कहानी समकालीनः यूजलेस-आलोक कुमार सातपुते/ लेखनी-जुलाई-अगस्त 17


हैण्डपम्प चलाते-चलाते वीनू हाँफने लगा। उसने दो बाल्टियों में पानी भर लिया था, और अभी उसे दो बाल्टियाँ और भरनी थी। इसके बाद इन सभी बाल्टियों को आधा किलोमीटर दूर चमारटोले में स्थित अपने घर तक ले जाना भी था। यह सोच-सोचकर ही उसके हाथ-पाँव फूलने लगे थे।
वीनू शहर का रहने वाला था। उसकी पढ़ाई-लिखाई शहर में ही हुई थी, लेकिन ग्राम सेवक की नौकरी लगने के चलते वह इस गाँव में आया था। उसे अपना शहर वाला घर याद आने लगा, जहाँ एक बटन दबाते ही उसके घर की छत पर रखी टंकियों में पानी भर जाता था, और पाइपलाईन से सभी आवश्यक जगहों पर पहुँच भी जाता था। उसे अपने घर के बाथरूम में शॉवर के नीचे बैठकर नहाना बहुत पसंद था। गरमियों में वह घण्टों नहाया करता था। उसे इस क्षेत्र में नौकरी करते सात बरस हो गये थे। उसे पता ही नहीं चला कि छः बरस कैसे गुजर गये। अभी पिछले ही वर्ष उसकी शादी हुई थी, और अभी उसकी पत्नी को सात माह का गर्भ था। सुहास के लाख मना करने के बावजू़़द उसे अपनी पत्नी को यहाँ अपने साथ लाना ही पड़ा। सुहास उस गाँव में पशु चिकित्सक था। वह भी दलित जाति का ही था, और विवाहित था, लेकिन वह अपने साथ अपनी पत्नी को नहीं रखता था। वह हर बात को मजाक में लेता। कोई उसे उसकी पत्नी के बारे में पूछता तो वह यूँ ही कह देता कि हमारा तलाक़ हो चुका है।
वीनू जब पहली बार इस गाँव में आया था तो उसकी दोस्ती सबसे पहले सुहास के साथ ही हुई थी। गाँव के ठाकुर ने वीनू को अपने ही घर पर रहने का प्रस्ताव रखा। वीनू ने स्पष्ट बताया था कि ठाकुर साहब मैं अनुसूचित जाति का हँू। इसपर उसका कहना था कि अरे साहब हम तो जाति-पाँति को नहीं मानते हैं। यह जानकर वीनू को सुखद आश्चर्य हुआ था। वह अपने को धन्य समझने लगा कि उसकी नियुक्ति एक छुआछूत-रहित आदर्श गाँव में हुई है। वीनू ठाकुर के घर में ही रहने लगा। उसे ठाकुर ने अपने घर से लगा हुआ कमरा दे दिया था। वह अब ठाकुर को चाचा व ठकुराइन को चाची कहने लगा था। ठाकुर की दो अनब्याही लड़कियाँ थीं। ठाकुर की छोटी लड़की भी वीनू से लगभग एक साल बड़ी थी। विनोद अपने हाथों से खाना बनाता था। उसके जूठे बर्तन दोनों लड़कियों मेें कोई भी धो देती। वे उसके लिये पानी भी भर देतीं। उनमें आपस में वीनू का काम करने की होड़ सी लगी होती। कुछ दिनों बाद ठाकुर के कहने पर वह उनके घर में ही खाने भी लगा। ठाकुर उस गाँव का सबसे सम्पन्न व्यक्ति था। उसके पास सौ. एकड़ खेत थे। तीन नौकर हमेशा उसकी चाकरी में लगे रहते थे।
सुहास को एक ब्राम्हण ने पनाह दे रखी थी। उस ब्राम्हण की भी दो लड़कियाँ थीं, जो बहुत ही ख़ूबसूरत थीं। वीनू को उड़ती-उड़ती सी ख़बर लगी थी कि सुहास के उन लड़कियों के साथ संबंध हैं। सुहास के बारे में उसने यह भी सुन रखा था कि गाँव के बनिये दुकानदार की लड़की से भी उसके संबंध हैं। इस तरह गाँव में सुहास की छवि लंगोट के ढीले आदमी के रूप में थी। वीनू को यूँ तो किसी की निजी ज़िन्दगी में झाँकने का शौक नहीं था,पर एक बार उसने यूँ ही सुहास से उसके सम्बन्धों के बारे में पूछ लिया इस पर वह गोलमोल जवाब देने लगा। उसने थोड़ी कड़ाई से पूछा तो वह उखड़ गया और कहने लगा कि लोग तो पता नहीें क्या-क्या कहते हैंै। लोग तो यह भी कहते हैं कि ठाकुर की लड़कियाँ अपने नौकरों के साथ सम्बन्ध रखती हैं।
देख यार सुहास, मैं उन लड़कियों का बहुत सम्मान करता हूँ। आइन्दा उनके बारे में ऐसा-वैसा कुछ कहा तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। वीनू ने नाराज़गी के साथ कहा।
सम्मान…कहकर वह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा। थोड़ा रूककर सुहास ने उसकी आँखों में आँखंे डालकर कहा मैं गाँव का ही रहने वाला हूँ। मुझे इन जैसे सम्मानित लोगों के बारे में सबकुछ पता रहता है। मैं तो इन सबकी नस-नस से वाकिफ़ हूँ यार। कुछ दिनों बाद देखना, ठाकुर की लड़कियों के साथ तेरा भी नाम जुड़ जायेगा। अबे ये सब सरकारी कर्मचारियों के साथ सम्बन्ध बनाने में गर्व महसूस करते हैं, और कभी-कभी चारा डालकर फँसा भी लेते हैं।
सुनो ऐसा कभी नहीं होगा समझे तुम। ऐसा कहकर वीनू खिन्न मन से उससे अलग हो गया।
इसके बाद एक लम्बे समय तक दोनों के बीच में अबोला ही रहा।
वक़्त गुजरते वक़्त नहीं लगता है।
वीनू को क़िताबंे पढ़ने का बड़ा शौक था। उसके पास प्रतिष्ठित लेखकों की ढेर सारी क़िताबें थीं। ठाकुर की दोनों लड़कियाँ अक्सर वीनू की उपस्थिति में भी उसके कमरे में आ जातीं और क़िताबेें पलटती रहतीं। वीनू को बड़ा अच्छा लगता कि इन्हें क़िताबें पढ़ने का शौक है, वरना तो वह यही मानता रहा कि किताबें पढ़ना तो शहरी लोगों का ही शगल है।
गाँव की प्रायमरी स्कूल की एक शादीशुदा शिक्षिका किरण की इन दोनों लड़कियों से अच्छी मित्रता थी। वे हम उम्र थी। किरण के पति कम्पाऊण्डर थे। जो वहाँ से पच्चीस किलोमीटर दूर गाँव में पदस्थ थे। किरण वहीं से स्कूल आना जाना करती थीं और रिसेस में ठाकुर के घर ही आ जाती और उन्हीं के घर पर टिफिन करती। किरण भी दलित जाति से ही थी। वीनू से उसकी हाॅेय-हॅलो बस थी। फिर कुछ दिनों बाद तीनों ही एक साथ आकर वीनू के पास बैठने लगे। धीरे-धीरे किरण वीनू से औपचारिक से अनौपचारिक होने लगी।
वह मार्च महीने का एक दिन था। अचानक किरण अकेले ही वीनू के कमरे में आ गयी और उसने उससे सीधा प्रश्न किया-तुम ठाकुर की लड़कियों की तरफ ध्यान क्यों नहीं देते हो?
ध्यान देने से क्या मतलब है आपका? वीनू ने इस अप्रत्याशित प्रश्न पर हड़बड़ाकर पूछा।
ध्यान का मतलब, जैसे एक जवान लड़का, जवान लड़की की तरफ ध्यान देता है। किरण बेहिचक बोली।
लेकिन मैडम मैंने कभी भी उन्हें इस नज़र से नहीं देखा। असमंजस की स्थिति में वीनू बोला।
लेकिन वे तो खुद ही ऐसा चाहती हैंै। उन्होंने खुद ही मुझसे कहा है कि आप बड़े बेवकूफ़ किस्म के इंसान है, जो कि उनकी तरफ देखते भी नहीं हैं। किरण ने नयी बात बताई
ऐसा आपसे किसने कहा ? वीनू ने जानना चाहा।
देखिये, मेरी तो इन दोनों से ही दोस्ती है। मुझे तो इन दोनों ने ही घुमा-फिराकर यह बात कही है। उनका तो यह भी कहना है कि आपसे अच्छे तो उनके नौकर हैं। उन्हें तो आपके पुरूष होने पर भी सन्देह होता है। किरण ने अपनी रौ में बहते हुए कह दिया। थोड़ा रूककर उसने फिर कहा-देखिये वीनूजी हर व्यक्ति के शरीर की आवश्यकताएँ होती हैं इस बात से आप तो सहमत होंगे ही। एक ऐसा गाँव, जहाँ 20 वर्ष उम्र तक की लड़की हर हालत में ब्याह दी जाती हो, वहाँ इनका अनब्याहा रहना इन्हें बहुत बेचैन करता है। वीनूजी शादी की उम्र निकल जाने के बाद लड़कियों में अजीब किस्म की असुरक्षा की भावना आ जाती है। शहरों में लड़कियाँ अपने अपने कामों में व्यस्त रहती हैं, इसलिये उन्हें ज़्यादह फ़र्क़ नहीं पड़ता है, लेकिन यहाँ तो ये दिनभर खाली रहती हैं, इस कारण इनकी बेचैनी बढ़ती जाती है। किरण ने बताया।
लेकिन इनकी शादी क्यों नहीं हो पायी है ? वीनू ने अब अधिक उत्सुक होकर पूछा।
देखिये वीनूजी कथित तौर पर ऊँची जाति के कहलाने वालों के घरों में ही ज्य़ादा पोल होती हैं। बड़ी लड़की की सगाई के दिन ही ठाकुर महोदय ने किसी बात पर नाराज़ होकर लड़के पक्ष वालों को एक कमरे में बंद कर दिया, और अपनी रायफ़ल से धमकाने लगा। उधर लड़के वाले भी कम नहीं थे। उनकी तरफ के लोगों को पता चला तो वे भी दल-बल सहित पहुँच गये। किसी तरह बीच-बचाव कर मुआमला शाँत कर दिया गया,लेकिन लड़के वालों ने शादी से इनकार कर दिया और लड़की की फिर शादी नहीं हो पायी। ठाकुर का यह कहना है कि हमारे खानदान की यह परम्परा है कि बड़ी के रहते छोटी का ब्याह नहीं हो सकता, इसलिये अच्छे रिश्ते आने के बावज़ूद छुटकी का ब्याह नहीं हो पाया। ठाकुर की रस्सी जल गयी पर ऐंठ नहीं गयी। किरण ने बताया।
तब तो ठाकुर बहुत ही ख़तरनाक़ होगा ? वीनू ने आंशकित होकर पूछा।
अरे काहे का ख़रतनाक ये लोेग बाहर में तो अपनी मूछों पर ताव देते घूमते हैं, और घर की पोल की तरफ से जानबूझकर आँखें मूँद लेते हैं, बल्कि मुझे तो ऐसा लगता है कि ये खुद ही उन्हे ऐसा करने के लिये प्रेरित करते हैं। खैर मैं वापस मुद्दे की बात पर आती हूँ। मैं उन लड़कियों की बातें कर रही थी। वीनूजी औरतें तो हर जात में औरतें ही हैं। दलितों को तो फिर भी क्लाॅसिफाइड कर दिया गया है, लेकिन औरतें चाहे किसी भी जाति,धर्म की हो हर हाल में औरत ही होती हैं। उनकी जगह मैं भी अगर होती तो मैं भी वही चाहती, जैसा कि वे चाहती हैं। उन्हें अभी भाईचारे की जरूरत नहीं है..समझे आप? किरण ने खुलकर कहा।
लेकिन मैंने तो सुन रखा है कि यहाँ सरकारी कर्मचारियों को फाँस लिया जाता है। वीनू ने शंका ज़ाहिर करते हुए पूछा।
वीनूजी गाँव की हर लड़की की ख्वाहिश होती है कि किसी सरकारी कर्मचारी से ही उसकी शादी हो। वे खेती-किसानी की अनिश्चितताओं से भली-भाँति परिचित होती हैं, लेकिन ये लड़कियाँ उम्र के उस दौर में पहुँच चुकी हैं ,जहाँ अपने ख़्वाबों को द़फ़्न कर दिया जाता है। ऐसे में इनके साथ डर वाली कोई बात नहीं है। आपका वह दोस्त है न सुहास वह तो बड़ा ही समझदार है, जो शादी के बाद भी अपनी मिसेज़ को यहाँ नहीं लाया। वह वास्तव में दुनियादार है। मुझे तो आश्चर्य हो रहा है कि उसने आपको कुछ बताया क्यों नहीं। उसके मकान मालिक शुक्ला की दोनों लड़कियों से भी मेरी दोस्ती है। उन्होंने खुद मुझे बताया है कि उनका सुहास के साथ सम्बन्ध है। किरण ने खुलासा किया।
लेकिन यह तो सरासर ग़लत है कि शादी के बाद भी वह अपनी पत्नी के प्रति वफ़ादार न रहकर इधर-उधर मुँह मारता फिरता है। वीनू ने खुद को साफ़-सुथरा बताने की गर्ज से कहा।
वीनूजी यह सब क़िताबी बाते हैं। व्यवहार में कुछ और ही होता है। सुहास यह बात अच्छी तरह से जानता है कि यदि उसे इस गाँव में सम्मानजनक तरीके से रहना है तो यह सब करना ही होगा, नहीं तो उसे गाँव के बाहर अलग-थलग पड़े चमारटोले में रहना पड़ेगा। आप वहाँ कभी गये हैं; कितना बदबूदार मोहल्ला है वह। छतों पर जानवरों के चमड़े सूखते रहते हैं। आपको तो मालूम ही होगा कि गाँव, दलितों के लिये नर्क है। यह तो हमारा सौभाग्य है कि हम सरकारी नौकरी में हैं, इसलिये इस नर्क से बचे हुए हैं। आगे भी नर्क से बचे रहना है तो सुहास जैसी समझदारी से काम लेना चाहिए। वह अपनी पत्नी के प्रति भी उतना ही समर्पित है, जितना एक पति को होना चाहिए। वह हर छुट्टी में अपने घर जाता है, लेकिन जब अपना अस्तित्व ही दाँव पर लगा हो तो आदमी की प्राथमिकता अपने अस्तित्व को बचाने की होनी चाहिये।
चलिये काफी देर हो चुकी है। मुझे चलना चाहिए। लेकिन जाते-जाते मैं फिर कहती जाऊँगी कि आपके पास उनका उपकार करने का मौका है किरण ने जाते हुए कहा।
किरण के जाने के बाद वीनू को अपने दिमाग में भूचाल सा महसूस होने लगा। उसने सोचा कि थोड़ा आराम कर लिया, जाये, लेकिन वह अपने मानसिक द्वंद्व में ही उलझा रहा।
शाम होने लगी थी। बिस्तर पर पड़े-पड़े वह ऊब सी महसूस करने लगा। वह मुँह धोने के लिये बाड़ी की तरफ गया। उसने जैसे ही बाड़ी की तरफ का दरवाजा़ खोला, देखा कि वहीं पत्थर पर बैठकर बड़की शरीर पर मिट्टी मल रही है। मिट्टी लगाते-लगाते वह कुछ गुनगुना भी रही है। उसने पहली बार महसूस किया कि वाकई में यह तो बड़ी खूबसूरत है। अचानक वह पीछे मुड़ी तो वीनू एकदम से हडबड़ा गया। उसकी इस स्थिति पर वह खिलखिलाने लगी। वह सिर झुकाए अपने कमरे में चला गया और बिस्तर पर जाकर बैठ गया। उसके दिमाग में रह-रहकर बड़की आने-जाने लगी। उसके बाद कुछ दिनों तक वह अनमना सा रहा। उसकी नज़रें बड़की को ही खोजती-फिरतीं। तो क्या वह बड़की की देह के प्रति आकर्षित हो रहा है ? उसने सोचा निश्चित ही देह का ही आकर्षण है, क्योंकि प्यार तो झटके से होता नहीं है।
एक दिन रात वह देर तक किताब पढ़ता रहा,लेकिन बीच-बीच में उसे बड़की का ध्यान आ ही जाता था। उसने अपने सर को झटका दिया और फिर सोने की तैयारी करने लगा। उसने घड़ी देखा बारह बज रहे थे। अचानक उसे लगा कि उसके दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई है। उसने इसे अपना भ्रम माना। दस्तक फिर दुबारा हुई तो उसने सोचा कि इतनी रात को भला कौन हो सकता है। उसने उठकर धीरे से दरवाज़ा खोला। दरवाज़े पर बड़की खड़ी थी। वह तेज़ी से अंदर दाखिल हुई और पलटकर उसने दरवाजे के पट लगा दिये। इधर वीनू की हालत ख़राब होने लगी। घबराहट में उसके मुँह से कुछ भी नहीं निकल पा रहा था। उसकी इस स्थिति को भाँपते हुए बड़की ने कहा- तुम बड़े डरपोक आदमी हो। मर्दों को ऐसे डरपोक नहीं होना चाहिए।
पर किसी ने देख लिया तो, वीनू ने हकलाते हुए पूछा।
तो क्या होगा। मुझे यहाँ सबकी पोल मालूम है। उसने बिस्तर पर बैठते हुए कहा।
पर तुम्हारे माँ और बाबूजी? उसने फिर प्रश्न किया।
मुझे उनकी भी पोल मालूम है। ख़ैर उनकी चिंता छोड़ो। इस बात को तो सभी जानते हैं कि शादी की उम्र निकल जाने के बाद लड़की अपने चरित्र का अचार नहीं डालने वाली है। हर बात का एक वक़्त होता है। बड़की अब बिन्दास तरीके से बातें करने लगी थी, सो वीनू का डर भी जाता रहा, फिर भी वह अंदर से थोड़ा डर रहा था। बातों-बातों में बड़की ने बताया कि हम दोनों बहनों के बीच किसी किस्म का परदा नहीं है, क्योंकि हम दोनों की स्थिति एक समान ही है। हम दोनों सहेलियों की तरह ही रहती हैं।
अच्छा जरा यह तो बताओ कि क्या किरण को तुमने ही कहा था कि मुझसे अच्छे तो तुम्हारे नौकर हैं और तुम्हें मेरे पुरूष होने पर भी संदेह है ? वीनू ने चुटकी लेते हुए पूछा।
हाँ बिल्कुल कहा था। क्योंकि पुरूष को जब तक ऐसा न कहा जाये, तब तक उसे अपने पुरूष होने का अहसास ही नहीं होता है और वह बकरियों की तरह मिमियाता रहता है।
रात का एकांत एक सुन्दर औरत की अपने नज़दीक उपस्थिति और उसके बिन्दास बोल वीनू को बहुत उत्तेजित कर रहे थे, और फिर आग़ और घी का कितना देर साथ होता….दोनों ही तृप्त होने लगे। फिर तो यह सिलसिला ही चल पड़ा बड़की को सभी सुरक्षा उपायों की जानकारी थी। इसलिये वीनू एकदम निर्भीक और आनन्दित जीवन जी रहा था।
एक दिन दोपहर ठाकुर-ठकुराइन भागवत सुनने के लिये पास के गाँव गये। वीनू अपने कमरे में लेटा किताब पढ़ रहा था। उसने अभी थोड़ी देर पहले ही खाना खाया था। बड़की ने उसे खाना परोसा था। लेटकर क़िताबें पढ़ने के कारण वह उनींदा सा होने लगा, तभी हल्की सी आहट हुई। उसने देखा छुटकी हाथ में झाडू औार गोबर-पानी की बाल्टी लेकर उसके कमरे को लीपने आ रही है। वह बिस्तर पर उठ बैठा। छुटकी ने झुककर झाडू लगाना शुरू किया। उसने ढीला-ढाला कुरता पहन रखा था। झुकने पर उसक उरोज स्पष्ट दिख रहे थे। वीनू को चोर नज़रों से देखता हुआ देख वह मुस्कुराने लगी अब वीनू की हिम्मत बढ़ी और उसने उसका हाथ पकड़कर अपने साथ ही बिठा लिया। उसने जरा भी प्रतिरोध नहीं किया, उलटे शरारती अन्दाज़ में बोली- क्यों बड़की से जी नही भरा क्या ? यह सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गयी और वह हकलाने लगा। इस पर उसने कहा- अरे डरो मत! मुझे तो दीदी ने ही सबकुछ बताया है, बल्कि उसने खुद ही मुझे यहाँ भेजा और खुद पड़ोस में बैठने चली गयी है। ऐसा कहकर वह मुस्कुराने लगी। वीनू को तो अपने दोनों हाथों में लड्डू रखा हुआ लगने लगा। और फिर बकौल किरण मैडम उसने उसपर भी उपकार करना शुरू कर दिया। इस तरह अविवाहित वीनू का जीवन एक शादीशुदा आदमी की तरह चलने लगा। बातों-बातों में दोनों लड़कियों ने कथित उच्च वर्ग के लोगों का चरित्र वीनू के सामने खोलकर रख दिया। उसने गाँव के बनिया दुकानदार की लड़की के बारे में भी बताया कि सुहास के अलावा और भी लोगों के साथ उसके सम्बन्ध हैं। ऐसा बताते हुए उन्हे शर्म महसूस नहीं होती थी, उलटे सामाजिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश ही प्रकट होता था। अब वीनू को समझ में आने लगा था कि ये तथाकथित ऊँची जाति के लोग दिखावे की ज़िन्दगी जीते हैं। अपने घर की औरतों को वे एक वस्तु से ज्य़ादह कुछ नहीं समझते हैं। इनके घर की महिलाएं अंदर ही अंदर घुटती रहती हैं, और इस घुटन का ही परिणाम इनका बेझिझक सम्बन्ध बनाने के रूप में नजर आता है।
वीनू का समय मजे से कट रहा था। सुहास से उसकी बातचीत शुरू हो गयी थी। अब उसे भी सुहास एक समझदार आदमी लगने लगा था। अब वे दोनों जब भी मिलते तो अपने-अपने अनुभव सुनाते।
इधर-वीनू के माँ-बाप उसकी शादी करना चाह रहे थे। युद्ध स्तर पर उसके लिये लड़कियाँ देखी जा रही थीं। सुहास ने उसे चेताया था कि यहाँ कभी भी किसी के पास अपनी शादी का जिक्र मत करना। छुटकी और बड़की से भी मत कहना। इसके अलावा उसने यह भी हिदायत दी कि शादी होने के बाद अपनी मिसेज़ को लेकर यहाँ गाँव में मत आना।
छुट्टियों में वीनू घर पहुँचा तो पता चला कि उसके माँ-बाप ने उसके लिये एक लड़की देख रखी है और उसे फाइनल करना है। लड़की, वीनू को भी पसन्द आ गयी और एक निश्चित तिथि पर उसकी शादी भी तय हो गयी । अपनी शादी का कार्ड जब उसने ठाकुर को दिया तो उसने देखा कि ठाकुर के चेहरे के भाव बदल गये हैं। उसने रूखे स्वरों में कहा- अब तुम्हारी शादी हो रही है। तुम दो जने हो जाओेगे। फिर बच्चे हो जायेंगे। हमने तुम अकेले को कमरा दिया था, पर अब तुम्हें अपना कमरा खाली करना होगा।
पर ठाकुर साहब मैं तो इतने सालों से आपके घर पर रह रहा हूँ। क्या आपको कभी मुझसे कोई शिक़ायत रही है ? वीनू ने उलझन भरे स्वरों में पूछा।
यह बात नहीं है बाबू, पर हम दरअसल फैमिली वालों को घर नहीं देते हैं। ठाकुर ने ठण्डे लहज़े में कहा। वीनू को बड़ा आश्चर्य हुआ। शहर में लोग कुआँरों को घर नहीं देते हैं, और ये कह रहे हैं कि फैमिली वालों को घर नहीं देंगे।
उसने कहा- पर शहर में तो…
देखो बाबू तुम्हारे शहर का तुम जानो। हमारे गाँव की तो यही परम्परा है कि हम शादीशुदा लोगों को घर किराये पर नहीं देते हैं, लेकिन हाँ यदि तुम चाहो तो अकेले यहाँ जब तक जी चाहे, रह सकते हो। ठाकुर ने अपना सख़्त फैसला सुना दिया।
कुछ दिनों बाद वह शादी के लिये छुट्टी लेकर घर चला गया। उसकी शादी पर गाँव से किसी के आने का प्रश्न ही नहीं था। गाँव से सिर्फ़ सुहास और किरण ही आये थे। विदाई के समय सुहास ने फिर से कान में फुसफुसाकर कहा- मिसेज़ को गाँव मत ले जाना।
विदाई के बाद अपनी पत्नी को शहर के घर ही ले गया। तीन-चार दिनों बाद उसने अपने माँ-बाप और सास-ससुर से कहा कि फिलहाल वह अपनी पत्नी को गाँव नहीं ले जायेगा और जल्द ही अपना ट्रांसफर कराकर शहर के नज़दीक आ जाएगा। उसके ऐसा कहने पर उसके सास-ससुर उखड़ गये और कहने लगे हमने अपनी बेटी का ब्याह अकेले रहने के लिए थोड़े ही किया है। इधर उसके माँ-बाप भी कहने लगे बहू यहाँ अकेले पड़ी-पड़ी क्या करेगी ? उसे तो तू अपने साथ ही रख।
मन मारकर उसे अपनी पत्नी को अपने साथ ले जाना ही पड़ा। वीनू को यह उम्मीद थी, कि कम से कम ठाकुर की दोनों लड़कियाँ उसके स्वागत के लिये आयेंगी, पर अब उन दोनों लड़कियों ने उसकी तरफ़ से पूरी तरह मुँह मोड़ लिया था। अब अचानक से ठाकुर-ठाकुराइन और उसकी दोनों बेटियों को अपनी ऊँची जाति का अहसास होने लगा था। वे वीनू और उसकी पत्नी के लिये वे जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करने लगे थे। उनमें इस तरह का बदलाव वीनू के लिये घोर आश्चर्य का विषय था। अब उसे सुहास के शब्द बार-बार याद आ रहे थे कि आदमी और औरत की जात होती है, लेकिन लिंग और योनी की कोई जाति नहीं होती है।
एक हफ़्ते बाद ही ठाकुर ने स्पष्ट कह दिया बाबू अब तुम यहाँ नहीं रह सकते हो अब जल्दी से अपने लिया दूसरा घर देख लो। इस बीच वीनू गाँव के सभी प्रमुख लोगों के घर किराये से रहने की बात करने के लिए गया पर सभी ने मना कर दिया। यहाँ तक कि पिछड़ी जाति के लोगों को भी अब अपनी ऊँची जाति का गुमान होने लगा था। आखीर में उसे अपनी ही जाति के चमारटोले में रहने की जगह मिल पायी थी, जहाँ के बदबूदार वातावरण में रहने के लिये वह अभिशप्त था, और वहीं तक उसे ये बाल्टियां पहुँचानी थी। उसने अपने सिर को जोर से झटका दिया, और बाल्टियाँ उठाकर अपने घर की तरफ चल पड़ा।

आलोक कुमार सातपुते
09827406575
832, हाउसिंग बोर्ड कालोनी सड्डू, रायपुर (छ.ग.)

लेखक परिचय – 1. हिन्दी, उर्दू एवं अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं में समान रूप से लेखन 2.पाकिस्तान के अंग्रेजी अखबार डॉन के उर्दू संस्करण में लघुकथाओं का धारावाहिक प्रकाशन।
3. पुस्तकें प्रकाशन – अपने-अपने तालिबान (हिन्दी शिल्पायन एवं उर्दू आक़िफ़ बुक डिपो), बेताल फिर डाल पर (सामयिक प्रकाशन), मोहरा, बच्चा लोग ताली बजायेगा (डायमंड बुक्स)