माह विशेषःलेखनी-जनवरी-फरवरी 17

– जागो मेरे देश!

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जागो मेरे देश!
बंद करो,–
वादों -नारों नगाड़ों का शोर ,
खामोश कर दो –
अघोषित महाभारत की दुनिया ,
अब टूट रही है खामोशियाँ –
अंतर्मन की –
-पद्मा मिश्रा
बंद करो,–
वादों -नारों नगाड़ों का शोर ,
खामोश कर दो –
अघोषित महाभारत की दुनिया ,
अब टूट रही है खामोशियाँ –
अंतर्मन की –
-पद्मा मिश्रा

राजा के पोखर में
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ऊपर ऊपर लाल मछलियाँ
नीचे ग्राह बसे।
राजा के पोखर में है
पानी की थाह किसे।

जलकर राख हुईं पद्मिनियाँ
दिखा दिया जौहर
काश कि वे भी डट जातीं
लक्ष्मीबाई बनकर
लहूलुहान पडी जनता की
है परवाह किसे।

कजरी-वजरी चैता -वैता
सब कुछ बिसराए
शोर करो इतना कि
कान के पर्दे फट जायें
गेहूँ के संग-संग बेचारी
घुन भी रोज़ पिसे।

सूखें कभी जेठ में
सावन में कुछ भीजें भी
बडी ज़रूरी हैं ये
छोटी-छोटी चीज़ें भी
जाने किस दल में है
सारे नरनाह फँसे।
– बुद्धिनाथ मिश्र

नोट हजारी
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वक्त किसीका एकसा नहीं रहता
कभी जो हजार थे आज बेकार हैं
बन्द बोरियों में सुबकते
औने पौने खपाए जाते
निरस्त होने से पहले
इतराते दस बीस और सौ पचास के
नोट भी इनके आगे
छोटे थे जो , बदरंग थे जो
कदर ना थी जिनकी कुछ भी
रखे जाते अब सहेजकर
और यह बेबस पूछते
हम जो थे तुम्हारे चहेते
तुम्हारी तिजोरियों में सुरक्षित
रखे रखे हुए अब काले…
-शैल अग्रवाल

खयाल
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क्या कभी आपको
यह आया है ख्याल
कैसे कैसे जोड़ा जाता है
अपने लिये माल
इसका गणित समझना
मैने जाना अभी हाल
जिसने छोड़ दिये है
कई सारे सवाल?
कुछ बिके हुये
कुछ टिके हुये
बिके हुये हो गये मालामाल
टिके हुये रहे फटे हाल
एक बार फिर
वही खड़ा हुआ सवाल?
बिक कर जब
दूर हो सकते सन्ताप
तो क्यों नही करते
एक बार यह पाप
यह बात अक्सर
घरों में दोहराई जाती है
लेकिन कुछ को
समझ नही आती है
वह तो आक्रोश मेें
हाथ ऊपर उठाकर तैयार है
गैर बराबरी से
लड़ने के खातिर
भट्टी में तपने को
मेहनत से
पूरा करने तैयार है
आँखों में पलते सपने को
-सुरेन्द्र अग्निहोत्री

-सभी बाँटकर खाओ

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देश यह रोटी का टुकड़ा
सभी बाँटकर खाओ;
कोई कभी तुम्हें टोकता
मिलकर सब गुर्राओ । ।

गबन -लूट मचाता जो भी
उतना नाम कमाए ;
बेबस भूखी जनता सिर्फ़
गीत उसी के गाए ।

दबंग बनो आँख दिखाओ
फिर सबको लतियाओ । ।
ख़्वाब जो गाँधी ने देखे
उनको लगा पलीता ;
ओढ़ चादर दुराचार की
उलटी पढ़ ली गीता ।

चोर-चोर सभी हैं भाई
सब कुछ चट कर जाओ । ।

अनाचार हटाने की जो
बातें कहीं करेगा ;
इनके हाथों सही मानो
वह बेमौत मरेगा ।
कुर्सी भक्षक बनी दोस्तो
दूर कहीं छुप जाओ । ।
दो रोटी को वह तरसता
जो है दिन भर खटता ;
न सिर पर है छप्पर कोई
भूख- पिशाच न हटता ।
जनसेवक जी ! अब न चूको
लूट-लूटकर खाओ ॥
लूटो नभ ,धरा यह लूटो
लूटो यहाँ पाताल
कम लगे तो कफ़न लूट लो
भरो घर में सब माल ।
परदेसी को न बुलवाना
तुम खुद लूट मचाओ । ।
लोकतन्त्र है मत टोकना
इनको मिला अधिकार
सेवक ही बने हैं मालिक
यही सेवक हथियार ।
अँधेरा है लोकतन्त्र का
ज़रा नहीं घबराओ । ।
भेड़ बकरियाँ आँखें मूँदे
अपनी खैर मनाएँ;
शेर दें रेवड़ पर पहरा
पल-पल में गुर्राएँ ।

जीना तो चुप रहना बन्धु
अपनी खैर मनाओ । ।

-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

नोटबंदी से

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नोटबंदी से

पब्लिक हुई बेहाल
नोटबंदी से,
ग़रीब खड़ा क़तार
नोटबंदी से,
खाए लाठी-डंडा
नोटबंदी से,
बैंक-बैंकर्स मालामाल
नोटबंदी से,
माल्या मनाए मौज़
नोटबंदी से,
बाज़ार में छाई मंदी
नोटबंदी से,
उठी नहीं अर्थी होरी की
नोटबंदी से,
दुल्हन हुई निराश
नोटबंदी से
पलिहर खेत उदास
नोटबंदी से,
हुए बैंक-माफिया एक
नोटबंदी से,
काले कुबेरों का नया दौर
नोटबंदी से,
कहाँ रूके आतंकी
नोटबंदी से,
राजा ने लिया नहीं काम
अक़्लमंदी से,
जियो-जियो रे लला
नोटबंदी से,
गौतम सुख में विभोर
नोटबंदी से,
गडकरी गिनाए लाभ
नोटबंदी से,
जेटली मनाए जश्न
नोटबंदी से,
काटे चाँदी शहंशाह
नोटबंदी से,
देश में हाहाकार
नोटबंदी से!
-चंद्रशेखर पाणडेय