मृदुला सिन्हाः पद्मा मिश्रा

घर परिवार समाज के बीच धुरी बनी नारी अपनी सम्वेदना त्याग करुणा एवम समर्पण को नये आयाम देती आधे अधूरे सपनों को साकार करती है । वह विमर्श का मुद्दा बनती जा रही है लेकिन उसमें कितना दम है, संकल्पों को साकार किए जाने की समाज में कितनी उर्जा और कितना दृढ़ निश्चय है, यह एक प्रश्न बना हुआ है।
साहित्य सन्स्कृति का वाहक होता है , दोनो मिलकर एक विलक्षण व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। यदि ये दोनो गुण एक ही व्यक्ति में समाहित हो और वह एक राजनयिक भी हो तो बात सचमुच उल्लेखनीय हो जाती है । श्रीमती मृदुला सिन्हा राज्यपाल गोवा पिछले दिनों डा जूही समर्पिता और डा मुदिता चंद्रा द्वारा संपादित पुस्तक नारी विमर्श एवम सिनेमा के लोकार्पण के लिये हमारे नगर जमशेदपुर में पधारी तो नारी विमर्श के मायने ही बदल दिये । वर्षो से नारी शोषण व उत्पीड़न के नाम पर आन्दोलनरत महिलाओं के अपने घर परिवार से कट कर जिम्मेदारियों से मुक्ति का नाम नारी विमर्श नहीं है अपने वक्तव्य से यह सिद्ध कर दिया। उनकी बातें सीधे सीधे दिल में उतरतीं रहीं । सरल हास्य का पुट देकर कही गई उनकी बातो ने जो असर दिखाया वह एस एन टी आई के सभागार में सबकी प्रसन्नता एवम उल्लास से बजती तालियों ने सिद्ध कर दिया था । उनके सृजन में नारी घर परिवार से दूर नहीं होती बल्कि उनसे जुड कर ही अपने सपनों के आकाश का निर्माण करती है।

उनके उपन्यासों नई देवयानी ‘ सीता पुनि बोली ‘ ‘ मात्र देह नहीं है औरत’ जैसी कृतियों में नारी के त्याग समर्पण के साथ साथ पति के कंधे से कंधा मिलाकर जीवन की हर चुनौतियों का डटकर सामना करने का साहस भी है । सीता पुनि बोली नामक उपन्यास में सीता के चरित्र को एक नये रुप में दर्शाते हुए आधुनिक समाज के प्रसंगों के साथ जोडकर जो कथा प्रस्तुत की गई है वह सीता और राम के संबंधों को एक नई परिभाषा देती है, साथ ही नारी के अंदर समाहित ऊसकी ऊर्जा सम्वेदना ममत्व पारिवारिकता को जगाती भी है। मै उन्हें सुनते हुए बातचीत करते हुए अभिभूत थी । इसके पूर्व मृदुला सिन्हा जी के केवल लेखकीय और राजनयिक रूप को ही जानती थी पर आज उनका साहित्यिक रुप मेरे मानस पटल पर अपनी गहरी छाप छोड़ रहा था । साहित्य अमृत नामक राष्ट्रीय पत्रिका में प्रकाशित मेरी कविता को पढ कर जब उन्होंने मुझे फोन कर बधाई दी और आशिर्वाद भी दिया तो मै सहसा विश्वास नहीं कर पाई थी तभी उन्होंने बताया कि वे जमशेदपुर आरही हैं और मिलेंगी । उनसे मिलना सचमुच एक सुखद अनुभव था। मेरी किताबें देख बहुत खुश हुईं और मेरी डायरी में लिखा- अपनी सशक्त लेखनी पर विश्वास रखो़, मन की आंतरिक संवेदना से लिखती रहो़। आशिर्वाद । मैं जीवन भर उनके इस स्नेहाशीष के लिये आभारी रहूँगी । धन्यवाद जूही दी , मुदिता दी आपने इतना सार्थक सुअवसर उपलब्ध कराया।

संयोग से सहयोग संस्था में ही उनका कार्यक्रम था जिसमें मै मीडिया प्रभारी हूँ। शायद जमशेदपुर के इतिहास में यह एक ऐतिहासिक घटना थी । अपने उपन्यास सीता पुनि बोली के संदर्भ में सीता के विषय में बोलते हुए सीता और राम के संबंधों मे समाहित असीम त्याग समर्पण की भावना को नये रुप में परिभाषित भी किया था । एक लोकगीत भी उन्होंने मंच से गाया था़। सीता धरती में गैली समाय मुख से ना बोलेली हो । स्वर भी मधुर और भाव भी मधुर। सब कुछ मन को छू गया था। पद की गरिमा का अहंकार उन्हें छू भी नहीं गया था। बेहद अपनी सी घर परिवार की बुजुर्ग सा स्नेह लुटाता व्यक्तित्व, अपनी थरती अपनी जडोँ से जुड़ा हुआ उनका मन,अपनी संस्कृति को संजो कर रखने के लिये जैसे कृत संकल्पित था । पत्रकारों द्वारा पूछे गए एक प्रश्न -आजकी राजनीति इतनी गंदी है इन सबसै निर्लिप्त रहकर आप साहित्य सृजन कैसे कर पाती हैं? जवाबमे उन्होंने कहा कि हम महिलाएं जब चावल साफ करती हैं तो उनमें से कंकरौ को चुन कर फेंक देतीं हैं और शेष चावलों से जो भात बनता है वह बहुत मीठा होता है वैसे ही इस राजनीति से कुछ मुट्ठीभर गंदे कंकरों को निकाल फेंकना है फिर सब अच्छा ही होगा ।

साहित्य से ईतर जूही दी के घर पर नाश्ते के समय भी अनेक मनोरंजक प्रसंगों से हमें प्रभावित किया और खुलकर अपने अनुभव और अपना स्नेह बांटा । उस समय उपस्थित
सभी के साथ हास परिहास करती खाती रहीं । साथ ही यह भी बताया कि गोआ में सब मिलता है लेकिन पटल नहीं, पटल उन्हें पसंद है ।

बेहद सादा भोजन सादगी भरी वेशभूषा और मुख पर मोहक मुस्कान जीवन भर याद रहेगी । लगा कि अगर एक कुशल राजनयिक अच्छा साहित्यकार और अपनी संस्कृति से जुड़ा हो, अपनी जडोँ को न भूल देश समाज की सेवा में निरत हो, इससे गौरवपूर्ण और कुछ हो ही नहीं सकता । उनके सुंदर स्वास्थ्य, सुंदर सृजन और सुंदर राजनैतिक आकाश के लिए अनंत शुभकामनाएं।

पद्मा मिश्रा जमशेदपुर