कहानी समकालीनः मिस्ट्रेस-शैल अग्रवाल/लेखनी जनवरी-फरवरी 17

mistressकिस्सागोई अक्सर होती है जीवन में और बातें भी बहुत। कोई भी बात कहीं से भी शुरु की जा सकती है और कहीं पर भी समाप्त और बात आई-गई भी हो जाती है। पर जीवन की तरह ही कुछ बातें भी बेहद हठीली होती हैं। बहुत कुछ ले और दे जाती हैं। कलम या मन की नोक पर आ बैठती हैं। शूल या संबल सी धंस जाती हैं मन और स्मृति में। अक्सर ही खुद को मनवाकर या लिखवाकर ही दम लेती हैं। बदल देती हैं धारणा क्या, खुद इंसान तक को। जहाँ तक दिशा को याद आता है वह दिन भी कुछ ऐसा ही था।…
घर की पूरी साफ-सफाई जी तोड़ मेहनत से की थी दिशा ने और वह बैठी ही थी कि गौरव का फोन आ गया था।
‘ सुनो बताना भूल गया, रोहन और वर्षा आ रहे हैं। याद है न रोहन की तुम्हें? ‘
‘ हाँ हाँ, रोहन को भला कैसे भूल सकती हूँ मैं! वही जैनी वाला न ! ‘
‘ हाँ, हाँ, वही, पर अब जैनी नहीं, वर्षा वाला। ‘
दिशा को गौरव की हंसी इतनी अटपटी कभी नहीं लगी थी।
‘ एक रात रुकेंगे। ज्यादा कुछ नहीं करना है। बस, मेहमानों का कमरा ठीक कर लेना। शाम को बाहर चलेंगे और खाना भी बाहर ही खाएंगे । आखिर शादी के बाद पहली बार आ रहा है। इतनी ट्रीट तो बनती ही है न? ‘
‘ नहीं। घर में ही खाते हैं। अक्षत को बुखार है हलका-सा। बाहर जाना ठीक नहीं। मुझ पर छोड़ दो तुम, सब। ‘
‘तुमपर ही तो छोड़ रखा है सब। घर को भी और खुद को भी मैंने।‘ और एक बार फिर हंस पड़े थे आदतन यूँ ही गौरव।
रसोई में लग गई थी दिनभर के लिए दिशा फिर से । सप्ताह का अंत आ पहुँचा था और सप्ताह-अंत का अर्थ प्रायः मेहमानों की आवा-जाई ही रहती है इन पाश्चात्य देशों में।
पहले यह सिलसिला बहुत ज्यादा था…भारत लौटने से पहले; जब वह नई-नई आई थी यहाँ पर और गौरव के एकाध मित्रों की ही शादी हो पाई थी तबतक । जिनकी हुई भी थी, दोनों पति-पत्नी काम पर जाते थे और तब मेहमान नवाजी के लिए वक्त नहीं निकाल पाते थे वे। विदेश में घर का खाना और माहौल लेने के लिए, याद आते ही अधिकांश का जमावड़ा उसी के घर पर रहता था और मन के किसी चोर कोने में गर्व था खुद दिशा को भी इस बात पर।…
दिशा ने कभी बुरा नहीं माना इस अतिरिक्त मेहमान नवाजी और मेहनत का…गौरव की खुशी ही अब उसकी खुशी थी और उनके मित्र ही उसके मित्र। गौरव से अलग अब उसकी अपनी कोई जिन्दगी नहीं थी। गौरव भी काम में पत्नी का पूरा हाथ बटाते और दिशा तो ‘ अतिथि देवो भव! ‘ में पूर्ण विश्वास करती ही थी।
इसी बहाने उसे परिवार जैसी हलचल देखने सुनने को मिल जाती थी। घर भरापूरा लगने लगता था वरना तो चिड़िया जैसे बैठे रहो दिनरात टी.वी. के आगे। इसी बहाने ही सही, नए-नए रिश्ते जुड़ रहे थे, कहने को मित्र बन रहे थे अपने ही मन के बीहड़ में अकेले ही रमी रहने वाली दिशा के भी।…
वर्षों बाद रोहन आ रहा था जैनी नहीं पत्नी वर्षा के साथ । यादों की बाढ़ थी दिशा के तारो तरफ। मेहमानों का कमरा ठीक करते, बिस्तर बदलते हुए कुछ मन में था जो बारबार बिखरा और बहा जा रहा था। मोहब्बत ही न जो समझे वो जालिम प्यार क्या जाने…उसी ने गाया था कभी। वर्षों पुरानी बात हो चली है यह भी-गला किसका कटा, क्योंकर कटा तलवार क्या जाने… पर जाने क्यों न चाहते हुए भी, याद आते ही मन उदास हो चला था और इस उदासी की भी एक नहीं कई-कई वजहें थीं, उसका देश भारत और भारतीयों का चरित्र…प्रेम या रिश्तों की अनकही सच्चाई, व्यवहारिकता जो हजार आदर्श और रूमानी बातों के बावजूद भी ठोस जमीन पर ही खड़ी मिलती है हमेशा …एक नहीं कई-कई वजहें थीं दिशा के पास उदासी और अनमने पन की पर हजार दलीलों और बातों के बाद भी जैनी को भूल क्यों नहीं पाई दिशा!
जैनी शायद पहली या दूसरी मेहमान थी उसके घर में। पहली बार घर में मेहमानों का कमरा सजाया था दिशा ने उसके लिए।
यूँ तो दो सिंगल बेड का कमरा भी खाली था चार बेडरूम के फ्लैट में पर गौरव ने दूसरा डबल बेड वाला ही कमरा उन दोनों के लिए तैयार करने को कहा था। पूछने पर कि वे तो सिर्फ मित्र हैं , कुछ असहज-सा जबाव मिला था उसे ‘ इसमें अटैच बाथरूम है , आसानी रहेगी, उन्हे भी और हमें भी।‘
शादी-शुदा होकर भी जो अभी तक मां-बाप, अड़ोसी-पड़ोसी किसी को नहीं बता पाई थी कि माँ बनने वाली है, ऐसी शर्मिली दिशा के लिए अभिप्राय विचलित करने वाला था, पर बहस या चर्चा का मुद्दा नहीं। नया देश, नया परिवेश और खुद के अंदर पलते बच्चे की वजह से शारीरिक परिवर्तन, बहुत कुछ नए और अनजान से सुलझना सीख रही थी दिशा। यौन-संबंधों के खुलेपन की आंधी थी चारो तरफ। दूसरे चाहे जो भी सोचते हों पर उसके लिए तो देह-समर्पण आज भी नैवेध्य की तरह ही था, जिसमें शुचिता और समग्रता का महत्व बहुत अधिक था। अपने मूल्यों और विश्वास के साथ आज भी वह वैसे ही उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ डटी खड़ी थी जैसे कि एक साहसी सिपाही देश की सीमा पर खड़ा रहता है।
खाने की मेज पर देर तक गपशप फिर मोमबत्तियों की मद्धिम रोशनी में कौफी के साथ गीतों का सिलसिला…अच्छा गाता था रोहन। पर घंटों यूँ ही मन्द स्मिति के साथ बैठी जैनी को देखकर पूछे बिना न रह सकी वह –क्या तुम बोर हो रही हो, जैनी? नहीं तो, थोड़ा बहुत सुन रही हूँ। थोड़ा बहुत टेलिविजन देख रही हूँ। गालों में पड़ते गढ्ढों के साथ खेलती, शांत-सी जैनी ने एक बेहद ईमानदार-सा जबाव दिया और दिशा को उसकी यह परिस्थितियों से समझौता करने की आदत और स्पष्ट-वादिता अच्छी लगी।
खाने की मेज से बर्तन हटवाने, चौके की साफ सफाई, सब में तीनों ने दिशा की पूरी मदद की और घंटों का काम चुटकियों में निपट गया। मेहमान के आने की उत्तेजना और उत्साह के बावजूद दिशा अब पूर्णतः थक चुकी थी और पोर-पोर दुख रहा था उसका। आराम करना जरूरी हो चला था। बातों का क्या –पूरे दो दिन और पड़े हैं।
‘ सुनो , तुम दोनों का कमरा तैयार है , जब भी सोना चाहो । सारा सामान तौलिए वगैरह सब रख दिए हैं मैंने । फिर भी अगर किसी चीज की जरूरत हो तो खटखटा लेना। सामने वाला कमरा है मेरा। मैं अब सोने जा रही हूँ। शुभरात्रि और सुबह मिलते हैं।‘ -कहकर मेहमानों और गौरव को गपशप में मशगूल छोड़ वह अपने कमरे में आ गई।
कपड़े बदल ही रही थी कि दरवाजे पर खटखट हुई। झटपट हाउस कोट डालकर दरवाजा खोला तो झुकी नजरों के साथ जैनी खड़ी थी ।
‘ आओ जैनी, आओ।‘
‘ नो, आई वोन्ट स्टे लौंग। होप यू डोन्ट माइंड, आई नीड सम कन्डोम्स।‘
दिशा लड़खड़ा गई और पलंग के पाए को कैसे भी पकड़ कर ही संभल पाई। हजार रंग एकसाथ उसके चेहरे पर आए और चले गए। एक बार फिर जैनी की स्पष्टवादिता की कायल थी वह।
‘ यू सी, आई एम हिज मिस्ट्रेस। ही टोल्ड मी टु गेट सम फ्रौम यू। यू मस्ट हैव सम। औल द शौप्स आर क्लोज्ड नाओ एंड आई कैन नौट रिफ्यूज हिम। फौरगौट टु पैक। ‘
नजरें झुकाए-झुकाए, जैनी ने खुद को पुनः स्पष्ट किया। दिशा ने भी खुद को संभाल लिया और बताया कि पर उन्हें तो कभी जरूरत ही नहीं समझ में आई इसकी। एक राज की बात बताऊँ तुम्हें , अब दिशा के होठों पर कानों तक खिंची एक मोहक और लजीली मुस्कान थी। ‘ पिछले महीने ही पता चला है, जव्दी ही तुम आन्टी-अंकल बनने वाले हो। पहली ही रात शायद …। खुश तो हूँ पर बहुत डर भी लगता है मुझे। ‘
अब चौंकने की जैनी की बारी थी। हाउ ओल्ड आर यू? सिक्सटीन और सेवेन्टीन?
‘ नो ट्वेन्टी वन।‘ सकुचाती सी दिशा बोली।
‘ यू लुक वेरी यंग। क्या यह सब बोहद जल्दी नहीं…क्या कोई ऐसी योजना नहीं थी तुम्हारी? ‘
‘योजना.. ‘.दिशा का मुंह खुला का खुला रह गया। ‘ नहीं जैनी, जिस समाज से हम आते हैं वहाँ बच्चे योजना से नहीं, प्रभु के आशीर्वाद से आते हैं। इंतजार करते हैं दंपति इसका। हाँ एक दो बच्चों के बाद अब अधिकांश कुछ स्थाई इंतजाम कर लेते हैं। ‘
अगले पल ही अपनी गलती समझते हुए आगे बढ़कर दिशा के गुलाबी गालों को चूम लिया जैनी ने और उसे गले से भी लगाया। खुशी में शामिल होते हुए बोली- ‘ बधाई, बहुत बहुत बधाई, दिशा । उम्मीद करती हूँ कि मैं भी एकदिन इतनी ही खुश किस्मत हो पाऊँगी। ‘
‘ क्यों नहीं । अवश्य । पर मैं चाहती हूँ, अभी तुम यह खबर किसी को न दो। रोहन को भी नहीं।‘
‘ क्यों? ‘
‘ पता नहीं क्यों? पहले मैं खुद तो सहज हो लूँ ।‘
‘ प्लीज, मेरी इच्छा की कद्र करना। ‘
जाती जैनी को पुनः दिशा ने आगाह किया और तब जैनी ने भी सिर हिलाकर स्वीकृति दे दी, बिना मुड़े या रुके और अपने कमरे में चली गई।
अगले दिन चारो उन्मुक्त परिंदों की तरह साथ-साथ आसपास के शहर घूमते रहे। परिचय का यह अंदाज और उनका साथ दिशा को पसंद आ रहा था। एक सहजता थी चारो के बीच।

फिर तो जैनी और रोहन अक्सर ही आने लगे। बिना बताए ही आ जाते। और जब भी वे आते दिशा सोती ही मिलती। दिशा के लिए जगे रहना दिन प्रतिदिन मुश्किल होता जा रहा था। रोहन ने तो नाम ही स्लीपिंग ब्यूटी रख दिया था पर जैसे ही जैनी उसके कमरे में साड़ी बांधना सीखने आती या हिंदुस्तानी खाने की ऱैसेपी पूछती दिशा पूरी तरह से सजग हो जाती। ऐसे ही एक अंतरंग पल में पूछा था दिशा ने, ‘ जैनी उस दिन तुमने खुद को रोहन की मिस्ट्रेस क्यों कहा था, प्रेमिका क्यों नहीं?’
‘ आदत पड़ चुकी है हमें एक दूसरे की। पालतू हो चुकी हूँ उसकी, इसलिए।‘
‘ हमारे यहाँ रखैल कहते हैं।‘ सहेली के लिए यह शब्द इस्तेमाल करते हुए एक अवसाद था दिशा के स्वर में।
‘ नहीं, रखैल नहीं हूँ, मैं। रखैल मालिक के टुकड़ों पर पलती है। मैं रोहन से कोई सुविधा नहीं लेती। सिवाय प्यार के। बहुत प्यार करते हैं हम एक दूसरे को। चार साल से हवा भी नहीं आ पाई हमारे बीच। इतने एक हो चुके हैं हम।‘
उसका रोहन के प्रति यह नेह और पूर्णतः भारतीयता में रमने की ललक, उसके अटूट नेह की परिचायक थी। हिंदुस्तानियों से ज्यादा हिंदुस्तानी होती जा रही थी जैनी और दिशा को उसका यह एकनिष्ठ समर्पण सच्चे प्यार का ही प्रतीक लगने लगा था। तन और मन दोनों से ही पूरी तरह से ही रोहन के साथ थी जैनी। एक पत्नी की तरह ही उसके कपड़े धोती कमरा ठीक करती , खाना बनाती और सिर दुखने पर घंटों सिर भी दबाती। बिना माँगे ही कभी कॉफी का प्याला तो कभी औरेंज जूस का गिलास लिए खड़ी रहती बगल में। उसे सब पता रहता कि उसे क्या चाहिए या खुश रखता है रोहन को। काम में भी उसके साथ…रोहन के वार्ड में ही तो स्टाफ नर्स थी वह। चौबीसों घंटों का साथ था उनका।
और जोड़ी भी बुरी नहीं लगती थी दोनों की। बुरी क्या, लाखों में एक, मानो एक दूसरे के लिए ही बने थे दोनों। दिशा अब तो मन-ही-मन प्रार्थना भी करने लगी थी –भगवान किसी की नजर न लगे इन्हे। इनका साथ कभी न तोड़ना। कितने खुश दिखते हैं दोनों साथ-साथ।

पर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था।
अचानक एक दिन गौरव ने बताया रोहन भारत में है। उसकी शादी हो गई है। जैनी नहीं, वर्षा के साथ। माँ को हार्ट अटैक हुआ था और तुरंत ही बुलाया था उसे। चिठ्ठी में तो यही लिखा था। आपदकालीन छुट्टी लेकर गया था वह। मां ठीक है अब। मां की पसंद की लड़की से ही शादी करके लौट रहा है, वह। जान दे देने की धमकी दी थी माँ ने।
‘ और जैनी…? ‘ अवाक थी दिशा।
‘ कोई पता नहीं। वह नौकरी शहर सब छोड़कर चली गई है । किसी को नहीं पता कहाँ पर है और कैसी है? उड़ती खबर हैं कि औस्ट्रेलिया में है। जाते वक्त रोहन के दिए सारे तोहफे और अपनी चाभी सब उसके कमरे में वापस रखकर गई है, साथ में शुभकामना का कार्ड और उसके और पत्नी के लिए एक बड़ा-सा फूलों का गुच्छा भी।‘
‘ …. ‘ दिशा की आखें भर आईं।
‘ पर तुम उदास क्यों हो ? यह सब तो चलता ही रहता है। जिन्दगी है यह। फिर यह गोरी लड़कियाँ इन्हें तो आदत होती है इस सबकी। बीसियों के साथ पहले खाती-खेलती हैं तब जाकर कहीं घर बन पाता है इनका।‘ गौरव अपनी ही रौ में बोले जा रहे थे।
पर दिशा उदास थी। वाकई में उदास । उसे पता था जैनी ऐसी नहीं थी। बहुत प्यार करती थी रोहन से। उसे तो रोहन भी ऐसा नहीं लगा था।
‘ फिर प्यार में गोरे काले, देश जाति का अर्थ क्या…!’ पूरी तरह से बरस पड़ी थी दिशा गौरव पर ।
‘ हम क्यों अपनी तबियत खराब करें उनके लफड़े को लेकर। वो जाने, रोहन जाने। पर तुम रोहन या वर्षा से कोई ऊलजुलूल बात मत करना।‘ अपनी अति अव्यवहारिक और अति भावुक पत्नी को समझाया गौरव ने।
कहाँ रोक पाई थी दिशा पर खुद को । पहला मौका पाते ही पूछ बैठी थी, ‘ कैसे हो रोहन? खुश तो हो न ? ‘
‘ हाँ बहुत।‘ रोहन का संक्षिप्त–सा जबाव था।
‘ और जैनी ? ‘
‘ पता नहीं। वह भी होगी ही । मैं अपनी जगह पर और वह अपनी जगह पर ! ‘
अब दिशा के पास पूछने और सुनने को कुछ नहीं बचा था। वर्षा अच्छी और स्मार्ट लड़की थी। दिशा ने अपनी एक बेहद खूबसूरत साड़ी तोहफे में दी तो उसकी पूरी अलमारी ही देख डाली, यह कहकर कि कितनी अच्छी पसंद है उसकी और कितनी अच्छी-अच्छी साड़ियाँ हैं उसके पास। पर व्हाट ए शेम अब तो भारत में भी खास करके दिल्ली वगैरह जैसे बड़े शहरों में कम ही साड़ी पहनती हैं लड़कियाँ। पार्टी ड्रेस होकर रह गई है यह । उसे तो वैसे भी वेस्टर्न कपड़े ज्यादा पसंद हैं । रोहन कहते हैं कि उसके स्लिम फिगर पर फबते भी खूब हैं।
दिशा कट कर वापस जैनी के पास पहुँच चुकी थी। ‘सबसे खूबसूरत लिबास है साड़ी। नारीत्व को कैसे उभारती है यह। मुग्ध हूँ मैं तो इसपर…रोहन कहता है अप्सरा लगती हूँ मैं इसमें।‘
और तब दिशा ने भी काली बिन्दी निकाल कर उसके गोरे खुशी से दमकते माथे पर लगा दी थी। डर जो रही थी कहीं नजर न लग जाए सहेली को उसकी। जैनी थी ही इतनी प्यारी तन से भी और मन से भी। क्यों होता है ऐसा अक्सर, जो नहीं है उसे ढूँढते रहते हैं हम और जो है उसकी कोई कद्र ही नहीं! दिशा हैरान थी मन की इस भूल-भुलैया पर।

रोहन फिर आया था कई बार वर्षा के साथ, वैसे ही, जैसे जैनी के साथ आता-जाता था। अब जैनी की कोई बात नहीं होती उनके यहाँ। प्रेत की तरह अदृश्य हो चुकी है जैनी रोहन की मित्र मंडली और बातों से। पर दिशा आज भी नहीं भूली है जैनी को। अक्सर ही वह उसकी प्रार्थनाओं में रहती है, स्मृति में रहती है। मांगती रहती है वह भगवान से कि जैनी का सहारा बनें वह। दुख न दें उसे और उसका भी घरबार बसा दें। जीने का गुर सिखा दें । मिला दें एक सीधे-सच्चे, साथ निभाने वाले साथी से।

( उपन्यास मिट्टी का एक अंश)