चन्द शब्द चित्रः सुशांत सुप्रिय

धूप
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कुछ उदास-सा मैं इंडिया-गेट के मैदान में चला आया था । कुछ जोड़े किनारे की घास पर बैठे थे । किशोर मैदान में क्रिकेट खेल रहे थे । वह एक धूसर-सा दिन था । आकाश बादलों से ढँका था । सामने से एक ढाई-तीन साल की बच्ची अपनी माँ की उँगली पकड़े चली आ रही थी । जब वे मेरे बग़ल में पहुँचे तो मैंने प्यार से बच्ची को ‘ हलो , बेटा ‘ कहा । बच्ची पहले थोड़ा शर्मा गई । फिर उसने मुझे एक बहुत प्यारी मुस्कान दी और मुझे लगा जैसे मेरे चारों ओर गुनगुनी धूप खिल गई हो ।

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सपना
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बाहर तूफ़ानी हवा चल रही थी । पास ही समुद्र में दैत्याकार लहरें उठ रही थीं । वहाँ मौजूद सब लोग भाग कर पीछे आ रहे थे । पर जानी-पहचानी पीठ वाली एक युवती समुद्र-तट से टकरा रही उन लहरों की ओर चली जा रही थी । मैंने चिल्ला कर उससे पूछा — ” तुम उधर क्यों जा रही हो ? ” जवाब में वह बोली — ” दूसरी ओर तुम रहते हो , इसलिए मैं तुमसे दूर उल्टी दिशा में जा रही हूँ । ” यहीं पर मेरी आँख खुल गई और मैं सपने में मौजूद उस युवती को पहचान गया । वह मेरी प्रेमिका थी जो हाल ही में मुझसे अलग हो गई थी । शायद यह सपना मुझे यह बता रहा था कि उसके मन में मेरे प्रति प्रेम का भाव अब ख़त्म हो चुका था ।

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नौकरी
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अभी-अभी पत्र से सूचना मिली कि मुझे यह नौकरी मिल गई थी । भाई दौड़ कर मिठाई ले आया । माँ ने आशीष देते हुए मेरा माथा चूम लिया । पिता ने प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरा । उनकी आँखें कह रही थीं — यह नौकरी तो मेरे होनहार को मिलनी ही थी । बहन ‘ पार्टी हो जाए ‘ चिल्ला रही थी । किंतु मेरे मन का एक कोना आशंकित था । न जाने मैंने नौकरी पाई थी या नौकरी ने मुझे पा लिया था ।

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सुशांत सुप्रिय
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ग़ाज़ियाबाद – 201014
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