मैं तुम्हारा गुनहगार हूँः रूपसिंह चन्देल


माइकी
(१८ फरवरी,२००७ – ३ अप्रैल,२०१९)

तुमने मेरे जीवन के उस रिक्त स्थान को भरा जो सदा खाली रहा था. मेरे अवलंब बन तुमने मेरा जीवन आसान बना दिया था. अपमान,घृणा, उपेक्षा और प्रवंचना के अपने सभी जख्मों को भूल मैं साहित्य और तुममें त्राण पाने लगा था. सच कहूं बच्चे, तुमने मुझे नया जीवन दिया. तुम्हारे प्रेम ने सब कुछ भूल जाने दिया और हम एक-दूसरे के प्रेम में डूब गए. तुम हर बात के लिए मेरी अनुमती लेना नहीं भूलते थे. पहले भी जब छोटे थे और उधम मचाते रहते तब भी सादतपुर वाले घर में ऊपर छत पर जाना होता या नीचे आंगन में तुम तब तक खड़े मेरी ओर देखते रहते जब तक मैं जाने के लिए कह नहीं देता और जैसे ही ’जाओ’ कहता तुम उछलते हुए ऊपर-नीचे पहुंच जाते थे. पिछले एक वर्ष से यह प्रक्रिया अधिक ही हो गयी थी. तुम्हें बेड या सोफे पर बैठना होता या कहीं और तुम मेरी अनुमति मांगते और मेरा इशारा पाकर या ’जाओ बैठो’ कहने के बाद वहां स्थान ग्रहण करते. मुझे वह घटना याद आ रही है. तुम्हें घर आए आठ दस दिन ही हुए थे. तुम सीढ़ियां चढ़ना सीख रहे थे. प्रारंभ में छत की ओर जाने वाली पहली सीढ़ी चढ़े थे और लुढ़कर नीचे आ गए थे. फिर हर दिन और दिन में एक से अधिक बार ऎसा करने लगे थे. एक दिन तुम चार-पांच सीढ़ियां चढ़ गए. चढ़ तो गए, लेकिन उतरने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे. हम सभी तुम्हें ऎसा करते देख रहे थे. खुश थे. नीचे न उतर पाने पर तुम कूं कूं कर रोने लगे थे. हम ताली बजाकर हंसते रहे थे. लेकिन उस दिन के तीन-चार दिन बाद एक दिन तुम धीरे-धीरे अपने नन्हें पांव रखते ऊपर छत तक जा पहुंचे थे. हमें छत पर भी ग्रिल के साथ पटरे आदि रखकर तुम्हें गिरने से बचाने की व्यवस्था करनी पड़ी थी.
सच, तुम्हारे कारण एक शुष्क जीवन हरा-भरा हो उठा था. यह अतिशयोक्ति नहीं कि मेरे जीवन में तुम्हारे प्रवेश के बाद मैंने साहित्य में बहुत कार्य किया. भले ही मैंने ३० नवंबर,२००४ को केवल साहित्य के लिए नौकरी छोड़ दी थी और काम कर भी रहा था, लेकिन ७ अप्रैल, २००७ को तुम्हारे घर आने के चार-पांच माह बाद मेरे और तुम्हारे बीच जो प्रेम पनपा और ताल-मेल बना उसने मेरी जीवनचर्या ही बदल दी.
तुम्हारा आना भी किसी कहानी से कम नहीं. २००७ की होली के बाद कुणाल ने जिद की. मैंने एक-दो मोत्रो से जानकारी ली कि अच्छी नस्ल का श्वान कहां से खरीदा जा सकता है. रमेश कपूर मोतीनगर चुक से पंजाबी बाग की ओर जाने वाले रास्ते कर्मपुरा की ओर कुछ स्थानों के नाम बताए. हम पिता-पुत्र जा पहुंचे उस जगह जहां होशियारपुर (पंजाब) से तुमको लाया गया था. जिस कमरे में हम बैठे हुए थे तुम धीरे-धीरे चलते हुए वहां आकर लुढ़क गए थे ठीक हम दोनों की कुर्सी के सामने. तब तुम मात्र एक माह सत्रह दिन के थे—तुम्हारे नन्हें पैर और फीकी सफेदी लिए बाल (जो समय के साथ गोल्डन ब्राउन हो गए थे) ,बड़ी आंखें और सुन्दर चेहरा कुणाल के मन चढ़ गया और हम तुम्हें गोद में उठाए गाड़ी में आ बैठे थे. तुम इतने प्यारे थे कि गाड़ी से उतरकर घर तक मैंने कितनी ही बार तुम्हें चूमा था. बस उस क्षण से मेरी जान तुममें बसने लगी थी. लेकिन तुमने भी अपनी जान मुझमें बसा ली थी यह कुछ माह में ही स्पष्ट हो गया था.
तुम इतने नन्हें थे कि हम डरते रहे थे कि तुम छत या आंगन के जाल से नीचे न टपक जाओ या नीचे आंगन को जाने वाले जीने से लुढ़क न जाओ. इसके लिए हमने जाल को ढका था और नीचे जाने वाली सीढ़ियों के साथ लकड़ी का पटरा रख दिया था. यही नहीं बराम्दे की ग्रिल के साथ भी ऎसे ही इंतजाम करने पड़े थे. फिर तो तुम अपने नन्हें पांवों से आगे बराम्दे से पीछे कमरे तक लुढ़कते-पड़ते घूमने लगे थे. उस क्षण को याद करके इस क्षण भी रोमांच हो रहा है. तुम्हारे लेटने के लिए हमने एक दरी बिछा दी थी पहली मंजिल के आंगन में जाल के साथ. मौसम गर्म होने लगा था. तुम दिन में हमारे साथ बेड पर पंखे की हवा में लेटते थे. सोते हुए हम बेड पर तुम्हारी सुरक्षा के लिए चाक-चौबंद व्यवस्था करते. बेड से तुम्हारे गिरने का खतरा जो था. जब मैं कंप्यूटर पर काम कर रहा होता या टेबल पर कुछ अन्य काम तब तुम्हें नीचे छोड़ते और तब तुम बाहर आंगन में बिछी दरी पर जा बैठते थे.
तुम्हें यह कतई स्वीकार नहीं था कि तुम्हें अकेले घर में छोड़कर हम कहीं जाते. लेकिन जाना तो होता ही था. तुम हमारे जाते समय बहुत शोर मचाते. लौटने पर हमें तुम्हारे गुस्से का अहसास होता जब तुम हमारे जूते-चप्पलों को पहनने योग्य नहीं छोड़ते थे. एक साल का होने के बाद तुम्हारी शैतानियां बढ़ गयी थीं. तुमने कितने ही कपड़े काट दिए थे. उसी वर्ष के जाड़े में मेरा शॉल भी काट दिया था. आज भी तुम्हारे काटे की निशानी लिए वह शॉल मेरे पास सुरक्षित है तुम्हारे होने का अहसास करवाता हुआ. जाड़े में तुम बेड पर सोते प्रायः मेरे साथ मेरे बगल में. बेटी माशा जब हमारे जगाने पर नहीं जागती थी तब हम तुम्हें कहते, “माइकी जाओ, दीदी को जगाओ” और हमारा इतना कहना भर होता कि तुम उछलकर डबल बेड पर उछलकर चढ़ते और माशा दीदी का चादर पकड़कर खींचकर उसे जगाना प्रारंभ कर देते थे. तुम तब तक उसकी चादर अपने पंजों से खींचते रहते जब तक वह उठकर बैठ नहीं जाती थी और उसके बैठते ही तुम उसके पैरों पर उसका प्यार पाने के लिए लेट जाया करते थे.
अक्टूबर, २००८ की बात है. तुम्हें अकेले छोड़कर हम कहीं गए थे. कपड़ों का स्टार्च का पैकेट आंगन में छूट गया था. दिन में पत्नी ने कपड़ों में स्टार्च किया था. लौटकर आए तब अचभित हुए. तुमने विरोध में पूरा पैकेट खा लिया था. तुम्हारी तबीयत बिगड़ने लगी थी. किसी प्रकार रात कटी थी. अगले दिन सुबह डाक्टर के पास ले गए. उसने मुझे डरा दिया था. दवा इंजेक्शन देने के बाद अगले दिन फिर बुलाया था. अगले दिन एक और डाक्टर की सलाह लेने के उद्देश्य से मैं करावल नगर के वेटेनरी अस्पताल ले गया था तुम्हें. यह अस्पताल घर से गाड़ी से सात-आठ मिनट की दूरी पर था. तीन दिन के अस्पताल के उपचार के बाद तुम स्वस्थ हो गए थे. उसके बाद मैं जब तक सादतपुर रहा उसी सरकारी अस्पताल में तुम्हें आवश्यकता पड़ने पर दिखाने लगा था. लेकिन तीन वर्ष पहले जब हम धारूहेड़ा से सादतपुर गए हुए थे, तुम्हें अचानक बहुत तेज ज्वर हुआ. सरकारी डाक्टर समझ नहीं पाया. वह ज्वर का इलाज करता रहा, जबकि तुम्हारी हालत खराब होती जा रही थी. तब एक मित्र के सुझाव पर मैंने तुम्हें यमुना विहार के डाक्टर धनंजय को दिखाया. डाक्टर ने टिक फीवर की आशंका व्यक्त की थी. तुम्हें १०५ डिग्री ज्वर था. तुमने भोजन त्याग दिया था. पानी भी कठिनाई से पीते थे. रक्त जांच में टिक फीवर ही निकला था. कई दिन लगे थे तुम्हें स्वस्थ होने में. उसके बाद जब भी दिल्ली रहा और तुम्हें कोई परेशानी हुई, तुम्हें डा. धनंजय के पास ही ले जाता रहा.
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तुम्हारी शरारतें याद आ रही हैं. सादतपुर में हमने छत पर वाशिंग मशीन रखी हुई थी. प्रायः शनिवार को कपड़े धोने का कार्यक्रम होता था,क्योंकि कुणाल भी सुबह गुड़गांव से आ जाते थे और उनके भी सप्ताह भर के कपड़े होते थे. धोने योग्य कपड़ों को फोल्डिंग पलंग पर रख दिया जाता. तुम चुपके से कोई कपड़ा मुंह में दाब ऎसे चुप बैठ जाते कि पहले पता नहीं चलता, लेकिन जब ज्ञात होता कि अमुक कपड़ा नदारत है तब तुम्हारी ओर ध्यान जाता और तुम इतना सतर्क रहते कि उस कपड़े को मुंह में दाबे पूरी छत में हमें दौड़ाते घूमते. बहुत कठिनाई से पकड़ में आया करते थे. तुम्हारी इस शरारत पर अंकुश लगाने के लिए हम लोहे की जंजीर लाए थे और ऎसे समय तुम्हें छत के जाल से बांध दिया करते थे, लेकिन तुम्हें बंधन कहां स्वीकार होता. तुम इतना उधम मचाते-उछल उछलकर आसमान सिर पर उठा लेते कि हम परेशान हो उठते. अंततः तुम्हें बंधन-मुक्त करना पड़ता.
मैं दिन में चार बार तुम्हें घुमाने ले जाता था. सुबह पांच बजे, ग्यारह-बारह बजे के मध्य, शाम पांच-छः के बीच और रात दस बजे. एक बार शाम पांच बजे मैं घुमाता हुआ सादतपुर की गली नं दो से निकल रहा था. तुमने अपने को मुझसे छुड़ा लिया और भागने लगे. मैं तुम्हें रुकने के लिए आवाज देता तुम्हारे पीछे दौड़ रहा था. तुम रुकते और जैसे ही मैं निकट पहुंचता तुम फिर भाग लेते थे. ऎसा लगता कि तुम भागने से पहले मुस्कराते थे मानो कहते थे कि पकड़ सकते हो तो पकड़ लो. तुम्हार उस दिन का भागना आज भी आंखों में बसा हुआ है. तुम्हारे भागने की गति बहुत तेज थी—कुलांचे-सा भर रहे थे. मैं तुमसे काफी पीछे होता. मुझे यह भय सताता कि कहीं कोई तुम्हें पकड़कर कार या मोटर-साइकिल में ले न उड़े. पूरे सादतपुर में तुम चर्चा का विषय थे. बच्चे तुम्हें देखते ही ’माइकी—माइकी’ का शोर मचाने लगते थे, जबकि कई लोगों ने तुम्हें खरीदने का प्रस्ताव दिया था. तुम थे भी तो इतना सुन्दर! बहुत ही विनम्रता के साथ मैंने सभी को मना किया था, लेकिन मन में आशंका पैदा हो चुकी थी कि कहीं कोई किसी दिन मुझपर हमला करके तुम्हें छीन न ले. अखबारों में ऎसी घटनाओं के विषय में पढ़ा था और सादतपुर में भी एक घटना ऎसी हो चुकी थी. इस आशंका के चलते जाड़े के दिनों में बहुत सुबह तुम्हें घुमाने ले जाना मैंने बंद कर दिया था. ऎसा ही २०१५ अप्रैल में धारूहेड़ा में सोसाइटी में घटित हुआ जब दो युवकों ने जबर्दस्ती तुम्हें मुझसे छीनने का प्रयास किया था.
तुममें नैसर्गिक विशेषाताएं थीं. तुम्हें चीजों का पूर्वाभास हो जाता था. प्रायः कुणाल शुक्रवार रात घर आते. उन्हें आने में देर हो जाती, लेकिन तुम्हें इस बात का अहसास रहता कि वह आ रहे हैं. जैसे ही कुणाल की गाड़ी पुलिस लाइन के निकट पहुंचती, जो घर से डेढ़ कि.मी. की दूरी पर है, तुम कहीं भी होते, छत पर, पहली मंजिल पर—धड़धड़ाते हुए सीढ़ियां उतरते और मेन गेट के पास जा बैठते थे. हम समझ जाया करते कि कुणाल पहुंचने वाले थे. तुम गाड़ियों के हार्न पहचानते थे. जब भी हमारी गाड़ी गली नं. दो में होती और किसी कारण हार्न बजता तुम दौड़कर नीचे पहुंच जाते थे. दिल्ली में हम जब भी किसी रिश्तेदार के यहां जाते तुम्हें प्रायः साथ ले जाया करते थे. २००८ से ३१ अक्टूबर,२०१२ तक तो तुम नियमित मेरे साथ शाम चार बजे दिल्ली विश्वविद्यालय जाते रहे थे. हम दोनों वहां के कमला नेहरू पार्क में, जो रिज या पहाड़ी नाम से भी जाना जाता है, एक घण्टा घूमते थे. विश्वविद्यालय के छात्रों में तुमने खासी पहचान बना ली थी. लाइब्रेरी के सामने सड़क पर पत्नी को लेने के लिए जब हम पहुंचते कई छात्र तुमसे मिलने आ जाया करते थे. कुछ तो नियमित आकर तुमसे कुछ देर मिलते, तुम्हें प्यार करते, तुम्हारे चित्र खींचते. तुम सर्वप्रिय थे.
सादतपुर में तुम प्रसिद्ध चित्रकार और लेखक हरिपाल त्यागी जी और कथाकार अरविन्द सिंह से इतना हिल-मिल गए थे कि तुम त्यागी जी के निकट बैठ जाया करते थे और त्यागी जी तुम्हारी पीठ पर हाथ फेरते रहते थे. मेरे सभी मित्रो को जानकारी थी कि तुम्हारे कारण मैंने कहीं भी जाना छोड़ दिया था. जाना अपरिहार्य होता तब कुणाल को तुम्हारी देखभाल के लिए अवकाश लेना होता था. कितने ही ऎसे अवसर आए कि तुम और मैं —महीनों घर में अकेले रहे. मुझे एक क्षण के लिए भी तुमने यह अनुभूति नहीं होने दी कि मैं अकेला हूं. तुम साए की भांति मेरे साथ रहते थे. मैं जिस भी कमरे में होता तुम वहीं आ जाते थे. मैं कंप्यूटर में काम कर रहा होता और तुम या तो कुर्सी के निकट बैठे होते या पीछे बेड पर. सुबह की सैर के बाद जब मैं व्यायाम करता प्रायः तुम मेरी चटाई पर आ जाया करते और मुझे रोककर तुम उलट-पलटकर व्यायाम करने का प्रयास करने लगते थे. कठिनाई से समझाकर तुम्हें चटाई से अलग कर पाता था. लेकिन तब भी तुम पास बैठकर मुझे व्यायाम करता देखते रहते थे.
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हमने १५ नवंबर,२०१४ को दिल्ली से धारूहेड़ा शिफ्ट किया था. सादतपुर का घर था और आज भी है. माह में एक बार उसकी देखभाल के लिए जाना होता और हर बार तुम मेरे साथ जाते थे. अंतिम बार तुम नवंबर ,२०१८ में गए थे. उसके बाद मैं यदि गया भी तो शनिवार को जाकर रविवार लौट आता रहा. मेरी अनुपस्थिति में कुणाल तुम्हें देखते और तुम उनके साथ भी प्रसन्न रहते थे. कुणाल को भी तुम बहुत प्यार करते थे, शायद इसलिए भी कि वह सप्ताह में एक बार दो दिनों के लिए धारूहेड़ा या सादतपुर आते थे और शेष दिन तुम उन्हें मिस करते थे. कुणाल जब आते तुम उछल-उछलकर उनका स्वागत करते और जब जाते तुम बहुत चीखते—शायद चाहते थे कि वह न जाए. ऎसा ही तुम तब किया करते थे जब हम सादतपुर रह रहे थे और पत्नी जब ऑफिस से आती तुम उनके इंतजार में मेन गेट पर बैठे होते थे. दरवाजा खोलते ही तुम उनकी साड़ी या दुपट्टा मुंह में दाबकर या हाथ को पोले दाब खींचते हुए पहली मंजिल तक ले जाया करते थे. यह तुम्हारा प्रतिदिन का नियम था. मोहल्ले के लोग उत्सुकभाव से यह सब देखते थे. तुम्हारी एक और आदत थी. जब भी घर का कोई बाहर से आता तुम इतना खुश हो जाते कि नाचने लगते थे और जो भी वस्तु मिलती उसे लेकर भाग लेते थे. खुशी कहूं या गुस्सा व्यक्त करने का तुम्हारा यह बिल्कुल नायाब ढंग था. तुम्हें मनाने के लिए उसी व्यक्ति को जाना होता था. पहले तुम गुर्राते, फिर उस चीज को लेकर किसी दूसरे स्थान पर उसे अपने नीचे दबाकर बैठ जाया करते. शायद यह खुशी नहीं उसके प्रति गुस्सा व्यक्त करने का ढंग था यह तुम्हारा. यहां तक कि जब मैं दुकान से कोई वस्तु लेने जाता तब तुम विरोध व्यक्त करते, लेकिन मैं यह कहकर कि “माइकी, बस पांच मिनट में लौट रहा हूं.” तुम मन मानकर बैठ जाते थे, लेकिन जैसे ही मैं दरवाजा खोलकर अंदर दाखिल होता तुम दौड़कर कोई वस्तु उठाकर कहीं जा बैठा करते थे. कितना अच्छा लगता था तुम्हारा ऎसा करना. घर के लोगों के साथ ही नहीं, घर काम करने आने वाली मेड जब जाने लगती तब तुम शोर मचाते—-शायद इसलिए कि वह वापस न जाए. सादतपुर में हरिपाल त्यागी जी या अरविन्द के जाने के समय भी तुम विरोध व्यक्त करते थे. तुम्हें जिनसे प्रेम हो जाता तुम उनके जाने पर ही ऎसा करते थे.
तुम्हारे नाश्ता-भोजन का समय निश्चित था. सुबह ब्रेकफास्ट के समय तुम प्रायः डाइनिगं टेबल के इर्द-गिर्द घूमने लगते थे. दोपहर एक बजे तुम आकर यह जताते कि तुम्हारे लंच का समय हो चुका. आश्चर्य होता यह देखकर कि घड़ी में ठीक एक बजा होता. मैं प्रायः घर में यह कहता कि माइकी के अंदर घड़ी फिट है. मित्रो को भी इस बारे में बताया था. यही हाल रात भोजन का था. आठ बजते ही तुम आकर कभी मेरे पास तो कभी पत्नी के पास जा खड़े होते थे. और यह सब धारूहेड़ा की बातें हैं. सादतपुर (दिल्ली) में दोपहर एक बजे और रात आठ बजते ही तुम पत्नी के पास जा पहुंचते थे. यदि वह भोजन पकाकर कुछ क्षण आराम करने के लिए बैठी होती तब तुम उसका बैठना कठिन कर देते थे. उसका हाथ पकड़कर खींचते और जब वह उठ जाती तुम आंगन में अपने निर्धारित स्थान पर जाकर भोजन की प्रतीक्षा करने की मुद्रा में आगे के दोनों टांगे खड़ी रखकर उठंग बैठ जाया करते थे.
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तुम्हें प्रकृति से विशेष प्रेम था. कमला नेहरू पार्क में घूमते हुए तुम प्रायः किसी पौधे या किसी फूल के पास रुक जाया करते थे और देर तक उसकी सुगंध लिया करते थे. ऎसा ही धारूहेड़ा आने के बाद मैंने देखा. शाम छः-साढ़े छः बजे घूमकर लौटकर पार्क में पन्द्रह-बीस मिनट बैठना तुम्हें पसंद था. और रात दस बजे घूमने निकलने पर जब तक तुम देर तक पार्क की हरियाली में बैठ नहीं लेते थे घर आने का नाम नहीं लेते थे. रात में तो तुम घर आना ही नहीं चाहते थे. कितनी ही बार मुझे तुम्हें बलात खींचकर लाना पड़ता था. तुमने स्वतः यह संस्कार अर्जित किए थे या मैं जो तुम्हें दिन में चार-पांच बार घुमाने ले जाया करता था उससे तुमने सीख लिया था कि तुम घर में निवृत्त नहीं होते थे. कभी ही जब तुम्हारा पेट गड़बड़ हुआ और तुम अपने को रोकने में असमर्थ रहे तब की बात अलग है वर्ना अपने को रोकने की अद्भुत क्षमता तुममें थी. कभी यदि उलटी कर दी और उसी समय हमने देखा तो तुम कुछ इसप्रकार हमारे ओर देखते थे मानो कह रहे थे “तुमने जानबूझकर ऎसा नहीं किया—गलती से हो गई”. तुम्हारी आंखों में एक अपराधबोधभाव दिखाई देता और जब मैं कहता, “कोई बात नहीं. तुम जाकर आराम करो” तब मैं तुममें सच ही एक निश्चिन्तता देखा करता था. लगता तुम्हारा पश्चाताप दूर हो चुका था.
कई ऎसे अवसर रहे कि मैं आवश्यक कार्य से सुबह निकलकर रात देर से घर लौटा लेकिन तुम मेरी प्रतीक्षा में अपने को रोके रहे थे. यह बात मैं सादतपुर की कर रहा हूं और धारूहेड़ा के फ्लैट में तो प्रश्न ही नहीं था सिवाय एक बार के जब तुम हैजा जैसी बीमारी का शिकार हुए थे यहां. तुम भी क्या करते! डाक्टर भी घबड़ा गया था. लगातार दो दिन तुम्हें ग्लूकोज चढ़ाया गया था—तब भी मुझे लगा था कि तुम साथ छोड़ने वाले हो.
तुम्हारे कारण मुझे घर में बहुत सुनना पड़ता था. तुम्हें सुबह साढ़े छः बजे से सात बजे के मध्य दूध के साथ एक चपाती देता था. यह नाश्ता की पहली किस्त होती. दूसरी तुम मेरे साथ लेते थे. घर वालों को उस प्रक्रिया से परेशानी थी. उस समय मैं एक ग्रास स्वयं लेता और एक ग्रास तुम्हें देता था. तुम बेड पर बैठे होते या नीचे जमीन पर और मैं तुम्हारे सामने कुर्सी पर होता या डायनिंग/कम्प्यूटर मेज पर. यह वर्षों से हमारी आदत में शामिल हो चुका था. मेरे साथ तुम्हारा नाश्ता न करना मुझे अहसास देता कि तुम्हें नाश्ता दिया ही नहीं गया. अपने हाथों तुम्हें खिलाकर मैं संतुष्ट होता और मेरे साथ नाश्ता लेकर तुम संतुष्ट होते थे.
तुम्हारी एक और बात याद आ रही है. तुम आजीवन बैचलर रहे. सादतपुर में कुछ लोगों ने प्रयास किए. लेकिन क्षमता के बावजूद तुम अन्यमनस्क रहे. इसका मनोवैज्ञानिक कारण था. तुम सदा घर में रहे —बाहर जब भी निकले मेरे साथ. यदि तुम्हें बाहर उन्मुक्त घूमने के अवसर दिए गए होते तब शायद ऎसा न हुआ होता. लेकिन तुम्हें लेकर मैं सदा भयग्रस्त रहा. किसी के ले जाने का भय और तुम पर दूसरे जानवरों के हमले का भय. इसी कारण मैं तुम्हें बिना बांधे और हाथ में बिना डंडा लिए घर से नहीं निकला. तुम्हें हल्की छींक भी आ जाती तो मैं तुरंत डाक्टर के पास दौड़ लिया करता था. लेकिन इस बार मुझसे चूक हुई. मैं समझ ही नहीं पाया कि तुम अंदर से स्वस्थ अनुभव नहीं कर रहे. हमने इसी १८ फरवरी को बड़े उत्साह से तुम्हारा जन्म दिन मनाया था. तुम्हारा ग्यारहवां जन्मदिन. अर्थात तुम बारह वर्ष पूरे कर चुके थे. मुझे भ्रम था और इस बारे में घर में देर तक चर्चा भी चली थी. मैं समझ रहा था कि तुमने ग्यारह वर्ष ही पूरे किए थे और मैं बहुत प्रसन्न था यह सोचकर लेकिन जब गणना की तब अपने को गलत पाकर मैं दुखी हुआ था. फिर भी विश्वास था कि मेरी देख-रेख और तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम तुम्हें कम से कम तीन साल मेरे साथ रहने की अनुमति प्रकृति देगी, लेकिन प्रकृति को यह स्वीकार नहीं था.
१५ फरवरी,२०१९ के लगभग तुमने सुबह दूध-चपाती लेने से इंकार किया तो मैंने सोचा कि तुम्हारे मुंह में कुछ तकलीफ है. मैंने तुम्हें सादी ब्रेड दी जिसे तुमने चाव से खाया. १५ को कुणाल और नूपुर गुड़गांव से आए और १६-१७ को भी तुमने बहुत मनुहार के बाद भोजन किया था. कुणाल ने कहा भी कि तुम्हारा स्वास्थ्य शायद सही नहीं वर्ना खाने के लिए आवाज देने पर जिस प्रकार तुम दौड़कर उछलते हुए आते थे वह उत्साह तुममें नहीं दिख रहा. मैंने कहा था कि बुखार लग नहीं रहा. इसपर कुणाल ने एक बार डाक्टर को दिखा देने की सलाह दी. सोमवार १८ फरवरी को तुम्हारा जन्मदिन था.कुणाल और नूपुर को गुड़गांव जाना था. तुम्हारे जन्मदिन के लिए वे कुछ चीजें लेकर आए थे. हमने तुम्हारा जन्मदिन मनाया और उनकी लायी चीजें तुमने चाव से लीं. २० फरवरी को मैं तुम्हें भिवाड़ी (राजस्थान –धारूहेड़ा से चार कि.मी.) डॉ. कुमार विकास के क्लीनिक लेकर गया. भलीभांति चेक-अप के बाद डाक्टर भी समझ नहीं पाए कि तुम्हें समस्या क्या थी. इंजेक्शन और दवाएं देकर कहा कि यदि स्थिति में परिवर्तन नहीं होता तब रक्त जांच करवाना होगा.
तुम्हारी स्थिति यह रही कि कभी तुम बेहद चाव से भोजन करते तो कभी मुंह घुमा लेते और मैं विकल्प तलाशता. २ मार्च के बाद तुम भोजन में उत्साह दिखाने लगे तो मैं लापरवाह हो गया. लेकिन यह स्थिति अधिक दिनों तक नहीं रही. ९ मार्च को मैंने तुम्हारे मोशन में कालापन नोटिस किया. दस मार्च को उसके कालापन में वृद्धि हुई. ११ मार्च को वह इतनी काली थी कि मुझे संदेह हुआ. भोजन तुम सामान्य ले रहे थे. दूध,सब्जी, दाल और चपाती—कभी कभी आटा ब्रेड. एक अण्डा हम नियमित लेते थे. फिर वह कालापन! मैंने दिल्ली के डाक्टर धनंजय से बात की. डा. धनंजय ने कहा कि अंदर कहीं रक्त का रिसाव है तभी ऎसा हो रहा है. मैं एक सप्ताह से यह भी ध्यान दे रहा था कि तुम्हारी शारीरिक क्षमता भी घट रही थी. तुम जल्दी हांफ जाते थे, लेकिन फिर भी उत्साह में कमी न थी. डा. धनंजय ने एक दवा बतायी जो मैं सोसाइटी के मेडिकल स्टोर से ले आया. लेकिन १२ मार्च को तुम्हारी शारीरिक क्षमता आश्चर्यजनक रूप से इतनी कम हो चुकी थी—एक दिन में ही—-कि शाम घूमकर लौटते हुए तुम पार्क में दो बार बैठे. दूसरी बार तुम उठने का नाम ही नहीं ले रहे थे. किसी प्रकार तुम्हें घर ला पाया था. ऎसा लगा था कि मैं तुम्हारे साथ ज्यादती कर रहा था, लेकिन विवशता थी.
मैंने तुरंत डा. कुमार विकास से बात की और अगले दिन तुम्हें लेकर उनके पास गया. जांच के लिए रक्त लिया, इंजेक्शन दिया और रक्त जांच की रपट आने पर उचित इलाज की बात की. शाम चार बजे रपट व्वाट्स ऎप पर मुझे मिली. तुम्हारे हीमोग्लोबिन ५.८ (सामान्य १२-१९ ) और प्लेटलेट्स ५९,००० (सामान्य २ लाख से ६.२१ लाख) थे. घबड़ा देने वाली रपट थी. अन्य और कमियां भी निकलीं. डाक्टर ने दवा के लिए मुझे बुलाया. तुम्हारी दवा प्रारंभ हुई. डाक्टर विकास के अनुसार जो टिक फीवर तुम्हें तीन वर्ष पहले हुआ था यह उसका ही परिणाम था. १५ मार्च को पुनः रक्त जांच करवाना था. १५ मार्च की तारीख मैंने अपनी बायीं आंख के मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए ले रखी थी, लेकिन तुम्हारे बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण मैंने १४ मार्च को डाक्टर को फोन करके आंख का ऑपरेशन स्थगित करने का अनुरोध किया. कुणाल को मेरी आंख के ऑपरेशन के लिए आना था. वह और नूपुर १४ की रात आए. १५ को सुबह मुझे मामूली परेशानी हुई, जिस कारण मैंने तुमको कुणाल और नूपुर के साथ डाक्टर विकास के यहां भेजा रक्त जांच के लिए. यह पहला अवसर था जब तुमने फ्लैट से बाहर जाने से इंकार किया था. तुम दरवाजे से आगे जाना ही नहीं चाहते थे. शायद क्षमता जवाब दे चुकी थी. किसी प्रकार हमने लिफ्ट में चढाया, लेकिन सातवीं मंजिल से लिफ्ट के नीचे पहुंचने तक तुम खड़े नहीं रह सके थे. लिफ्ट में लेट गए थे. हमने किसी प्रकार तुम्हें उठाकर गाड़ी में लेटाया था.
लगभग दस बजे नूपुर का फोन आया. उस समय मैं अपने डाक्टर के पास था. नूपुर ने बताया कि डाक्टर विकास ने तुम्हें गुड़गांव के ’सेसन’ वेटेनरी अस्पताल ले जाने की सलाह दी है. उन्होंने वहां डाक्टर नितिन से बात कर ली थी. तुम्हें तुरंत रक्त दिए जाने की आवश्यकता अनुभव की गयी थी. सेसना बंगलौर बेस्ड अस्पताल है. गुड़गांव में उसकी शाखा है. अस्पताल के पास रक्त डोनेट करने वालों की सूची थी. डाक्टर नितिन ने किसी बंगाली परिवार में तुम्हारे लिए बात कर ली थी. मैं तुरंत सोसाइटी वापस लौटा. कुणाल और मैं तुम्हें लेकर ११.२० बजे गुड़गांव सेक्टर ३८ में सेसना अस्पताल पहुंचे. वहां स्टाफ ने तुरंत कार्यवाई प्रारंभ कर दी . डाक्टर ने हमें आध घण्टा बाद वापस भेज दिया और प्रगति रपट निरंतर देने और तुम्हारी गतिविधि के वीडियो व्वाट्स ऎप पर भेजने की बात कही थी.
तुम्हें तीन बजे जब वे रक्त दे रहे थे उसका वीडियो उन्होंने भेजा. फिर शाम को तुम्हें कुछ खिलाने का प्रयास करता वीडियो और चित्र और शाम सात बजे के लगभग तुम्हारे घुमाने का वीडियो. हम आश्वस्त हुए कि तुम ठीक हो रहे थे. रक्त देने से पहले उस दिन तुम्हारे हीमोगोलोबिन ३ और प्लेटलेट्स २६ हजार बचे थे. रक्त देने के बाद तुम्हारे हीमोग्लोबिन तो बढ़े थे, लेकिन प्लेटलेट्स घटकर २० हजार हो गए थे. अगले दिन सुबह सात बजे मैंने फोन करके तुम्हारी प्रगति जानी. उसके बाद दिन भर मुझे तुम्हारी प्रगति की जानकारी नहीं मिली. शाम सात बजे डाक्टर का फोन आया. प्लेटलेट्स घटने से डाक्टर परेशान थे और उन्होंने तुम्हारा एक्सरे किया था. गॉल ब्लैडर के पास उन्हें कुछ सिस्ट समझ आया. उन्होंने अगले दिन अर्थात १७.३ को मुझे आकर अल्ट्रासाउण्ड करवाने की सलाह दी. यह सुविधा अस्पताल में नहीं थी. उन्होंने अल्ट्रासाउण्ड करने वाले डाक्टर से बात कर ली थी. हम १७ को साढ़े नौ बजे ही अस्पताल पहुंच गए. हमें देखकर तुम हमारे पास आए और हमारे निकट बैठ गए. नर्स तुम्हें भोजन दे रहे थे, जिसमें तुमने रुचि तो ली लेकिन अधिक नहीं. दस बजे हम तुम्हें अल्ट्रासाउण्ड के लिए लेकर गए. अल्ट्रासाउण्ड के डाक्टर यादव मुझे सब दिखाते और बताते रहे. उन्होंने तुम्हारे लिवर में दो बड़ी ग्लैण्ट्स बतायीं और स्पष्ट किया कि उनके अनुसार तुम्हें ९५% प्रतिशत लिवर कैंसर है. हम सदमें में थे, लेकिन वास्तविकता को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.
सेसना में डाक्टर नितिन ने तुम्हें घर ले जाने की सलाह दी. सात दवाएं खाने के लिए और लिवर के लिए लिवोपोल और एक टॉनिक दिया. २१ दिनों की दवाओं का थैला संभाले हम तुम्हें घर ले आए. तुम इतना अशक्त हो चुके थे कि आते ही सोफा पर पसर गए थे. वह चित्र मेरे पास है. तीन दिन बाद तुम्हारा रक्त जांच होना तय हुआ था. डाक्टर विकास के यहां रक्त जांच करवाया और आश्चर्यजनकरूप से तुम्हारा हीमोग्लोबिन ७.८ और प्लेटलेट्स १.६५ लाख पहुंच चुके थे. तुम भोजन भी सही प्रकार लेने लगे थे और घूमने भी जाने लगे थे. यहां तक कि तुम वहां तक आराम से जाने लगे थे जहां पहले जाया करते थे, जो आने-जाने में डेढ़ किलोमीटर पड़ता है. हम सब प्रसन्न थे. तुम ठीक हो रहे थे. तुम्हारे मोशन का रंग भी सामान्य हो आया था. तीन दिन बाद फिर रक्त जांच हुई. लेकिन उस जांच में तुम्हारा हीमोग्लोबिन बढ़ने के बजाए घट गया था और ७.३ निकला था लेकिन प्लेटलेट्स सामान्य से भी अधिक अर्थात ६.२६ लाख पहुंच गए थे. अन्य चीजें भी कुछ सामान्य की ओर थीं, लेकिन हीमोग्लोबिन घटने से डाक्टर चिन्तित थे. तीन दिन बाद पुनः रक्त जांच करवाने पर ज्ञात हुआ कि हीमोग्लोबिन घटकर ६.८ रह गए और प्लेटलेट्स भी दो लाख घट गए थे. स्थिति पुनः पीछे की ओर लौट रही थी. पुनः तुममें कमजोरी आने लगी थी और तुम्हारे मोशन का रंग भी फिर कालिमा की ओर बढ़ने लगा था. यह स्थिति चिन्ताजनक थी. तुम्हारे साथ एक समस्या यह भी थी कि तुम सोसाइटी में फ्रेश होना कभी स्वीकार नहीं करते थे. तुम्हें गाड़ी में बैठाकर मैं जंगल ले जाने लगा था.
लेकिन २९ मार्च से तुम्हारी स्थिति बहुत खराब हो गयी. तुम कुछ कदम चलते और फिर रुककर देर तक खड़े रहते थे. फिर भी चल रहे थे और सुबह से रात तक चार बार निकल ले रहे थे. रात दस बजे सोसाइटी पार्क में भी तुम ३० तक कुछ देर बैठे थे. लेकिन ३१ को तुम पार्क में नहीं बैठे और जल्दी ही घर लौट आए थे. १ अप्रैल को तुम्हारा स्वास्थ्य अधिक ही खराब हुआ. सुबह साढ़े तीन-पौने चार बजे तुम भरभराकर उठे और लड़खड़ाते कदमों से ड्राइंगरूम से पीछे कमरे की ओर भागे थे. मैं भी जाग गया और मैंने पीछे गैलरी का दरवाजा खोल दिया. तुम वहां जाकर बैठ गए, लेकिन मैं समझ गया था कि तुम्हें फ्रेश होना है. तैयार होकर जब मैं तुम्हें लेने पहुंचा तुम मुंह उठाए मेरी ओर ही देख रहे थे. तुरंत तुम्हें बाहर ले गया. तुम्हें उस कार्नर का पता था जहां ऎसे अवसरों पर सोसाइटी के पेट्स को लोग ले जाते थे. तुम तेजी से चलते हुए वहां गए और फ्रेश हुए. लेकिन अपनी आदत से विवश तुम मुझे जंगल की ओर ले जाने लगे. मैंने रोका और तुम्हें समझाकर घर ले आया. लौटकर तुम अशक्त से ड्राइंगरूम में लेट गए थे. सुबह नाश्ता में तुमने दो पीस आटा ब्रेड ली. डाक्टरों ने तुम्हें तीन-चार अण्डे देने की सलाह दी थी. तुम ले रहे थे, लेकिन उस दिन तुमने अण्डा लेने से इंकार कर दिया था. मैंने तुम्हें सारी दवाएं दीं. दवाएं इतनी गर्म थीं कि तुम दिन भर कई लीटर पानी पी जाते थे. उस दिन भी पीना ही था. किसी प्रकार तुम्हें साढ़े ग्यारह बजे बाहर पेशाब करवाने ले गया. उसके बाद तुम जो लेटे तो २ अप्रैल को रात कुणाल के आने पर बलात ले जाने के लिए उठे. हम दोनों तुम्हें गोद में लेकर पेशाब करवाने ले गए, लेकिन तुम्हारे पैरों में ताकत नहीं थी. तुमने एक बार साहस दिखाया और टॉवर के गेट के सामने एक पेड़ पर करने के लिए पीछे का एक पैर उठाया. कुछ बूंद पेशाब ही की थी कि पैर लड़खड़ा गए और तुम बैठ गए थे. कुछ देर बैठे रहने के बाद तुम्हें हमने उठाया. कुछ कदम तुम चले, लेकिन पेशाब नहीं की. हमारी चिन्ता यह थी कि तुम्हें पैंतीस घण्टे हो चुके थे. ढेर पानी तुमने पी रखा था. पेट फूला हुआ था, लेकिन—–अंततः तुम्हें हम घर ले आए थे. देर रात हमने एक बार पुनः गैलरी में प्रयास किया, लेकिन तुम खड़े नहीं रह सके. तुममें ताकत बिल्कुल ही नहीं बची थी.
और ३ अप्रैल की सुबह साढ़े आठ बजे —तुमने उसी स्थिति में इस असार संसार को अलविदा कह दिया था. अंतिम समय से पहले तुम्हारा हमारी ओर देखना—अंदर तक छील देता रहा था. अंतिम यात्रा के लिए प्रयाण करने से पहले तुम शायद कुछ कहना चाहते थे. तुमने कभी मुझसे कुछ नहीं कहा था और न कभी कुछ चाहा था. जो खिलाया वह खाया और जो पहनाया (जाड़े के दिनों में) वह पहना, जहां ले जाना चाहा खुशी से गए. बल्कि जब भी हम दिल्ली जाने की तैयारी कर रहे होते या दिल्ली से धारूहेड़ा आने की तब तुम बेहद विकल हो इधर-उधर घूमने लगते थे. शोर मचाते थे. गुस्सा दिखाते हुए मेरी चप्पलें उठाकर डायनिंग मेज के नीचे बैठ जाया करते थे. तुम्हें भय रहता कि कहीं हम तुम्हें छोड़ न जाएं. लेकिन उस दिन तुममें इधर से उधर होने तक की ताकत नहीं बची थी. तुम स्थिर एक ही दिशा में आंखें बंद किए लेटे हुए थे. और जब कुछ हलचल सुनते तब आंख खोलकर भरपूर हमारी ओर देखते और वह देखना मुझे अंदर तक हिलाता रहा था. तुम तो चले गए, लेकिन सोचो तुम्हारे पीछे मेरा क्या हाल हुआ और होगा—–
बेटे, यह तो प्रकृति का नियम है. सभी को एक दिन जाना है. मैं तुम्हारा गुनहगार हूं कि मैंने प्रारंभ में तुम्हारी बीमारी को गंभीरता से नहीं लिया. मुझे इस बात का भी अफसोस है कि मैं जहां तुम्हारा अंतिम संस्कार करना चाहता था वहां नहीं कर पाया. मैं चाहता था कि तुम्हारा अंतिम संस्कार नीमराना (राजस्थान) के निकट ’कोट रेजीडेन्स” के अपने प्लॉट में करूं, जहां माह-दो माह में जाकर तुमपर फूल चढ़ा सकता, लेकिन घर वाले तैयार न थे. वह स्थान धारूहेड़ा से ७५ कि.मी. दूर है. अंततः डाक्टर विकास ने अपने क्लीनिक के निकट खाली पड़े प्लॉट में वह व्यवस्था की और तुम्हें सुपुर्द-ए-खाक करके हम दस बजे तक घर लौट आए थे. लौटकर मैं जिन्दगी में पहली बार रोया था और देर तक रोता रहा था. आज भी रो ही रहा हूं. यह पीड़ा मुझे सदा परेशान करती रहेगी.
माइकी, मैं तुम्हारा कृतज्ञ हूं कि तुमने बारह वर्षों तक मेरा साथ दिया. ऎसा साथ जो किसी से भी मुझे नहीं मिला. तुम प्रतिदिन सुबह और रात सोने के समय मुझे याद आते हो और आजीवन आते रहोगे. मैं हर सुबह सैर के बाद पार्क के उस कोने में जाकर कुछ देर बैठता हूं जहां बैठना तुम्हें पसंद था और उन क्षणों को याद करता हूं जो तुम्हारे साथ वहां गुजारे. मेरी यादों में तुम अमर हो.
अश्रुपूरित शृद्धाजंलि मेरे बच्चे.


रूपसिंह चन्देल
फ्लैट नं.७०५, टॉवर-८, विपुल गार्डेन,
धारूहेड़ा, हरियाणा-१२३१०६
मो. ८०५९९४८२३३