हास्य-व्यंग्यः मुर्दे की आँखें-शैल अग्रवाल

मुर्दे ने अचानक आंखें खोल दीं। आज वह खूब सजा हुआ था। बाल कटे थे। सूट नया था और जूते भी चमक रहे थे। आखिर अंतर्राष्ट्रीय बेटे का पिता और अंतर्राष्ट्रीय मुर्दा था वह। बस एक ही तकलीफ थी-सभी मित्र आए थे विदा देने पर वह किसी से बात नहीं कर पा रहा था। और बिना बात किए उसका पेट फूलने लगा था। यह दिल के दौरे वाली बात भी तो यही है कि अंदर की सारी सांसें अंदर ही घुट गईँ। बाहर नहीं आ पा रही थीं। अगर मन की निकाल लेता तो… बीबी ने भी कितनी बार कहा था यही। वह तो लड़ लेती थी बहू से पर वह नहीं लड़ पाता था। आखिर बड़ा रईस व्यापारी ऐसे ही तो नहीं बना, जाने किस किस के आगे दबा और झुका है जिन्दगी भर । हाँ गप्पें और ठहाके मारने का शौक था पान के बीडे की तरह ही उसे। और यहाँ आकर तो खूब हवा मिली थी उसे। चारो तरफ निठल्ले ही निठल्ले थे। भला हो यहाँ की सोशल सिक्योरिटी का कइयों ने तो पचासों साल से कुछ काम ही नहीं किया था।
पर अब उसके चारो तरफ निशब्द सन्नाटा था…और सभी क्रम बद्ध खड़े फूल पत्ती घी जाने क्या-क्या उसके ऊपर चढ़ाकर एक ओर खड़े हो जा रहे थे। उसे याद आया पिछले छह महीने में ही उसने भी कई बार ऐसा किया था। उनके मंदिर की तरह हफ्ते में दो बार जाने वाले सेंटर से पांच परिचितों को यहाँ छोड़ चुका था वह। फिर बस उन्ही की तरह अग्नि में झोंक दिया जाएगा वह भी। और मिस्टर सो एंड सो का नामो-निशान तक मिट जाएगा दुनिया से।

तो क्या यही अंत है जीवन का, इसी के लिए ताउम्र भटकते हैं हम ! हंसी आ रही थी अब उसे खुदपर । अगर पहले से पता होता तो …बिना बात ही इतने दंद-भंद नहीं करता । किस-किस से छुपाया, कैसे-कैसे खेल खेले। पास बुक और कैश जेवर तो पर सब जीते-जीते ही बेटे ने अपने कब्जे में ले लिए थे। विदेश जा बसा था और मिलने आने की अब तक फुरसत ही नहीं मिली थी तो वे ही चले आए थे मिलने । अब क्या पता था कि लौटने की बजाय यूँ ठाट से विदा मिलेगी। पत्नी आराम से कुरसी पर बैठी चाय पी रही थी । बेटे के साथ ही रहेगी अब वह। आखिर उन्हे भी तो नैनी को अच्छे-खासे पैसे देने पड़ते हैं, फिर नौकरानी भी तो यहाँ नहीं मिलती। जाने कब अब इतने आराम और चैन से बैठ पाएगी बेचारी…पूरे साल भर बाद इतने चैन से चाय पी पाई है, वरना तो दिन-रात उसकी ही फरमाइश और तीमारदारी में भागती दौड़ती रहती थी। उसने फिर से ध्यान से देखा। आज तो बाल भी ढंग से कढ़े थे और चेहरे पर भी हल्का सा मेकअप था। हो भी क्यों न आखिर एक मजमा-सा जो जुड़ गया है नाते रिश्तेदार और परिचितों का उसे बिजली घर तक ले जाने के लिए। कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा था उसने इन मिज्ञों को, कितना याद किया था अपने उन बीमार और उदास दिनों में । पर फुरसत ही नहीं थी किसीको कि एक दिन भी आकर मिल जाते। यह वही मित्र और परिचित थे जिनके साथ स्वस्थ दिनों में कहकहे और शराब भरी महफिलें सजती थीं उसकी। तबकी बात और है पर, तब कुछ पैसे रहते थे उसकी जेब में,यूँ ठनठन गोपाल नहीं था वह।

बचपन में आए दिन डांट खाता, बुद्धि की कमी नहीं, पर तितली सा मन उड़ता ही रहता। कभी आई.ए.एस औफिसर, तो कभी डॉक्टर, इंजीनियर, चित्रकार, लेखक…जाने क्या-क्या बनना चाहता था वह इस एक ही अपनी जिन्दगी में। वैसे तो कुछ न बनकर भी ठीक ही जिन्दगी गुजर गई । ठीक क्यों अच्छी गुजरी। अपने घर , अपनी गद्दी अपनी दुकान पर बैठकर बिताई। न किसी की जी हुजूरी न कोई चिन्ता। पर यहाँ आकर तो बुरा फस गया था। पाई-पाई को बेटे का मुँह देखना पड़ता था। पर अब जब इस सीरे पचड़े से जान छूट गई है तो क्यों. परेशान हो रहा है वह। मुर्दे ने सामने टंगी खड़ी देखी अभी दस मिनट और थे चलने में। इस बार माइक पर बेटा घड़ियाली आंसू बहाता दिखा । बगल में खड़ी उसकी पत्नी भी बारबार रगड़-रगड़कर आँखों को पोंछ रही थी पर अंदरूनी खुशी की वजह से दुखी नहीं दिख पा रही थी। यह वही बेटा था जिसने उसकी हर चीज पर कब्जा कर लिया था और पैसे पैसे को तरसाता था उसे। खाने-पीने तक को मनमाफिक नहीं देता था। हर चीज पर ताला रहता था । वह तो अच्छा था जो अमीर देश है यह। और वृद्धों के मनोरंजन के बहाने भरपूर और मनमाफिक खाना हो जाता था उनका इन सेंटर में।

नहीं देखना उसे इनमें से किसी का चेहरा अब।

मुर्दे ने आँखें वापस बन्द कर लीं। अब वह बहुत चैन में था क्योंकि उसे वाकई में कुछ नहीं दिख रहा था। खुश होना और चैन से सोना इतना आसान था – पहले क्यों नहीं पता चला ….पर अब तो बहुत देर हो चुकी थी। उसे तो अब यह भी पता नहीं था कि सब कितने खुश-खुश विदा कर रहे थे उसे। पोती से थोड़ी एकाध आंसू की उम्मीद थी पर वह भी अब सहेलियों से बातों में व्यस्त थी। हम शोक नहीं , ग्रैन की लाइफ सेलिब्रेट कर रहे हैं। पास ही होटल में खाने पीने का बढ़िया इंतजाम है , आना जरूर। हंसहंसकर बता रही थी।
सही उम्र पर जा रहा है वह। और इज्जत से जा रहा है। और तो बस घिसटना ही होता। फिर आजके मिलावटी वक्त में सत्तर पहुंचना भी पहाड़ चढ़ने जैसा ही है।…खास करके अमीर बेटे-बहू के घर में रहकर। …

शैल अग्रवाल