यादेंःआलोक कुमार सातपुते


जीने के लिये मरने की दुआ करता था…

मुझे याद पड़ता है हमारे मोहल्ले बजरंग नगर में एक पानी की टंकी हुआ करती थी। यह टंकी किसी को पता बताने के लिये सबसे अच्छा लैंडमार्क थी। टंकी की दूसरी तरफ़ एक अतिक्रमण-युक्त मोहल्ला फोकट-पारा बसा हुआ था। इस पारे में कुछ “मांग” जाति के लोग बसे हुए थे।ये आमतौर पर बैंड-बाजा बजाया करते थे। इनके बच्चे भी हमारी स्कूल में हमारे ही साथ पढ़ा करते थे। यह वो दौर था जब हमारा परिवार भूखमरी के दौर से गुजर रहा था। हम कोल्ड-स्टोरेज़ जाती हुई बैलगाड़ियों से आलू-प्याज चुराकर उसे भूनकर खाया करते थे। हम अर्थियों के सामने-सामने चला करते थे।अर्थी के पीछे चलने वाले लोग लाई के साथ एक, दो या तीन टिकली,या अधिकतम पांच पैसे के सिक्के फेंका करते थे। हम उसे उठाने के लिए झपट पड़ते थे।

एक बार मुझे बहुत जोर की भूख लगी हुई थी।अर्थी के सामने चलते हुए हम नौ-दस किलोमीटर दूर श्मशान-घाट तक पहुंच चुके थे,लेकिन हमारे हाथ एक भी सिक्का नहीं लगा था।भूख के मारे आँतें कुलबुला रहीं थीं। वापसी में मेरा जी चाहा कि मैं लाई बीनकर खा लूँ।मैं झुककर लाई उठाने लगा,इसपर मेरे मित्र राजेन्द्र ने कहा-अबे ये क्या कर रहा है?मुर्दे के ऊपर से फेंकी गई लाई खाने से भूत पकड़ लेता है।मैंने डरकर लाई वहीं छोड़ दी।

ऊपर उल्लेखित मांग जाति में किसी की मृत्यु होने पर उत्सव मनाने की परंपरा थी। वे मृत्यु का उत्सव मनाते और अर्थी को भी बाजे-गाजे के साथ नाचते-गाते हुए ले जाते थे।चूंकि ये लोग सिक्के नहीं फेंकते थे, सो मुझे इनकी अर्थी में कोई दिलचस्पी नहीं होती थी।मेरे बाकी दोस्त नाचते हुए चल देते थे।नाचने से बेहद तेज़ भूख लगती थी और चूंकि खाने को कुछ होता नहीं था, सो इस कारण भी मैं नहीं जाना चाहता था। बाद में पता चला कि वे इस जर्जर देह के अंत और नये शरीर के जन्म की कामना का उत्सव मनाते थे। मैं चाहता था कि मेरे घर के सामने से ज़्यादह से ज़्यादह अर्थियां गुज़रे… मतलब मैं अपने ज़िंदा रहने के लिये ज़्यादह लोगों के मरने की दुआ करता था। इसके साथ ही मैं यह भी चाहता था कि मांग जाति का कोई भी व्यक्ति न मरे।
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लांघ डारिस सत्तर बरस डोकरा
खोजे-खोजे रे जलेबी मा रस डोकरा
– अज्ञात
मुझे याद आता है कि एक बार मैं ऐसे लोगों के साथ पिकनिक चला गया था, जिनके बारे में कहा जाता है कि उनकी दोस्ती जी का जंजाल होती है। उनके साथ घूमते हुए मैं अचानक खुद को फोर्टी-प्लस( फोर्टी फाइव प्लस) से ट्वेंटी प्लस महसूस करने लगा था। मैंने कुछ दिन पहले ही अपने बालों में डाई लगवाई थी, कुछ तो उसका भी असर था। आश्चर्य की बात यह रही कि मैं पूर्व में भी दो बार उस पहाड़ी पिकनिक स्थलों की यात्रा कर चुका था, लेकिन साथ मे ऐसे रिश्तेदार थे, जो मुझे लगातार मेरी बढ़ती उम्र का अहसास कराते रहे, सो वहां की सीढ़ियां देखकर ही मेरा दम फूलने लगता था और मैं चुपचाप एक जगह छाँव में बैठ जाया करता था। लेकिन उस दिन कुछ ऐसा घटा कि मैं एक सांस में ही सीढियां चढ़ने-उतरने लगा। न सिर्फ़ यह,बल्कि ख़तरनाक पहाड़ी रास्तों को भी नापने लगा था। इस चमत्कार के पीछे आप संग/(कुसंग) को मुख्य कारण मान सकते हैं। बहरहाल मुझे यह भली-भांति ज्ञात है कि मैं वास्तविकता से पलायन नहीं कर सकता, लेकिन छोटी -छोटी खुशियां तलाशने के लिए मन को मुग़ालते में रखना जरूरी है और हमारा यह मन भी भ्रम में ही रहना चाहता है। इस तरह मैंने ख़ुशियों के कुछ पल चुरा लिये वरना तो ज़िन्दगी कृष्ण बिहारी ‘नूर’ के शेर “ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं, और क्या जुर्म है पता ही नह

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
-मिर्ज़ा ग़ालिब
मुझे आत्म-मुग्ध होने के अवसर बहुत कम मिले हैं। मैं अपने जीवन में घटी आत्म-मुग्ध कर देने वाली घटनाओं को अपने जेहन में संजोकर रखना चाहता हूँ। ये मेरी धरोहर हैं। मेरा वर्तमान आत्म-प्रताड़ना का दस्तावेज़ बन गया है। ऐसे में मैं अपने वर्तमान से भाग कर अतीतजीवी हो जाता हूँ। मैं अपनी आत्म-प्रताड़ना का इलाज़ आत्म-मुग्धता में खोजने लगता हूँ। इस कड़ी में मुझे आज कुछ याद आ रहा है।
मेरे एक अफ़सर हुआ करते थे। वे प्रशासनिक शब्दों के बेहद ऊँचे दर्जे के खिलाड़ी माने जाते थे। लोगों का कहना था कि किसी को भी ‘निपटा’ देने के उन्हें सारे दांव-पेंच आते हैं। उनका सारा जीवन इसी में खप गया था। वे जब मेरे अफ़सर बने, तब उनके रिटायर्मेंट में सिर्फ़ दो साल बचे हुए थे। हम दोनों, शुरुआत से ही एक-दूसरे को बेहद नापसंद किया करते थे। चूँकि वे डंडा मारकर या डालकर ‘रचनात्मकता’ बाहर निकालना चाहते थे, इसलिये मुझे वे नापसंद थे।…और चूँकि मेरा यह मानना था कि डंडे से रचनात्मकता नहीं,सिर्फ ‘आह’ ही निकल सकती है,सो मैं उन्हें नापसंद था। हम दोनों रेल की पटरियों की भांति अलग-अलग होकर भी साथ-साथ थे। ख़ैर…एक बार अपने सह-कर्मियों के कहने पर मैं भी दीवाली की शुभकामनाएं देने के लिये उनके साथ उन अफ़सर के चेम्बर में पहुंचा। मेरे साथी कर्मी उन्हें शुभकामनाएं देते और साथ ही उनके चरण भी स्पर्श करते जाते। मेरे लिये यह एक ‘आड’ सी स्थिति थी। चरण-वंदन की परंपरा से मेरा दूर-दूर तक का नाता नहीं था…फिर एक ऐसे व्यक्ति के चरण-स्पर्श करना, जो कि मेरा धुर विरोधी हो,मेरे लिये कल्पना से परे था। बहरहाल मेरी बारी आई। मैंने उन्हें शुभकामनाएं दीं और बेमन से चरण स्पर्श करने के लिये झुकने लगा। इतने में उन्होंने मुझे बीच में ही रोककर कहा…नहीं,तुम्हे मेरे पैर छूने की कतई आवश्यकता नहीं है। तुम मुझसे एक घंटे बाद अलग से मिलना। उनसे ऐसा सुनकर मैं तुरन्त बाहर आ गया।
अब मेरे अन्दर विचारों के झंझावातों ने डेरा डाल दिया था। मुझे लगने लगा था कि शायद आज वह मुझे निपटा ही देगा।यदि उसने मुझे निपटा दिया तो आगे की मेरी रणनीति क्या होगी आदि जैसे कई विचारों के अंधड़ मेरे वजूद पर बुरी तरह से छा चुके थे। मेरे अन्दर शंका,आशंका और संदेह की सुनामी ने मेरी चूलें हिलाकर रख दी थी।आने वाले एक घंटे के मिनट्स मुझे युगों की मानिंद प्रतीत हो रहे थे। जैसे-तैसे एक घंटा गुजरा। अब मैं उनके सामने था। उन्होंने मुझसे कहना शुरू किया- मेरे पूरे सर्विस काल में लोग, यहाँ तक कि बहुत बड़े-बड़े अफ़सर भी मुझसे कहते रहे कि आप के जैसा प्रभावी ड्राफ्ट कोई नहीं बना सकता। आप शब्दों के खिलाड़ी हो।और मैं भी इसी मुगालते में जीता रहा,लेकिन आज मैं पूरी ईमानदारी से तुम्हारे सामने यह स्वीकार करना चाहता हूँ कि तुम शब्दों के जादूगर हो। प्रशासन में लोग दिमाग़ से ड्राफ्ट बनाते हैं लेकिन तुम दिल से बनाते हो।मेरे सामने आज तक ऐसा कोई ड्राफ्ट नहीं आया, जिसमे मुझे पेन न चलानी पड़ी हो, लेकिन तुम्हारा बनाया हुआ ड्राफ्ट बेहद सधा हुआ अपने आपमें परिपूर्ण होता है। मैं पेन खोलता हूँ और वैसे ही बन्द भी कर देता हूँ। गज़ब का फ्लो होता है तुम्हारे बनाये हुए ड्राफ्ट में। वाकई तुम दिल से काम करते हो। तुम्हें पूरा हक़ है कि तुम अपनी शर्तों पर काम करो। मैंने कई बार तुम्हें अपमानित करने के उद्देश्य से कहा है कि तुम्हे काम करना नहीं आता, पर आज मैं तुमसे यह कहता हूँ कि यह कहना कि तुम्हें काम नहीं आता, कुछ-कुछ ऐसा ही है कि कोई मछली से कहे कि उसे तैरना नहीं आता।
इस प्रसंग के याद आने की एक वज़ह यह भी है कि आज फिर मछली से कहा गया है कि उसे तैरना नहीं आता…संभवतः फिश फ्राई की तैयारी है।मछली अभिशप्त है फ्राई होने के लिये।

कला के “साधक” बनाम कला के “दलाल”
मुझे बचपन से ही कला-संस्कृति से लगाव रहा है। मैं “धर्मयुग” और “सारिका”में छपने वाले मॉडर्न स्केचेस को बहुत ध्यान से देखा करता था और उसकी गहराइयों को समझने की कोशिश भी किया करता था। साहित्य की बुनियादी समझ होने के कारण मैं यह बात तो जानता था कि हर “शब्द” का अपना वज़न होता है और हर “शब्द” कुछ कहता भी है। मैं दोस्तों को एक पोस्ट कार्ड लिखने में घण्टों लगा देता था। मैं परफेक्शन पर विश्वास करता था। मैं उपयोग से पहले हर शब्द का रिफ्लेक्शन जांचता था। ख़ैर हर शब्द कुछ कहता है, मैं यह तो जानता था,पर हर “रंग” भी कुछ कहता है, यह मुझे मालूम न था। इसके बारे में मुझे एक बहुत बड़े कलाकार ने बताया। हम दोनों ने एक साथ एमएफ हुसैन की फिल्म “गजगामिनी” देखी। वह पूरे समय उस फिल्म में प्रयोग हुए रंगों की व्याख्या करता रहा। उसके साथ रहते अब मुझे रंगों के रिफ्लेक्शन्स का भी थोड़ा-थोड़ा ज्ञान होने लगा था। इसके बाद एक लम्बे समय तक मेरी उस कलाकार से मुलाकात नहीं हुई। मुझे अन्य स्रोतों से पता चला कि उसने किसी बहुत बड़े संगठन में ग्राफ़िक्स डिज़ायनर की नौकरी करनी शुरू कर दी है। कई बरस बाद एक दिन मैं उसकी बनाई हुई डिजाईन देखने के इरादे से उसके संगठन के कार्यालय पहुंचा। वहां बहुत ही बचकानी सी, रंगों के बेहूदे संयोजन वाली कुछ डिज़ाइनें पड़ी हुईं थीं। उसके यह बताने पर कि ये सारी बकवास कृतियाँ उसने ही बनाई है, मुझे सहसा यकीन ही नहीं हुआ। लेकिन यह बात सच थी। मैंने उसे लताड़ना शुरू किया कि आप जैसे कलाकार को इस तरह का घटिया काम करना शोभा नहीं देता। इस पर उसने बताना शुरू किया-अपनी नौकरी के शुरूआती दौर में मैं दिल से काम करके अपने बॉस को दिखाता था, लेकिन मेरा बॉस मेरी बनाई हुई कृति में इतने सारे सुधार कर देता था कि वह मेरी न रहकर उसकी ही हो जाती थी। उसके उपर भी दो-तीन बॉस थे। वे भी अपना प्रशासनिक काम छोड़ उस कृति की धनिया बोने में लग जाते थे। इस तरह से मेरी कृति का सामूहिक बलात्कार हो जाता था। इसमें उनकी भी कोई गलती नहीं थी। दरअसल मैं उनका नौकर हूँ और मेरे द्वारा किये गए काम को वे अपने नौकर का काम मानते हैं । धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा कि मुझे सिर्फ़ “यस सर” और “जी सर” ही बोलना है। उसके बाद से मैंने अपनी रचनात्मकता का गला घोंट दिया। सिस्टम में एक बात का हमेशा ध्यान रखना पड़ता है कि जो जितने बड़े ओहदे पर है, वह उतना ही बड़ा कलाकार होता है। उसकी व्यथा-कथा जानकार मैंने उससे कहा कि आपको फिर भी अपनी बात तो उनके सामने रखनी ही चाहिए थी। इस पर उसने बड़ी ही बेज़ारी से कहा- भला नौकर की सलाह का क्या मूल्य होगा। आगे उसने बताया कि संवेदनशीलता का ढोल पीटने वाले भी बॉस आये…मुझे लगा शायद अब मेरी कुछ कद्र होगी,पर वे भी वैसे ही निकले। अब मैं पूरी तरह जान चुका हूँ कि बॉस कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक “जात” का नाम है। इससे पहले कि मैं कुछ खेद प्रकट करता,उसने अचानक से विषय बदलते हुए पूछा कि फलां फर्म का नाम सुना है? मैंने कहा हाँ,वो फलां तो एक बहुत ही बड़ी रचनात्मक फर्म है। वह फर्म तो कला के क्षेत्र में मील का पत्थर मानी जाती है। इस पर उसने फुसफुसाते हुए मुझे बताया कि वह फर्म मेरे एक दोस्त की है। मैं उसका बौद्धिक और रचनात्मक पार्टनर हूँ। मैं उस फर्म के लिए दिल से कृतियाँ तैयार करता हूँ और लोग उसे मुहमांगी कीमत पर खरीदते हैं। और तो और मेरी बनाई हुई डिजाईन में काला-पीला करके सत्यानाश करने वाले मेरे बॉस लोग भी उस दोस्त के आगे नाक रगड़ते हैं। वह मेरी ही बनाई हुई कृति उन्हें टिकाकर उनसे मुंहमांगी कीमत वसूल लेता है। मैं कला का “साधक” हूँ, लेकिन मेरा वह दोस्त कला का “दलाल” है। आज का दौर कला की साधना करने का नहीं,बल्कि उसकी दलाली करने का है।
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साकी तूझे इक थोड़ी सी तकलीफ़ तो होगी।
साग़र को ज़रा थाम, मैं कुछ सोच रहा हूं।
अपने शहर में मैं यों तो बहुत से पागलों को घूमते हुए देखता रहा हूं, लेकिन मुझे दो पागलों ने विशेष रूप से आकर्षित किया। उसमें से एक भोला नाम का पागल था। वह हमेशा काॅपी-पुस्तकें और पेन बगल में दबाये घूमता रहता था। उसके बारे में सभी जानते थे कि वह पढ़ाई में बेहद होशियार था, और पढ़ते-पढ़ते ही पागल गया था। वह उस दौर में इंजीनियरिंग का छात्र था, जब इंजीनियर सबसे प्रतिष्ठित पद माना जाता था। भोला के अलावा एक वासु नाम का पागल का किस्सा बड़ा इंटस्ट्रेटिंग था। उसका एक दोस्त दांतों का डाॅक्टर था। एक बार वासु के दांतों में तकलीफ हुई तो वह अपने वह अपने उसी लंगोटिया दोस्त, जिस पर वह सबसे ज्यादह भरोसा करता था, के पास दांत उखड़वाने पहुंचा। उसके दोस्त ने कहा कि दांत उखाड़ने पड़ेंगे। उस डाॅक्टर के पास एनीस्थिसिया खत्म हो गया था, लेकिन उसने अपने पास एनीस्थिसिया खत्म हो जाने की बात न बताते हुए कहा कि एनीस्थिसिया के बहुत सारे साईड इफेक्ट्स होते हैं, इसलिये मैं उसके बिना ही तेरा दांत उखाड़ता हूं। तुझे थोड़ी तकलीफ तो होगी, लेकिन तू एनीस्थिसिया के साईड इफेक्ट्स से बच जायेगा। इसके अलावा तेरी सहन-शीलता की भी परीक्षा हो जायेगी। अपने यार की बातों में आकर उसने हामी भर दी और दांत उखाड़ने के दौरान हुए असहनीय दर्द से उसके दिमाग में केमिकल लोचा आ गया और वह पागल हो गया। तब से वह जिसे भी देखता है कहता है कि तूझे थोड़ी तकलीफ़ तो होगी, पर मैं तेरा दांत तोड़ दूंगा।
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रायपुर का वैभवशाली गवर्मेण्ट स्कूल
मुझे याद पड़ता है कि उस दौर में अमीर से अमीर और गरीब से गरीब बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे और सरकारी अस्पताल में ही भर्ती होते थे। उस समय भी हालांकि प्रायवेट स्कूल थे लेकिन सरकारी स्कूलों में पढा़ई इतनी अच्छी हुआ करती थी कि सभी चाहते थे कि उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढा़ई करे। जिन्हे सरकारी स्कूल में प्रवेश नहीं मिल पाता था वे ही प्रायवेट स्कूल का रूख करते थे। हालांकि कुछ ऐसे लोग उस वक्त भी थे जो अपनी श्रेष्ठता के अहं को तुष्ट करने और गरीब बच्चों की छाया से दूर रखने के लिए अपने बच्चों को प्रायवेट स्कूल मंे पढा़ते थे। वाद-विवाद हो या भाषाण प्रतियोगिता हो हमारे मुकाबले में प्रायवेट स्कूल टिक नहीं पाते थे। प्रतियोगिता के दौरान हम अपने साथियों का उत्साह बढा़ने के क्लास छोड़कर चले जाते थे। प्रायवेट स्कूल के लड़के भी हमारा सम्मान किया करते थे। कुल मिलाकर स्वस्थ स्पर्धा होती थी। आज परिस्थितियां पूरी तरह उलट चुकी है। शिक्षा व्यवसाय बन चुका है। शिक्षा के लिये परचुन की दुकान से लेकर बडे़-बडे़ माॅल के स्तर की दुकान खुल गई हैं जहां से लोग है जहां से लोग शिक्षा खरीद रहे है।
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अट्ठारा खोली की कहानी
रायपुर में पहले बहुत से बाड़े थे। ब्राह्मण पारा और पुरानी बस्ती में भी बहुत से बाड़े थे। हमारे मुहल्ले बजरंग नगर में भी कुछ बाडे़ थे। अट्ठारह खोली एवं खैरखूंट बाड़ा मेरे घर के अगल-बगल में दो-चार घर छोड़ कर थे। इन बाड़ों की खोलियों में बुनियादी सुविधाएं नहीं होती थीं। यहाँ रहने वालों को नहाने-धोने के लिए तालाब जाना होता था, जबकि शौच के लिये खुले में कम से कम आधा किलोमीटर दूर जाना होता था। यहां के निवासी पीने के पानी के लिए पूरी तरह सरकारी नलों पर निर्भर होते थे। हालांकि इन बाड़ों में एक-एक कुआँ आवश्यक रूप से होता ही था। अट्ठारह खोली में भी एक कुआं था, पर उसका पानी खराब था और इस्तेमाल में नहीं लाया जाता था। अट्ठारह खोली का महत्व इसलिये भी था कि होली के दौरान जब मुहल्ले के टपोरी टाईप लड़के फाग गाते तो इसका जिक्र कुछ इस तरह करते थे-तोला ले के जाहूं गोरी वो, अट्ठारा खोली में तोला ले के जाहँू। इस अट्ठारह खोली का एक संकरा सा प्रवेशद्वार था, जिससे लगकर एक पक्का मकान था। प्रायः सभी बाड़ों के साथ एक पक्का मकान होता था। ये पक्का मकान बाड़े का मालिक अपने लिये बनवाता था। ये पूंजीवाद का प्रतीक होता था। हाँ तो अट्ठारह खोली में एक संकरे द्वार से प्रवेश किया जाता था, जिससे बाद कुछ कदमों की दूरी पर खपरे(कवेलू) की छत वाली नौ-नौ खोलियां दोनांे ओर थीं। ये खोलियां बिल्कुल ही एक समान थीं और एक समान आय वर्ग समूह, अर्थात मजदूर वर्ग को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। ये एक-एक कमरे की ही थी। ये खोलियां साम्यवाद और समाजवाद की प्रतीक थीं। इन खोलियों में रहने वाले मजदूरों के बच्चे प्रवेश द्वार पर स्थित पक्के मकान में रहने वाले मकान के बच्चों को सम्मान देते थे। यहां किसी भी कमरे में ताला नहीं लगा हुआ होता था, सिर्फ सांकल भर लगी होती थी। पक्के मकान में रहने वाले परिवार को ऐसा प्रतीत होता था कि वह राजा है,और खोलियों में रहने वाले लोग उसकी प्रजा हैं। एक समय बेहद गुलजार रहने वाली ये अट्ठारह खोली में लोग रहने से कतराने लगे, क्योंकि अगल-बगल के मकान ऊंचे हो गये थे जिसके कारण पर्याप्त हवा-प्रकाश का उसमें अभाव हो गया था। बाद में उसका मालिक अट्ठारह खोली को बेचना चाहता था। उस दौर में प्रापर्टी को बेच पाना भी बड़ा कठिन कार्य हुआ करता था। लोग बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति की जद्दोजहद में लगे रहते थे। अट्ठारह खोली से उलट खैरखूंट बाड़ा था ।यहाँ का वातावरण बड़ा साफ-सुथरा था। यह पर्याप्त हवा-पानी वाला बाडा था। इसके कुएं का पानी बड़ा साफ था।
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आलोक कुमार सातपुते, 832, हाउसिंग बोर्ड कालोनी, सड्डू, रायपुर,छत्तीसगढ़- भारत, मोबाईल-7440598439