को पूरे काबू में रख कर लराइन की माँ बेटे का पत्र सुनने की प्रतीक्षा कर रही थीं, लेकिन अब उनका सब्र टूट गया -“मास्साब तोरा हमर किरिया, ठीक-ठीक बताई दै, की लिखल है चिट्ठी में।” पर चंद्रकिरणबाबू अजीब धर्म-संकट में थे, वह चिट्ठी नहीं थी, एक जीवित बम था, जिसके विस्फोट से लराइन की माँ पलक झपकते स्कूल में ही ढेर हो जाती। क्या बताएँ लराइन की अम्माँ को ? कितना बताएँ, कितना छिपायें, कैसे बताएँ उनके मन में द्वन्द्व चल ही रहा था कि चाची बोल पड़ीं।
-“मास्साब ऊ हमरा पैसा न देना चाहै न देई ,पर जाय के बहिनिया के बरतुहारी कर आवे। अपना गाँव – समाज में एहि घरी त बाप-भाई के काम पड़ई है।”
-“जब से लराइन के बाप दुनिया से उठ गेल हम सब काम त अपने करली। पर ई काम हम कैसे कर सकबै मास्साब” ।
-“ओकरा लिख दहो कि ओकरा दु गो काम करना जरूरी है –एक त बहिनिया के बरतुहारी और दोसर हमर सराध।” चंद्र्किरण बाबू लराइन की माँ से कैसे कहें कि बेटे के पत्र का सारांश यह है कि वो अब माँ के लिए मर चुके हैं, माँ और बहन भी उनके लिए मर चुकी हैं। बरतुहारी के लिए उनके आने का मतलब है उनकी प्रतिष्ठा के अनुसार खर्च। जो वह कतई नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करने से उनके बेटे का हक मारा जाएगा। जो पैसे उन्हें अपने इकलौते बेटे के सुनहरे भविष्य के लिए निवेश करने हैं, उन्हें वह बहन की शादी में नहीं बहा सकते। माँ किसी दोती लड़के से उसका सम्बन्ध कर दे, यह सलाह भी दे डाली थी। चंद्रकिरणबाबू स्पष्ट समझ रहे थे कि इशारा किसकी तरफ है। साथ ही लिखा था -“पहले बच्चे के भविष्य का इंतजाम करना चाहिए,तब उसे जन्म देना चाहिए। बेटे के भरोसे बेटी को जन्म दिया था ?” और भी ऐसी ढेरों बातें, जिन्हें सुनकर कोई भी माँ यदि मरेगी नहीं तो बेहोश जरूर हो जाएगी।
-“मास्साब की सोची रहल छो”
-“कुछ नहीं चाची बस यही कि लराइन बाबू को जल्दी से सरकारी काम से फुर्सत मिले, और वो छुट्टी लेकर घर आ सकें। क्या करिएगा चाची ई सरकारी काम का लफड़ा ही ऐसा होता है। अब हमको देखिए छोटे से गाँव के स्कूल में नौकरी करते हैं तब भी फुर्सत नहीं है। अब हमको कोई है ही नहीं तो किसके पास जाने के लिए छुट्टी की अर्ज़ी दें, जब अर्ज़ी देते हैं तब पता चलता है कि छुट्टी मिलना कितना मुश्किल है। जब तक शोभा जीवित थी, वह भी पलकें बिछाए मेरा इंतजार किया करती थी, मैं भी सोमवार से ही इंतजार करता था कि कब शनिवार की शाम हो, और मैं शोभा के पास जाऊँ। कोई पर्व-त्योहार होने पर मैं कोशिश करता था कि उस दिन के आगे-पीछे छुट्टियाँ लेकर शोभा के साथ रह सकूँ। जब भी छुट्टी मंजूर नहीं हो पाती थी, या कम समय के लिए छुट्टी मिलती थी, मुझ पर जो बीतती थी, सो तो बीतती ही थी, ऊपर से शोभा रूठ जाया करती थी। उसे घंटों समझाया करता था, नौकरी की मजबूरियाँ, छुट्टी मंजूर होने की कठिनाइयाँ, बताता था, कितना समझाने और मनाने के बाद वह इस शर्त पर मानती थी, कि अगली बार जल्दी आऊँगा और पूरे सप्ताह भर उसके पास रहूँगा।”
“मास्साब, घरवाली के पास जाए के बात और मतारी के पास जाए के बात, दुनू दू बात है। घरवाली के इंतजार, आँसू, गुस्सा, त आदमी देख लेई है, पर माई के कुछ भी ओकरा नईं दिखै है। मास्साब, लराइन के बाप भी हमर आँख में आँसू नईं देख सकै रहै। लेकिन बेटवा के लिए त हमर जीनाई-मरनाई सब बराबर। कहांकर माई, केकर माई? आब माई कोई ने? आब कोनो माई के दूध पिबै के जरूरी छै की ?”
-“ऐसी बात नहीं है चाची। उन्हें सचमुच फुर्सत नहीं है,लराइन बाबू ठहरे जिलाधीश। पूरे जिले की जिम्मेदारी,कोई छोटी- मोटी बात है ? चाची आपको अंदाज़ा भी है कि बेटा कितना बड़ा साहब हो गया है।”
-“मास्साब हमरा लिए त बेटा, बेटा भर बनल रह जाए त उहे बहुत, जब बेटा बेटे नहि रहल त कोनची अफ़सर आ कोनची नौकर।”
उनके चेहरे पर उदासी और निराशा का पूर्ण साम्राज्य देखकर चंदरकिरण बाबू ने उन्हें समझाना शुरू किया
-“क्या चाची, आप खुशी-खुशी घर जाइए न। बेटा आपका नहीं है तो क्या पड़ोसी का हो गया, जब देखिए तब आप बिना बात का टेंशन लेते रहते हैं। आप पहले किसी बड़े अधिकारी से मिले हैं जो उसकी दिक्कत समझिएगा
क्या है खेत ? कि आज नहीं जोतेंगे, कल ही जोतेंगे, आज पहले बहन का बरतुहारी करने चले जाते हैं। जो सरकारी फ़रमान मिलता है वो तुरंत पूरा करना पड़ता है, जैसे ही फ़रमान पूरा कर लेंगे, चले आएँगे। आप घर जाइए कुछ अच्छा बनाइये खाइये, भगवान का नाम लीजिए और सो जाइए।”
इस समझाने का ऐसा असर हुआ कि वो सचमुच ही घर की ओर चल पड़ीं। हालांकि वो भली-भाँति जानते हैं कि अच्छा खाना तो दूर सामान्य खाना भी वो शायद ही बनाएँ-खाएँ,क्योंकि बेटे के बिना उन्हें न कुछ बनाना अच्छा लगता है न खाना। बेटे के आने पर वो जरूर अच्छा खाना बनाती और बेटे को खिलाती हैं,पर स्वयं तब भी कोई सस्ता अनाज खाती हैं, ताकि बेटे को अगले दिन अच्छा खाना खिलाने के लिए पैसे कम न पड़ें। उन्हें जाते हुए मास्साब देर तक देखते रहे, और स्वयं से ही कहा- ये मेरी माँ नहीं है, पर इनकी आँखें जब भी छलकती हैं, मुझे दर्द सा होता है। फिर लराइन बाबू को अपनी माँ के आँसू क्यूँ नहीं दिखते। पिछली बार जब लराइन बाबू जा रहे थे, माँ ने उनका हाथ पकड़ लिया था और रोते हुए कहा था –“बेटा कैसे दिन काटबे हम माई बेटी। तोहर बाप हमरा मझदार में छोड़ी देलक। बेटा नहि जा हमरा छोड़ी के।”
माँ की इतनी विनती के बाद भी लराइन बाबू चले गए,क्योंकि उनका वापस जाना जरूरी था, पर वो माँ को साथ तो ले जा सकते थे। पर साथ क्यूँ ले जायेंगे, उन्हें ऐसा लगता है कि माँ और बहन उनके अफ़सरी रुतबे में बट्टा लगा देंगी। उनके चेहरों पर गरीबी का ऐसा स्थायी प्रभाव पड़ चुका है, कि किसी भी साबुन से उस गरीबी और लाचारी के भाव को धो कर साफ नहीं किया जा सकता। उनके हाथ रूखे-सूखे हैं,पावों में बिवाइयाँ फटी हुई हैं, बाल कड़े और उलझे हैं, उनकी वेशभूषा को ठीक करने में ही हजारों का खर्च आ जाएगा,जो लराइनबाबू की दृष्टि से अनावश्यक है, और यदि कलेजे पर पत्थर रखकर वह हज़ारों रु. खर्च करके उनकी वेशभूषा को थोड़ा ठीक कर भी देते हैं, तो रातोंरात माँ और बहन के रहन-सहन, भाषा, भाव-भंगिमा और आदतों को बदला नहीं जा सकता। अब उनमें और उनकी माँ-बहनों में उतना ही अन्तर आ गया है, जितना कि दो ग्रह के लोगों में हो सकता है। अब इस अन्तर को पाट पाना, न तो लराइन बाबू के हाथ में है,और न ही उनकी माँ-बहन के। माँ-बहन जब भी इस अन्तर को पाटने की कोशिश करती हैं, तो यह अन्तर और भी ज्यादा हो जाता है। दूरी मिटाने के लिए वो दोनों जो भी कदम उठाती हैं, वो उल्टा पड़ता है,जो भी बोलती हैं, वो लराइन बाबू को बुरा लग जाता है। इन लोगों ने लराइन बाबू को आगे बढ़ाते हुए,अपनी सारी ताकत और पूंजी दाँव पर लगा दी, लराइन बाबू को आगे बढ़ाने में तो ये कामयाब हो गए, पर खुद इतने पीछे रह गए कि लराइन बाबू को इनके साथ खड़े होने में भी बेइज्जती महसूस होती है। वो लोग और होते हैं, जो उच्च पदों पर आसीन हो जाने के बाद भी अपने गरीब परिवार के सदस्यों को स्वीकार करते हैं, और अपने मित्रों से उनका परिचय परिवार के सदस्य के रूप में करवाते हैं। लराइन बाबू में यह हिम्मत कहाँ कि वह किसी के सामने यह कह सकें कि मेरे घरवालों ने मुझे बनाने के लिए स्वयं को मिटा डाला। ये मेरी माँ और बहन हैं, जिन्होंने अपने खून-पसीने से मुझे सींचा है, तब जाकर मैं आज बरगद की तरह स्थापित हो पाया हूँ। काश! लराइन बाबू में इतनी हिम्मत होती तो शायद! आज जगदीश बाबू ज़िंदा होते। उनकी बीमारी की शुरुआत तो उसी गम से हुई थी,जो बेटे ने दी थी। पिता जब एक बार,मकर संक्रांति के अगले दिन,पुत्र – प्रेम में डूबे हुए, बेटे के छात्रावास जाने से खुद को रोक नहीं पाये थे, लेकिन खुशी के बदले अपमान और पीड़ा लेकर लौटे थे, रो-रोकर अपना दुख चंद्रकिरण बाबू को सुनाया था। पीड़ा का प्रभाव ऐसा गहरा था कि उनके लाख समझाने पर भी उनके दुख में कमी नहीं आ सकी थी।
-“मास्साब जब आदमी बड़ा बन जाता है, तो बाप उसका नौकर हो जाता है। हमारा जिंदगी भर का तपस्या व्यर्थ हो गया मास्साब। हम तो ई गम ले के ही अब जायेंगे, लेकिन ई बात आप लराइन की अम्माँ को नहीं बताइएगा। ऊ त जीते जी मर जाएगी,लराइन बाबू को तो हमलोगों के जीने और मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन रुपिया मर जाएगी। मास्साब जब लोग कहते थे कि गोली से भी बढ़कर बोली घायल करती है तो हम हँसते थे, और कहते थे कि लोग कुछ भी बोलते रहते हैं। लेकिन आज समझ में आ गया। हम तो ऐसे घायल हुए हैं कि हम त नहीं ही बचेंगे,बस उसकी अम्माँ को नहीं पता चलना चाहिए।”
-“मेरी समझ में नहीं आ रहा है चाचा, क्या हुआ है ? आप मुझे पूरी बात बताइए।”
-“हुआ ई मास्साब कि हम जब बबुआ के हॉस्टल में गए, तो गेट पर चौकीदार बोला कि किससे मिलना है, त हम कहे कि लराइन बाबू से। त उ कहा कि इस नाम के तो कोई नहीं है। फिर हम याद किए कि बबुआ कागज़ में कुछ और नाम लिखाया है, बहुत याद करने पर याद आया कि कुछ मेहता जैसन बताए थे। हम बोले कि मेहता लिखते हैं, त बोला अच्छा! रूम नंबर दो सौ चौबीस में रहते हैं, हमको भी याद आया कि बबुआ बताया था एक बार, हम भूल गए थे। चौकीदार बोला कि –क्या काम है, त हम छाती चौड़ा करके बोले कि उ हमार बेटा है, तो बोला कि रजिस्टर में अपना नाम-पता लिख दीजिये, और भीतर चले जाइए। हम तो सोच में डूबे थे कि कैसे रजिस्टर में लिखेंगे, कि देखे कि बबुआ चार-पाँच साथी के साथ इधरे आ रहा है, मास्साब हमरा तो खुशी के ठिकाना नहीं रहा-वहीं से चिल्लाए- बबुआ………..
बबुआ हमको देख कर पहले खुश हुआ चौंका,फिर खुशी को पता नहीं कहाँ छुपा लिया। पैर में जो अचानक तेजी आई थी, उसको भी रोक लिया। इतने में एक साथी ने अंग्रेज़ी में शायद पूछा कि कौन है ? तो बबुआ बोला कि सरवेंट। मास्साब हम स्कूल कॉलेज तो नहीं गए कभी, पर दुनियादारी करते करते इतना जानते हैं कि अंग्रेज़ी में सरवेंट, नौकर को बोला जाता है। बबुआ दोस्तों के सामने हम को बाप बताता तो उसका इज्जत घट जाता। यही दिन देखने के लिए मास्साब इतना तपस्या किए थे। हम बड़ी मुश्किल से अपना आँसू को रोक पाये। मन किया लौट जाएँ,पर सोचे कि बेटा के लिए जो तिलबा,लाई-चुरलाई लाये हैं वो दे दें। बबुआ बोला अंदर चलने के लिए, तो हम कहे कि रास्ता खोजने में ही बहुत समय लग गया, अब ट्रेन का समय हो गया है। ई सब तुम्हारी अम्मा भेजी है, ले लो। इस पर उसके एक दोस्त ने कहा कि रूम तक तो सामान पहुँचा दो। यार नलिन, तुमने तो इसे लगता है बहुत छूट दे रखी है। गेट पर ही सामान छोडकर जा रहा है। इस पर बबुआ के दूसरे दोस्त ने कहा कि हमारे मेहता साहब बूढ़े सरवेंट को घर के बुजुर्ग सदस्य की तरह मानते हैं। हमने कहा कि रास्ता बता दीजिये, हम सामान रूम तक पहुँचा देते हैं। रूम में जाकर सामान रख कर चुपचाप सिर झुकाये हम वापस आ गए।”
आते समय हमको ई हॉस्टल बहुत सुंदर बुझा रहा था, लेकिन लौटते समय आँख में एतना आँसू भरा था कि कुछ नहीं दिख रहा था। बाहर आते-आते आँसू गाल पर बहने लगे थे, और मेरी हिचकियाँ बंध गयी थी। घर से निकलते समय लराइन की अम्माँ बोली थी कि उसका भी साथ आने का मन है,तो हम ने कहा कि तू आएगी,तो रुपिया कहेगी कि उ भी आएगी। इस बार हमको मिल के आने दे, अगली बार तुम सबको लेके आएँगे। अच्छा ही हुआ कि उ नहीं आई, उ सर्वेंट का मतलब तो नहीं समझती, लेकिन हमार आँसू देख के सब कुछ सूंघ लेती।”
सड़क पर आकर एक आदमी से पूछ ही रहे थे कि यहाँ से टीशन जाने के लिए कोई सवारी मिलेगी कि देखते हैं कि बबुआ चले आ रहे हैं- उ भी अकेले। हमरा पैर छूने के लिए झुके तो हम चार कदम पीछे हट गए, बबुआ समझ गए कि हम सब कुछ समझ गए हैं। कहा कि बाबू यहाँ आना था,तो कम से कम अच्छे कपड़े तो पहन कर आते। मैं ने कहा कि बेटा नौकर तो कुछ भी पहन लेगा,तो नौकर ही रहेगा,मालिक नहीं हो पाएगा, काहे कि मालिक बनने के लिए जो मक्कारी चाहिए,वो नौकर कहाँ से लाएगा।”
उस दिन से लगातार कई दिनों तक जगदीश बाबू घंटों अपना दुखड़ा चंद्रकिरण बाबू के सामने प्रकट करते रहे, पर अफसोस ! इतना रो-धो कर भी उनका गम सीने से बाहर नहीं हो सका, और धीरे-धीरे हृदयरोग में परिवर्तित हो गया। इस घटना के दो महीने बाद ही बेटे के प्रशासनिक सेवा में चयन की खबर वाली चिट्ठी आई थी, माँ-और बहन खुशी से पागल हो रही थीं। रिश्ते के लिए लडकीवालों की लाइन लग गयी थी। एक से एक बड़े घर से रिश्ते आ रहे थे। स्वयं जगदीशबाबू चौक-चौराहे पर बढ़ा-चढाकर बेटे की प्रशंसा करते नहीं थकते थे,पर दिल से उस हॉस्टल वाले झटके का दर्द अभी तक मिट नहीं पाया था। पत्नी जब भी पूछती थी कि अब तो सुख के दिन आ रहे हैं, फिर क्या सोचते रहते हो तो कहते थे कि इतना सुख मैं कैसे भोग पाऊँगा, यही सोचता रहता हूँ। काहेकि सुख भोगना तो बचपन से कभी सीखा ही नहीं, तो घबराहट सी हो रही है। लराइन की अम्माँ इस बात पर हँस-हँस कर दोहरी हो जाती,और कहती कि हम शहर के भाषा-बोली कैसे सीखब। दरअसल जगदीश बाबू बेटे को माफ़ करने का पूरा मन बना भी चुके थे,ये सोचकर कि अबकी बार बेटा घर आएगा तो जरूर माफी माँगेगा, और काफी देर के बाद वो बेटे को माफ़ कर देंगे, कितना भी बड़ा बन गया हो, आखिर है तो वह अभी बच्चा ही।
पर, इसी बीच बेटे के पत्र से ही ज्ञात हुआ कि बेटे ने शादी कर ली है,लड़की कॉलेज के दिनों में इनकी सहपाठिनी रह चुकी हैं। सबकुछ इतना अचानक हो गया कि कुछ भी बताने का मौका ही नहीं मिला। माँ को दुख हुआ कि आखिर ऐसी भी क्या बात हो गयी कि हमें शादी में शामिल होने का भी मौका नहीं दिया, और यदि जल्दी में शादी कर भी ली तो भी कम से कम दुल्हन को लेकर ही आ जाता। हमें इस लायक भी नहीं समझा कि हमसे आशीर्वाद भी ले सके। जगदीश बाबू का ज़ख्म फिर से हरा हो गया, सीने में तेज पीड़ा होने लगी। होठों ही होठों में बुदबुदाकर कहा था कि नौकर – नौकरानियों से भी आशीर्वाद लिया जाता है क्या भला ?
लराइन की अम्माँ नहीं सुन पायी थी, भला सुनती भी कैसे ? आज कल तो उसे बस कभी नई-नवेली बहू की पायल की आवाज सुनाई देती थी, तो कभी चूड़ियों की खनक, वह ये भी नहीं जान पा रही थीं,कि ये सब वो सिर्फ ख्वाबों और ख़यालों में सुन रही हैं। जगदीश बाबू ने मास्साब से कहा था,कि मैं तो अब बस कुछ ही दिनों का मेहमान हूँ, अब रुपिया और उसकी माँ को आप ही संभालना,क्योंकि लराइन बाबू तो अब दूसरी ही दुनिया के हो गए हैं। उन्हें कितनी ही बार पत्र में लिखवा दिया कि उनकी माँ उन दोनों की आरती उतार कर उन्हें घर में प्रवेश करवाना चाहती है। कुलदेवी की पूजा बहू के हाथ से करवा कर उसे अखंड सौभाग्य का वरदान दिलवाना चाहती है। पर, उन्हें दुल्हन को लेकर न आना था, न आए। खैर ! पिता ने अपनी बीमारी की बात भी कई – कई बार लिखवा दी, यह भी कहा कि यदि उन्हें शहर ले जाकर अच्छे डॉक्टर से दिखला दिया जाता तो वो ठीक हो जाते। पर लराइन बाबू इतने व्यस्त थे कि नहीं ही आ पाये। पिता की मृत्यु पर वो आए तो थे, पर उनके पास समय बहुत कम था, तेरह दिनों में सम्पन्न होने वाले श्राद्ध-कर्म को उन्होंने किसी तरह तीन दिनों में निबटाया, माँ की जिद थी कि पूरे तेरह दिन रुककर उन्हें सारे कर्मकाण्ड करने पड़ेंगे, पर वो तीन दिन से अधिक नहीं रुक सकते थे, तो चौथे दिन माँ-बहन को दुबारा जल्दी आने का आश्वासन देकर चले गए। गाँव में यह चर्चा कई दिनों तक जोरों पर चलती रही कि लराइन बाबू ने बेटे का फर्ज़ ठीक से अदा नहीं किया, शादी को दो वर्ष हो गए, बेटा भी हो गया पर आज तक माँ-बाप को बहू और पोते का मुँह भी नहीं देखने दिया, न तो बीमारी में पिता का ईलाज करवाया, न उनकी मृत्यु पर सिर के बाल मुंडवाए, और न ही ठीक से विधिपूर्वक श्राद्धकर्म किया। एक तो जगदीश बाबू का निधन, ऊपर से लराइन का जल्दी लौट जाना, रुपिया और उसकी माँ नौ-दस दिनों तक लगातार दिन-रात रोती रहीं, वे दोनों एकदम से बेसहारा हो गयी थीं, पर रुपिया का रोना उसकी माँ अधिक देर तक नहीं देख पाई, और फिर उसने हिम्मत जुटानी शुरु कर दी। उसने सोच लिया था, पिता चले गए तो अब वही रुपिया को माँ और बाप दोनों का सुख देगी। नियमित रूप से पत्रों के माध्यम से बेटे को बहन की शादी की ज़िम्मेदारी की याद दिलाने लगी। पिता की मृत्यु के बाद इस बार तीसरी बार लराइन बाबू गाँव आए थे और अब वापस जा रहे थे,पर अब तक एक बार भी वे पत्नी और पुत्र को साथ लेकर नहीं आए थे। माँ ने कई बार बहू और पोते को देखने की इच्छा जाहिर की थी, हर बार उन्होंने यही कहा था कि अगली बार ले आऊँगा। माँ का मन था कि बेटा उनसे साथ चलने को कहे, पर अब तक एक बार भी उन्होंने माँ से साथ चलने को नहीं कहा। इसी गाँव में जिन लोगों ने बेटों की पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया, उनके बेटे आज खेती करते हैं, बाढ़ और सूखा होने पर दाने-दाने को मोहताज होते हैं। घर में कोई अनाज न होने पर शहर जाकर मजदूरी करते हैं, बोरा ढोते हैं, रिक्शा-ठेला चलाते हैं, पर उस गरीबी में भी माँ- बाप को नहीं छोडते।
माँ-बेटी अपने दुख से जितनी दुखी हैं,उससे कहीं अधिक तानों-उलाहनों से हैं। गाँव की औरतें आते- जाते कुछ न कुछ सुना ही देती हैं।सुनने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं है। रुपिया तो जवाब भी दे देती है, पर लराइन की अम्माँ अब मानने लगी है कि गाँव की औरतें तो हंसेंगी ही, हमने अपने हाथों बेटे को पराया कर दिया,क्या जरूरत थी, बेटे को इतना बड़ा बनाने की। उसका बहुत बार मन करता है कि बेटी को लेकर किसी ऐसी जगह पर चली जाए,जहाँ उसे कोई न पहचाने, और उससे कुछ भी न पूछे। आखिर बेटे ने कौन सा सुख दे दिया बड़ा आदमी बनकर। ऐसी जिद क्यों सवार थी, हमें बेटे को पढ़ाने और बड़ा आदमी बनाने की । रुपिया समझाती है
-“अम्माँ भैया सरकारी काम में व्यस्त रहते हैं, तू उन्हें चिट्ठी में बार-बार एक ही बात मत लिखा कर। देख ! मेरी शादी में देर हो रही है,तो ये अच्छी बात है, मैं तेरे साथ रह पा रही हूँ।”
पर माँ तो माँ ठहरी,वो कहाँ शांत बैठने वाली थीं, उनकी तो यही जिद थी, कि उनके जीते जी बेटा अच्छा घर-वर देखकर अपनी प्यारी बहन का ब्याह कर दें। बेटे की उपेक्षा को वो समझती तो थी, फिर भी उसे उसके कर्तव्य याद दिलाने का अपना कर्तव्य निभाती चली जा रही थीं।
“जब भी बेटे की चिट्ठी आती,लराइन की माँ चंद्र्किरणबाबू के पास दौड़ी चली आती। चंद्र्किरणबाबू स्कूल के ही एक कमरे में अपने तीन बच्चों के साथ रहते थे। पत्नी के गुजर जाने के बाद वही माँ और पिता दोनों की भूमिका में थे। अपने बच्चों और स्कूल के बच्चों में ही इतने व्यस्त रहते कि कभी अपनी आवश्यकताओं की तरफ ध्यान ही नहीं जाता था। आज भी लराइन की माँ चिट्ठी पढ़बाने के लिए इनके पास दौड़ती-भागती आ गयी थीं, यूँ तो पूरे गाँव की स्त्रियाँ डाकबाबू से ही पत्र पढवा लेती हैं, और उन्हीं से ही जवाब भी लिखवा लेती हैं, पर जगदीश बाबू और उनकी पत्नी हमेशा पत्र के लेखन और पाठ के लिए इनकी शरण में ही आते रहे हैं। पहला कारण तो यह है कि डाकबाबू समेत अधिकांश लोग अंग्रेज़ी में कमज़ोर हैं और लराइन बाबू अपने पत्र अंग्रेज़ी में ही लिखा करते हैं। चंद्र्किरण बाबू ने एक-दो पत्र में कहा भी कि बाहर आप बेशक अंग्रेज़ी, या किसी भी अन्य विदेशी भाषा का प्रयोग करें, पर माँ-पिताजी की चिट्ठी भला अंग्रेज़ी में क्यों? इस पर उनका ज़वाब था कि कौन सा चिट्ठी माँ-पिताजी को स्वयं ही पढ़ना है, पत्र पढ़कर तो आप ही सुनाओगे, उनके लिए तो सारे ही अक्षर काले हैं और भैंस बराबर हैं, कौन सा हिन्दी में लिखने पर वो खुद ही पढ़ लेंगे। माँ-पिताजी के लिए ऐसी भाषा देख चंद्र्किरण बाबू भीतर से हिल गए थे, परंतु ऊपर से सामान्य बने रहने की पूरी कोशिश की थी। खैर! अब दूसरा कारण- इन दोनों को चंद्रकिरणबाबू पर सर्वाधिक भरोसा रहा है, और तीसरा कारण आरंभिक दिनों में यह था कि लराइन बाबू के पढ़ाई-लिखाई के संबंध में इनसे अच्छा सलाहकार कोई और हो ही नहीं सकता था, परंतु इन दिनों तीसरा कारण यह है कि लराइन की माँ नहीं चाहती कि गाँव के लोगों को यह पता चल जाए कि पिता की मृत्यु के बाद लराइन बाबू माँ और बहन से दूरी बढ़ाने लगे हैं। लराइन बाबू को ऐसा लगता है कि इनके नजदीक आने पर अनावश्यक खर्चे बढ़ जायेंगे। फिर भी वो पत्रों के माध्यम से बारम्बार बेटे को कर्तव्यों की याद दिलाती रहती हैं, और हर बार बेटे का पत्र पाकर आशा और उम्मीद से भर जाती हैं कि इस बार तो जरूर बेटे ने अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए हाँ कह दिया होगा, परंतु चंद्रकिरण बाबू भली-भाँति जानते हैं कि लराइन बाबू अब किसी कर्तव्य के लिए हाँ नहीं कहेंगे क्योंकि अब वो सिर्फ और सिर्फ अपनी पत्नी और बच्चे के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी मानते हैं, माँ और बहन के लिए नहीं, इस बात का खुलासा वो किस्तों में अपनी चिट्ठियों में करते आए हैं, पर हर बार पत्र पढ़ते समय चंद्र्किरणबाबू उस बात को दबाते रहे हैं, उन्हें डर लगता है कि दुखी होकर लराइन कि माँ कहीं कुएं में न छलांग लगा दे, और यदि कहीं उन्होंने ऐसा कर दिया तो रुपिया अनाथ हो जाएगी। लराइन की अम्मा जो लिखबाती हैं, उसमें भी चंद्र्किरणबाबू थोड़ा बहुत बदलाव कर देते हैं, ताकि लराइन बाबू ये न समझ ले कि माँ उन पर पैसे खर्च करने के लिए दवाब बना रही है, और नाराज होकर गाँव आना ही छोड़ दें। जगदीश बाबू की गाँव और समाज में अच्छी-भली इज्जत रही है, पूरे गाँव के लोग उनसे सलाह-मशविरा करते रहे हैं। जब लराइन बाबू यू.पी.एस.सी. की परीक्षा में चयनित हुए, तो उस दिन से पिता की इज्ज़त-प्रतिष्ठा को चार चाँद लग गए। उसी इज्ज़त को बचाने की खातिर ही लराइन की अम्माँ बेटे का पत्र मास्साब के अलावा किसी और से नहीं पढ़वाती, क्योंकि मास्साब के लाख छुपाने के बाद भी लराइन की अम्माँ धीरे-धीरे सब कुछ समझती जा रही है। वह पत्र का सारांश जैसे सूंघ लेती है, और बेटे के स्वयं तक सिमटते जाने की सोच से उपजी पीड़ा को हर बार मास्साब के मुँह से सुन कर विश्वास करना चाहती है, पर जब मास्साब उन्हें समझाते हैं कि वो बेटे की समस्या नहीं समझ पा रही हैं, बड़ा अफसर होने के कारण उन्हें गाँव आने का वक्त नहीं मिल पाता है, बहुत व्यस्त रहते हैं, तो वह मान लेती हैं कि ऐसा ही कुछ होगा। परंतु न जाने क्यों और कैसे बेटे को लेकर सारी आशाएँ अब कमजोर होती जा रही हैं, अब उन्हें ये लगने लगा है कि बेटे ने उन्हें पूरी तरह भुला ही दिया है। अब वह इतना समझदार हो गया है कि हर कदम फायदा-नुकसान सोचकर उठाता है। पत्र खोलने से पहले ही चंद्रकिरणबाबू ने लराइन की अम्माँ के चेहरे पर गहरी निराशा के भावों को महसूस किया था। उनमें आशा का संचार करने के लिए उन्होंने अतिरिक्त उत्साह प्रदर्शित करते हुए मुस्कुराकर पत्र उनके हाथ से ले लिया। हर बार वे पत्र रुक-रुक कर पढ़ते हैं, यह दिखाते हुए कि बहुत कठिन अंग्रेज़ी में लिखा है मुझे भी समझने में दिक्कत हो रही है, और इसी दौरान वे सोच लेते हैं कि कैसे, क्या और कितना बताना है। आज लराइन बाबू ने वह सब लिख दिया था जिसकी उम्मीद कभी कोई माता-पिता अपने पुत्र से नहीं कर सकते। चंद्र्किरण बाबू को गहरा धक्का लगा इतनी बार मेरे समझाते रहने के बावजूद भी यह सब लिख दिया, ऐसा लिखते हुए एक बार भी लराइनबाबू के मन में यह ख़याल नहीं आया कि इस पत्र को सुनकर माँ की क्या दशा होगी। क्या कल को उनका पुत्र यदि ऐसा पत्र उन्हें लिखे तो उनकी पत्नी या वह स्वयं सहन कर पायेंगे। पर उन्हें अगले ही पल महसूस हुआ कि-
पहली बात तो लराइन के मन में यह प्रश्न ही नहीं उठेगा और यदि उठ भी गया होगा तो लराइन इसका उत्तर यही देंगे – कि उन्होंने अपने बेटे को इतनी सुविधाएँ दी हैं कि उसका बेटा सदैव उसके प्रति कृतज्ञ रहेगा। पत्र में भी और कभी-कभार पहले जब गाँव आया करते थे, सामने से भी यह तो कहते ही थे कि वह एक ही औलाद रखेंगे और उसे दुनियाँ की सारी सुख-सुविधाएँ जुटा कर देंगे। यह कह कर शायद वे यही जताना चाहते थे कि माता-पिता ने दूसरी संतान पैदा करके बहुत बड़ा अपराध कर दिया। हाँ, लराइन बाबू के नज़रिये से तो अपराध ही किया है, आखिर क्या अधिकार था उन्हें बेटे के सर पर इतना बड़ा बोझ डालने का। बातचीत के क्रम में तथा बीच-बीच में पत्रों में भी लराइन बाबू इस बात को कई बार दुहरा चुके हैं कि लड़की की शादी करना कोई आसान काम है क्या ? ऊपर से अनपढ़ गंवार बना कर रखा। इतना भी नहीं हुआ कि गाँव के स्कूल से ही पाँचवी तक भी पढ़ा देते। एक बार तो चंद्रकिरण बाबू ने लराइन बाबू से कह भी दिया था कि आपके माता-पिता और पूरे गाँव के लोग ठहरे ज़ाहिल। पर जब मैं ने चाचाजी से रुपिया को पढाने की बात कही थी, और वो ये कहकर रोने लगे थे कि हमदोनों को खेत में काम करने के लिए जाना पड़ता है, रुपिया ही भैया को समय पर खाना बना कर देती है, गाय को सानी-पानी देती है, गोबर उठा कर गाय बांधने के स्थान को साफ करती है, आँगन, खलिहान और दालान को बुहारकर गोबर से लीपती है। फिर पगडंडी के किनारे,गोबर से गोरहा बनाती है। घास लाती है, दूध दुह कर, उबाल कर भैया को देती है। अगर रुपिया स्कूल जाएगी तो लराइन बाबू के खाने –पीने की व्यवस्था कौन करेगा। मास्साब हम बहुत गरीब लोग हैं, दो बच्चे को नहीं पढ़ा पायेंगे। बेटा पढ़-लिख कर साहब बन जाएगा, तो बहन की जिंदगी भी संवार देगा। इस पर मैं ने कहा था कि एक ही बच्चे को पढाना संभव है तो रुपिया को ही पढ़ाइए और बेटे को उसकी सेवा में लगा दीजिये। इस पर जगदीश बाबू ने कहा था कि हम तो मास्साब आपकी बात मानकर ऐसा कर भी लें, मगर इस गाँव के लोग मुझे गाँव में रहने नहीं देंगे। लराइन बाबू ये सारी बातचीत आपके सामने हुई थी, आज आपको याद दिला दिया है, क्या आपने एक बार भी यह कहा कि हम दोनों भाई-बहन मिलकर खाने-पीने और गाय की देखभाल का काम संभाल लेंगे, और दोनों पढ़ेंगे भी। हम दोनों अपनी-अपनी जिंदगी खुद संवारेंगे। इस पर लराइन ने वीभत्स हँसी हँसकर कहा था- “मास्साब मेरा मुँह मत खुलवाइए”
“क्या मतलब है आपका लराइन बाबू, आप कहना क्या चाह रहे हैं।”
-“मैं समझ नहीं पाता कि आप हमेशा रुपिया का इतना पक्ष क्यों लेते हैं। यदि आप दोनों के बीच कुछ है तो विवाह क्यों नहीं कर लेते, मुझे तो लगता है कि हम सबके सीधेपन का फायदा उठाकर आपने रुपिया को नादान उम्र में ही अपने प्रेमजाल में फंसा लिया, हो न हो आपकी पत्नी भी इसी ग़म में मरी होगी, या आत्महत्या ही कर ली होगी, या क्या पता कहीं आपने ही किसी दिन उसका गला घोंट दिया हो। गाँव-देहात में कौन इतना समझदार है कि पता लगाए और रिपोर्ट करे कि कहाँ आत्महत्या हुई और कहाँ हत्या ? यदि आपकी उस वक्त किसी ने रिपोर्ट की होती तो आज आप मुझे समझाने की बजाय जेल में चक्की पीस रहे होते। मैं ने भी तो ये सुन ही रखा है कि अनाथ होने के कारण आपकी शादी नहीं हो पा रही थी। इस काली-कलूटी लड़की के माता-पिता रिश्ते ढूँढ-ढूँढ कर थक गए थे, तो आपसे उन्होंने अपनी लड़की ब्याह दी। आपने जब रुपिया को देखा तो नया ही कांड शुरू कर दिया। मेरे माता-पिता ठहरे आपके परम भक्त, तो उन्हें न आपकी कमियां कभी दिखीं और न ही चालाकियाँ।”
चंदरकिरणबाबू खून का घूंट पीकर रह गए, यह भली-भाँति समझ गए कि यदि लराइन बाबू को इस समय कुछ समझाया जाए, तो वो उसे झूठी सफाई मानेंगे। फिर भी उत्तर देने से वे स्वयं को रोक नहीं पाये थे
–“लराइन बाबू अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, अपने दिल-दिमाग और जुबान को इतना गंदा मत करिए। आज आपने गुरु दक्षिणा दे दी, आप जैसा शिष्य पाकर मैं भी धन्य हुआ। यदि मैं अपराधी था तो आपने रिपोर्ट क्यों नहीं किया, जेल क्यों नहीं भेजा। मैं जब भी आपको समझाने की कोशिश करता हूँ,आप मेरे ही ऊपर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगते हैं। जहाँ तक मेरी पत्नी की मृत्यु की बात है, तो वो पीलिया से मरी थी, सही समय पर बीमारी का पता नहीं चल पाया था, और जब तक पता चला उसका लिवर ख़त्म हो चुका था। आपने आरोप भी कैसे-कैसे लगाए हैं, मैं आश्चर्यचकित हूँ, ऐसा लगता है आप बड़े आदमी तो बन गए,पर शिक्षा का लक्ष्य ही भूल गए । अफ़सर बन जाना अच्छी बात है, पर इंसानियत खो देना ? ये तो मेरी शिक्षा का उद्देश्य नहीं था। मैं ने आपको क्या बनाना चाहा था और आप क्या बन गए ? मुझे तो आपने ज़लील किया ही है, कम से कम अपनी लक्ष्मी-सरस्वती जैसी बहन के सम्मान की तो लाज रख लीजिए।”
-“मास्साब आप भी लगता है वक्त से बहुत पहले ही सठिया गए हैं लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर इंसान को आप लक्ष्मी-सरस्वती की उपमा दे रहे हैं। अपने ये उपदेश आप किसी और को दीजिएगा, क्या मैं नहीं समझता कि आपको कितनी ईर्ष्या है मेरी अफसरशाही से, मैं वो बन पाया जो बनने के लिए शायद आपको दुबारा जन्म लेना पड़े। बड़े-बड़े शब्द आपकी बुराइयों को नहीं ढँक सकते मास्साब। आप गाँव के भोलेभाले जीव-जंतुओं पर ही अपने शब्दों का जादू चला सकते हैं। कम से कम मुझ पर तो बिल्कुल भी नहीं, क्योंकि मेरी आँखें, नाक और कान पूर्ण स्वस्थ हैं और इनसे भी बढ़कर मेरा दिमाग बिल्कुल दुरुस्त है।”
-“लराइन बाबू मैं नहीं सठियाया, आपकी आँखों पर ही घमंड और स्वार्थ की मोटी चर्बी चढ़ गयी है, कभी आप शांत चित्त से मेरी बातों को सोचना। मैं पढाता आपको था, पर ज्ञान रुपिया ने प्राप्त किया। आपने तो कुछ अक्षर सीखे, और उसकी चमक से आपकी आँखें चौंधिया गयीं, कभी अपने साहबी ठाठ से फुर्सत पाकर माँ बहन के करीब बैठिए, और जानिए की कोशिश करिए की आज नलिन विलोचन मेहता जो कुछ भी है, उसके वो होने का श्रेय उसके माता-पिता और बहन को भी मिलना चाहिए या नहीं। हाँ, आज आपको बेशक ये लगता है कि मैं एक नाकारा इंसान हूँ, पर आपका हाथ पकड़, उसमें पेंसिल पकड़ाकर ‘अ’ लिखना मैं ने ही सिखाया था।”
इतना कह कर चंद्र्किरण बाबू स्कूल वापस आ गए थे, परंतु मन में अभी भी तर्क-वितर्क चल ही रहा था। क्यों भूल गए लराइन बाबू कि उनके माता-पिता ने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर उनके लिए किया। आखिर क्या नहीं किया इन लोगों ने बेटे को पढ़ाने के लिए। आज भी चंद्रकिरण बाबू को अच्छी तरह याद है- इस गाँव में उनका वह पहला दिन, जब वो यहाँ नौकरी लगने पर आए थे। स्टेशन पर उतरते ही जगदीश बाबू ने पूछा था-
“आप हमारे मास्साब तो नहीं हैं ?
“हाँ मैं ही हूँ” पर आप ने कैसे पहचान लिया ?”
“मास्साब जब से सुना है कि आज मास्साब आने वाले हैं, हम अपने भाई-बंधुओं के साथ टीशन पर आ गए हैं। हमारे परम सौभाग्य कि हमारे गाँव के स्कूल में आपका पदार्पण हुआ। अब हमारे बच्चा और को पहिला किलास से ही दूसरा गाँव नहीं जाना पड़ेगा। मास्साब यहाँ हमलोग दिन-रात आपकी सेवा में हाज़िर रहेंगे। हम आपको कैसे बताएँ मास्साब कि यहाँ आकर आपने हम गरीब गुरबा किसान लोग पर कितना उपकार किए हैं ? मास्साब आज इस चमेली गाँव के धरती धन्य हो गयी। मास्साब आपने सोचा होगा कि जिस गाँव का नाम चमेली होगा वो गाँव केतना सुंदर होगा, केतना खसबूदार होगा, पर मास्साब यहाँ गरीबी, भूख और बीमारी का ही राज है। अब बाल-बच्चा सब पढ़-लिख जाए त शायद गाँव के तकदीर भी बदल जाए। आप भी मास्साब कहेंगे कि केतना बोलता है ? चलिये मास्साब स्कूल में पैर धरिए, कबसे आपके इंतजार में उदास पड़ल है। अगले ही दिन लराइन और उसकी उम्र के दस-बारह लड़के विद्यालय में प्रवेश लेने आ गए थे। जगदीश बाबू के अलावा और किसी बच्चे के पिता नहीं आए थे। जब पूछा तो पता चला कि ये उन बच्चों को उनकी माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध ज़बरदस्ती लेकर आए हैं क्योंकि वे लोग बच्चों को पढ़ाना ठीक नहीं समझते हैं, उन्हें लगता है कि इससे खेती और पशु-पालन में बच्चे से जो मदद मिल रही थी वो खत्म हो जाएगी, जिससे परिवार का खर्चा-पानी चलना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने आगे कहा था- “मास्साब ये लोग नहीं समझते कि बच्चा लोग पढ़ के हाकिम-आफिसर बन जाएगा तो केतना सुख से रहेगा। ई गाँव का आदमी सब मास्साब एतना देहाती भुच्च है कि इनको दाल-रोटी से आगे तनिको कुछो नहीं पता है। बहुत हो गया त जादे से जादे दूध-दही तक। मास्टर साहब भी देख रहे थे कि एक लराइन ही था, जिसने साफ-सुथरी पैंट-शर्ट पहन रखी थी, बाकी बच्चों ने डोरिया कपड़े की हाफ पैंट पहनी हुई थी, किसी-किसी के तन पर एकाध जगह से फटी हुई गंजी थी, तो किसी के वह भी नहीं। स्वयं मास्साब भी किसी अमीर घराने या सुदृढ़ पृष्ठभूमि से नहीं जुड़े थे, कस्बे के एक अनाथालय में उनकी परवरिश हुई थी, सदा माता-पिता के प्यार के लिए तरसते रहे थे, उन्हें लगता था यदि उनके माता-पिता होते तो उन्हें दुनिया की हर अच्छी से अच्छी सुविधा उपलब्ध करवाते, पर आज इन बच्चों को देख वह हतप्रभ हैं। हाय ! ये कितने गरीब लोग हैं जो अपने बच्चों को इतने अभाव में रखते हैं। इनसे अच्छी परवरिश तो अनाथालय में होती है। कहाँ है इन बच्चों का बचपन ?
“मास्साब इ बच्चा लोग के माता-पिता को बोल के आया हूँ कि इनके खाने और कपड़े का वेवस्था स्कूल से होगा, तब जा के आने दिये हैं, नहीं त कह रहे थे कि – ई इसकुल जाएगा त भैंसिया के चराएगा। मास्साब महामूर्ख, वज्रमूर्ख लोग रहते हैं इस गाँव में, जिनको आप यदि समझाने बैठो तो तभी जाकर कुछ उनके समझ में आता है जब आप उनको कुछ लोभ दो।
“का कहें मास्साब गंगा खुद चल के घर आ गयी, तब भी ई लोग नहाना नहीं चाहते हैं”
अचानक ऊँचे स्वर में बच्चों के पहाड़ा पढ़ने की आवाज़ से मास्साब अतीत से वर्तमान में पहुँचे। छात्रों को गौर से देखने लगे, और सोचने लगे, इनमें से कुछ बच्चे जो असफल रह जायेंगे, वो इसी गाँव या अधिक से अधिक पास के कस्बे तक सिमट कर रह जायेंगे, तो कुछ सफल होकर आसमान की ऊंचाइयों को छुएंगे, परंतु सवाल ये उठता है कि इनमें से संवेदनशील कितने होंगे ? क्या बड़ी कुर्सी, बड़ी गाड़ी, बड़ी कोठी और फिर उससे बड़ी कुर्सी ? ये ही हैं शिक्षा के मायने। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि जिन छात्रों पर हम बहुत गर्व करते हैं, वो बाद में इतने बड़े हो जाते हैं कि उनके आगे पुरानी पीढ़ी, कमजोर और गरीब लोगों की कोई अहमियत ही नहीं रह जाती। बचपन में सीखी गयी सूक्तियाँ- ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ कहाँ विलीन हो जाती हैं।
लराइन बाबू जैसे छात्र पर कितना गर्व था उन्हें, धीरे-धीरे वो जैसे-जैसे बड़े होते गए, उनका अहंकार भी बड़ा होता गया। चंद्र्किरण बाबू ने उसी दिन भाँप लिया था कि लराइन बाबू माँ-बाप को हेय समझते हैं, जिस दिन दसवीं बोर्ड के रजिस्ट्रेशन फोर्म पर उन्होंने नाम के कॉलम में लराइन बाबू महतो की जगह नलिन विलोचन मेहता लिखा था। उन्होंने कह भी दिया था -“लराइन बाबू माता-पिता ने जो नाम दिया है, उसे उनका आशीर्वाद समझ कर स्वीकार करिए,उसी नाम को रोशन करिए।”
इस पर उन्होने कहा था -“मास्साब आपका काम हमें पढ़ाना है,व्यक्तिगत फैसलों में दखल देना नहीं। कल को एक बड़ा अफसर बनकर इस देहाती नाम के साथ कैसे एडजस्ट करूँगा ?”
-“ मास्साब लराइन के चिट्ठी लिख दहो”
लराइन की अम्माँ आकर खड़ी हो गयी थी, मास्साब ने घड़ी देखी चार बजने में पाँच मिनट बाकी थे,छात्रों को जाने का संकेत किया और लराइन की अम्माँ से बोले
-“आप जाइए चाची मैं लराइन को पत्र लिख दूंगा।” जाने से पहले कहने लगीं –
“गलती हमरा दुनु जीव से एगो हो गइल। बेटी के भी पढाबे के चाही रहई। ऐसे भी पहिले खेत सुदभरना गेल,फेर नहिए हासिल हुए सकलई। एक के पढाबे में भी दोनोंजीव मजदूरी करली, दुओ के पढ़ावे में भी मज़दूरिए करतिए। हमें माई-बाप होइ के बेटी के जिनगी खराब करली।” चाची जो हो गया उसे भूल जाइए। जब मैं ने पढाने के लिए कहा तो आपका कहना था कि जिस गाँव में बेटी को गोद में लेना भी पिता के लिए अपमानजनक माना जाता हो, वहाँ चाह कर भी कोई बेटी को स्कूल नहीं भेज पाता। ऐसे कई उदाहरण इस गाँव में स्वयं मैं ने भी देखे ही हैं। आज भी मुझे याद है
“एक दिन चाचा रुपिया को गोद में लिए दालान में आ गए थे, तो पड़ोस की औरतों ने ताली पीट कर कहा था
-‘छोड़ सैयां खेती,खेला हमर बेटी।’ चाचा शरम से पानी-पानी हो गए थे।”
उन्हें कहना चाहिए था कि बेटी को भी माता-पिता से प्यार – दुलार पाने का पूरा अधिकार है।
“मास्साब ऊ ज़माना में बड़ी –बूढ़ी के जवाब देना मनाही रहै। एक बच्चा के पढाबे में ही अपन सब कुछ बिक गेल, दोसर के लेल त कुछ बचबो नईं करल।”
-“हाँ चाची, सारी गरीबी की मार तो बेटी के लिए है। दूसरा भी बेटा होता तो आप उसे भी पढ़ा ही लेते। बेटी को भाई के सहारे जीने के लिए विवश कर दिया आप लोगों ने।”
-“हाँ बेटा हुनिके विश्वास रहई कि हमरा बेटा बहिनिया के शादी राजा घर में करत।”
इतना बोल कर चाची वापस चली गयी थीं। चंद्र्किरणबाबू को याद आया। कितने उत्साहित थे बेटे को आगे पढ़ाने के लिए जगदीश बाबू। जिस दिन उन्होंने अपना आखिरी खेत सुदभरना लगाया था, जमींदार ने कहा था,
-“एक बार और सोच लीजिए जगदीश बाबू। हो सकता है यह खेत आप दुबारा हासिल नहीं कर पायें।”
जगदीश बाबू ने हंसकर कहा था
-“बेटा अफ़सरी करेगा, या हल जोतेगा ?”
हम दोनों भी बेटे के पास ही रहेंगे। सोफा-पलंग पर सोएँगे-बैठेंगे।”
जमींदार ने कहा
–“अभी आपकी एक बेटी भी है। गाँव में और कोई भी बेटे को पढ़ाने के लिए बाप-दादा की ज़मीन नहीं लुटा रहा।”
पढ़ने का इतना शौक है तो कहो शहर में पार्ट टाइम जाब करके पढ़े।” चंद्र्किरण बाबू ने जमींदार से कहा कि यदि आपको चाचा से इतनी सहानुभूति है, तो रू. उधार ही क्यों नहीं दे देते। इस पर जमींदार ने हंस कर कहा
-“जगदीश बाबू बाबले हो गए हैं, जो बाप-दादा के खेत लुटा रहे हैं। मेरा दिमाग पूरा ठीक है, मैं ने बाप-दादा से जैसे धंधा करना सीखा है वैसे ही करूँगा।”
फिर भी जगदीश बाबू का निर्णय टस से मस नहीं हुआ। चंद्र्किरण बाबू को अपने साथ ही घर ले गए थे, और आग्रह किया था कि पहली बार लड़का घर से बाहर जा रहा है उसके साथ चले जाएँ। टिकट के पैसे वही देंगे। पढ़ाई-लिखाई का मामला है, हम जैसे अनपढ़ साथ रहकर भी क्या कर पायेंगे। उन्हें दालान पर बैठा स्वयं जगदीशबाबू आँगन की ओर गए थे
-“अरे लराइन की माँ, सब व्यवस्था कर आए हैं, अब जल्दी से लराइन के सहर जाने की तैयारी करो, पर आँगन में उनकी बात सुनने को बैठा कौन था ? भीतर से एक गिलास पानी लेकर स्वयं चंद्र्किरणबाबू को देने के लिए आए। आते ही कहने लगे।
-“ लगता है लराइन की अम्माँ जानती थी कि हम व्यवस्था कर ही लेंगे। उसकी तरफ से भी तैयारी पूरी है भीतर रसोई में जाकर देखा है, लिपा-पुता चूल्हा,तुरंत लगाया गया चौका,आगे के कार्यक्रम की प्रतीक्षा कर रहा है। मेरे मन में सवाल उठ रहे हैं, जलावन है भी या नहीं, बरसात के मौसम में चूते गट्ठुल्ले में गोरहा भींग जाता है,लकड़ियाँ इतनी महँगी कहाँ से जुटे। मन ही मन मुझे लराइन की माँ के प्रति श्रद्धा होती है ,चाहे कैसी भी समस्या आ जाए, तीनों वक्त मुस्कुराते हुए, घर के सारे सदस्यों के आगे खाना परोस ही देती है। पता नहीं बेचारी क्या-क्या सहती होगी, इन सारी व्यवस्थाओं को पूरा करने के लिए। खुद पता नहीं खाती भी है,या हवा पी कर ही दिन काट रही है। इतने में बेटी रुपिया लकड़ियों का एक गट्ठर सर पर रखकर, ऊँची आवाज़ में गीत गाती हुई-आँगन में घुसी।
“छिनरो के मोन होइ छै,
फुटहा जे खइतौं,
आनि देल,
मुरही बेसाही रे समोलिया ………
फुटहा जे रहितई कुटुर-मुटुर उठितई-
मुरही त गेलै मसुआई रे समोलिया ………….
गीत के बोल सुन जगदीश बाबू ने शर्म से सिर झुका लिया, और लगभग दौड़ते हुए पुत्री के पीछे भागे। थोड़ी देर पहले पत्नी के प्रति जो श्रद्धा थी,वह क्रोध में परिवर्तित हो गयी थी। हाव-भाव अजीब से हो गए थे, यद्यपि चंद्र्किरण बाबू की उपस्थिति के कारण उन्होंने स्वयं को काबू में रखने की कोशिश की, पर पूर्णतः सफल नहीं हो पाये। उनकी आवाज इतनी ऊँची थी कि दालान पर पूरी तरह से सुनाई दे रही थी।
– “अब बेटी को लाज-शरम करना भी बाप होकर मैं सिखाऊँ। बारह बरस की हो गयी पर रत्ती भर समझदारी नहीं है। रुपिया का गीत पूरे उफान पर जारी था-
“छिनरो के मोन होइ छई,छौड़ा लग सुतितों……………..
आनि देल बुढ़्वा बेसाहि रे समोलिया…………
छौड़ा जे रहितई….
उन्होंने क्रोध पर दुबारा काबू करते हुए कहा- “देख बेटी ये मत गाया कर।”
रुपिया तो धीमे बोलना जानती ही नहीं थी, पूरी तेज आवाज में पूछा
-“काहे बाबू ?”
“बेटी ये गाली है।”
– “ गाली है तो माँ – चाची लोग काहे गाती हैं”
– “उन्हें तो आप कभी मना नहीं करते ?”
बेटी शादी में गाने का चलन है, हमारे गाँव-समाज का रिवाज है”
“बाबू इ कइसन रिवाज हुआ कि शादी में गाए तो रिवाज़, और दिन गाए तो गाली।”
-“बेटी तू हमसे बहस मत कर, बस मेरी बतिया मान ले, हम हाथ जोड़ते हैं बेटी।” इतने में लराइन की अम्माँ एक हाथ में रस्सी लगी हुई भरी बाल्टी,और दूसरे हाथ से कमर पर रखे हुए बड़े घड़े को संभालती हुई आँगन में आ गयी।
– “गे रुपिया, घईला पकड़ बेटी”
जगदीश बाबू ने मुस्कुराकर कहा-“बेटवा के सहर भेजई के तैयारी कर .. ”
-“सहर कहाँ से ?”
-“रुपिया के इंतजाम ?”
-“सब होइ गेलई”।
-“तू त बस बेटा के खाना-नाश्ता के भरपूर व्यवस्था कर.. ”
इतना कह जगदीशबाबू ने कुर्ते की जेब से नोटों की गड्डी निकाली,और पाँच सौ रु. लराइन की माँ के हाथ पर रखा। हिदायत दी
-“कोई कंजूसी नइ करिहो, रात खातिर पूरी सब्जी, कलका बिहान से अगिला पंद्रह दिन खातिर चूरा, सतुआ, लाई, ठेकुआ,पिरुकिया सब कुछ होना चाहिए।”
-“एतना कुछ चाही, त एगो पंचसइया आरो दहो ने”।
जगदीश बाबू ने एक और पाँच सौ रु. का नोट पत्नी के हाथ पर दे दिया। लराइन की अम्माँ कुछ देर उन्हें देखती रही,जैसे उनके चेहरे को पढ़ना चाहती हो। उन्होंने सफाई देने के अंदाज़ में कहा
-“हम कोई गलत काम नहीं किए हैं, हम को ऐसे मत देख। सही रास्ते से ही लाए हैं पैसा।” पर लराइन की माँ की आँखों में अभी भी प्रश्न था। हो भी क्यों नहीं । उनकी गरीबी को देखते-जानते हुए कोई भी उन्हें कर्ज़ नहीं दे सकता था।
आँगन में जाकर रुक गयी, लराइन की माँ,
-“कहीं खेत त नई बेच देलहो।”
-“अरे नई”
-“अब आरो देरी मत कर नारायण की अम्माँ। चरबजीया गाड़ी नई छूटना चाही।”
-“पिताजी आज आप हमें खाना नहीं देंगे।” तीनों बच्चों ने एकस्वर में कहा तो चंद्र्किरण बाबू अतीत से वर्तमान में लौटे। दो बेटे आलोक और विवेक और एक बेटी ज्योति।ज्योति अब छह वर्ष की है, विवेक आठ और आलोक दस का। भोजन-पानी के बाद बच्चों के साथ बिस्तर पर लेट गए थे, ठंड बढ़ गयी थी। बच्चे रज़ाई को पैरों के नीचे दबा खुद ऊपर आ जाते थे,चंदरकिरण बाबू रात में कई-कई बार बच्चों को ठीक से रज़ाई ओढाते थे। सोचते-कितना क्रूर है वो जिसे हम ईश्वर कहते हैं, मुझे माँ-बाप का सुख नहीं दिया,तो मेरे बच्चों से उनकी माँ छीन ली। अनाथ होने की पीड़ा से उबरने के लिए ही बड़ा परिवार चाहता था, तीन बच्चे होने के कारण लोग हँसते थे, निन्दा करते थे,पर उन्हें तो भरे-पूरे परिवार का सुख पाना था। पत्नी जीवित होती तो शायद वो चौथी सन्तान की कामना भी करते। पर कहाँ पूरी हो पाई थी वह इच्छा। बेटी ज्योति मात्र सालभर की थी, जब शोभा अचानक गम्भीर रूप से बीमार पड़ी, और इस भरे-पूरे परिवार की खुशियों को अपने साथ लेकर सदा के लिए चली गयी। तीन साल लगे थे उन्हें सामान्य होने में। साथ रहने का सुख भी नहीं दे पाये थे शोभा को। बेचारी मायके में ही रहती आई थी। वे तो उसे अपने पास लाने की व्यवस्था में ही लगे रहे,और वो सदा के लिए मुँह मोड़कर चली गयी थी। कहाँ दे पाये थे उसे वो खुशियाँ जिसकी वो हकदार थी। कितनी आशंकाओं में जी रही थी वह। जितने लोग उतनी बातें, तरह-तरह की बातें। बंद कर देना चाहती थी वह सबका मुँह। पर, कहाँ बंद कर पायी। जाते-जाते भी उनका हाथ नहीं छोड़ रही थी, वह खुद भी कहाँ जाना चाह रही थी,पर नियति। तब भी लोग उन्हें और रुपिया को लेकर कहानी बना रहे थे,और आज भी बना ही रहे हैं। इतनी समझदार होते हुए भी कितना असुरक्षित महसूस करने लगी थी शोभा। कितनी ही बार उसने मुझसे कहा था कि मेरी सारी सहेलियाँ अपने पतियों के घर चली गयी हैं, एक मैं ही शादी-शुदा होकर, तीन बच्चों की माँ होकर अभी तक मायके में पड़ी हूँ। पर एक बार तो उसने साथ आने की जिद ही ठान दी-
“इस बार तो मैं आपके साथ ही जाऊँगी।”
-“अरे ऐसी क्या जल्दी है ?”
-“घर में इतने कमरे भी नहीं हैं कि मैं हमेशा यहाँ रह सकूँ। सोनू की शादी तय हो गयी है । माँ कह रही थी कि उन्होंने सोचा था कि ये कमरा मेरी शादी के बाद खाली हो जाएगा, तो यही कमरा सोनू की बहू के लिए हो जाएगा, लेकिन मेरे यहीं रहने के कारण उन्हें आँगन में एक नया कमरा और बनवाना पड़ेगा, जिसके कारण काफी खर्च बढ़ जाएगा। घर की आमदनी तो बढ़ नहीं रही,बस खर्चे ही बढ़ते जा रहे हैं। बेटी की शादी कर दी, फिर भी मुक्ति नहीं, सबकी बेटियाँ तो अपने घरों में बस गयी हैं, एक मेरी ही हैं जो पूरी जिंदगी यहीं बितायेंगी। अबकी बार यदि तूने अपने पति से बात नहीं की न ! तो मैं ही कह दूँगी, ले क्यों नहीं जाते मेरी बेटी को। आखिर पूरे समाज के आगे आपने उससे शादी की है। यही सोचेंगे न कि नहीं रख पाये बेटी को, तो सोचें, मुझे परवाह नहीं। बड़े से बड़े राजा भी नहीं रख पाये हैं, तो मैं कौन सी अनोखी हूँ। कई-कई बार अपनी माँ- भाभी समेत आस-पड़ोस की चाचियाँ-भाभियाँ भी सुना देती हैं कि बेचारे पति के पास अपना घर हो तो दुल्हन को विदा करा कर ले जाएँ। खुद के रहने का तो ठिकाना नहीं और बच्चे तीन-तीन पैदा कर लिए। ऐसा भी नहीं कि अनपढ़-गंवार हों। एम.ए., बी.एड., एम.एड. दुनिया भर की डिग्रियाँ लेकर बैठे हैं, पर नौकरी कर रहे हैं दो टके की। बीबी का खर्च उठाने की तो हैसियत नहीं है, और यहाँ पूरी फौज तैयार करके बैठा दिया है ससुराल वालों के सिर पर। अब और सहा नहीं जाता आप मुझे ले चलो, भले पेड़ के नीचे रखना, पर यहाँ अब और रहना ठीक नहीं है। मैं तुम्हारे बारे में ऐसी-वैसी बातें नहीं सुन सकती। मैं कभी कोई शिकायत नहीं करूँगी, तुम्हारे पास रहकर मैं इज्जत से रहूँगी। खाना नहीं मिल पाएगा तो पानी पीकर रह जाऊँगी पर अब यहाँ से ले चलो। अब ऐसा लगने लगा है कि माँ –बाबूजी भी ऐसा ही चाहते हैं, और वो भी क्या करें, तुम मुझे खर्चे के लिए जो पैसे देते हो, वो पूरा नहीं पड़ता है, मुझे माँ – बाबूजी से कई बार पैसे माँगने पड़ते हैं, जो देते हुए उन्हें ऐसा लगता है जैसे उनके बेटे-पोते का हक़ मारा जा रहा है। भैया-भाभी का व्यवहार दिन-प्रतिदिन रूखा होता जा रहा है, रही-सही इज्ज़त समाप्त होने से पहले तुम मुझे विदा करा लो। मैं तुम्हारे पाँव पड़ती हूँ। उसकी जिद के आगे मैं विवश सा हो गया था,और कहा था- छह महीने का समय दे दो, कुछ इंतजाम करता हूँ।
-“ छह महीने क्यों, भला! इस बार तो मैं तुम्हारे साथ ही जाऊँगी। और तुम्हें मुझे लेकर ही जाना होगा। तुम्हें मेरी कसम है।”
-“इसमें कसम देने की क्या बात है,यदि तुम्हारा जाना इतना ही जरूरी है तो लेता चलूँगा, पर इस बार नहीं अगली बार। आखिर तुम्हारे रहने का इंतजाम तो कर लूँ।”
इतना सुनते ही शोभा के चेहरे पर खुशी और संतोष के भाव आ गए थे। तनाव की जगह मुस्कुराहट खिल गयी थी। मैं ने भी हँस कर छेड़ा था- मैं तो सोचता था लड़कियाँ सिर्फ मायके जाने की जिद करती हैं, पर आज पता चला कि असल में वो सब नाटक होता है, दिल से तो वो पति के घर ही रहना चाहती है। पहले तो वो हँसी थी, फिर कहा था-
“देखो पहली बात तो दो-चार दिन के लिए मायका आना, और हमेशा के लिए रहना, दोनों बातों में बहुत अन्तर है। दूसरी बात कि मायके वाले मेरे दुश्मन नहीं हैं, दुनियाँ का जो दस्तूर है, मेरे लिए भी वो उसे ही निभाना चाहते हैं। उन्हें भी आस-पड़ोस और रिश्तेदारी में जवाब देना पड़ता है। पड़ोस के पंकज भैया की पत्नी आरती भाभी चमेली गाँव की ही है, परसों ही वो मुझे सुना कर भाभी से कह रही थी कि आप तो यहाँ ननद को राजकुमारी बना कर बिठाए रखो, वहाँ आपके ननदोई छोटी सी गुड़िया से आँखेँ लड़ा रहे हैं।” यह बात सुनते ही मेरे तन-बदन में आग सी लग गयी थी, गुस्से से कहा-
“शोभा मुझे समझ नहीं पाई हो अब तक। कोई ऐरा-गैरा आकर कुछ भी कहेगा और तुम उसे मान लोगी। यदि तुम्हारे मन में संदेह है तो सीधे-सीधे भी पूछ सकती थी, इतनी लंबी-चौड़ी भूमिका क्यों बना रही थी।”
शोभा ने हाथ के इशारे से धीमे बोलने को कहा, ताकि घर के अन्य सदस्य न सुन लें। यह सारी बातचीत शयन कक्ष के एकांत में हो रही थी।
-“देखो जब बात सौत की आती है तो हर औरत सावधान हो जाती है। तुम्हें समझती हूँ,पर उस जादूगरनी को तो नहीं जानती हूँ न। मैं ऐसी कोई गलती नहीं करना चाहती कि आगे चलकर पछताना पड़े। सुना है रुपिया रूप का भंडार है। सोलह-सत्रह बरस की उम्र, उस पर बड़ी- बड़ी कजरारी आँखें और गोरा रंग। अब आदमी तो आदमी ठहरा – इतनी रूपवती लड़की पढ़ने के बहाने रोज़-रोज़ घंटों सामने बैठी रहे, वह भी देर रात को, तो उसका दिल तो आ ही सकता है न ! खासकर तब जब पत्नी की नज़रों का पहरा न हो। जब विश्वामित्र जैसे ऋषि स्त्री से मोहित होने से नहीं बच सके, तो आज कल के आदमी की तो बिसात ही क्या है।”
-“ये आज तुझे क्या हो गया है शोभा। ये तू कैसी बातें कर रही है। वो बेचारी बहुत गरीब लड़की है, दिन भर घर और खेत के काम से जूझती रहती है। शाम ढले दो बड़ी टोकरियों में घास छील कर लाती है, गाय दुह कर उसके आगे हरी ताज़ी घास रखती है, फिर खाना बनाती है, सबको खिला-पिला कर, खाकर, बर्तन माँजकर उसके बाद बेचारी मेरे पास पढ़ने बैठती है, वह भी अपने पिता की उपस्थिति में। तुम अपना मन साफ रखो, मुझ पर भरोसा रखो।”
-“हाँ भरोसा रखते-रखते एक दिन तुम उसके हो जाओगे, और मैं आँसू पोंछती रह जाऊँगी। यदि पढाना ही था तो उसके जवान होने का इंतजार क्यों किया।”
-“घर के काम-काज के चलते उसे स्कूल नहीं भेजा गया, और शाम ढलते ही वो सो जाती थी। अब जाकर जब शादी-ब्याह की बातचीत चलने पर लड़के वालों ने कहा कि लड़की कम से कम इतनी पढ़ी हो कि वो चिट्ठी पढ़ – लिख सके,जरूरत पड़ने पर पता-ठिकाना लिख कर दे सके,या पढ़ कर समझ सके, तो जगदीश बाबू ने मुझसे आग्रह किया कि मैं रुपिया को लिखना-पढ़ना सिखा दूँ।”
-“तुमने जगदीश बाबू के घर का, उनके बेटे-बेटियों का ठेका ले के रखा है क्या ? तुम्हें मेरी कसम है जो उसे फिर से पढ़ाया। अगर मैं ने सुना कि तुम फिर उसे पढ़ा रहे हो, तो मेरा मरा मुंह देखोगे,कह देती हूँ।”
-“शोभा आज मेरी नज़रों में तुम छोटी होती जा रही हो। मैं ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि तुम कभी मुझ पर संदेह करोगी।”
-“मैं ये सब नहीं जानती। मैं तो बस इतना जानती हूँ,कि तुम मर्द हो,रुपिया जवान,सुंदर गोरी है, और मैं काली-कलूटी हूँ। जल्दी-जल्दी तीन-तीन बच्चे पैदा करके सूख कर कांटा हो गयी हूँ। पर याद रखो, मैं चाहे जैसी भी दिखूँ, तुम मेरे हो और तुम्हें मेरा और सिर्फ मेरा बनकर ही रहना होगा। मैं अपने पति को किसी स्त्री के साथ, किसी शर्त पर, साझा करने के लिए तैयार नहीं हूँ। मैं ने जो कह दिया सो कह दिया, इस बार तुम्हारी एक नहीं सुनुंगी, तुम्हारे साथ जाऊँगी, साथ रहूँगी और रुपिया से मेलजोल पूरी तरह बंद करवाऊँगी।”
-“ठीक है, मैं ने तुम्हारी सारी बातें मान ली,पर अब मेरी एक बात तुम भी मान लो, रुपिया को लिखना-पढ़ना तुम सिखा देना,जितना तुम्हें आता है,उससे थोड़ा कम भी सिखा दोगी,तो भी उसका ब्याह किसी ठीक-ठाक घर में हो जाएगा। पिछली बार जब लड़के वाले उसे देखने आए थे तो अपने साथ अंग्रेज़ी की एक किताब लेकर आए थे, उससे पढ़ कर सुनाने को कहा था। जब रुपिया ने ना में सिर हिलाया तो उन्होंने रामचरितमानस निकाली, और कहा अंग्रेज़ी नहीं आती तो भी कोई बात नहीं । इसमें से कोई चौपाई ही पढ़कर सुना दे। रुपिया ने कहा कि उसे पढ़ना तो नहीं आता, लेकिन उसने मंदिर में रामायण पाठ सुनकर कई चौपाइयाँ याद कर ली है, स्कूल की किताब की कई कविताएँ भी सुन-सुन कर याद कर ली है। यदि आज्ञा हो तो सुना दे। इस पर उन्होंने कहा कि ठीक है स्कूल की कोई कविता सुनाओ। रुपिया बिल्कुल उसी सुर में गाकर सुनाने लगी जैसे स्कूल के बच्चे मेरे साथ मिलकर कविता गाया करते हैं-
निर्झर कहता बढ़ो साथियों,
सरिता कहती हो गतिमान,
सागर कहता जीवन में तुम
धैर्यशील और बनो महान।
तारों का संदेश कि धरती
जगमग-जगमग कर दो,
सूरज कहता उगकर जग में
नई रोशनी भर दो।
पौधे कहते इस दुनिया में
हरियाली ……
बस- बस बेटी,तुमने तो सुन-सुन कर बहुत कुछ सीख लिया है। तेरी बुद्धि तो बहुत तेज है,फिर तुमने लिखना- पढ़ना क्यों नहीं सीखा ? यदि तुम सुन-सुन कर कविता और चौपाई सीख सकती हो तो इसका अर्थ है कि तुममें क्षमता बहुत है, तुम्हें मौका नहीं दिया गया। इतना कुछ सुन कर सीखा है तो आज एक पाठ मुझसे भी सुनकर सीख लो-
“माता शत्रु,पिता वैरी,येन बालो न पाठ्यितह।
न शोभते सभा मध्ये, हंस मध्ये वको यथा॥
इसका अर्थ है कि वह माता-पिता शत्रु हैं,जो बच्चे को नहीं पढाते,ऐसे बच्चे सभा में उसी प्रकार शोभा नहीं देते, जैसे हंसों के बीच में बगुला शोभा नहीं देता है। लिखने वाले ने तो यह बात सभी बच्चे अर्थात बेटे और बेटी दोनों के लिए लिखी थी, पर समझने वालों ने यह समझा कि सिर्फ बेटों को पढ़ाना ही आवश्यक है। बेटियाँ तो दूसरे घर जाएँगी, इसीलिए उन्हें घर-गृहस्थी के काम-काज सिखा देना ही काफी है। ईश्वर ने तुम्हें इतनी प्रतिभा दी, और तुम्हारे माता-पिता ने उसे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। रुपिया की आँखों से आँसू बहने लगे, जगदीश बाबू भी गमछे से आँखेँ पोंछने लगे। उन लोगों ने कहा आपकी बेटी बहुत सुंदर है,प्रतिभाशाली है,पर आपलोगों ने उसे अनपढ़ रखा, जबकि गाँव में ही स्कूल है, मास्साब आपके घर के सदस्य की तरह हैं, बेटा शहर में यूनिवर्सिटी में पढ़ रहा है। बुरा मत मानिएगा जगदीश बाबू आपने बेटी को पीस कर बेटे को तैयार किया है, गरीबी थी तो दोनों को ही अनपढ़ रख लेते। आपको यह भली-भाँति पता है कि मेरा बेटा बी. ए. कर रहा है, दोनों बेटियाँ भी बी. ए. पास हैं। फिर आप अपनी अनपढ़ लड़की का रिश्ता लेकर मेरे पास आ गए, और अपनी बेटी के अनपढ़ होने का जिक्र तक नहीं किया। ये तो अच्छा रहा कि मैं ने पढ़ाई-लिखाई की जाँच कर ली, नहीं तो मेरे बेटे का तो गला ही कट जाता। आपने मुझे भी अपने जैसा अँगूठा छाप समझा था। जगदीश बाबू ! बेटे की पढ़ाई के दम पर आप, बेटी का जीवन नहीं संवार सकते, और इन मास्साब को तो क्या कहूँ, जिन्होंने अपने सामने रुपिया समेत न जाने कितने बच्चे-बच्चियों को बर्बाद हो जाने के लिए छोड़ दिया। काश ! आपलोगों ने बच्ची को पढ़ाया होता। आपकी बच्ची की कोई गलती नहीं है, वो इतनी बुद्धिमती है कि सिखाने पर सब कुछ सीख सकती है,पर ये रिश्ता मैं इस लिए स्वीकार नहीं कर सकता कि यहाँ आते समय मेरे बेटे ने मुझसे कहा कि पिताजी लड़की अंग्रेजी में कमजोर भी हो तो मुझे कोई दिक्कत नहीं,पर उसका सामान्य ज्ञान अच्छा हो, हर विषय पर बोल सके,लिख सके। जब उसे पता चलेगा कि लड़की पूर्णतः निरक्षर है तो क्या वह मुझे माफ कर सकेगा। चलता हूँ, जगदीश बाबू। उसी दिन जगदीश बाबू ने कहा कि कल रात से आप रुपिया को पढ़ा दें, तो पढाने लग गया। अब तुमने अपनी कसम दे दी है, तो मैं नहीं पढ़ाऊंगा,तुम्ही पढ़ा देना।”
पर यह क्या, शोभा तो रोने लगी,आँसू पोंछते हुए कहा
-“मैं अपनी कसम वापस लेती हूँ, तुम पढ़ाओ रुपिया को। लोगों ने बोल-बोल कर मेरा दिमाग खराब कर दिया, मैं यह भूल गयी कि तुम मर्द बाद में हो ,पहले शिक्षक हो। मुझे माफ कर दो, और छह महीने का वक्त दिया तुम्हें। व्यवस्था कर लो,फिर मुझे ले जाना।”
इतना बोल कर शोभा मेरे सीने से लग कर सो गयी थी। अब उसके चेहरे पर निश्चिंतता के भाव थे। मुझे शोभा पर बहुत प्यार आया, यह शोभा का प्रेम ही तो है,जो उसे भयभीत करता है,कि उसके पति को कोई उससे छीन न ले। मैं भी मन ही मन शोभा की परिस्थितियों को समझने की कोशिश करता हुआ कब सो गया पता ही नहीं चला था।
वापस आते ही चंद्र्किरण बाबू ने किराए का घर ढूँढना शुरू कर दिया था,पर किसी के पास इतने कमरे थे ही कहाँ कि वो किसी को किराए पर दे सकें। गाँव के जमींदार ने कहा था कि वो तीन से चार महीने में दो कमरों का सेट बना देंगे, और सात सौ रु. किराए के लेंगे। बात दोनों के मध्य तय हो गयी थी। अगले शनिवार ससुराल जाने पर उन्होंने शोभा को यह खुशखबरी भी दे दी थी। पर, सारी बातें मन में ही रह गईं। शोभा के बाद तो वो सदमे में ऐसे डूबे कि सब कुछ तितर-बितर हो गया। स्कूल में ही वो किसी तरह से पढ़ा पा रहे थे, तो रुपिया को पढाना भला कैसे जारी रह सकता था। जगदीश बाबू ने भी उनकी हालत को देखते हुए उनसे कुछ भी नहीं कहा।
पंद्रह दिन बाद चाची फिर आई और कहा कि घर पर तो बेटे की चिट्ठी नहीं आई है, मास्साब कहीं आप के पास आई हो। उन्होंने चाची का दिल रखने के लिए झूठ ही कह दिया
-“हाँ आई है।”
-“का लिखा है” चाची ने चहक कर कहा।
लिखा है कि फुर्सत नहीं है। अभी दो साल बिल्कुल भी छुट्टी नहीं मिल सकती। उन्हें चाची के बूढ़े-थके चेहरे पर उदासी साफ दिख रही थी। उन्हें लगा इन्हें और कुछ नहीं तो सांत्वना के दो बोल तो दे ही सकते हैं। हिम्मत जुटा कर कहा कि चाची रुपिया बहुत अच्छी लड़की है,जिसके घर जाएगी वो खुशनसीब होगा।”
इतना सुनते ही लराइन की माँ ने जो कुछ कहा उसका सार यही था कि उसे रुपिया इतनी पसंद है तो वही ले आए उसे अपने घर। वे बूढ़ी-बेसहारा इससे बढियाँ लड़का कहाँ ढूँढ पाएँगी। मास्साब चंद्र्किरण बाबू स्तब्ध रह गए। रुपिया का गाया गाना उन्हें याद आ गया, उन्हें लगा कि माँ के इस निर्णय पर वह रोएगी।
-“मास्साब आपहु चुप हो गए, आब हम कहाँ जाइब,केकरा से रुपिया के बियाह करब।
मास्टर साहब ने चुप्पी नहीं तोड़ी, मन के भीतर बहुत कुछ चल रहा था। “अच्छा जाई छिय, सोची के बताय दिहो। चिट्ठी दै दै।“ “कोई बात नहीं चाची ले लेना चिट्ठी, अभी इसका जवाब भी तो लिखना है।” लराइन की अम्माँ ने भाँप लिया था कि उस पत्र में अवश्य ही किसी न किसी रूप में बेटे ने कर्तव्यों की पूर्ति से स्वयं को मुक्त करने की बात कही है। पर बात कितनी और किस रूप में कही गयी है, ये जानने के लिए वो बेचैन हैं। बेचैनी तो मास्साब के मन में भी बहुत थी, पर फिलहाल एक नयी बेचैनी पैदा हो गयी थी। मन में अचानक ख़याल आ गया कि यदि कल को मेरे बच्चों ने भी इसी तरह मुझसे मुँह फेर लिया तो मेरा क्या होगा ? लराइन की अम्माँ तो मेहनत-मजूरी करके अपना और बेटी का गुजारा कर ले रही है। रुपिया भी सिलाई-बुनाई और कढ़ाई करके दो पैसे कमा लेती है। क्या शहर में कोई कल्पना भी कर पाता होगा कि साहब की अम्माँ दूसरों के खेतों और घरों में काम करती होगी,और बहन दूसरों के स्वेटर-टोपी और मोजे बुनकर दो वक्त की रोटी का इंतजाम करती होगी। पर, यदि ऐसी परिस्थिति मेरे जीवन में आई तो मैं क्या करुंगा ? मुझे तो मजदूरी भी नहीं आती, न ही कोई दूसरा हुनर जानता हूँ । जहाँ तक ट्यूशन वगैरह की बात है, उसकी कोई गुंजाइश नहीं,क्योंकि जिस गाँव में माता-पिता सरकारी स्कूल में भी बच्चों को सिर्फ भोजन की उम्मीद में भेजते हों, वहाँ पैसे खर्च करके बच्चे को कौन पढ़ाएगा ? न नौकरी में पेंशन है, न कहीं एक कट्ठा खेत, न कोई मकान, न जमा-पूँजी। रातभर मास्साब के मन में विचारों का अंधर चलता रहा। बिस्तर से उठते वक्त उन्हें ध्यान आया कि सुबह थोड़ी देर के लिए जब आँख लगी थी, तो सपने में देखा था कि वो अकेले एक पेड़ के नीचे बैठे हैं, उनके पास एक भी सामान नहीं है, भूख जोरों की लगी है, फिर नींद खुल गई। कुछ देर तक वो सपने के बारे में सोचते रहे थे, और दुबारा सो गए थे। घड़ी में समय देखा तो आठ बजकर बीस मिनट हो रहे थे, हड़बड़ाकर उठे, तैयार हुए, भोजन तैयार किया। बच्चों को खिला-पिला खुद खाना खा बच्चों को लेकर क्लासरूम की ओर चल दिये। क्लासरूम के नाम पर दो बड़े कमरे थे, एक में पहली से तीसरी तक के छात्र बैठते थे, और दूसरे में चौथी और पाँचवीं के। कम से कम पाँच शिक्षकों की आवश्यकता थी, पर थे, एक वही। भोजन सामग्री रखने के लिए भंडार घर के नाम पर जो एक छोटा कमरा था, वही मास्साब का क्वार्टर बन गया था। हर क्लास से दो-दो जहीन बच्चों को उन्होंने मॉनिटर बना रखा था, जो क्लास में अनुशासन कायम रखने की ज़िम्मेदारी के साथ अपने सहपाठियों को वो सबक भी समझा देते थे, जो वो स्वयं समझ चुके होते थे। इस तरह से विद्यलाय में पढ़ाई को सुचारु रूप से जारी रखने की मास्साब पूरी कोशिश करते।
बारह बजे डाकिये ने आवाज लगाई, मास्साब यही समझ रहे थे कि कोई सरकारी चिट्ठी होगी, पर चिट्ठी लराइन की थी। खोलकर पढ़ा । पत्र अंग्रेज़ी में था,जिसका अनुवाद कुछ इस प्रकार है –
मास्साब प्रणाम,
यहाँ हम सभी सकुशल हैं। मेरे और माँ के बीच एक आप ही हैं, जिनके माध्यम से पत्र लिखे और पढ़े जाते रहे हैं, इसलिए आप सब कुछ जानते हैं। जब देखो तब माँ रुपिया की शादी की ज़िम्मेदारी की याद दिलाती रहती है। रुपिया मेरी ज़िम्मेदारी क्यों है ? वो कहती हैं कि मुझे पढाने में वो बर्बाद हो गईं, नहीं पढाती मुझे, खुरपी और कुदाल बचपन में ही पकड़ा देती, क्यों दिखाया मुझे बड़े-बड़े सपने। बेटी की ज़िम्मेदारी उनकी है, वो उनकी शादी करें या कुंवारी रखें उससे मेरा कोई वास्ता नहीं। मैं कोई रिश्वतखोर नहीं, कि इनके सारे सपने पूरे कर सकूँ। अपनी तनख्वाह से मैं अपने बच्चों की परवरिश भी मुश्किल से कर पा रहा हूँ। पिताजी के श्राद्ध के लिए दो दोस्तों से दस-दस हज़ार उधार लिए थे, वो अभी तक नहीं लौटा पाया हूँ। अब उन्हें रुपिया कि शादी के लिए लगभग पाँच लाख रुपए चाहिए, मैं कहाँ से दूँ। उनके पैसे माँगने से मैं इतना तंग आ चुका हूँ कि गाँव नहीं आना चाहता। यदि मेरा सुख-चैन उन्हें बर्दाश्त नहीं तो उनसे कहिए कि दो रु. का ज़हर खरीद कर मुझे भेज दें, मैं सपरिवार ज़हर खा लुंगा, और अब तक जो भी कमा सका हूँ, उन्हें मिल जाएगा। वैसे भी उन्हें मुझसे नहीं मेरे पैसे से प्यार है। उम्मीद है आप माँ को समझा देंगे।
-नलिन विलोचन मेहता ।
पत्र पढ़कर उन्हें गहरा धक्का लगा। पढ़-लिखकर क्या दिल इतना छोटा हो जाता है ? लराइन की अम्मा को कोई शौक तो है नहीं दहेज देने का, वो तो बस इतना ही चाहती है कि रुपिया थोड़े से ठीक –ठाक घर में ब्याही जा सके। यदि लड़के वाले दहेज माँगते हैं, तो दो-चार- दस जगह कोशिश करनी पड़ेगी, हो सकता है कि कोई कम में भी तैयार हो जाए, और पाँच लाख का ज़िक्र करते हुए लराइन की अम्मा को तो कभी नहीं सुना। हाँ एक समय था, जब लराइन के पिता अवश्य बेटे के दम पर बड़े-बड़े सपने देखते थे, पर उनके सपने तो उनके साथ ही चले गए। उन्होने कागज़ कलम उठाया और पत्र का उत्तर लिखने लगे।
प्रिय लराइन जी,
खुश रहिए।
बाबू, आप पत्र लिखते हैं या बम गिराते हैं। इससे पहले आपने अपनी अम्माँ को जो पत्र लिखा था, वो मैंने आज तक उन्हें पूरा पढ़कर नहीं सुनाया है, और ना ही कभी सुनाउंगा, मैं नहीं चाहता कि वो जीते जी मर जाएँ। अब जो आपने दूसरा पत्र लिखकर उन्हें समझाने की सलाह दी है तो बाबू, इस पर मेरा उत्तर है कि समझाने की जरूरत यदि किसी को है तो आप को है न कि उन्हें। वो तो आप के पत्र का और आपके आने का हर घड़ी इंतज़ार कर रही होती हैं। यदि कोई झूठ भी कह देता है कि आप आ रहे हैं, तो दोनों काम-काज छोड़, गाँव के मुहाने तक दौड़ती-भागती आ जाती हैं। आप चिंता मत करिए। आपकी अम्मा और बहन बड़ी खुद्दार औरतें है। ईश्वर ऐसी माँ-बहन सबको दें। आप गाँव आया करें। डरें मत। हाँ माँ और बहन के पास कलक्टर बनकर नहीं, बेटा और भाई बनकर आइये। ईश्वर ने रुपिया के लिए भी किसी को अवश्य ही भेजा होगा। ये बात और है कि अभी हमलोग उन तक पहुँचे नहीं हैं। हाँ आप दुनिया में भले ही किसी नाम से जाने जाते हों, गाँव वालों के लिए लराइन ही हैं और लराइन ही रहेंगे। अगले पत्रों में अपना यही नाम लिखिएगा। आज लगा ही नहीं कि किसी अपने का पत्र पढ़ रहा हूँ। शायद आपकी बहन आपके लिए सिर्फ एक बोझ है, जिसको उठवाने का कुलीभाड़ा पाँच लाख है, पर आपकी बहन आपसे कुछ नहीं चाहती, वो आप पर गर्व करती है। उसे ऐशो -आराम की भी आदत नहीं है, इसलिए उसे अमीर वर की तलाश नहीं है। वह तो दिया है, जहाँ रख दो वहीं प्रकाश फैलाने लगती है, उसे इस बात की भी परवाह नहीं की उसकी सहेलियाँ सालों पहले अपने ससुराल चली गईं, अब किसी शादी-ब्याह या पर्व-त्योहार में ही अपने पति और बच्चों के साथ आती हैं। उसने अपने से दस-दस साल छोटी सहेलियाँ बना ली है और उन सबके साथ बहुत खुश रहती है। लराइन बाबू, गाँव में जहाँ सोलह-सत्रह साल तक सारी लड़कियाँ ब्याह दी जाती हैं, रुपिया का तेईस की उम्र में भी कुंवारी रहना तुम्हारी अम्माँ के लिए,चौबीस घंटे कायम रहने वाली पीड़ा बन गयी है ,और गाँव वालों के लिए, चर्चा, आलोचना हंसी और टीका-टिप्पणी का विषय। पर आश्चर्य है कि रुपिया हर वक्त हँसती-खिलखिलाती रहती है। न उसे भैया से कोई शिकायत है, न अम्मा-बाबूजी से, न ही अपनी उम्र से। भैया के खिलाफ माँ या गाँव वाले कुछ भी कहें वह तुरंत चुप करा देती है। मेरे भैया को कुछ मत कहना। एक दिन कुएं पर औरतें पानी भर रही थीं, मैं उधर से गुजर रहा था, पड़ोस की भाभी ने रुपिया से ऊँचे स्वर में कहा (ताकि मैं सुन लूँ ) – रुपिया दीदी, तेरे भैया सौ- दो- सौ खर्च होने के डर से राखी और भाई दूज पर भी नहीं आते, फिर लाखों खर्च कर तुम्हारी शादी कहाँ से करेंगे। मेरी मानो तो किसी दुहाजू के घर बैठ जाओ। भाई के खर्चा भी नहीं होगा और तुम्हारी गोटी भी सेट हो जाएगी। मुझे लगा कि सुरेश की बीबी से कुछ कहूँ, पर ऐसे गुजर गया जैसे कुछ सुना ही न हो। लेकिन तभी मुझे रुपिया की खिलखिलाहट सुनाई दी। खूब हंस कर बोली भौजी, तुम्हारी गोटी तो सेट है, न। सुरेश भैया दुहाजू भी नहीं हैं, और तुम्हारे बाबूजी ने कसकर दहेज भी दिया है। तुम अपने सुख से खुश रहो, मेरे लिए खून मत जलाओ, और रही मेरे भैया की बात, तो आजतक तुम्हारे खानदान में कोई हुआ है, कलक्टर। मैं तो दुहाजू क्या तिहाजू के घर भी जाऊँगी, तो रहूँगी कलक्टर की बहन। मेरी चिंता छोड़ दो भौजी, मैं कमाकर खा सकती हूँ, दस को खिला सकती हूँ। बाबू, रुपिया की बातें सुनकर लगा कितनी सुलझी हुई है ये लड़की। आप एक अच्छा लड़का देख उसका ब्याह कर दीजिये, थोड़ा गरीब हो तो भी वो सामंजस्य बैठा ही लेगी। लराइन बाबू कुछ ज्यादा लिख गया हो, तो अन्यथा मत लेना। हाँ बस इतना याद रखना कि तुम्हारी माँ और बहन तुम्हें बहुत याद करती हैं, तुम्हारा इंतज़ार करती हैं, तुम्हारे सिवा उनका कोई भी नहीं है। विशेष मिलने पर-
शुभेक्षु,
चंद्र्किरण ……
इस पत्र को भेजने के दस दिन बाद ही,सुबह के लगभग आठ बजे चंद्रकिरण बाबू ने देखा कि लराइन की अम्माँ दौड़ती-भागती, उड़ती सी चली आ रही हैं, कल – तक एक-एक कदम ऐसे रखती थीं,जैसे पाँव उठ ही न रहे हों, और आज तो पाँव ज़मीन पर जैसे पड़ ही नहीं रहे हैं,चेहरे से खुशी टपक रही है, उनकी बातों से पता चला कि लराइन बाबू सुबह पाँच बजे आए हैं, यही खुश-खबरी देने वो इनके पास आई हैं,बेटे के आते ही वो बहुत व्यस्त हो गयी हैं,फिर भी उन्हें यह खुशखबरी देने आई हैं, क्योंकि पूरे गाँव में एक वही तो हैं,जिन्हें इनकी खुशियों से जलन नहीं होती,और इनके दुखों पर हँसी नहीं आती। चंद्र्किरण बाबू ने गौर से उनके चेहरे को देखा – कहीं भी बेटे के प्रति किसी शिकवा-शिकायत के लिए रत्ती भर स्थान नहीं था। वो अपने पुराने शब्द पूरी तरह भूल चुकी थीं,जिनमें उन्होंने बेटे के प्रति अविश्वास प्रकट किया था। कहने लगीं
–“ अभी हमरा दूध-दही,तरकारी सबके इंतजाम देखे खातिर जाय पड्तेक।”
-“हाँ चाची आज तो सचमुच कुछ खास भोजन होना चाहिए,क्योंकि आज घर का खेनहार जो आया है”
-“हाँ मस्साब ! अपने ठीक बोलै छहो” ऐसा कहते हुए वह तेजी से निकल गयीं। उन्हें मास्साब के खेनहार शब्द में छिपा व्यंग्य नहीं दिखा,क्योंकि इस गाँव की परम्परा ही ऐसी थी कि घर के पुरुष सदस्यों को खेनहार अर्थात् खाने वाला तथा स्त्री सदस्यों को भनसिया अर्थात् रसोई बनाने वाली कहा जाता था, जब पुरुष सदस्य घर में नहीं होते थे,तो स्त्रियाँ कुछ भी खाकर गुजारा कर लेती थीं,जाने क्यों सारी गरीबी की मार स्त्रियों पर ही पड़ती थी,और इसमें किसी को कुछ भी बुरा या गलत नहीं लगता था, स्त्रियों को भी नहीं, क्योंकि परम्पराओं की घुट्टी, उन्हें बचपन में ही पिला दी जाती थी, और दूध की जगह मांड, जौ या मक्के के आटे की लेई आदि पीकर बड़े होने की आदत डाल दी जाती थी,दूध और दही तो पिता और भाइयों के लिए संभाल कर रखा जाता था। महिला सदस्यों के बीच भी भेद-भाव का रिवाज था, मायके में भाभी के आने पर,ननद का स्थान थोड़ा ऊपर हो जाता था क्योंकि सबसे निचले स्थान पर भाभी आ जाती थी,जो बहू जितनी छोटी होती थी,उसका स्थान उतना नीचे होता था, ससुराल जाते समय बेटी को यह भी समझाया जाता था कि ससुराल जाकर वह खुद को सबसे निचले पायदान पर रखे, और जब घर के पुरुष तथा बड़ी महिला सदस्य खा चुकें, तब वह बचा-खुचा खाना खा ले, और यदि खाना कम पड़ जाए तो पानी पीकर संतुष्ट हो जाए। कई बार चंद्रकिरण बाबू को लगता है कि इस गाँव में ही क्यों,पूरे विश्व के तमाम समाज में,जाति,नस्ल,वर्ग,धर्म तथा लिंग के आधार पर भेद-भाव की इस सीढ़ी का अस्तित्व किसी न किसी रूप में मौजूद है। बहरहाल,आज लराइन की माँ और बहन उनके गाँव आने से बहुत प्रससन्न हैं,और चंद्र्किरण बाबू का मन भी हल्का सा हो गया है, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि ये उनके पत्र का असर है,आखिर लराइन बाबू उनके पहले शिष्य हैं, और वे उनके पहले गुरु। भले ही लराइन बाबू के मन में बड़ा अफसर होने का गुरूर आ गया हो,पर फिर भी अपने पहले गुरु की बातों का उन्होंने मान रखा।ऐसा सोच वे मन ही मन प्रसन्न हुए, तथा अपने शिक्षक होने पर उन्हें गर्व सा महसूस हुआ,एक यही तो उपलब्धि है एक शिक्षक की, कि ऊँचे से ऊँचे ओहदे का व्यक्ति भी उसकी इज्ज़त करता है, उसके शब्दों का मान रखता है।
शाम में लराइन की अम्माँ ने आकर आग्रह किया कि आज रात का खाना वे उनके घर लराइन बाबू के साथ खाएँ। रात के भोजन का निमन्त्रण स्वीकार करने का अर्थ होगा,उन पर अतिरिक्त बोझ डालना,हालांकि उनकी यह सहृदयता उन्हें भली लगी, तो उन्होंने सोचा कि कुछ इस तरह से मना किया जाय कि लराइन की माँ को बुरा भी न लगे और उनपर अतिरिक्त भार भी न पड़े, अतः मास्साब ने अत्यंत प्रेम से कहा कि वो खाना बना चुके हैं, और यदि वे उनके घर खाना खाने जाएँगे तो बेवजह यहाँ का खाना खराब होगा। हाँ उन्होंने यह अवश्य कहा कि वे लराइन बाबू से मिलने के लिए रात के खाने के बाद आएँगे। खाना बना चुकने की बात मास्साब ने झूठ बोली क्योंकि वो भली-भाँति जानते हैं कि अच्छे भोजन की व्यवस्था उधार लेकर हो रही होगी। एक से एक बढ़िया भोजन जब तक बेटा रहेगा,ये बनाती रहेंगी। बेटे के प्रेम में उन्हें यह नहीं दिखेगा,कि उनके सिर पर उधार का बोझ और कितना बढ़ गया। दुनिया की तमाम खाने वाली चीजें वे भले बेटे को न खिला सकें पर वे चीजें तो अवश्य ही खिलाएंगी, जो स्वयं बनाना जानती हैं। लराइन इस बात की परवाह एक बार भी नहीं करेगा कि माँ इतना सबकुछ कैसे और कहाँ से जुटा रही है। उसे ऐसा लगता है कि माँ के पास कोई गड़ा खजाना है, जिसके धन का उपयोग वह सिर्फ अपने हाथों से करती है,बेटे को उसका पता नहीं बताती है। लराइन बाबू के जाने के बाद वे किसी का उधार पैसे देकर चुकाएंगी, तो किसी का श्रम देकर। शायद एक का उधार चुकाने के लिए वह दूसरे से उधार भी लेगी,और सारे उधार चुकाने के लिए उसे अत्यंत कठिन परिश्रम करना पड़ेगा। हाँ,पर यह निश्चित है कि यह अच्छा भोजन सिर्फ बेटे के लिए बनाकर वह अपनी बचत-योजना को जारी रखेंगी,माँ-बेटी इन दिनों भी मक्की की रोटी नमक के साथ खाती रहेंगी,माँ और बहन क्या खाती-पीती, पहनती-ओढ़ती हैं,ये जानने की कोशिश लराइन बाबू ने न पहले कभी की है,न अब करेंगे। आज भी लराइन की माँ और बहन दो साड़ियाँ पहनने के लिए रखती हैं, जिनमें से एक को धोती हैं तो दूसरी को पहनती हैं, बाहर जाने के लिए माँ और बेटी के पास एक-एक साड़ी है। घर में चाहे कितनी भी गरीबी आई, लराइन के लिए हमेशा सबकुछ जुटाया जाता रहा। उसे कभी किसी चीज का अभाव नहीं होने दिया गया,और इसका परिणाम यह हुआ कि उसने स्वयं को विशेष महत्वपूर्ण समझ लिया तथा अत्यधिक स्वार्थी हो गया, उसने यह मान लिया कि घर के बाकी सदस्य सिर्फ और सिर्फ उसकी सेवा के लिए हैं, पिता की मृत्यु के बाद तो उन्हें यह भी संदेह था कि पिता ने बेटे से छुपा कर जमा किया हुआ धन इन माँ-बेटी को दिया है, माँ और बहन उनके सामने साधारण कपड़े पहन कर गरीबी का नाटक करती हैं, ताकि उससे पैसे झटक सकें,पर उसने भी कोई कच्ची गोलियाँ नहीं खेली हैं,जो इनकी बातों में आकर इन्हें पैसे दे दे। उसने पता कर लिया है कि माँ और बहन ने मिलकर रामअधीन के पचासी मन धान उबाले थे, जिसकी मजदूरी में उसने तीन मन धान दिया था, जरूर उस धान को बेचकर माँ और बहन ने पैसे बनाए होंगे। रोज के कूटने-पीसने के हर घर के पाँच किलो मान लिया जाए, तो भी इतना अनाज इनके पास अवश्य आता होगा, कि खाने के अलावा बाकी अनाज ये बेचती होंगी और पैसे इकट्ठे करती होंगी।
बच्चों के सो जाने के बाद उन्हें ठीक से रज़ाई ओढ़ाकर, चंद्रकिरण बाबू एक मोटी चादर ओढ़कर बाहर निकले, बाहर से कमरे की कुंडी बंद की और लराइन बाबू से मिलने के लिए चल पड़े। जगदीश बाबू के घर से पहले मकुन बाबू का घर पड़ता था,उधर से गुजरते हुए उन्हें परेमिया की आवाज सुनाई पड़ी,किसी से बात करते हुए उसने दो-तीन बार मस्साब-मस्साब कहा, अपनी चर्चा सुन कर उनके पाँव ठिठक गए
-“मस्साब भले इन्सान हैं, उनके साथ तू खुश रहेगी”
-“मस्साब पहले तैयार हों तो मैं, खुशी –नाखुशी की सोचूँ” अगली आवाज रुपिया की थी।
-“ठीक है,मानती हूँ,उन्होंने हाँ नहीं कहा है,पर ना भी तो नहीं कहा है।चाची ने मुझे बताया कि मस्साब चुप ही रहे,कोई जवाब नहीं दिया। मुझे लगता है कि वो सोच-विचार कर उत्तर देंगे,उनके भी तीन बच्चे हैं,उनके मन में संदेह होगा कि सौतेली माँ बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार करेगी या नहीं पर देखना एक दिन वो हाँ कहेंगे,क्योंकि सोच-विचार कर वो यही तय करेंगे कि एक तो रुपिया सौतेली माँ जैसा व्यवहार नहीं करेगी और बच्चों को ठीक से ही रखेगी दूसरे ज्योति की परवरिश के लिए माँ को होना ठीक रहेगा। ”
कमरे की खिड़की खुली होने और रात की नीरवता होने के कारण बातचीत स्पष्ट सुनाई दे रही थी, हालांकि उनके मन ने धिक्कारा कि छुप कर बातचीत सुनना, अपराध है, विशेष रूप से स्त्रियों की बातचीत। परंतु मन के धिक्कारने के बावजूद बातचीत सुनने से वे स्वयं को रोक नहीं पाये। बातचीत रुपिया और मकुन बाबू की बड़ी बेटी परेमिया जो रुपिया की सबसे गहरी सहेली है और इन दिनों मायके आई हुई है, के बीच चल रही थी।
-“तू एक काम कर, मस्साब को एक स्वेटर बुन कर दे, और पैसे मत लेना, चाहे वो पैसे देने की कितनी भी कोशिश करें,इससे उनका दिल जरूर पसीझेगा।”
-“ना परेमिया हम बहुत डरते हैं उनसे,हमसे नहीं होगा।”
-“तू और डर ? तू कबसे डरने लगी ?”
परेमिया ज़ोर से खिलखिला कर हँसी।
-“हमने तो नहीं देखा तुझे कभी किसी से डरते ?”
-“इसका मतलब है तू प्रेम करती है मस्साब से ? इसलिए उनसे तुझे डर लगता है। उनके सामने जाने की तेरी हिम्मत नहीं होती है।”
– “परेमिया परेम-वरेम का तो पता नहीं,पर उनसे बात करने का हिम्मत हम में नहीं है।”
-“तू कहे तो मैं तेरे लिए उनसे बात करूँ”
-“ना ! मुझे मेरे हाल पर छोड़ दे परेमिया।”
-“हाँ तू तो कहेगी छोड़ देने के लिए, तेरे लिए आएगा न घोड़े पर बैठ कर राजकुमार ? देख मस्साब की उमर पर मत जा, उनके विचार देख, वैसे भी कौन सा कोई जवान लड़का आने वाला है तेरे लिए।”
-“आज भैया कहा है कि एक लड़का से बात किए हैं, सरकारी दफ्तर में किरानी है, सत्ताईस साल उमर है, देखने में भी अच्छा-भला है, कल आएगा हमको देखने।”
-“तभी खुद को रानी-महारानी समझ के बैठ गयी है। दहेज कितना लेगा ? भैया तैयार है दहेज देने के लिए ? पर एक बात कहूँ रुपिया, तेरे भैया पर हमको रत्ती भर भरोसा नहीं है। आज तक कभी उसने तेरा भला सोचा है जो आज सोचेगा।”
-“भैया बोला है कि उसको दहेज का लालच नहीं, बस ऐसी लड़की चाहिए जो उसके माँ-बाप की सेवा करे, तो भैया ने कहा कि मेरी बहन बहुत सेवा करेगी। सुन ! तू कल आ जाना, थोड़ा मुझे अच्छे से तैयार कर देना।”
-“हाँ ! रुपिया,हम आ जायेंगे,और अपनी गुलाबी सिलक की सड़िया भी ले आएँगे,जिसे पहन कर तू एकदम गुड़िया लगेगी।”
-“ना, परेमिया सड़िया त हम अपनी ही पहिरेंगे, चाहे जैसी भी सही, कल को शादी के बाद कहेगा कि ऊ दिन वाली गुलाबी सिलक कि सड़िया पहिरो तो हम का जवाब देंगे, बता ?”
-“हम अपनी रुपिया के लिए एक साड़ी नहीं छोड़ सकते का ? बस तेरा बियाह पक्का हो जाए,हमरे लिए इससे खुशी की बात तो कोई हो ही नहीं सकती,पर हमको तुम्हारे भैया पर भरोसा नहीं, भरोसा है तो मस्साब पर, देखना हमार दिल कहता है, तेरा बियाह आज हो, कल हो मस्साब से ही होगा, कल वाला लड़का तुझे पसंद भी कर ले तब भी, भैया से सब बात खोद-खोद कर, पूछ कर जान लेना। कहना उसके माँ-बाप को भी बुलाओ। हरबड़ी वाली शादी अच्छी नहीं होती।”
-“अच्छा परेमिया,ये ले रख, तैयार हो गया तेरे दूल्हे का स्वेटर। अब हम जा रहे हैं।”
-“ठीक है रुपिया,कल आऊँगी।स्वेटर के पैसे भी ले आऊँगी। पर सावधान रहना, तेरे भैया……..”
-“चुप कर परेमिया, वो मेरा भाई है दुश्मन नहीं”
-“ ठीक है, तेरा भाई है,पर दुश्मन से कम भी नहीं है,ध्यान रखना,ये पूछा कि लड़का कुंवारा है कि दुहाजू, और यदि दुहाजू है,तो फिर उससे अच्छे तो मस्साब ही हैं।”
-“ये तो न अम्माँ ने पूछी, न भैया ने बताई,पर हमरी समझ में ई नईं आ रहा कि हर बात में तू मस्साब को क्यूँ घुसा रही है। वो कौन सा हमसे ब्याह करने को तैयार बैठे हैं”
-“चल उनकी छोड़, तेरी बता,तू तैयार है मास्साब से बियाह करने के लिए ?”
-“परेमिया……, सच त ई है,कि हम बियाह करने से ही घबराते हैं, काहे त अम्माँ को छोड़ के हम नहीं जाना चाहते,हाँ मस्साब से बियाह होता, तो अम्माँ से दूर नईं जाना पड़ता।”
-“ मतलब ! कि तू मस्साब से……….हा हा हा .. रुपिया, एक बार सीधे मुँह मस्साब से बात काहे नईं करती है। मना कर देंगे तो हम अपनी ससुराल में तुम्हरा खातिर अइसन लड़का खोजेंगे,जो तुझे अम्माँ के पास आने और रहने से न रोके। एक बार मस्साब मेरी ससुराल में एक लड़के वाले के यहाँ तेरे रिश्ते की बात करने गए थे, उन लोगों ने उनसे कुछ उल्टी-सीधी बात की, मुझे जब पता चला तो बहुत बुरा लगा। अब देख न ! तेरा भाई कहीं जाता नहीं और मस्साब गए तो लोगों ने गलत मतलब निकाला,अब तेरे रिश्ते की बात कहीं बने तो कैसे,और कल जो लड़का आने वाला है,उसके बारे में तो कुछ नहीं जानती है तू। यदि तुझे कल को वो धोखा दे दे तब का होगा रुपिया ? शहर में तो आए दिन ऐसी-वैसी घटनाएँ होती रहती है। मेरा मन धुक – धुक कर रहा है। देख मस्साब को हमलोग ठीक से जानते-समझते हैं। उनको एक बार ई बता दे कि तेरे लिए उनसे अच्छा संसार में कोई और नहीं हो सकता,ठीक है। समझ आया कुछ, और कह तो मैं जाकर बात कर आऊँ।”
-“परेमिया, मेरी चिंता छोड़ दे बहन ! जो भाग में बदा होगा, होगा। अम्माँ मस्साब से पूछ चुकी है,और उनकी तरफ से लंबी चुप्पी है, फिर का करूँ। कोई किसी से जबरदस्ती ब्याह करता है का। बोल ?”
इतने में रुपिया……… रुपिया………… रुपिया के अम्माँ के पुकारने की आवाज आई।
-“ देर होने के कारण अम्माँ परेशान हो रही है, अब जाने दे परेमिया”
जब रुपिया बाहर निकली,और परेमिया भी उसे कुछ दूर छोडने के लिए साथ में निकली, तो चंद्र्किरनबाबू पुआल के ढेर के पीछे छुप गए। थोड़ी देर बाद जब रुपिया और परेमिया अपने-अपने घर चली गईं, तो चंदरकिरण बाबू पुआल के ढेर से बाहर निकले और धीरे-धीरे जगदीशबाबू के घर की ओर चल पड़े। अंदर जाकर देखा कि लराइन बाबू कम्बल ओढ़कर बैठे हैं, अम्माँ और रुपिया भी उनके पास ही बैठी है। मस्साब के आने पर रुपिया उठ कर खड़ी हो गयी, लराइन बाबू ने बैठे-बैठे ही नमस्ते की, और उनके बैठने के लिए जगह बनाने के लिए थोड़ा सा खिसक गए। दो घंटे तक इधर-उधर की बातें होती रही,पर अभी तक लराइन बाबू ने कल के कार्यक्रम का जिक्र नहीं किया था, यह भी नहीं बताया कि किसी से रुपिया के रिश्ते की बात उन्होंने की है। जब चंद्र्किरण बाबू जाने के लिए उठने को हुए, तो लराइन की अम्माँ ने कहा कि
-“मस्साब ! कल शाम में आई जईहो, एगो लड़का आई रहल है,रुपिया के देखे खातिर ! मस्साब तोहूँ दुनिया-जमाना देखने छहो, एक नज़र लड़का के देख के अपन विचार बतैहो, वैसे लराइन के त लड़का बहुत पसीन है, तोरो पसीन होइ जाय,त हम निश्चिंत होइ जाइब। हम त ठहरली मुरुख ! तोरे आओर लराइन के विचार, हमरो विचार, बाकी रुपिया के भाग।”
-“ठीक है चाची”
पर, चंद्र्किरनबाबू ने देखा कि लराइन बाबू के चेहरे पर क्रोध के भाव स्पष्ट रूप से दिख रहे हैं। वो शायद नहीं चाहते थे,कि अम्माँ मस्साब को ये बात बताए। आगे किसी ने कुछ नहीं कहा। मस्साब चुपचाप वापस आ गए। रास्ते से लेकर बिस्तर तक, रुपिया,परेमिया और लराइन की अम्माँ की बातें उनके मन में घूमती रहीं,फिर उन्हें कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला।
अगले दिन शाम में, चंद्रकिरनबाबू उधेड़ – बुन में थे कि लराइन बाबू के यहाँ जाएँ या नहीं, जाने से लराइन बाबू नाराज़ होंगे,और नहीं जाने से उसकी अम्माँ निराश होगी। और रुपिया ? रुपिया की स्थिति से तो वो अनभिज्ञ ही हैं। पर स्वयं उनकी अपनी स्थिति ? क्या रुपिया के लिए उनकी उपेक्षा उचित है ? यदि उन्हें लगता है कि वे रुपिया से बीस साल बड़े हैं, और उससे विवाह कर लेंगे तो उसके साथ अन्याय हो जाएगा, तो बाकी सब जो उसके साथ होता रहा है, क्या वो न्याय है, और यदि रुपिया की खुशी उन्हीं से विवाह करने में हो तब ? रुपिया की खुशी या मजबूरी ? रुपिया के लिए कौन सा कोई राजकुमार तलाश कर ला रहा है ? जब कोई है ही नहीं तो बूढ़ा मास्टर ही सही वरना रुपिया जैसी सुंदर युवती तीन-तीन बच्चों के पिता की ओर पलट कर भी क्यों देखती भला ? काफी उधेड़ –बुन के पश्चात उनके पाँव जैसे स्वतः लराइन बाबू के घर की ओर चल पड़े। आँगन में एक खटिया पर लराइन और लड़का बैठे थे, दूसरी पर लराइन की अम्माँ, रुपिया और परेमिया थे। पाँच-पाँच लोग बैठे थे पर इतनी चुप्पी थी, जैसे यहाँ कोई मातम मनाने को इकट्ठा हुए हों। मस्साब को देखते ही लराइन की अम्माँ ने कहा कि
-“मस्साब, बहुत देर लगाय देलहो।”
-“हाँ ! चाची, कुछ काम था, अब आ तो गया न। आदेश करिए।”
-“का आदेश मस्साब ! जा अपन काम देखहो। हमरा तरफ से ई बात खतम। ई बात त हम बेटा और किरानी बाबू के सामने कहब। बाद के बाद में देखल जाई।”
लड़के की तरफ देखा तो लड़के ने शालीनता से नमस्कार किया, इन्होंने भी नमस्कार का जवाब दिया। चंद्र्किरन बाबू की समझ में कुछ नहीं आया। इतना खूबसूरत और शालीन लड़का ऊपर से शहर में नौकरी, विचार ऐसे ऊँचे कि दहेज की माँग नहीं, चाची को आखिर हो क्या गया है ? इन्होंने मन में बैठा लिया है कि लराइन जो करेगा वो माँ-बहन के लिए गलत ही करेगा। तभी कहते हैं कि शक का कोई ईलाज नहीं है। पर, ये लड़का अकेले आया है, कहीं ये भी अनाथ तो नहीं ? पर, अनाथ होने से यदि लराइन की अम्माँ को गुरेज होता तो वो मेरे लिए कैसे सोच रही थी। सचमुच कोई वजह है या लराइन की अम्माँ का बेटे पर ऐसा अविश्वास है कि उसे बेटे की अच्छी कोशिश भी बुरी लग रही है। क्या किया जाय, रुकना ठीक रहेगा, या वापस जाना। यही सब सोचते हुए वे आकर लराइन बाबू और लड़के के बीच में बैठ गए और पूछा
-“आप अकेले क्यों आए बाबू ? साथ में और लोगों को भी लाना था न। घर में कौन-कौन हैं?”
-“घर में सभी हैं।”
-“फिर अकेले आए हैं ? किसी को साथ लाना ज्यादा अच्छा रहता। ऐसे एक बार आप लड़की को देखोगे, फिर घरवाले, सब एक साथ देख लेते तो निर्णय आसान हो जाता।”
इसी बीच लराइन की अम्माँ, रुपिया और परेमिया भीतर चली गयी थीं।
थोड़ी देर की चुप्पी के बाद लड़के ने कहा
-“इसका उत्तर मैं बता चुका हूँ। अब बार-बार क्या बताऊँ। मैं चलता हूँ। लराइन बाबू ने कहा था कि निर्णय वही लेंगे, थोड़ी देर पहले पता चला कि माताजी का निर्णय ही अंतिम होगा, अब पता चल रहा है कि निर्णय में आप का भी हस्तक्षेप होगा। आपलोग पहले यह तय कर लें कि निर्णय कौन लेगा, उसके बाद ही इस पर विचार करिएगा कि क्या निर्णय होगा। जहाँ तक मेरी बात है तो जैसा मैं ने लराइन बाबू से कहा था, उसी पर अडिग हूँ। वैसे तो आपकी लड़की अच्छी-भली है, अगर नहीं भी होती तो भी यदि आपलोगों को मेरी शर्त मंजूर होती तो इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ना था। मुझे अफसोस है कि आपलोगों की तरफ से जिसे देखो वही गार्जियन बना हुआ है, जब इतने गार्जियन हों तो क्या काम होगा। ये तो वही बात हो गयी कि “अधिक बाबाजी, मठ उजाड़”
चंद्र्किरणबाबू को झटका सा लगा। थोड़ी देर पहले जिसने पूरी शालीनता से मुस्कुराकर नमस्कार किया था,उसकी भाषा उनके पूरे शरीर में जैसे वरमे से सुराख़ कर रही है। सचमुच कोई बड़ी गड़बड़ लगती है। ये लराइन कैसे लड़के को बुलाकर ले आया है। शर्तों पर कहीं जीवन भर के रिश्ते जोड़े जाते हैं। आखिर कोई भी माँ शर्तों के अधीन अपनी बेटी के भविष्य को दाँव पर लगाना स्वीकार कर सकती है ? पर, पूरी बात समझे बिना क्या कहा जा सकता है ? तभी लड़का उठा,उसके पीछे लराइन बाबू भी उठे, और दोनों बाहर निकल गए। ऐसा लगा कि वो लराइन बाबू पर बिगड़ रहा है और लराइन बाबू भी पलट कर जवाब दे रहे हैं,पर क्या बातें हो रही है, ये स्पष्ट नहीं हो पा रहा था। दोनों में खूब देर तक जोरदार बहस चलती रही। चंद्र्किरणबाबू को बीच में जाना उचित प्रतीत नहीं हुआ। फिर टैक्सी स्टार्ट होने की आवाज आई, और उसे छोडकर थोड़ी देर बाद लराइन बाबू वापस आँगन में आए, और चंद्र्किरणबाबू की उपेक्षा करते हुए ऐसे भीतर चले गए, जैसे आँगन में कोई बैठा ही न हो। उन्होंने भी अब वापस जाना ही उचित समझा।
अगले दिन रविवार था, इसलिए चंद्र्किरण बाबू को फुर्सत ही फुर्सत थी। दोपहर तक लराइन की अम्माँ और रुपिया दिखाई नहीं पड़ी, चंद्र्किरण बाबू को थोड़ी चिंता हुई, कहीं दोनों बीमार तो नहीं हैं, मन में आया कि जाकर हाल पूछ आऊँ, हालांकि कल लराइन बाबू ने उनकी जैसी उपेक्षा की थी, उसके बाद जाना ठीक लग नहीं रहा था, पर मान-अपमान से ऊपर उठकर वो चाची और रुपिया की खैरियत जान लेना चाह रहे थे। अभी उनके मन में उधेड़-बुन चल ही रहा था, इतने में देखा कि रुपिया धुले हुए कपड़ों से भरा एक बड़ा कठौता सिर पर रखे हुए, दूसरे हाथ में पानी से भरी हुई रस्सी लगी बाल्टी लिए कुएँ की तरफ से घर की ओर चली आ रही है। मन में आया कि उसे रोककर सारी बातें पूछ लूँ, पर न जाने क्यूँ फिर रुक से गए, जैसे पूछने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहे हों। मन ने खुद से सवाल किया
-“कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं रुपिया से प्रेम करता हूँ, और इसीलिए उसके पास जाते डरता हूँ, कि कहीं वो मेरी आँखों को पढ़ न ले।” फिर मन ने ही उत्तर भी दे दिया
-“ हाँ, रुपिया से बहुत प्रेम करता हूँ,और इसीलिए चाहता हूँ कि वो जीवन में सुखी रहे, किसी हमउम्र लड़के से ब्याही जाए,न कि मेरे जैसे बूढ़े से।”
चंद्र्किरण बाबू के मन में रुपिया के लिए कोमल भाव बढ़ते ही चले जा रहे हैं, पर यह ठीक से स्पष्ट उन्हें भी समझ नहीं आ रहा कि यह विशुद्ध प्रेम है, दया है, आदर है, श्रद्धा है या मानवता के नाते सहानुभूति या फिर नारी के सामीप्य की वह आदिम ईच्छा जिससे ऋषि-मुनि भी नहीं बच पाते, या कहीं उनके मन में अपने उजड़े हृदय और आँगन को फिर से हरा-भरा बना लेने का लोभ तो नहीं जाग रहा है।
-“नमस्कार मस्साब” किसी की आवाज से उनकी तंद्रा टूटी, तो देखा कि जमींदार बाबू हैं, उन्हें नमस्कार कर वे रुके नहीं, बल्कि लराइन बाबू के घर की ओर जा रहे हैं, आखिर बात क्या हो सकती है ?
कुछ ही देर बाद रुपिया आ गयी थी,और पहली बार उनसे प्रत्यक्ष रूप से बोली थी
-“मास्साब, भैया जमींदार को घर बेच रहा है, कह रहा है कि हमको और अम्माँ को अपने साथ ही ले जाएगा। पर, ई बात सुनते ही अम्माँ गुस्से से पागल हो गयी है। कहती है कि उ ऐसा नहीं होने देगी। भैया की जिद है कि इस पैतृक घर पर सिर्फ उसी का अधिकार है । अम्माँ कह रही है कि घर बेच दिया तो उ जीते जी मर जाएगी। उनका कहना है कि भैया का अब और कुछ नहीं बचा है हियाँ। उ तो कह रही है कि तू बेटा नहीं कसाई है, और केतना लेगा तू हमसे। पहले सारा खेत वापस दिलवा, उसके बाद घर पर दावा करना। तुझे घर बेच कर अपना फ्लैट खरीदने की चिंता है, तो हमरा भी रुपिया के बियाह के चिंता है। और भी जाने क्या-क्या अम्माँ बोलती ही चली जा रही है । ”
-“तू क्या चाहती है रुपिया”
-“मस्साब आज ज़िंदगी में पहली बार किसी ने हमसे पूछा है कि हम क्या चाहते हैं। हम तो ये कभी सोचे भी नहीं थे कि कोई हमसे भी ई बात पूछेगा। हम चाहते हैं कि आप चलके भैया को समझाओ। हम…. हम ई घर को बिकने नहीं देना चाहते मास्साब, पहिली बात ई घर में भैया का और हमार जन्म हुआ, दूसरी ई घर बाबूजी की अमानत है तीसरी हम भैया के पास जा कर कितने दिन रह पायेंगे। बहुत जल्दी हम उन्हें बोझ लगने लगेंगे। हम यहीं रहेंगे,यहीं………………..
मास्साब अम्माँ कह रही है कि उ पंचायत बुलाएगी, उहाँ फैसला नहीं हुआ और जरूरत पड़ी तो उ अदालत भी जाएगी।”
मास्साब हक्के –बक्के थे। रुपिया को देखे और सुने जा रहे थे।
-मुस्कुराकर कहा
-“रुपिया कलक्टर असल में तुझे बनना चाहिए था। देश का भला भी वही कर सकता है,जो मातृभूमि से जुड़ा हो।”
-“मास्साब, अइसन घरी में आपको मजाक सूझ रहा है, कहाँ हम अंगूठा छाप,और कहाँ कलक्टर । हमको तो लगता है कि हमरी किस्मत में विद्या है ही नहीं। जब आपने पढ़ाना शुरू किया था, तो थोड़ी सी उम्मीद जागी थी,शायद कुछ पढ़ जाऊँगी । पर……….”
रुपिया ने उनको लाजवाब – सा कर दिया था, विषय बदलते हुए उसे समझाने लगे
-“वैसे गाँव के रिवाज के मुताबिक कोई भी लड़की अपनी जन्मभूमि पर नहीं रहती,ज़मीन और घर भाई को ही मिलता है।”
-“हाँ, रहती तो नहीं है, पर उस जन्मभूमि को भाई इतना तो सँजो कर रखता ही है, कि बहन कभी भी आकर वहाँ सुस्ता सके, पर भैया तो हमसे उ सुख-चैन भी छीन लेना चाहता है। मस्साब गाँव के रिवाज के मुताबिक तो सोलह बरस में लड़की ससुराल भी चली जाती है।”
-“हो सकता है,शहर में ही लराइन बाबू तुम्हारा ब्याह करवा दें, और अम्माँ को तो रहना भी चाहिए बेटे के ही साथ। घर का गार्जियन पिता के बाद पुत्र ही तो होता है, वो जो सोच रहा है, तुम्हारे और अम्माँ की भलाई के लिए ही सोच रहा है। यहाँ अकेले रहने से अच्छा है कि तुमलोग वहीं उनके साथ रहो, अब भैया तो यहाँ आकर नहीं रह सकता न। तुम्हारे बाबूजी का भी तो यही सपना था कि बेटे के साथ शहर में रहेंगे। ”
-“मस्साब ! जो कल वाली बात नहीं हुई होती, तो हमको और अम्माँ को भैया के साथ जाने में तनिको संदेह नहीं होता, हम माँ-बेटी खुश ही रहते, लेकिन अब हम जान गए हैं कि भैया के पास पैसा जैसे-जैसे बढ़ता जा रहा है, उनका लालच भी बढ़ता जा रहा है।”
-“मस्साब उ जो लड़का कल आया था, पहिले से शादी-शुदा है, शहर की लड़की से कोट-मेरीज किया है, उसकी बीबी गाँव नहीं जाना चाहती, न सास-ससुर को अपने पास रखना चाहती है, इसलिए उसको पत्नी के नाम पर एक नौकरानी चाहिए जो उसके माँ-बाप की जिंदगी भर सेवा करे। उ माँ-बाप से कहेगा कि यही तुम्हारी बहू है। उसके माँ-बाप के मर जाने के बाद, वो घर बेच देगा, और नौकरानी को शहर ले आएगा, फिर वो उसकी और उसके बीबी – बच्चे की सेवा करेगी। ई ज़िंदगी भर की गुलामी के बदले उ भैया को दस लाख रुपैया देगा, जिसमें से पाँच लाख एडभांस दिया है, जब बात नहीं बनी तो उ जाते हुए भैया से लड़ रहा था, हमको और अम्माँ को डर है कि शहर ले जाकर भैया हमको जबरदस्ती उसके साथ भेज देगा। अब आप ही बताओ, कि जब गाँव आकर भैया हमको बेच रहा है, तो शहर जाकर क्या करेगा ? उ त हमरी किस्मत अच्छी थी, कि उ भैया से बोला कि हम लड़की से अकेले में बात करेंगे। उ हमको सब बात बता दिया, बोला कि जो कुछ भी तय हुआ है उ हमको भी जान लेना चाहिए, काहे त कल को हम कहीं ई जिद न पकड़ लें कि हमको अपने साथ शहर में रखे। हमसे बोला कि ई जान लो कि ई शादी नहीं सौदा ही है, फिर भी हम जिस भी लड़की से ई सौदा करेंगे, उसको बताकर करेंगे, काहे तो हम पुलिस, कोट-कचहरी के झंझट में नहीं पड़ना चाहते, और आजकल तो लड़की सब तुरंत अपने अधिकार खातिर कोट-कचहरी पहुँच जाती है। हम शादी नहीं शादी का नाटक कर रहे हैं, हाँ ! तुमको खाना-पानी लत्ता-कपड़ा का दिक्कत नहीं होने देंगे। तुम्हारे साथ हम ज़ोर-जबरदस्ती भी नहीं करेंगे, तुम खुशी-खुशी अपनी मर्ज़ी से हमारे साथ सोना चाहोगी, तो मना भी नहीं करेंगे, बच्चा चाहो या नहीं ई तुम्हारी मर्ज़ी, पर उसको हम अपनी संपत्ति में से कुछ नहीं देंगे, ई अभी से ही बताए देते हैं। उ चाहता है कि हम सब कुछ जान भी लें और अपनी गरीबी से समझौता करके ई सौदा भी कर लें। हमने जड़ खरीद गुलाम के बारे में सुना है, वेश्या के बारे में भी सुना है, उन चोरों के बारे में भी सुना है जो चोरी भी नियम-कायदे से करता है, ये आदमी नियम कायदे से चोरी करने वाला चोर है, जो मुझे जड़ खरीद गुलाम और वेश्या बनाने आया है, पर भैया को क्या कहूँ। अपनी बहन का सौदा करने वाला क्या कहलाता है,ये तो आप जानते हैं न ! भैया वही बनना चाहता है। हम मेहनत करके अपना गुजारा कर सकते हैं मस्साब, मगर ऐसा घिनौना सौदा नहीं कर सकते, मन में आया कि डंडे से पिटाई करूँ उसकी, पर असली गुनहगार तो भैया है न। जब हम अम्माँ को बताए त उ भैया का गला दबाने के लिए दौड़ी थी, बड़ी मुश्किल से हम भैया को अम्माँ की पकड़ से छुड़ा पाये। भैया को इस समझौते में कुछ भी गलत नहीं लग रहा है। कहता है कि दस घर काम करने से अच्छा है कि एक ही घर करे, और दुनिया की नज़र में नौकरानी नहीं बीबी कहलाए। अम्माँ ने उसके सामने ही कहा कि लराइन रुपिया को तो मैं किसी कीमत पर इसके साथ नहीं जाने दूँगी, अगर तुझे ये सौदा करना ही है तो अपनी औरत को उसको साथ भेज दे। भैया तिलमिलाकर रह गए। अम्माँ इस ग़म से उबरी भी नहीं थी, कि जमींदार आ गया और बताया कि भैया शहर से ही फोन पर ही उससे पंद्रह लाख में घर का सौदा कर चुका है, आज लिखा-पढ़ी होनी है, उसके बाद हमें ये जगह खाली करनी पड़ेगी। भैया को शहर में कोठी खरीदनी है, जिसके लिए लोन के अलावा भी पच्चीस लाख रुपये चाहिए, तो वो उस धुन में सही-गलत सब भूल गया है। कह रहा है गाँव में घर रखने की जरूरत नहीं है। अम्माँ और भैया में बहुत लड़ाई हो रही है। ”
मस्साब को काटो तो खून नहीं, लराइन इतना बड़ा आदमी होकर बहन को बेचने जा रहा है। इससे बढ़िया होता कि वो भी गाँव के अन्य लड़कों की तरह खेती-मजदूरी करता। गाँव में किसी ने भी बहन को नहीं बेचा है, चाहे कैसी भी भुखमरी झेलनी पड़ी हो।
-“मास्साब एक बार आखिरी बार आप भैया को समझाने की कोशिश कर लीजिए। बस ……
उसके बाद देखा जाएगा। कोट-कचहरी करना पड़ा तो उ भी करेंगे।”
मास्साब ने स्पष्ट महसूस किया कि रुपिया को उन पर गहरा विश्वास है। बिल्कुल वैसा ही भाव कि तुम्हारा साथ होगा तो हम सब से मुक़ाबला कर लेंगे।
-“रुपिया आजकल अदालत में भी उसी की सुनी जाती है, जो पैसे बहा सके, तू भैया से कहाँ जीत पाएगी। न गाँव की पंचायत में, न अदालत में।”
-“मास्साब हार के डर से हम पहले ही चुप नहीं होंगे। हम जानते हैं कि भैया से जीतना मुश्किल है,पर आप ये क्यों भूल रहे हैं कि आप रोज़ स्कूल में बच्चों को पढाते रहते हैं कि अपने अधिकार के लिए जरूर आवाज उठानी चाहिए।”
-“इतना सब हो जाने के बाद भी तुमने भैया के कपड़े धोये, क्योंकि जितने कपड़े धोकर तुम लौट रही थी, उतने कपड़े तो तुम्हारे और अम्माँ के पहनने, ओढ़ने और बिछाने के मिलाकर भी नहीं हो सकते।”
-“मस्साब सब आदत की बात है, बचपन से ही उसको आदत पड़ गयी, हुकुम चलाने की, और हमको उस पर चलने की। आदत तो न उसकी जाएगी जल्दी और न हमरी ”
-“फिर कैसे जीतोगी,भैया से ?”
-“काहे मस्साब आप हमलोग को सहारा नहीं देंगे का ?”
इतना बोल कर रुपिया चली गयी, उस अनपढ़ लड़की ने चंद्र्किरणबाबू को निरुत्तर कर दिया था। वे लराइन बाबू को समझाने जा ही रहे थे कि देखा वो टॅक्सी में बैठे वापस जा रहे हैं। माँ-बहन ने लगता है, उनकी हाँ में हाँ मिलाने से साफ मना कर दिया है। किसी भी शर्त पर वो दोनों अब झुकने को तैयार नहीं हैं। आगे बढ़कर हाथ हिलाया था चंद्र्किरण बाबू ने। टॅक्सी रुक गयी थी।
-“लराइन बाबू, वापस जा रहे हैं, क्या हुआ ? आइये बैठिए।”
-“बस! कीजिये मास्साब! आग लगा चुके हैं आप मेरे घर में। मेरे विरुद्ध मेरी माँ-बहन को भड़काकर। अब आप मेरे घर पर भी कब्ज़ा करने की सोच रहे हैं। मेरी बहन आपके कारण इतनी बदनाम हो चुकी है कि कोई उससे विवाह करने को तैयार नहीं है। न आप उससे विवाह करते हैं न उसका विवाह कहीं तय होने देते हैं, मुझे तो यह सोच कर घिन आती है कि आप जैसे नीच आदमी से मैं ने शिक्षा पाई, पर ईश्वर की कृपा रही कि आपकी बुराइयाँ मुझ में नहीं आई।”
-“हाँ लराइन बाबू, ईश्वर की कृपा तो सचमुच आप पर रही है, तभी तो सब आप की सेवा में लगे रहे हैं। यदि आपको मुझसे घिन आ रही है,तो मैं भी आप पर गर्व नहीं कर रहा हूँ ”
-“आप मुझ पर गर्व करें या शर्म मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, पर हाँ यदि आप मुझसे दहशत नहीं रखते तो आपको पछताना पड़ सकता है। घर में बन गयी है अब दो पार्टी, बताइए आप किसके साथ रहना चाहेंगे। यदि मेरी तरफ हैं, तो आपके तीनों बच्चों की पढ़ाई-लिखाई से लेकर अच्छी से अच्छी,कोचिंग, ट्रेनिंग और नौकरी वगैरह की जिम्मेदारी मेरी। आप चैन की वंशी बजाएँ, और यदि माँ की तरफ हैं तो आगे की दिक्कतों के लिए तैयार हो जाएँ।”
-“लराइन बाबू, आप बड़े पद पर पहुँच गए इसका यह मतलब नहीं कि आपकी शर्तों पर ही दुनिया चलेगी। एक अदना से अदना व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह अपने अधिकार के लिए लड़े। अपना जीवन अपनी शर्तों पर जिये। और जिसका साथ देना चाहे उसका साथ दे। मुझे परिणाम की परवाह नहीं, बल्कि उस इंसानियत का फर्ज़ अदा करना है, जो आपके माता-पिता से बोरा भर-भर कर मिला। आप जीत जायेंगे,तो घर आपका हो जाएगा, पर क्या आपको एहसास है कि आज आपने क्या खोया है।”
-“मस्साब भावुकता पागलपन है, मेरा इससे कोई वास्ता नहीं। आप यही कहेंगे न कि माँ का आँचल छूट गया,बहन कि राखी छूट गयी, इसी तरह की और भी बेमतलब की बातें, पर आप ही बताओ कि मैं ऐसी माँ-बहन के साथ कैसे निभाऊँ, जिन्हें मुझ पर भरोसा नहीं, जब मैं उन्हें कह रहा हूँ कि वो हमारे साथ रहेंगी, उन्हें हर तरह की सुख- सुविधाएँ उपलब्ध रहेगी, फिर भी उन्हें साथ जाने में दिक्कत है। मैं सब समझता हूँ,ये सब आपका किया-धरा है, आप मेरा घर हासिल करना चाहते हैं, हम सबको लड़ाकर, पर लाखों की संपत्ति यूँ ही नहीं लेने दूंगा किसी को।”
-“लराइन बाबू आइये, कुछ भोजन पानी ग्रहण कीजिये। अपने गाँव से भूखे-प्यासे और गुस्से में नहीं लौटते।अंदर चलकर ही सारी बातें कर लेंगे।” ऐसा कह कर चंद्र्किरण बाबू ने उन्हें शांत करने की कोशिश की। उनकी कोशिश थी, लराइन बाबू को शांतिपूर्वक समझाने की, जबकि भीतर ही भीतर यह डर भी था कि लराइन बाबू नहीं मानेंगे। लराइन की अम्माँ के ज़ोर ज़ोर से रोने और बोलने की आवाज अभी तक आ ही रही थी। आज वो बेटे को जी भर कर कोस रही थी,पर अचानक चीखते-चिल्लाते उनकी आवाज बंद हो गयी थी, रुपिया ज़ोर- ज़ोर से रोने लगी थी। लराइन बाबू और मास्साब उनके पास आए थे। बेटे के छूने पर उन्होंने उसका हाथ झटक दिया था। उसी टॅक्सी में उन्हें बैठाकर अस्पताल ले चलने के लिए लराइन बाबू ने कहा तो हाथ के इशारे से उन्होंने मना कर दिया, बेटे ने बड़े अस्पताल में ले चलने की बात कही, तो भी वो हाथ के इशारे से मना करती रही, खास इशारे से यह भी कहा कि उनके मरने पर रुपिया ही उन्हें मुखाग्नि देगी। रुपिया रोती रही, लराइन बाबू को इतना बेगानापन महसूस हुआ कि वहाँ एक पल बैठना भी नागवार लगा। उसी पल वो अपनी टॅक्सी में बैठकर रवाना हो गए, पर बेगानापन सिर्फ माँ से था,घर कैसे हासिल करना है इसकी योजना अभी भी उनके मन में चल रही थी।”
-“माँ को अस्पताल ले चलने की कुछ व्यवस्था करिए।” रुपिया ने मस्साब से कहा।
तुरंत ही चंद्र्किरण बाबू जमींदार बाबू की कार किराए पर ले आए थे।
पूरे पंद्रह दिन तक जिला के सदर अस्पताल में वे भर्ती रही थीं, एक आम भारतीय नागरिक की तरह, बेटे के माध्यम से उन्होंने कोई सुविधा हासिल नहीं की थी। चंद्र्किरण बाबू का एक पाँव गाँव में होता था तो दूसरा अस्पताल में। अब वह ठीक थीं, पर आवाज अभी भी स्पष्ट नहीं हो पायी थी, डॉ का कहना था कि अचानक ब्लड-प्रेशर बहुत ज्यादा बढ़ जाने के कारण ऐसा हुआ था। आगे से भी उनका बहुत ध्यान रखना जरूरी है। उन्हें कोई चिंता नहीं करनी चाहिए। डॉ की बातों पर रुपिया हाँ में सिर हिलाती,पर मन ही मन जानती थी कि चिंता से माँ को नहीं बचाया जा सकता। माँ को लेकर उसके मन में डर बढ़ता जा रहा है, पता नहीं कब साथ छोड़ दे। अस्पताल से जिस दिन उन्हें छुट्टी मिलनी थी, सुबह-सुबह चंद्र्किरण बाबू जमींदार के यहाँ गाड़ी की व्यवस्था करने गए थे,गाँव में एक ही गाड़ी होने के कारण कोई दूसरा विकल्प ही नहीं था। उसने बताया कि आज लराइन बाबू उन्हें घर सौंप देंगे, सारी लिखा-पढ़ी कल हो गयी और उसने पूरे पैसे भी लराइन बाबू को दे दिये हैं। अब क्या होगा ? लराइन बाबू इतने चिंतित हो गए कि सर्दी में भी उन्हें पसीना आ गया। मतलब लराइन बाबू गाँव आए हुए हैं। लराइन की अम्माँ को क्या बताएंगे, वो तो घर का बिकना सुनकर मर ही जाएगी, पर बिना बताए भी तो कोई चारा नहीं है। जमींदार की गाड़ी उन्होंने किराए पर ली और शहर की ओर चल पड़े। रास्ते भर चिंता में डूबे रहे। आने से पहले रुपिया को घर वाली बात बताई और कहा कि माँ को रास्ते में धीरे-धीरे बता देना,क्योंकि उन्हे अचानक पता चलने पर उनकी जान को ख़तरा है। रुपिया हाँ में सिर हिलाती रही, फिर पूछा-
“अब अम्माँ और हम कहाँ रहेंगे”
-“स्कूल के उसी कमरे में, जिसमें मैं रहता हूँ।”
चंद्र्किरण बाबू ने गौर किया कि रुपिया के चेहरे पर चिंता की रेखाएँ घट गयी हैं, और आँखों में खुशी की हल्की चमक आ गयी है। इन दिनों उन्हें वह मास्साब भी नहीं कह रही है, और पूरे अधिकार से सारे काम करने को कहती रही है। आज पहली बार वो रुपिया को इतने करीब से और इतने गौर से देख रहे थे। रुपिया की आँखों की चमक उनके मन को भी हल्का कर गयी थी, मन में अब चिंता के स्थान पर दृढ़ता थी। रुपिया कि हिम्मत बढ़ाने के लिए कहा –
-“रुपिया चिंता मत करना।”
रास्ते में रुपिया ने माँ को मिश्री में नीम की गोली अर्थात प्यार से घर छिन जाने की बात बता दी, साथ ही कहा कि वो चिंता न करे। इस पर उनका जवाब था
-“चिंता करे से कुछो बदल जाय,त हम खूब चिंता करब। जे होइतै, देखल जेयतै।” अभी भी आवाज पूरी स्पष्ट नहीं थी,पर इतनी थी कि सुनने समझने में कोई खास दिक्कत नहीं आ रही थी।
चंद्रकिरण बाबू सोच रहे थे, कितना भरोसा करती हैं दोनों इन पर। उन्हें लगता है कि ये सब कुछ करने में सक्षम हैं,पर लराइन बाबू से जीतना आसान नहीं। प्रकट में उन्होंने भी यही कहा
-“हाँ ! जो होगा, देखा जाएगा।”
जब गाँव पहुँचे, रात के साढ़े बारह बज चुके थे। बच्चे भूखे ही सो गए थे। रुपिया अपनी माँ के बगल में सहमी-सकुचाई सी बैठी थी। थोड़ी देर बाद ही रसोई का इंतजाम करने में जुट गयी, मस्साब भी सबके लिए बैठने और सोने की व्यवस्था करके, बच्चों को उठा रहे थे, ताकि उन्हें खाना खिला सकें। आज रुपिया ने खाना बनाकर उनका काम आसान कर दिया था। कुल मिलाकर माहौल इतना सहज था,जैसे वर्षों से यह परिवार इसी छोटे से कमरे में रहता आया हो। गाँव के किसी घर में शादी थी। औरतों के सम्मिलित स्वर में गाने की आवाज आ रही थी-
छिनरो के मोन होइ छै,
छौड़ा लग सूतितों…….

बिभा कुमारी
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