माह विशेषः निर्जन की मुरली


मौन बोलता रहा
…………
गुलाब का पौधा हमने
इक लगाया,
खाद पानी देकर,
काट छांट के बढ़ाया,
दो फूल खिले उसमें
संवाद के बिना ही,
संवाद हुए उनसे,
हम देख ते रहे
मौन बोलता रहा।

सूरज उदय हुआ जब,
किरणो का जाल फैला
पूरब में सोना बिखरा
सूरजमुखी का चेहरा,
सोने की तरह चमका
उसने चेहरा घुमाया
सूरज का हाल पूछा
और अपना बताया,
संवाद के बिना ही
संवाद हुए उनमे,
वो देखते रहे
मौन बोलता रहा।

गरमी की तपती रात में
बिस्तर लगा के छत पर
हम सोने को लेटे थे
चांद तारे हम से
कुछ कहने को उत्सुक थे
सोने ही नहीं दिया हमे
बाते बहुत करनी थी
संवाद के बिना ही
संवाद हुए उनसे
हम देखते रहे
मौन बोलता रहा।

कुहासे की चादर तनी थी,
कमरे में बंद हम थे,
बाहर बगीचे मे
जाकर देखा
पौधे डरे सिमटे थे।
धूप के एक कतरे के
इंतज़ार में वो खड़े थे ।
ओस कण लुढक रहे थे
सूरज की पहली किरण
जैसे ही उन पर पड़ी वो
उससे बाते कर रहे थे।
संवाद के बिना ही
संवाद हुए उनके
मौन बोलता रहा,
मौन बोलता रहा……
बीनू भटनागर

लौटना
…..

बरसों बाद लौटा हूँ
अपने बचपन के स्कूल में
जहाँ बरसों पुराने किसी क्लास-रूम में से
झाँक रहा है
स्कूल-बैग उठाए
एक जाना-पहचाना बच्चा

ब्लैक-बोर्ड पर लिखे धुँधले अक्षर
धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहे हैं
मैदान में क्रिकेट खेलते
बच्चों के फ़्रीज़ हो चुके चेहरे
फिर से जीवंत होने लगे हैं
सुनहरे फ़्रेम वाले चश्मे के पीछे से
ताक रही हैं दो अनुभवी आँखें
हाथों में चॉक पकड़े

अपने ज़हन के जाले झाड़कर
मैं उठ खड़ा होता हूँ

लॉन में वह शर्मीला पेड़
अब भी वहीं है
जिस की छाल पर
एक वासंती दिन
दो मासूमों ने कुरेद दिए थे
दिल की तसवीर के इर्द-गिर्द
अपने-अपने उत्सुक नाम

समय की भिंची मुट्ठियाँ
धीरे-धीरे खुल रही हैं
स्मृतियों के आईने में एक बच्चा
अपना जीवन सँवार रहा है …

इसी तरह कई जगहों पर
कई बार लौटते हैं हम
उस अंतिम लौटने से पहले

सुशांत सुप्रिय


किस्से
—–
बड़े चाव और गुरूर के साथ
बिहार के गाँव, शहरों में
सुनाये जाते हैं
दही को गमछे में बाँध कर
लाने, ले जाने के किस्से
लड़कियों की शादियों पर
भेजने, भिजवाने के किस्से
दही अच्छा बताया जाता है
स्वाद से नहीं
ठक ठक की आवाज़ से
यानि उस खटखटाहट की आवाज़ से
जो प्रतीकों में बताती है
दही का जमना
जो पैमाना है
ये मापकर देखने का
कि काठ सा सख्त
ठक ठक जम गया है दही
कुछ घरों में
बच्चे कटोरी उलटकर
देखते हैं
कितना जमा दही
और गमछे में भी
उलटा जाता है दही
मिटटी की हाँड़ी में जमाकर
और कपड़े, गमछे के बर्तन को
खटखटाने की आवाज़ नहीं होती
मिटटी की हाँड़ी सी
ये ठक ठक जमे दही का गुण
दरअसल आँखों से देखा जाता है
कान से सुना नहीं………..

पंखुरी सिन्हा


किरन के नाम

सुबह-सुबह को भेंट गई शाम की चुभन,
उस किरन के नाम कोई पत्र तो लिखो।

खुली जो आंख तो लगा कि रूप सो गया,
साथ जो रहा था आज वह भी खो गया।

देह-गंध यों मिली कि दे गई अगन,
उस अगन के नाम कोई पत्र तो लिखो।

मन किराएदार था रच-बस गया कहीं,
तन किसी का सर्प जैसे डंस गया कहीं।

हम मिले तो साथ में थी सब कहीं थकन,
उस थकन के नाम कोई पत्र तो लिखो।

मोड़ पर ही आयु के था वक्त रुक गया,
दूर चल रहा था पांव वह भी थक गया।

बांह में था याद की सिमटा हुआ सपन,
उस सपन के नाम कोई पत्र तो लिखो।

– तारादत्त निर्विरोध

सुनो,
….
सुनो, क्या करोगे उसे बुलाकर
बहुत पैसे खर्च होंगे उसके
फिर…पता नहीं
मिल भी पाऊँ या नहीं
वैसे भी
आंखें बंद तो सब बंद
तू भी तो बेटी जैसी ही है
आ गले लग जा
सुन , कहना उससे
अबतक तो ख्याल रखा था
अब आगे नहीं रख पाऊँगी
खुद ही आकर संभाल ले
घर भर में बिखरे
अपने इस सामान को
जानती हूँ
कुछ नहीं बचेगा
बावरी के लिए
खुली आंखों की ही
तो माया है पर सारी…

कितनी हाय थी
पूरा घी भरा कनस्तर
चौके से निकला
कितनी नई साड़ियां
पेटीकोट ब्लाउज
अम्बार था हर चीज का
मैंने कहा बांट दो
लेप-लपेट दो इसी पर
किसके काम की हैं अब
नगाड़े सी फूल गई थी
सीढ़ी नहीं पट्टा लाओ
पीठ रह जाएगी कैसे उठाओगे
ठेला ले लो नहीं तो…
बड़ी सी सिंदूर की बिन्दी
माथे सजाए
बड़े प्यार से उढाई थी
गोटा लगी लाल चूनर
तेरे बाप ने उस पर
कहते हैं धू-धू जली थी
उंची उंची लपटों में
खुश खुश गई वैसे सुहागिन
आशीष देती हुई
जलती चिता पर भी
दांया हाथ ऊपर उठा
दूर से ही दिखता था
जितने मुंह उतनी बातें थीं
पत्थर सी सुनती रही सब
सैकड़ों पत्थरों के नीचे दबी
हवा में तैरती रहीं हजार यादें
कितना सहा होगा
कितना पुकारा होगा मां ने उसे
जानती थी बेटी
लौटा दिया दूधवाली का कंठा
बिना किसी लेन देन के
सामान तो पलटकर देखा तक नहीं
हिसाब किताब बराबर
कह दिया बहते आंसुओं से

बहुत प्यार करती थीं अम्मा तुमसे
अशीषा था तब दूध वाली ने भी उसे
रूपया पैसा तो धीरे धीरे हम दे ही देते
पर खुश रहो बिटिया तुम, आई हो तो अब
कुछ दिन रहकर ही जाना,
दो दिन पहले ही आ जातीं
अभागिन थीं जो मुंह तक न देखा
देवी सा दमकता था माँ का चेहरा
हम ही तो नहलाए थे…
तूफानी वह पल आया और तोड़ गया
अस्तित्व की छत
घर के अपने सब कहाँ थे पर
पूछ तक न पाई वह आंसू डूबी

….
फिर वही लौटना
फिर वही चोट दोबारा
वही एक ग्लानि और
गुम हो जाने का अहसास
यूँ रोने से क्या फायदा
आंसू रहित जलती रहीं आँखें
हवा में तैरती रहीं हजार बातें
बेटियों को तो जाना ही पड़ता है दूर
फिर वक्त कब ठहरा है किसी के लिए
बदल ही जाती हैं
परिस्थितियाँ और इन्सान
देख हम हैं ना अब तेरे अपने…
बिखर गई किरच-किरच पर वह
खुद को ही समेटते-सहेजते

सुनो, कुछ मत बताना
बर्दाश्त नहीं कर पाएगी
कहा था पापा ने जाने से पहले
ये कुछ चिठ्ठियाँ हैं
जो लिखी थीं मैंने
हर हफ्ते डाल दिया करना बस एक
बहली रहेगी,
फिर भी कभी
अगर पता चल ही जाए
तो कोशिश करना
बना रहे उसका मायका
……

जब जब मौत ने बहलाया
यूँ ही तो भटकाती जिन्दगी
कैसा राग-वैराग है यह
बिना मां बाप के भी पर
मायके जाने को अभिशप्त बेटियाँ
भाइयों के लिए कतार में खींची
जौ के दानों की वह फसल
खींचती ही रहेगी इन्हें
खंडहर की राख से ही लीपकर
रख आती हैं जाने कितने प्रेमपत्र
धधकती उस आंच के सिराहने
गीली आंखों से बांचती जिन्हें यह
आज भी पलट पलटकर
नित- नित ही झुलसी-तिरकी …
शैल अग्रवाल


जमीन पर पुरानी दरी
……………
वे थे तो सब कुछ था
रिश्‍ते समझ में आ जाते थे
चीज़ों के भी
भावुक भी हुआ जा सकता था

वे थे तो एक छाता था
दुर्दिनों की बेतहाशा बारिश में
अभावों की धधकती धूप में
महज एक ओट की जरूरत में भी
खोल सकते हैं—इस भरोसे का छाता
एक दंभ था,
सिर पर तने होने का उसके

एक छत्र के नीचे हम राजपुत्र होते थे
भले ही रहे हम खुरदरी
जमीन पर पुरानी दरी

हम चार पाये थे, वे चौकी का पटिया
चार थूनियॉं थे हम, वे मचान
हम चार दीवारें
तो वे हम पर छत की तरह थे
पिता नहीं, अब तो चौकी नहीं
मचान या छत भी नहीं,
ओट नहीं, न ही वह एक मात्र आश्रय
और हम: न पाये, न थूनियॉं, न दीवारें

चार हैं, पर लाचार
जैसे तस्‍वीर निकल जाने के पश्‍चात
चार खंड फ्रेम , विखंडित होता हुआ।

ओम थानवी

आज भी
……
आज भी तारों की छैया में
मुस्कुराता है एक चेहरा
बाहें फैलाए प्यार से एकटक देखता
पर उदास ठिठकी खड़ी लड़की के
पास आकर अब आंसू नहीं पोंछता
माथे और बालों को फिर फिरके नहीं सहलाता
‘देख, तेरे मन का क्या क्या बनाया है’
कहकर नहीं बहलाता फुसलाता कोई इसे
नहीं कहता अब चाहे कितना भी रो ले यह
‘यूँ चुपचुप न रोया कर, बहुत दुखता है मन मेरा’
आज भी तो नहीं सीख पाई पर बावरी
हंसी का सामान बनी अटपटी-सी लडकी
जोरजोर से कहकहे लगाना
खुलकर जीना, भीड़ के साथ चलना
मान अपमान हर दर्द को ठुकराकर
खुद को बहलाना और मुस्कुराना
सच तो यह है कि तुम्हारे बाद
ना तो ठीक से हंसी और ना ही रोई कभी
कितना अकेला कर गई हो पर तुम इसे
इतना प्यार भी तो ठीक नहीं
चाहे मां का ही क्यों न हो
जो दुनियादारी ही भुलवा दे
भिखारी को शहंशाह की गद्दी पर बिठा दे
आज फिर आंसू भीगे चेहरे से ही उठी है यह
आज फिर वही तारीख है, एक उम्र गुजर गई
इतने वर्ष कम तो नहीं सब भूल जाने को…
अगर इतनी ही हठीली हैं ये यादें
तो याद क्यों नहीं ऱख पातीं
आंसुओं की नदी बनकर बहाने से पहले
जाना ही पड़ता है सभी को एकदिन
प्यारे कुप्यारे अपने बेगाने सभी छोड़कर
कुछ ज्यादा ही बेवकूफ लगती है मुझे तो
तुम्हारी यह जिद्दी लाडली बेटी
कभी बड़ी न होने की कसम खाए जो बैठी आज भी अकेली ही आँसू पीती ..
-शैल अग्रवाल-


‘लो मटकेSSS’
……
मटकों के जल से भी
शीतल अधिक ही था
स्त्री का आलाप
कि मई का मन होने लगा था
मटकों की ठंडक में हलक तक
डूब कर मर जाने का

आइसक्रीम खाने पर स्टिकर मुफ़्त थे
कोल्ड ड्रिंक का ढक्कन
इनामों में खुलता था
पंखों-कूलरों पर छूट बहुत भारी थी
रेफ्रीजरेटरों के दाम
पानी के मुकाबले
घटा दिए गये थे
डंकल और गेट के भभकों से
पसीने-पसीने था पूरा प्रतिपक्ष
ऐसे में सुना मैंने शहर में
सिर्फ़ एक साहस का स्वर-
‘लो मटकेSSS’।
ओम थानवी


कुछ पुराने पेड़
……….

कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी तक गाँव में
यादों के पीपल लहराते खड़े हैं यूं ध्यान में
सघन बदली दबे पाँव आती लुटाती कोष जब ,
कुछ नमी लिए संध्या छम से उतरती छाँव से !
अमुवा बगिया से सरसराती बयार, धीमे बहती
कोयल कूकती सुनाती गीत मीठा महुवे की डाल से
मयूर टेर उठती बरखा जल लिए ठुमकती मोरनी,
किसे लुभाती ‘ के आऊँ ‘, मोरनी चपल चलती शान से !
मोर संग चलती मोरनी प्रकृति की विजय सी सामने !
मेरे गाँव के पेड़ों से लिपटी हैं ये अनगिनत कहानियां
कुछ सुनीं दादी से रात में दुबक कर गोद में कम्बल लपेटे
कुछ घड़ी मन ने मेरे , शैशव से चलीं, फिर, बदलीं
कितने खेल खेले, मिटाए, कुछ बनीं अपने आप भी
याद है, कौन वो , नित आता दूर से चल कर वहाँ पर
पेड़ की ओट से छिप निहारता मूक मौन जो है खड़ा
पोखर पे मधुरिमा खडी थी औ’ जल में छाया पडी थी !
कब भूल सका है मन, खत, उसके बहाए उसी जल में !
डोली उठी वो दुल्हिन बनी पराये देस जा कर बस गयी ।
आज भी थामे डालियों को देखता सूने पथ को मैं अकेला
फिर फिर याद आते हैं घर आंगन के वे विस्तृत पेड़ सारे
दादा की धूप सी खिलती हंसी औ ‘ राज गद्दी , चारपाई
दादी ने जो सुखायीं अमिया मिरच, आंगनकी धूप में
ये पुराने पेड़ नहीं, हैं मेरे बचपन के वे हैं संगी साथी
छूटे कुछ, कुछ आबाद हैं लिए संग अपने नाते – नातिन !
– लावण्या-


याद करें
…….
याद करें बचपन के दिन ,
यादें अकुलाये तुम बिन ,
उतरे चंदा मामा ,दूध कि कटोरी में ,
मचली निंदिया रानी -अम्मा की लोरी में ,
बतियाँ बनाने के दिन ,
याद करें बचपन के दिन ,
आंगन की सीमा पर -लड़ते झगड़ते थे
घरौंदों के खेल में टूटते खिलौने थे ,
रूठने मनाने के दिन ,
याद करें बचपन के दिन ,
गुड़िया की चुनर में रंग नए भर लाएं ,
कागज की नावों को पानी में तैराए
रिमझिम बरसातों के दिन ,
याद करें बचपन के दिन ,
सूनी दोपहरी में ,आम के बगीचों में ,
टूटे खंडहरों में ,ताल में -तलैयों में
छुपने छुपाने के दिन ,
याद करें बचपन के दिन ,
छोटे छोटे सपनो में ,खिलता था वो बचपन ,
आसमान छूने को मचल मचल जाये मन ,
ऊंची उड़ानों के दिन ,
याद करें बचपन के दिन ,
टूटे खिलौनों पर आँखें क्यों भर आईं ?
डाली से बिछुड़े ज्यों बहना से हर भाई ,
सावन की राखी के दिन ,
याद करें बचपन के दिन ,
रूठने मनाने की बातें पुरानी हैं
भूलेंगे कैसे हम ,यादें आनी-जानी हैं
यादें रुलाएं तुम बिन ,
याद करें बचपन के दिन ,
–पद्मा मिश्रा

कहानी
……
हर एक ज़िन्दगी ही,
एक कहानी होती है।
एक दूसरे से अलग,
ज़िन्दगानी होती है।
किसी घटना को याद करके,
चाहें संस्मरण लिख डालो,
या आत्मकथा लिखके,
उपन्यास बनालो।
ज़िन्दगी के हर मोड़ पे,
नये किरदार मिलते हैं,
नई घटनायें घटती हैं,
कछ अनुभव होते हैं।
सभी ख्वाहिशें किसी की,
पूरी होती हैं क्या कभी!
तृप्ति काअहसास होता है,
कुछ पल के लिये,
फिर कोई नई राह मिलती है
चलने के लिये।

पूरी कहाँ कोई कहानी होती है।
अधूरेपन का अहसास न हो तो,
कहानी भी कहाँ कहानी होती है।
ये अधूरापन,
ज़िन्दगी की गति है,
स्थिर नहीं होती,
ये ज़िन्दगानी कभी भी!
कहानी के बाद,
नई कहानी होती है।

बीनू भटनागर

अतीत के खजानों से
………..
अतीत के खजानों से
यादों के रँग चुराकर
मैने कुछ तस्वीरें बनार्इं
और मन की सूनी
दीवार पर टाँग दीं
अब यह तस्वीरें
मेरी तरफ प्यार से देखती
और मुस्कराती हैं
कभी-कभी तो सूनेपन में
मेरे माथे और बाल तक
सहला जाती हैं——
भीड़ में अकेले में अक्सर ही
खुद को कहता पाती हूँ
“क्या तुमने मुझे बुलाया?”

भूल जाती हूँ कि
अतीत की ये तस्वीरें तो
उस पुराने कैलेन्डर
की तरह होती हैं
जिसके दिन महीने तारीखें
सब बीत चुके हैं
ना ही कोई इनके पास जाता है ना पलटता और ना ही देखता है
बस समय की
धूल चढ़ती जाती है
और मन में गढ़ी वो कील
चुभती रह जाती है

फिर भी ए मेरे मनकी
सजीली तस्वीरों,
हठीली कविता बनकर
बाहर मत आ जाना तुम
हममें तुममें से किसीको भी तो
अकेले रहने की आदत ही नहीं—-
शैल अग्रवाल