कविता आज और अभीः लेखनी जनवरी/ फरवरी 2017

चुल्लू की आत्मकथा
1795503-oct-8
मैं न झील न ताल न तलैया
न बादल न समुद्र
मैं यहाँ फँसा हूँ इस गढ़ैया में
चुल्‍लू भर आत्‍मा लिये
सड़क के बीचों-बीच

मुझ में भी झलकता है आसमान
चमकते हैं सूर्य सितारे चाँद
दिखते हैं चील कौवे तोते और तीतर
मुझे भी हिला देती है हवा

मुझमें भी पड़कर
सड़ सकती है
फूल पत्तों सहित हरियाली की आत्‍मा

रोज़ कम होता
मेरी गँदली आत्‍मा का पानी
बदल रहा है शरीर में
चुपचाप
भाप बनकर
बाहर निकल रहा हूँ मैं।

-लीलाधर जगूड़ी

 

 

 

तलाशी
1795503-oct-8

उन्होंने कहा- “हैण्ड्स अप!”
एक-एक अंग फोड़ कर मेरा
उन्होंने तलाशी ली!

मेरी तलाशी में मिला क्या उन्हें?
थोड़े से सपने मिले और चांद मिला
सिगरेट की पन्नी-भर,
माचिस-भर उम्मीद, एक अधूरी चिट्ठी
जो वे डीकोड नहीं कर पाये

क्योंकि वह सिन्धुघाटी सभ्यता के समय
मैंने लिखी थी-
एक अभेद्य लिपि में-
अपनी धरती को-

“हलो धरती, कहीं चलो धरती,
कोल्हू का बैल बने गोल-गोल घूमें हम कब तक?
आओ, कहीं आज घूरते हैं तिरछा
एक अगिनबान बन कर
इस ग्रह-पथ से दूर!

उन्होंने चिट्ठी मरोड़ी
और मुझे कोंच दिया काल-कोठरी में!
अपनी क़लम से मैं लगातार
खोद रही हूँ तब से
काल-कोठरी में सुरंग!

कान लगा कर सुनो-
धरती की छाती में क्या बज रहा है!
क्या कोई छुपा हुआ सोता है?
और दूर उधर- पार सुरंग के- वहाँ
दिख रही है कि नहीं दिखती
एक पतली रोशनी
और खुला-खिला घास का मैदान!
कैसी ख़ुशनुमा कनकनी है!
हो सकता है – एक लोकगीत गुज़रा हो
कल रात इस राह से!
नन्हें-नन्हें पाँव उड़ते हुए से गए हैं
ओस नहाई घास पर!

फिलहाल, बस एक परछाईं
ओस के होंठों पर
थरथराती सी बची है

पहला एहसास किसी सृष्टि का
देखो तो-
टप-टप
टपकता है कैसे!
-अनामिका

 

 

 

इंटेलिजेंस फेलियर
1795503-oct-8

कुछ और असुरक्षित होती है दुनिया
हर किसी के लिए
हर आतंकी हमले के बाद
चाहे जहाँ भी हुआ हो हमला
जिनकी भी जानें गयीं हों
हमें लगता है कि सोमालिया और उस जैसी जगहों में
होने वाले हमलों का मलबा
कभी नहीं पहुँचेगा
पहली और दूसरी दुनिया तक
उन्हें लगता है कि तेल की खाड़ी से
सारा तेल ले जाकर
वो करते रहेंगे
देशों का पुनर्निर्माण
साम्राज्यवादी तर्ज़ पर
और सबको लगता है
कि कभी नहीं पता चलेगा
ऐसी जगहों में आये दिन
फटने वाले बमों के निर्माताओं का नाम
पता, ठिकाना
दुनिया बँटी रहेगी
सुरक्षित और असुरक्षित खेमों में
इतने यातायात, परिवहन, भ्रमण
और भागमभाग के बीच
उड़ान और ढ़लान के बीच
कि किसी के पास नहीं होता
किसी का नाम
और कितने मेहमान होते हैं हम
दूसरे देशों के वायुयानों में उड़ते हुए
बिल्कुल अजनबी देश के वायुयानों में उड़ते हुए
जिनसे फ़ोन करके हमने पूछा होता है
कि उनके हवाई अड्डों से गुज़रने के लिए
हमें ट्रांज़िट वीज़ा तो दरकार नहीं
कि रोज़ बदल रहे हैं
आने और जाने के नियम
और हमारा पुराना शासक
फिर से बना रहा है पैसे
बना कर ढेर सारे कायदे, क़ानून
और किनकी क्या नाराज़गियाँ हैं
जो पहुँचती नहीं
अंतर राष्ट्रीय वार्ताओं के टेबलों तक
वो जो एक घना सा जाल है
हवा में
अंतर राष्ट्रीय संपर्क और सहयोग का
क्यों टूटा है वह इस बीच बार बार
और कुछ अजीब सा है
ज़मीन पर चलने वाली गोलिओं में भी
जैसे पहचान कर मारे गए हों अजनबी
और जबकि हो रही है तहक़ीक़ात
फूलों से लदे
बंद वातानुकूलित कमरों में
क्या कर रही है
जनता भी
बनाये रखने को
एक दूसरे के जीवन की शांति
-पंखुरी सिन्हा
 

 

 

भीड़ भागती बचके है
1795503-oct-8

संदर्भों को
सब तकते हैं
अर्थ यहां
केवल भॊके हैं।
जिनको ढूंढो
आस-पास में
ताक रहे
उलटे लटके हैं।

गढ़ी हुई
परिभाषाओं में
ढूंढ रहे पहचानें अपनी।
जितना खोजा
चर्चाओं में
प्रतिक्रियायें बोझिल उतनी।
चेहरों पर
अंकित सहमापन
कांच यहां
सारे चटके हैं।

शब्द-शब्द
रिसता
संवेदन।
और दृष्टियां
बस आवेदन।
कथन आज
बस प्रश्न मात्र हैं
उत्तर तो
सारे अटके हैं।

बहुत पुरानी
दीवारों से
विश्वास चिपककर है बैठा।
हुआ धुंऐला
चेहरा उसका
गूंगापन पीकर ऐंठा
चौराहे पर
टंकी दृष्टि से
भीड़ भागती
बचके है
-पंकज मिश्र अटल
 

 

 

चाहो तो,
1795503-oct-8

समय एक अंतहीन नदी
उद्गम का पता न अंत का
बस बहता जाता
एक रोमांच एक अबूझ अहसास
रंगों के इंतजार में कोरा कागज
साज में बन्द अनसुनी धुन
और…
हवाओं की तैरती कब्र में कैद
हम सुनते गुनते इसे
इन्तजार करते उसका
मीत जो दुश्मन जो
बहती धार में डूबते उतराते
बुदबुदों को ले नन्ही हथेलियों में
ताज पहन जा बैठें सिंघासन पर
ख्वाइशों का अस्क नहीं समय
चटक से चटक रंग में भी
रहता मटमैला और धुंधला
पानी का एक बुदबुदा
हाथ लगाते पास जाते-जाते
छूटता, फूटता नित-नित
मौजों पर बहते मौज मनाते
हमने पर यह कब जाना
माटी जो इसके साथ बही
बारबार बनी बिगड़ी
आज भी वही नेह सनी
जिससे थे जन्मे
कभी साथ ना छोड़े
लहर लहर कैसे जिएं
जानना चाहो तो
माटी से सीखो।
-शैल अग्रवाल