अपनी बात/ लेखनी-जुलाई-अगस्त 17

width="157"क्या है इन किताबों में जो हमें किताबी कीड़ा बना देता है…इतना दीवाना कर देता है कि भूख प्यास भूलकर, पढ़कर ही चैन मिलता है । मैं साठ और सत्तर के दशक में प्रचलित गुलशन नंदा या मिल्स एंड बून के मसालेदार उपन्यासों की बात नहीं कर रही, मैं बात कर रही हूँ उन किताबों की जिन्हें हम पलट पलट कर पढ़ते हैं जब उदास होते हैं या फिर उन किताबों की भी जिन्हे घर घर में पढ़ा जाता है एक नियम की तरह और जिनके एक एक वाक्य को बृह्मवाक्य मानकर मरने मारने को तैयार हो जाते हैं लोग। क्या ताकत या जादू है इन शब्दों में जो वेद कुरान गीता और बाइबल गढ़ जाते हैं…ग्रन्थ साहब का पन्थ चल पड़ता है। कार्ल मार्क्स की तरह दुनिया की सोच ही बदल दी जाती है। फ्रायड और जुंग की सलाह पर लोग अपने ही अंतर्मन की कुंठाओं की चीड़ फाड़ कर डालते हैं। छोटी ताकत नहीं है इन किताबों या इनमें छपे विचारों की, तभी तो जब आक्रमण कारी किसी सभ्यता का विनाश करना चाहते हैं तो उसके विचारों को नष्ट करना शुरु कर देते हैं। किताबों की लाइब्रेरी और संग्रहालय जलाते हैं क्योंकि साहित्य जनमत और विचार गढ़ने का कार्य आदिकाल से ही करता आ रहा है। साहित्य सिर्फ समाज का दर्पण ही नहीं उसका रचयिता भी तो है। और यह कोई छोटी जिम्मेदारी नहीं।

वेद बृह्मा के मुख से नहीं, बृह्मत्व को प्राप्त , सृजन की इसी तल्लीनता में लिप्त किसी विचारक मानव के मुख से ही निकले थे और किसी गुफा में उस महाभारतकाल में एक क्रांतिकारी ने नए समाज का श्री गणेश किया था, शायद। वेदव्यास ने तो बस इसे लिपिबद्ध किया।

किसी भी देश की संस्कृति और आचार विचार को विकसित करने में किताबों का बड़ा हाथ रहा है। आगे बढ़ती वक्त की धारा के बावजूद गीता, कुरान और बाइबल आदि पर आज भी विश्व को पूरा भरोसा है। वे आज भी हमारे नैतिक चरित्र की मानक और पराकाष्ठा हैं। ईश्वरीय तत्व प्राप्त कर चुकी हैं और इन्हें साक्ष्य मानकर आज भी सच बोलने की कसमें खाई जाती हैं और हर अदालत स्वीकारती भी है। सीधे हृदय और मस्तिष्क दोनों से ही संवाद करती है एक पूरी निष्ठा और सच्चाई से लिखी गई किताब। वक्त के साथ-साथ कुछ ने तो ईश्वरीय और चमत्कारिक रूप तक ले लिया है। हनुमान चालीसा और सुंदरकांड आज भी कितनों के सुरक्षा कवच हैं, गुरुबानी और बाइबल के श्लोक, कुरान की अताएँ इन सबसे पृथ्वी का कोना-कोना भी आज भी गूंजता है, उसी निष्ठा और भक्ति के सथ। कहीं ये किताबें डूबते मानव मन की लाइफ जैकेट भी तो नहीं! आदिकाल से सुख दुख में गाए जाने वाले ये गीत ही तो हैं जो संभालते हैं बिखरते -टूटते मानव को ! अब इन्हें हम चाहें तो गीत कहें या कविता, आंसू कहें या गीतांजलि !

विशेषतः भारत की बात करें तो हम सभी जानते हैं कि भारतीय मानसिकता और आध्यात्म को विकसित करने में चारो वेदों और महाभारत का कितना बड़ा हाथ रहा है। रामायण का कितना बड़ा हाथ है। इनके संस्मरण और खंडहरों से देश का कोना-कोना आज भी अटा पड़ा है। वेदों ने जहाँ एक विकसित होती सिंधु घाटी की सभ्यता को जीवन दर्शन और दिशा के लिए हर संभव नीति और निर्देश दिए थे, रामायण और महाभारत ने जीने की कला सिखायी, समाज को दर्पण दिखाया । भारत की सांस्कृतिक धरोहर को देखें तो ऐसी ही कई और किताबें भी हैं जैसे पंचतंत्र, मनुस्मृति, चाणक्यनीति आदि, जिन्हें भारतीय समाज ने आज भी अपना रखा है क्योकि इन्होंने भारतीय जनजीवन के हर पहलू को उकेरा है। उसके हर मापदंड और मानदंड को खंगाला है। समाजशास्त्र, नीतिशास्त्र, दर्शन और जीवन के नवों रसों का सुन्दर और प्रभावी समावेश है इन किताबों में और यही वजह है कि आज भी इनकी सामयिकता और अर्थवत्ता बनी हुई है। एक तरफ जीने के सही तरीके बताए गए हैं तो दूसरी तरफ मानव व उसके समाज की कमियों और षडयंत्रों को भी भरपूर उजागर गया है। परन्तु अतीत पर टिक कर ही नहीं बैठ सकता कोई भी समाज क्योंकि जीवन गतिमान है और वक्त एक चतुर कारीगर जो नित ही सबकुछ काटता-छांटता रहता है। पुरानी मान्यताएँ टूटती झरती हैं। प्रकृति का भी तो यही नियम है। पुराने शरीर त्यागते हैं तभी नव अंकुर जन्म ले पाते हैं उनकी जगह। आत्मरक्षा का यह भी तो एक अद्भुत नियम है। हम नहीं बदलते तो वक्त बदल देता है सबकुछ।

जैसे कि प्रकृति के सृजन में सबकुछ सुंदर और सार्थक ही नहीं दिखता, किताबों और विचारों में भी जरूरी नहीं कि सबकुछ सच सुंदर और कल्याणकारी ही हो ।
लिखते वक्त लेखक का खुद के प्रति और अपने पाठकों के प्रति सच्चा होना सृजन की पहली शर्त है मेरी निगाह में। मन से कही बात ही मन को छूती है और निश्चल और विवेकी से ही सलाह लेते हैं साधु जन। क्योंकि इन्हीकी सलाह और शब्द जीवन दिशा को बदलने की सामर्थ रखते हैं। सिर्फ उत्तेजना और क्षणिक आनंद के लिए हमारी सभ्यता ने और भी बहुत कुछ वैसे ही विकसित कर लिया है। थौमस जैफर्सन शायद यही कहना चाह रहे थे जब उन्होने कहीं लिखा था कि आदमी के दो ही सच्चे मित्र हैं – एक किताब और दूसरा कुत्ता…पर किताब वॉक पर नहीं जाती और कुत्ते के सिर में अंधेरा है… चयन आज भी हर मानव का जन्म सिद्ध अधिकार है। पर खुली आंख के साथ हो तो बेहतर, किसी दवाब या स्वार्थवश भेड़ चाल की तरह ही नहीं। ….

लेखनी पत्रिका भी इसी खोजने, जानने, समझने और मनन करने की एक छोटी-सी कड़ी है। इसी प्रयास के तहत किताबों के इस तिलिस्मी संसार को आप सभी की दृष्टि से जानना चाहा था हमने परन्तु कोई भी लेखक या पाठक मित्र अपनी प्रिय किताबों की फेहरिस्त को लेकर आगे ही नहीं आये। जबकि हरेक की प्रिय किताबें होगीं ही । आभार पद्मा मिश्रा का जिन्होंने तुरंत ही आलेख भेजा था शिवानी के चौदह फेरे और प्रेमचंद के गोदान को रेखांकित करते हुए।
हमने भरसक कोशिश की है कि अंक फिर भी रोचक ही बने। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा…
पुनश्चः लेखनी का सितंबर-अक्तूबर अंक हमने मातृभाषा की शक्ति पर रखने का मन बनाया है। रचनाएं आमंत्रित हैं। भेजने की अंतिम तिथि 20 अगस्त।

शैल अग्रवाल